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09/01/2026

જય મેલડી માં 🌹🌹

09/01/2026

નવચંડી યજ્ઞ 08/01/2026

નવચંડી યજ્ઞ 08/01/2026
09/01/2026

નવચંડી યજ્ઞ 08/01/2026

જોગણી માં ફોટો પ્રતિષ્ઠા 🙏🌹🙏 જય જોગણી માં 🙏🌹🙏🙏🌹🙏જય મેલડી માં 🙏🌹🙏
24/04/2024

જોગણી માં ફોટો પ્રતિષ્ઠા
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01/07/2017

शुभ नवमांश में आते ग्रहों के फल

1 नृपांश :-

कोई भी स्थान का अधिपति जब नवमांश चरण में भ्रमण करता है तब जातक का कार्य द्वारा समाज मे यश कीर्ति प्राप्त करता है ।। जातक समाज मे अग्रेशर बनके खुद के अधिकार द्वारा राजा जैसे समाज मे दृष्टिगोचर होता है ।।।

2 भोग्यानश :-

जातक आनंदपूर्वक ते स्थान का फल स्थिर रह के भोगता है ।। गोचर में शुभग्रहों जब ये नवमांश में आते है तब सपरिवार उसका भोग जातक आनंदपूर्वक ओर स्थिर रह के भोगता है ।।।

3 उत्कृष्ठानश :-

जातक की फल मिले उस ओर ततपरता बढ़ जाती है ।। फल झड़प लेने सधन कर्म करता है ।। उत्तम फल उत्तम तरीके से भोग सकता है ।।।

4 पंडितांश :-

जातक खुद की समज- बुद्धि - ज्ञान द्वारा व्यवहारिक क्षेत्र के अनुलक्षी वो स्थान का फल लेके ओर भोगता है ।। शुभग्रह के गोचर से अच्छी बुद्धि बल से फल प्राप्त होता है ।।
अशुभ / पाप ग्रह के गोचर से गेरमार्गी बुद्धि बल से दुःखदायीं वातावरण खड़ा कर के फल प्राप्त करता है ।।
शुभ/ अशुभ ग्रहों के गोचर से जातक बुद्धि प्रभावित होती है और महत्व का रोल निभाता है ।।।

5 धनांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते फल जो जातक ने सोचा न होगा उससे विशेष प्रमाण में शुभ मिलता है ।। ये शुभ फल भोगने के बाद भी उसकी वृद्धि होती है ।।।

6 अभ्यांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते शुभाशुभ फल निर्भय रितो से भोगता है ।। जातक जीवन के आसपास का वातावरण सुखद हो की दुःखद उसको परिस्थिति से निर्भय रीत से भोगता है उसमें कोईभी प्रकार की चिंता रहती नही है ।।।

7 उग्रान्श :-

ये नवमांश में ग्रह आते फलो भोगने के लिये उग्रता भरी परिस्थिति निर्माण होती है । कोई भी संजोगो का निर्माण होता जातक कर्मको उग्र बना के फल भोगता है ।। फल भोग ने के लिये इच्छा प्रबल बढ़ जाती है ।।।

8 विद्यानश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को उसके विशिष्ट ज्ञान द्वारा फल प्राप्त होता है ।। जातक को ज्ञान से कैसे फल प्राप्त हो सकता है उसका ख्याल सभानपूर्वक होने की वजह से वो उसका आनंद लेके फल भोगता है ।।।

9 राज्यांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जाहेर क्षेत्रके अनुलक्षी फल मिलता है ।। जातक खुद कि प्रतिभा ओर प्रतिष्ठा विशिष्ट प्रकार से खड़ी कर के उसका लाभ खुद, परिवार और आसपास कर लोगो को मिलते है।।।

10 सेंनांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक अग्रेशर - अधिकारी बनके फल भोगता है ।। जातक विशिष्ट परिस्थिति में सब से अलग पड़ता है ।।।

11 कृपांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक की जन्मकुंडली के ग्रह जे स्थान के अधिपति हो वो स्थान के सम्बंधित दिखती बाबत व्यक्ति की कृपा द्वारा ओर प्रेमसम्बध, मित्रताभवे मददरूप होता है ओर जातक के पास से योग्य कर्म करता है ।।।

12 भृपांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातकने अधिकार द्वारा फल प्राप्त होता है ।। अधिकार प्रतिष्ठ जातक को मिलता रहता है।। ये फल भोगता जातक आनंद में रहता है और हर्ष पामता है ।।।

13 सौख़याश :-

ये नवमांश में ग्रह आते परिस्थिति में सौम्यता आती है या खड़ी होती है ।। सौख़याश का अर्थ है सुखदाता है ।। उससे फल में आनंद और सुखप्राप्ति होती है ।। शुभ ग्रह हो तो जातक दीर्घ काल तक फल भोगता है ओर पापग्रह होतो जातक को चिंताओं खड़ी होती है लेकिन बाद में आनंद - सुख की प्राप्ति होती है ।।।

14 शुरांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक स्व - पराक्रम से फल मिलता है ये फल भोगता जातक अग्रणी होता परिस्थिति को गर्वपूर्वक दीर्घ काल के लिये भोगता है ।।।

15 न्यायानश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक कुछ ऐसा कर्म करता है कि वो कर्मानुसार फल मिलता है ।। जोभी कर्म नीति अनुसार न्यायपूर्वक पुरुषार्थ कर ते मुजब फल मिलता है ।।।

16 शुभांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक का कर्म शुभ और संस्कार में रह के फल प्राप्त होता है ।। पापग्रह की नकारात्मक फल देनेकी क्षमता भी धीरे धीरे नाश होता जाता है ओर last में शुभ फल प्राप्त होता है ।। शुभांश में पापग्रह की अशुभता को दूर करने की क्षमता है ।।।

17 बलिष्ठानश :-

ये नवमांश में ग्रह आते फल को ज्यादा बल मिलता है ।। पापग्रह वो स्थान का शुभ फल का नाश करके चिंता करते है ।। अगर कोई शुभ ग्रह की असर न होय तो ते स्थान का फल का नाश करता है ।।।

सोमयांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को सौम्य ओर मृदुता से भरे वातावरण में सहजता से फल मिलता है ।। जो पापग्रह हो तो वो समय के दौरान वातावरण अशुभ तत्व का होके फलप्राप्ति में चिंता रहता है ओर पहले जो भी शुभफल प्राप्त हुवा होता है उसका भी नाश होता है ।।।

19 अर्थांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को फल की प्राप्ति होय ते कर्म हेतुलक्षी बना के सतत प्रयत्नशील रहता है ।। ये फलो के लिये जातक का अधिकार रहता है और इसकी प्राप्ति में यश और कीर्ति भी अच्छी रीत से मिलती है ।।।

20 मंगलांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को फल की प्राप्ति मंगलमय वातावरण में होता है ।। जातक को फल प्राप्ति में निजानंद ओर संतोष होता है ।। मांगलिक कार्य सिद्धिपूर्वक आयोजन होता है ।।।

21 शोभनांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को फल की प्राप्ति शोभायमान वातावरण में होता है ।। जातक फल प्राप्ति के समय शोभायमान होता है ओर show off करने की वृत्ति बढ़ती है ।।।

22 विचक्षणांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक खुद की विचक्षण बुद्धि बल से फल प्राप्त करता है ।। जातक चतुर ओर पीढ़ व्यक्ति में गणना होती है ।।।

23 उत्तमानश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक फल की प्राप्ति उत्तम कर्म करके लेता है ।।।

24 उत्पन्नांश :-

ये नवमांश में आते ग्रह जातक फल प्राप्ति के लिये खूब महेनत करता है।।।

अशुभ नवमांश में आते ग्रहों के फल

1 तस्करान्स :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक फल प्राप्ति के लिये अनीति अप्रामाणिकता से कर्म करके फल का अधिकारी न हो तो भी फल प्राप्ति के लिये गुप्त योजना करता है ।। उसकी गुप्तता खुद के लिये लाभकर्ता नही होती है ।।।

2 पापांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक फल की प्राप्ति के लिये अधिकार बिना , गेर रीति से या किसीका हक्क पे हाथ डालके उससे छीन के फल प्राप्ति करता है।।लेकिन फल हमेशा जातक के लिये दुःखदायीं साबित होता है ।। शुभ ग्रह आते परिस्थिति अच्छी हो तोभी प्रलोभनकारी वातावरण होता last में वो अन्याय और अनीति से दुःख प्राप्त होता है।।।

3 नीचांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक सच्चे मन से करे हुवे प्रयत्नों करता है लेकिन जो फल मिलना चाहिए ऐसा मिलता नही है ।। इसका फल कितना भी अच्छा हो लेकिन फल के भोग में एक प्रकार की अतृप्ति या असन्तोष रहता है ।। अच्छे फल में भी चिंता खड़ी होती है ।। फलप्राप्ति में जिस प्रकार की आशा होती है उससे विपरीत फल मिलता है ।।।

4 दरिद्रांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते कितना भी शुभफल मिलने वाला हो तोभी चिंताजनक परिस्थिति निर्माण होती है और सब रीत से गवाना पड़ता है ।। कभी कभी शुभग्रह के भृमण से फल विशेष प्रमाण में मिलता जातक खुद की कृपणता की वजह से जातक ये शुभ फलों के उपयोग करनेके लिये खुद को दरिद्रता की अनुभूति होती है ।। फल की जरूरत होने पर भी ओर जातक की लायकात उसका भोग नही कर सकता है ।।।

5 नपुंसकांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को जो फल मिलते है उसमें अतृप्ति असंतोष के साथ फलो को जातक भुगत नही सकता ।। शुभग्रह के गोचर से विरोधी वातावरण शांत होता है ।। लेकिंजो फलो मिलता है उसमें चिंता और व्यथा होती है ।।।

6 क्रुरांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक जो भी कर्म करे वहा क्रूरता से भरपूर वातावरण खड़ा होता है ।। जातक को चिंता व्यथा के साथ आनंद रहता नही है ।। शुभग्रह का गोचर से जातक अनीति के मार्ग से फल लेता है तो भी असन्तोष रहता है ।।।

7 भयांश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक जो कोई फल मिलता है वो भयभीत वातावरण में मिलता है।।।

8 तिक्षणाश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को जो फल मिलने के लिये जो पर्यत्न करता है वो तीक्ष्णता से दुसरो को परेशान करने के बाद मिलता है इसकी वजह से जातक को फल मिलने में मुशीबतों का सामना करना पड़ता है ।।।

9 क्रोधानश :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को जो फल मिलता है वो असहकार की परिस्थिति ओर क्रोधित वातावरण में मिलता है तो जातक को उस फल में हर्ष नही रहता है ।।।

10 चंडान्स :-

ये नवमांश में ग्रह आते जातक को जो शुभग्रह हो तो न धारेली शक्ति द्वारा धारेलू फल देता है लेकिन परिस्थिति ऐसी निर्माण होती है कि जातक फल भोगने में मन नही रहता है और पापग्रह ओर अशुभ ग्रह होतो अशुभ फल मिलता है ।।।

🙏 शुभम भवतु

13/07/2016

१.जन्म कुंडली का परिचय
जन्म कुंडली को पढ़ने के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखा जाता है. आइए सबसे पहले उन बातो को आपके सामने रखने का प्रयास करें. जन्मकुंडली बच्चे के जन्म के समय विशेष पर आकाश का एक नक्शा है.
जन्म कुंडली में एक समय विशेष पर ग्रहो की स्थिति तथा चाल का पता चलता है. जन्म कुंडली में बारह खाने बने होते हैं जिन्हें भाव कहा जाता है. जन्म कुण्डली अलग - अलग स्थानो पर अलग-अलग तरह से बनती है. जैसे भारतीय पद्धति तथा पाश्चात्य पद्धति. भारतीय पद्धति में भी उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय तथा पूर्वी भारत में बनी कुंडली भिन्न होती है.
जन्म कुंडली बनाने के लिए बारह राशियों का उपयोग होता है, जो मेष से मीन राशि तक होती हैं. बारह अलग भावों में बारह अलग-अलग राशियाँ आती है. एक भाव में एक राशि ही आती है. जन्म के समय भचक्र पर जो राशि उदय होती है वह कुंडली के पहले भाव में आती है.
अन्य राशियाँ फिर क्रम से विपरीत दिशा(एंटी क्लॉक वाइज) में चलती है. माना पहले भाव में मिथुन राशि आती है तो दूसरे भाव में कर्क राशि आएगी और इसी तरह से बाकी राशियाँ भी चलेगी. अंतिम और बारहवें भाव में वृष राशि आती है!

