02/07/2026
ॐ श्री गणेशाय नमः।
घर बनाने के लिए खरीद रहे हैं जमीन? पहले जान लें ये वास्तु टिप्स।
यदि घर बना चुके हैं तो भी स्वयं चेक करें अपने घर का वास्तु दोष। किसी वास्तु-विषेशज्ञ की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
सबसे पहले यह जान लें-
चौकोर अर्थात आयताकार या वर्गाकार भूमि देख कर गृह निर्माण के लिए वास्तु भूमि चयन करना चाहिए।
निम्न प्रकार के लक्षण युक्त स्थान गृह निर्माण कार्य के लिए शुभ माना जाता है। (मत्स्यपुराण)
१) जिस जगह पर भवन निर्माण का विचार हो, उस जगह के चारों ओर की भूमि का पूर्व और उत्तर दिशा में ढलान होना शुभ तथा अच्छा माना जाता है।
२) भवन निर्माण स्थान की भूमि के पूरब और उत्तर दिशा की ओर यदि नदी, नाला, जलाशय इत्यादि रहे, तब उस स्थान को अत्यन्त शुभ माना जाता है।
३) भवन निर्माण स्थान के पूरब-उत्तर दिशा में ऊँचे ऊँचे वृक्ष या कोई ऊँची इमारत नहीं होना चाहिए। क्योंकि ऊँचे ऊँचे वृक्ष तथा इमारत आदि से प्रकाश तथा सूर्य किरणों की रूकावट होती है, जो वास्तु क्षेत्र के लिए हानिकारक माना जाता है।
४) वास्तु भूमि का स्थान ऐसी जगह होना चाहिये कि उस स्थान के चारों ओर कोई भी बड़ा गड्डा या खाई नहीं होना चाहिए। वास्तु भूमि के चारों ओर खाई या बड़ा सा गड्ढा होना बहुत ही अशुभ माना जाता है।
५) जिस भूमि पर वास्तु निर्माण की योजना की जाय, उस भूमि के आस पास पश्चिम दिशा तथा दक्षिण दिशा में यदि ऊँचे ऊँचे पेड़ों के वन, बड़ी बड़ी इमारतें, किला, पहाड़ या चढ़ाव भूमि आदि रहे तो शुभ फलदायक माना जाता है। इससे जब सूर्य पश्चिम दिशामें ढलने लगता है, तब उसके किरणों से प्राप्त होने वाले बुरे परिणाम रोके जा सकते हैं। याद रखना चाहिए कि वास्तु भवन के पूर्व और उत्तर दिशा की ओर ऊँचे ऊँचे वृक्ष, ऊंचा मकान, टीला, पहाड़ आदि कभी भी नहीं होना चाहिए।
६) वास्तु भवन के सामने किसी भी मन्दिर का प्रवेश द्वार नहीं होना चाहिए। अगर इस प्रकार मन्दिर, घर के बिल्कुल सामने हो तो उस मन्दिर के देवता के आँखों की दिव्य शक्ति का भयावह प्रभाव उस वास्तु पर पड़ता है। यदि उस मन्दिर और उस वास्तु भूमि के बीच की सड़क (पक्का या कच्चा) बहुत अधिक चौडा़ हो (कम से कम अस्सी फीट) तो मन्दिर के सामने की वास्तु भूमि पर मन्दिर के देवता आखों की दिव्य शक्ति का भयावह प्रभाव नहीं पडता। परन्तु वास्तु बनाने वाले को यह ध्यान रखना होगा कि वास्तु भवन के प्रवेश द्वार एवं देव मन्दिर के प्रवेश द्वार आमने सामने न हों।
७) वास्तु भवन निर्माण के लिए ऐसा भूखण्ड चयन करना उचित रहेगा, जिस भूखण्ड के आस पास अभद्र काम करने वाले किसी स्त्री अथवा पुरुष अथवा निम्न प्रकार के सामान की व