२.भाव का परिचय
जन्म कुंडली में भाव क्या होते हैं आइए उन्हेँ जानने का प्रयास करें. जन्म कुंडली में बारह भाव होते हैं और हर भाव में एक राशि होती है. कुँडली के सभी भाव जीवन के किसी ना किसी क्षेत्र से संबंधित होते हैं. इन भावों के शास्त्रो में जो नाम दिए गए हैं वैसे ही इनका काम भी होता है. पहला भाव तन, दूसरा धन, तीसरा सहोदर, चतुर्थ मातृ, पंचम पुत्र, छठा अरि, सप्तम रिपु, आठवाँ आयु, नवम धर्म, दशम कर्म, एकादश आय तो द्वादश व्यय भाव कहलाता है़.
सभी बारह भावों को भिन्न काम मिले होते हैं. कुछ भाव अच्छे तो कुछ भाव बुरे भी होते हैं. जिस भाव में जो राशि होती है उसका स्वामी उस भाव का भावेश कहलाता है. हर भाव में भिन्न राशि आती है लेकिन हर भाव का कारक निश्चित होता है.
बुरे भाव के स्वामी अच्छे भावों से संबंध बनाए तो अशुभ होते हैं और यह शुभ भावों को खराब भी कर देते हैं. अच्छे भाव के स्वामी अच्छे भाव से संबंध बनाए तो शुभ माने जाते हैं और व्यक्ति को जीवन में बहुत कुछ देने की क्षमता रखते हैं. किसी भाव के स्वामी का अपने भाव से पीछे जाना अच्छा नहीं होता है, इससे भाव के गुणो का ह्रास होता है. भाव स्वामी का अपने भाव से आगे जाना अच्छा होता है. इससे भाव के गुणो में वृद्धि होती है.

३. ग्रहो की स्थिति
जन्म कुंडली मैं सबसे आवश्यक ग्रहों की स्थिति है, आइए उसे जाने़. ग्रह स्थिति का अध्ययन करना जन्म कुंडली का बहुत महत्वपूर्ण पहलू है. इनके अध्ययन के बिना कुंडली का कोई आधार ही नहीं है.
पहले यह देखें कि किस भाव में कौन सा ग्रह गया है, उसे नोट कर लें. फिर देखें कि ग्रह जिस राशि में स्थित है उसके साथ ग्रह का कैसा व्यवहार है. जन्म कुंडली में ग्रह मित्र राशि में है या शत्रु राशि में स्थित है, यह एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है इसे नोट करें. ग्रह उच्च, नीच, मूल त्रिकोण या स्वराशि में है, यह देखें और नोट करें.
जन्म कुंडली के अन्य कौन से ग्रहों से संबंध बन रहे है इसे भी देखें. जिनसे ग्रह का संबंध बन रहा है वह शुभ हैं या अशुभ हैं, यह जांचे. जन्म कुंडली में ग्रह किसी तरह के योग में शामिल है या नहीं, जैसे राजयोग, धनयोग, अरिष्ट योग आदि अन्य बहुत से योग है.

४. कुंडली का फलकथन
फलकथन की चर्चा करते हैं, भाव तथा ग्रह के अध्ययन के बाद जन्म् कुंडली के फलित करने का प्रयास करें. पहले भाव से लेकर बारहवें भाव तक के फलों को देखें कि कौन सा भाव क्या देने में सक्षम है. कौन सा भाव क्या देता है और वह कब अपना फल देगा यह जानने का प्रयास गौर से करें. भाव, भावेश तथा कारक तीनो की कुंडली में स्थिति का अवलोकन करना आवश्यक होता है. जन्म कुंडली में तीनो बली हैं तो जीवन में चीजें बहुत अच्छी होगी.
तीन में से दो बली हैं तब कुछ कम मिलने की संभावना बनती है लेकिन फिर भी अच्छी होगी. यदि तीनो ही कमजोर हैं तब शुभ फल नहीं मिलते हैं और परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है

५. दशा का अध्ययन
अभी तक बताई सभी बातों के बाद दशा की भूमिका आती है, बिना अनुकूल दशा कै कुछ् नहीं मिलता है. आइए इसे समझने का प्रयास करें. सबसे पहले यह देखें कि जन्म कुंडली में किस ग्रह की दशा चल रही है और वह ग्रह किसी तरह का कोई योग तो नहीं बना रहा है.
जिस ग्रह की दशा चल रही है वह किस भाव का स्वामी है और कहाँ स्थित है, यह जांचे. कुंडली में महादशा नाथ और अन्तर्दशानाथ आपस में मित्रता का भाव रखते है या शत्रुता का भाव रखते हैं यह देखें.
कुंडली के अध्ययन के समय महादशानाथ से अन्तर्दशानाथ किस भाव में स्थित है अर्थात जिस भाव में महादशानाथ स्थित है उससे कितने भाव अन्तर्दशानाथ स्थित है, यह देखें. महादशानाथ बली है या निर्बल है इसे देखें. महादशानाथ का जन्म और नवांश कुंडली दोनो में अध्ययन करें कि दोनो में ही बली है या एक मे बली तो दूसरे में निर्बल तो नहीं है यह देखे।

६. गोचर का अध्ययन
सभी बातो के बाद आइए अब ग्रहो के गोचर की बात करें. दशा के अध्ययन के साथ गोचर महत्वपूर्ण होता है. कुंडली की अनुकूल दशा के साथ ग्रहों का अनुकूल गोचर भी आवश्यक है तभी शुभ फल मिलते हैं.
किसी भी महत्वपूर्ण घटना के लिए शनि तथा गुरु का दोहरा गोचर जरुरी है. जन्म कुंडली में यदि दशा नहीं होगी और गोचर होगा तो अनुकूल फलों की प्राप्ति नहीं होती है क्योकि अकेला गोचर किसी तरह का फल देने में सक्षम नहीं होता है।

७. कैसे बनाएं कुंडली
कुंडली बनाने का कार्य मुख्य रूप से पंडित या ब्राह्ममण करते हैं लेकिन आज इंटरनेट ने अपना विस्तार इस तरह किया है कि ज्योतिष की इस अहम शाखा में भी उसकी पहुंच हो गई है। आज कई वेबसाइट्स और सॉफ़्टवेयर भी कुंडली बनाती हैं। इनमें से कई तो आपको पूर्ण हिन्दी या अंग्रेजी में भी कुंडली उपलब्ध कराते है।

८. सप्तम भाव बहुत ही महत्वपूर्ण होता है
ज्योतिषीय द्रष्टि से जातक की शादी के लिए उसकी कुंडली का सप्तम भाव बहुत ही महत्वपूर्ण होता है | सप्तम भाव के आदर पर ही विद्धवान ज्योतिषी जातक की शादी ओर पत्नी सुख के बारे में अपनी भविष्यवाणी कहते है | हम देखते है की कभी कभी सुन्दर स्वस्थ्य ओर धनवान होने के बाद भी किसी किसी जातक अथवा जातिका का विवाह नहीं होता है तो इसका कारण उसका सप्तम भाव अथवा सप्तमेश बिगड़ा हुआ है ओर यह भाव बिगड़ा हुवा कैसे है यह हम आगे कुछ ज्योतिषीय जानकारी के माध्यम से पता करेंगे | आगे जों भी कारण लिखा है उनको आप स्वयं देखे पढ़े ओर समझे ओर कुंडली देखकर विचार करेगे तो पाएंगे की ज्योतिषीय जानकारी कितनी स्टिक ओर स्पस्ट है |
सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है।
सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है।
कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है।
यदि सप्तम भाव में सम राशि है।
सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है।
सप्तमेश बली है।
सप्तम में कोई ग्रह नही है।
किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है।
दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है।
सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।

९. विवाह नही होगा अगर
सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है।
सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है।
सप्तमेश नीच राशि में है।
सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है।
चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों।
शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों।
शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों।
शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो।
शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों।
पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों।
सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो.

१०. विवाह में देरी
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है।
चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।
सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है।
सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।
सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।
लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है।
महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है।
राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है.

११.विवाह का समय
सप्तम या सप्तम से सम्बन्ध रखने वाले ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
कन्या की कुन्डली में शुक्र से सप्तम और पुरुष की कुन्डली में गुरु से सप्तम की दशा में या अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश की महादशा में पुरुष के प्रति शुक्र या चन्द्र की अन्तर्दशा में और स्त्री के प्रति गुरु या मंगल की अन्तर्दशा में विवाह होता है।
सप्तमेश जिस राशि में हो,उस राशि के स्वामी के त्रिकोण में गुरु के आने पर विवाह होता है।
गुरु गोचर से सप्तम में या लगन में या चन्द्र राशि में या चन्द्र राशि के सप्तम में आये तो विवाह होता है।
गुरु का गोचर जब सप्तमेश और लगनेश की स्पष्ट राशि के जोड में आये तो विवाह होता है।
सप्तमेश जब गोचर से शुक्र की राशि में आये और गुरु से सम्बन्ध बना ले तो विवाह या शारीरिक सम्बन्ध बनता है।
सप्तमेश और गुरु का त्रिकोणात्मक सम्पर्क गोचर से शादी करवा देता है,या प्यार प्रेम चालू हो जाता है।
चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है.

१२.
परिचय
काल पुरुख जिसकी कल्पना हम ज्योतिष शास्त्र में करते हैं और जिसके रचयता ब्रह्माजी हैं और जो सम्पूरण जातकों का प्रतिनिधितव भी करता है वह असल में किस प्रकार से कार्य करता है ! यहाँ पर विचारणीय बात ये भी है की जिस लाल किताब का आज इतना प्रचार किया जा रहा है वो भी इसी काल पुरुख लगन से प्रेरित है और उसका महत्व उपचार पर ज्यादा है , इसी प्रकार से अंक विद्या , केपी सिस्टम जो की बहुत ही सटीकता से फोरकास्टिंग करता है और न जाने कितने सिस्टम हैं ज्योतिष विद्या में वे सब के सब अपने आप में महत्व पूरण माने जाते हैं पर उन सब का आधार यही काल पुरुख कुंडली माना जाता है , इसके बाहर तो ज्योतिष शास्त्र की कल्पना करना भी बेकार है

१३. प्रथम भाव
उसमें काल पुरुख की मेष राशि यानी एरीज जोडिएक पड़ता है और जिसका के स्वामित्व हम मंगल गृह को मानते हैं , वह मंगल फिर अष्टम भाव का भी स्वामी मन जाता है क्यों की उसकी दूसरी राशि वृश्चिक वहां पड़ती है और दोनों राशियों का अपना अलग प्रभाव मन जाएगा , तो हम बात कर रहे थे पहले भाव की की वहां मेष राशी जिसका स्वामी मंगल को माना जाता है व रुधिर जिसे हम खून भी कहते है का शरीर में प्रतिनिधितव करता करता है और मंगल को हम उत्साह व उर्जा का कारक भी मानते हैं दुसरे वहां पर सूर्य उच्च का मन जाता है वह भी उर्जा का प्रकार मन जाता है तो दोनों मंगल और सूर्य उर्जा के कारक होने के साथ साथ अग्नि के कारक भी है इसलिए ये जीवन के संचालक गृह प्रथम भाव के कारक बनाये गए जो की पूरण तया तर्कसंगत मन जाएगा , अब मेडिकल साइंस के मुताविक भी इनका यही मतलव निकलता है क्यों को विज्ञान भी यही मानता आया है की ये सारा ब्रह्माण्ड एक उर्जा के आधीन है और प्रमाणित व प्रतक्ष रूप से सूर्य तो इसका प्रमाण है ही , अब विचारनिए बात यह है की जीवन जीने के लिए वो भी सही जीवन जीने के लिए हमें इस उर्जा का सही समन्वय करना पड़ता है नहीं तो हम कहीं न कहीं पिछड़ना शुरू हो जाते हैं सो हमें उर्जा का नेगेटिव या पॉजिटिव प्रयोग करना आना चाहिए , अपनी अपनी पर्सनल होरोस्कोप में देखने पर इन दोनों उर्जा युक्त ग्रहों का किस प्रकार से बैठे हैं , किन किन नक्षत्रों में , उप नक्षत्रों में और आगे उप उप नक्षत्रों में, नव्मंषा कुंडली में, षोडस वर्गों में, अष्टक वर्गों में , पराशर शास्त्र अनुसार की प्लेनेट और न जाने और कितनी विधियों अनुसार देखने के वाद ही ये पता चलता है के वे गृह कितने बलवान हैं , मात्र एक आधी विधि अपूरण मानी जाती गयी है , और विचारनिए बात ये भी है के आज के वक्त में इस पवित्र शास्त्र का मज़ाक बना कर रख दिया गया है मात्र सिर्फ भौतिकता के चलते ऐसा हो रहा है , क्यों के हर आदमी दो चार किताबें पढ़ कर अपने आप को ज्ञानी मानने लगता है और आज जब सब कुछ कोमर्शिअल यानी व्यावसायिक सोच सब पर हावी हो चुकी है तो हर चीज की सैंक्टिटी यानी पवित्रता ख़तम हो रही है , जब स्वार्थ हावी हो जाए तो अक्ल पर पर्दा पड़ना शुरू हो जाता है, तो हम यहाँ देखते हैं के इन दोनों ऊर्जायों का हम कैसे सही इस्तेमाल करते हैं और जैसे के अगर कहीं न कहीं कोई ग्रहों में कमी पूर्व जनित कर्मो के कारण आ गयी हो तो हम उसमे काफी हद तक सुधार भी ला सकते हैं , हालांकि वह सुधार अपनी अपनी बिल्पावेर यानि इच्छा शक्ति , करम और प्रभु पर पूरण भरोसा इसी के चलते पूरण हो पाती

१४. कुटुम्भ व धन भाव
बात करते हैं दुसरे भाव की यानि कुटुम्भ व धन भाव की तो वहां का स्वामित्व शुक्र व् चन्द्र को दिया है और कारक गुरु को माना गया है , एशिया क्यों इसलिए की शुक्र भौतिक गृह है और भौतिक सुखों को प्राप्त करने के लिए धन की ज़रुरत पड़ती ही है , विचारनिए बात यहाँ ये भी है के गुरु को दुसरे, पांचवे , नवं और एकादस का कारक भी माना गया है क्यों की सब असली निधियों का स्वामी गुरु ही होता है जो के किसी के साथ कभी पक्षपात नहीं करता और अगर ये ही अधिकार दुसरे गृह को दिया गया होता तो व ज़रूरी पक्षपात करता , तो यही वृहस्पति का बढ़प्पन माना जाता है जो की किसी के साथ कभी अन्याय नहीं करते हैं और सबको सद्बुधि देने वाले गृह माने जाते हैं ! हम यह भी देखते हैं के दूसरा भाव मारकेश का भी मन जाता है वजह चाहे जो भी रही हो मसलन के अष्टम जो के आयु का भाव माना गया है उससे अष्टम यानी तृत भाव से दवाद्ष भाव यानी दूसरा भाव इसलिए इसे मारकेश माना जाएगा परन्तु दर्शन के रूप में देखें तो यही पता चलता है के शुक्र और चन्द्र के रूप में जो हम भौतिकता जब वृहस्पति रुपी प्यूरिटी को हम एक्सक्लूड यानि बाहर करना शुरू करते हैं तो वह मारक का काम करना शुरू कर देती है , जैसा के मैंने बोला के हम यहाँ इसको लॉजिकल एंगल से देखें तो यही निष्कर्ष निकलता है के बिना मतलब का, बिना मेहनत और गलत तरीकों से कमाया भौतिक सुख आखिरकार हमारे लिए मारकेश का ही काम करेगा
१४. तीसरा और आगे छठा भाव
तीसरा और आगे छठा भाव दोनों का स्वामी और कारक बुध व मंगल को माना जाएगा , यहाँ पर बुध भाई बहनों का और छठे भ्हाव में बंधू बांधवों का जो इए वे भी भाई बहनों के रूप में हमारे सामने आते हैं का कारक बन जाता है दूसरा है मंगल तो इन दोनों ग्रहों की इसलिए स्वामित्व मिला के बुध रुपी लचकता व जुबान से और पराक्रम से ही हम बंधुयों के साथ इंटरैक्ट करते हैं , बुध यानी जुबान का उचित प्रयोग ही हमें सबका मित्र या शत्रु बनाता है और सही व पॉजिटिव मंगल रुपी साहस और पराक्रम हमें विजयी बनाता है ! इस के साथ हम इनके दुसरे भाव यानि छठे भाव को भी देखें के जो की शत्रुता व रोग और ऋण का स्वामी होता है उस संधर्भ में हम देखते हैं के दोनों ग्रहों का सही तालमेल हमें विजेता बनाता है , शत्रु का यहाँ लॉजिकल मतलव जीवन रुपी संघर्ष से है तो यहाँ हम देखते हैं के कैसे वही दोनों गृह उन चीजों का सही रूप में निपटारा करते नज़र आते हैं, और कैसे दो धारी तलवार की तरह बन जाते है।

१५. चतुर्थ भाव
चतुर्थ भाव की बात करें तो यह भाव सुख का मन जाता है और इस भाव का स्वामी चन्द्र और कारक वृहस्पति को माना जाता है , ये दोनों गृह जब आपस में मिलते हैं तो कुंडली में एक प्रकार का गजकेसरी योग बना देते हैं , यानी गज का यहाँ मतलब हाथी से है तो केसरी शेर को कहते हैं जब दोनों ताक़तवर मिल जाएँ तो क्या कहना , ठीक इसी प्रकार से इन दोनों ग्रहों की कल्पना की गयी और उन्हें सुख स्थान का स्वामी बनाया गया , वैसे भी हम देखें तो सिर्फ वृहस्पति ही ऐसा गृह नज़र आता है जो सौर मंडल में सबसे बड़ा और ज्ञान का दाता माना गया है अगर और किसी गृह को ये अधिकार दे दिया होता जैसे शुक्राचार्य को तो जो के सिर्फ वाहरी भौतिक सुखों का कारक है तो क्या होता ! चतुर्थ स्थान माँ का भी माना गया है और ज्योतिष में चन्द्र को माँ का कारक माना जाता है , माँ के आँचल में ही संतान को सुख मिलता है ।

१६. पंचम भाव
पंचम भाव का स्वामी सूर्य और कारक वही गुरु को बनाया गया क्यों की सूर्य रुपी प्रकाश द्वारा ही हम पंचम रुपी विद्या ग्रहण करते हैं और इसके संतान कारक होने का कारण भी यही है के संतान ही अपने माता पिता का नाम रौशन करती है , इसी पंचम से हर व्यक्ति की मानसिकता भी देखी जाती है तो उन कारकों की पोजीशन के अनुसार ही हम कोई निर्णय ले सकते हैं ।

१७. सातवाँ भाव
सातवाँ भाव पति या पत्नी और काम का माना जाता है और इसका स्वामी फिर शुक्र बन जाता है , शुक्र जिसे हम इस दुनिया में भौतिक सुखों का कारक मानते हैं वही नर यानी मंगल यानि रुधिर और मादा यानी शुक्र यानी वरीय रूप से श्रृष्टि का कारण बनता है वैसे भी लॉजिक एंगल से देखें तो शरीर में इन दोनों तत्वों का होना ही जीवन का कारण बनता है ! अब यही सप्तम भाव फिर मारक बन जाता है क्यों की जब हम भौतिकता की अधिकता या कह सकते हैं के भौतिक सुख को प्राप्त करने के एवज में मारकता सहन करनी ही पड़ती है ।

१८. अष्टम भाव
अष्टम भाव जिसे आयु और कष्टों का भाव माना जाता है उसका स्वामी फिर वही मंगल और कारक शनि बन जाता है तो अगर मंगल उर्जा के रूप में हमें जीवन देता है तो वही उर्जा दिए और वाती की तरह जब धीमी पड़नी शुरू हो जाती है तो जीवन ख़तम हो जाता है , जैसे जितना तेल हम दीपक में डालेंगे उतनी ही देर तक वह जलता रहेगा और उसके बाद उसे बुझना ही पड़ेगा इसी प्रक्कर से अष्टम भाव कार्य करता है ।

१९. नवम भाव
नवम भाव के बारे में चर्चा करेंगे के यह भाव धरम का और भाग्य का माना जाता है और इसका स्वामी और कारक सिर्फ एक की गृह बनता है वो है देव गुरु वृहस्पति जो के समस्त सुखों का कारक है और हमें यही सन्देश देता है के हमें मानवता का धर्म अपनाते हुए ही करमरत रहना चाहिए क्यों की चाहे इस संसार में आदमी ने कितने धरम बनाये हैं वो अपनी व्यक्तिगत सोच और परम्परा के अनुसार बनाये जाते हैं पर कल्पुरुख लग्न के रूप में ईश्वर ने सिर्फ एक ही धरम बनाया जो की सिर्फ मानवता ही है वैसे भी धरम का मतलब होता है धारण करना यानी आप किसी विचार को धारण करते हैं और उसके बनाये नियम में चलते हैं ये सब कुछ तभी बनाये गए क्यों की यह संसार विविद्ध संस्कृतियों के मेल जोल से बनता है और हम एक दुसरे का आदर करते हुए सबसे कुछ न कुछ सीखते रहते हैं पर इस चीज़ को न भूलते हुए के इश्वर को सिर्फ और सिर्फ मानवता का ही धरम अच्छा लगता है तभी जब काल्पुरुख कुंडली की ब्रह्मा ने कल्पना की होगी तो शुक्र रुपी भौतिकता का ख्याल ना आते हुए आध्यात्मिक देव गुरु वृहस्पति को ही इस पदवी का हक़दार बनाया गया क्यों की तमाम धरम ग्रंथों व गीता का भी अंत का सन्देश सिर्फ मोक्ष को ही माना गया जिसका सन्देश योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था और इस पर निरर्थक वादविवाद से कोई फायदा नहीं क्यों की मोक्ष का कांसेप्ट बहुत गहरा है जो हर किसी के बस की बात नहीं

30/06/2016

अंक ज्योतिष
अंक ज्योतिष

अंक ज्योतिष के अनुसार जन्म तारीख के कुल योग को मूलांक कहते है , DD :MM :YYYY के कुल योग को भाग्यांक कहते है, मूलांक और भाग्यांक के अनुसार काम करने से जीवन में रुके हुए काम पुरे होते चले जाते है :-
अंकज्योतिष में नौ ग्रहों सूर्य, चन्द्र, गुरू, यूरेनस, बुध, शुक्र, वरूण, शनि और मंगल की विशेषताओं के आधार पर गणना की जाती है। इन में से प्रत्येक ग्रह के लिए 1 से लेकर 9 तक कोई एक अंक निर्धारित किया गया है, कौन से ग्रह पर किस अंक का असर होता है। ये नौ ग्रह मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
आइये जाने किस अंक का कौन स्वामी है :-
जन्म तारीख 1, 10, 19, 28 का मूलांक 1 का स्वामी सूर्य है
2, 11, 20, 29 तारीख को जन्मे व्यक्ति का मूलांक- 2 स्वामी चंद्रमा
3, 12, 21, 30 मूलांक- 3, स्वामी गुरू
4, 13, 22, 31 मूलांक 4 का स्वामी- राहु
5, 14, 23 मूलांक 5 स्वामी बुध
6, 15, 24 मूलांक 6 स्वामी शुक्र
7, 16, 25 मूलांक 7 स्वामी केतु
8, 17, 26 मूलांक 8 स्वामी- शनि-
9, 18, 27 मूलांक 9 स्वामी मंगल
आइये जाने भाग्यशाली अंक, अंको के रंग और शुभ दिशा
मूलांक 1 : यह अंक स्वतंत्र व्यक्तित्व का धनी है। इससे संभावित अंह का बोध, आत्म निर्भरता, प्रतिज्ञा, दृढ़ इच्छा शक्ति एवं विशिष्ट व्यक्तित्व दृष्टि गोचर होता है। इसके स्वामी सूर्य हैं. जिस व्यक्ति का जन्म समय 21 जुलाई से 28 अगस्त के मध्य हो, का प्रभाव सूर्य के नियंत्रण में होता है, इनके लिए शुभ तिथि 1,10,19 एवं 28 तारीख है. चार अंक से इनका जबरदस्त आकर्षण होता है. इनके लिए शुभ दिन रविवार एवं सोमवार है, तो शुभ रंग पीला, हरा एवं भूरा है. ये अपने ऑफिस, शयनकक्ष परदे, बेडशीट एवं दीवारों के रंग इन्हीं रंगों में करें, तो भाग्य पूर्णत: साथ देता है. इस मूलांक के व्यक्ति शासन के शीर्ष पद पर देखे जाते हैं. छह एवं आठ अंक वाले इनके शत्रु हैं. इनकी शुभ दिशा ईशान कोण है.
मूलांक 2 : अंक दो का संबंध मन से है। यह मानसिक आकर्षण, हृदय की भावना, सहानुभूति, संदेह, घृणा एवं दुविधा दर्शाता है। इसका प्रतिनिधित्व चन्द्र को मिला है, इस अंक का स्वामी चंद्रमा है 2,11, 20, 29 तारीख अति शुभ हैं. रविवार, सोमवार एवं शुक्रवार श्रेष्ठ दिन हैं. सफेद एवं हल्का हरा इनके शुभ रंग हैं.
मूलांक 3 : इस अंक के स्वामी देव गुरु वृहस्पति हैं .इससे बढ़ोत्तरी, बुद्धि विकास क्षमता, धन वृद्धि एवं सफलता मिलती है। 3, 12, 21 एवं 30 तारीख इनके लिए विशेष शुभ हैं. मंगलवार, गुरुवार एवं शुक्रवार श्रेष्ठ है. पीला एवं गुलाबी रंग अतिशुभ है. शुभ माह जनवरी एवं जुलाई है. दक्षिण, पश्चिम एवं अग्नि कोण श्रेष्ठ दिशा है.
मूलांक 4 : इस अंक से मनुष्य की हैसियत, भौतिक सुख संपदा, सम्पत्ति, कब्जा, उपलब्धि एवं श्रेय प्राप्त होता है। इसका प्रतिनिधि हर्षल और राहु हैं. 2, 11, 20 एवं 29 तारीख शुभ है. रविवार, सोमवार एवं शनिवार श्रेष्ठ दिन हैं, जिसमें शनिवार सर्वश्रेष्ठ है. नीला एवं भूरा रंग शुभ है.
मूलांक 5 : इस अंक का स्वामी बुध है. शुभ तिथि 5, 14 एवं 23 है. सोमवार, बुधवार एवं शुक्रवार श्रेष्ठ है. उसमें शुक्रवार सर्वाधिक शुभ है. सफेद, खाकी एवं हल्का हरा रंग इनके लिए शुभ है. इनके लिए अशुभ अंक 2, 6 और 9 है.
मूलांक 6 : इस अंक का स्वामी शुक्र है. छह का अंक वैवाहिक जीवन, प्रेम एवं प्रेम-विवाह, आपसी संबंध, सहयोग, सहानुभूति, संगीत, कला, अभिनय एवं नृत्य का परिचायक है।शुभ तिथि माह की 6,15 एवं 24 तारीख है. मंगलवार, गुरुवार एवं शुक्रवार श्रेष्ठ दिन है जिसमें शुक्रवार सर्वश्रेष्ठ है. आसमानी, हल्का एवं गहरा नीला एवं गुलाबी रंग शुभ हैं. लाल एवं काले रंग का प्रयोग वर्जित है.
मूलांक 7 : इस अंक का स्वामी केतु है. सात का अंक आपसी ताल मेल, साझेदारी, समझौता, अनुबंध, शान्ति, आपसी सामंजस्य एवं कटुता को जन्म देता है।महीना के 7, 16 एवं 25 तारीख सर्वश्रेष्ठ है. 21 जून से 25 जुलाई तक का समय भी श्रेष्ठ है. रविवार, सोमवार एवं बुधवार श्रेष्ठ हैं. जिसमें सोमवार सर्वश्रेष्ठ है. शुभ रंग हरा, सफेद एवं हल्का पीला है.
मूलांक 8 : इस अंक का स्वामी शनि हैं. 8, 17 एवं 26 तारीख श्रेष्ठ तिथि हैं.शनि का अंक होने से इस अंक से क्षीणता, शारीरिक मानसिक एवं आर्थिक कमजोरी, क्षति, हानि, पूर्ननिर्माण, मृत्यु, दुःख, लुप्त हो जाना या बहिर्गमन हो जाता है, रविवार, सोमवार एवं शनिवार शुभ हैं. जिसमें शनिवार सर्वाधिक शुभ है. भूरा, गहरा नीला, बैगनी, सफेद एवं काला शुभ रंग है. हृदय एवं वायु रोग इनके प्रभाव क्षेत्र हैं. दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिण-पूर्व दिशा शुभ हैं.
मूलांक 9 : अंक नौ का स्वामी मंगल है. इस मूलांक के लोगों पर मंगल ग्रह का प्रभाव सर्वाधिक है.यह अन्तिम ईकाई अंक होने से संघर्ष, युद्ध, क्रोध, ऊर्जा, साहस एवं तीव्रता
नोट - अपना भुत-भविष्य जानने के लिए और सटीक उपायो के लिए सम्पर्क करे मगर ध्यान रहे ये सेवाएं सशुल्क और पेड़ कंसल्टिंग के तहत है , जानने के लिए अपनी फ़ोटो, वास्तु की फ़ोटो, दोनों हथेलियो की फ़ोटो और बर्थ डिटेल्स भेजे
ज्योतिषाचार्य,लाल किताब, वास्तु तज्ञ,kp, वैदिक पराशरी जैमिनी एक्सपर्ट ,तन्त्र प्रवीण ज्योतिष भास्कर त्रिवीक्रम

28/05/2016

"गुरु"संसार में ईश्वर ही केवल सत्य है और सभी असत्य है।
28-मई-2016
वार:-शनिवार
तिथी :-06षष्ठी07:09
पक्ष:-कृष्णपक्ष
माह:-ज्येष्ठ
नक्षत्र:-धनिष्ठा27:56
योग:-ऐन्द्र21:26
चन्द्रमा:-मकर16:01तक/कुंभ
सुर्योदय:-05:38
सुर्याअस्त:-19:10
दिशा शुल.....पूर्व
निवारण उपाय:-उङद का सेवन
ऋतु :-ग्रीष्म ऋतु
गुलिक काल:-06:00से 07:30
राहू काल:-09:00से10:30
अभीजित....12:00से12:48
विक्रम सम्वंत .........2073
शक सम्वंत ............1938
युगाब्द ..................5118
सम्वंत सर नाम:-....सौम्य
चोघङिया दिन
शुभ:-07:19से09:00तक
चंचल:-12:22से14:03तक
लाभ:-14:03से15:44तक
अमृत:-15:44से17:25तक
चोघङिया रात
लाभ:-19:10से20:28तक
शुभ:-21:47से23:06तक
अमृत:-23:06से00:25तक
चंचल:-00:25से 01:44तक
लाभ:-04:22से05:38तक
चोघङिया का समय सालासर में सूर्योदय के अनुसार है|
आज के विशेष योग
वर्ष का 149वाँ दिन, भद्रा 07:09 से 16:01 तक-पाताल-धन लाभ-दक्षिण, भद्रा 16:01 से 18:48 तक-पृथ्वी-अशुभ-दक्षिण, पंचक प्रारंभ16:01 से, वीर सावरकर जयंती,
🏡वास्तु टिपस 🏡
दक्षिण दिशा के वास्तुदोषों को दूर करने के लिए मकान मालिक को भैरव की उपासना करनी चाहिए।
सुप्रभात मित्रों
Astro vipul Pandya mo:9925802652

28/05/2016

👏👏👉👉भगवान शिव के शिष्य कौन थे…
सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर सभ्यता और धर्म के
प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें
‘आदिदेव’ भी कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभ।
शिव को ‘आदिनाथ’ भी कहा जाता है। आदिनाथ
होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। इस
‘आदिश’ शब्द से ही ‘आदेश’ शब्द बना है। नाथ साधु जब
एक-दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश।
शिव तो जगत के गुरु हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले
उन्होंने अपना ज्ञान ७ लोगों को दिया था। ये ही
आगे चलकर ब्रह्मर्षि कहलाए। इन ७ ऋषियों ने शिव से
ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और
दुनिया के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और वैदिक
ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। इन सातों ऋषियों ने
ऐसा कोई व्यक्ति नहीं छोड़ा जिसको शिव कर्म,
परंपरा आदि का ज्ञान नहीं सिखाया गया हो। आज
सभी धर्मों में इसकी झलक देखने को मिल जाएगी।
परशुराम और रावण भी शिव के शिष्य थे।
शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत ‍की थी
जिसके चलते आज भी नाथ, शैव, शाक्त आदि सभी
संतों में उसी परंपरा का निर्वाह होता आ रहा है।
आदिगुरु शंकराचार्य और गुरु गोरखनाथ ने इसी परंपरा
और आगे बढ़ाया।
सप्त ऋषियों के नाम : बृहस्पति, विशालाक्ष
(शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज
इसके अलावा ८ वें गौरशिरस मुनि भी थे।
उल्लेखनीय है
कि हर काल में अलग-अलग सप्त ऋषि हुए हैं। उनमें भी
जो ब्रह्मर्षि होते हैं उनको ही सप्तर्षियों में गिना
जाता है। ७ ऋषि योग के ७ अंगों का प्रतीक हैं 8वां
अंग मोक्ष है। मोक्ष के लिए ही ७ प्रकार के योग किए
जाते हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान और समाधि।
सप्त ब्रह्मर्षि देवर्षि, महर्षि, परमर्षय:।
कण्डर्षिश्च श्रुतर्षिश्च राजर्षिश्च क्रमावश:।।
अर्थात : १. ब्रह्मर्षि, २. देवर्षि, ३. महर्षि, ४. परमर्षि,
५. काण्डर्षि, ६. श्रुतर्षि और ७. राजर्षि। वैदिक
काल में ये ७ प्रकार के ऋषिगण होते थे।
सप्त ऋषि ही शिव के मूल शिष्य : भगवान शिव ही
पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ
उन्हीं को है। उन्होंने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए ७
ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं
का ज्ञान दिया, जो योग के ७ बुनियादी पहलू बन
गए। वक्त के साथ इन ७ रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल
आईं। बाद में योग में आई जटिलता को देखकर पतंजलि ने
३०० ईसा पूर्व मात्र २०० सूत्रों में पूरे योग शास्त्र को
समेट दिया। योग का ८वां अंग मोक्ष है। ७ अंग तो उस
मोक्ष तक पहुंचने के लिए हैं।
👏👏👏।। महादेव ।। 👏👏

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Kadi , Daimand Plaza
Kadi
382705

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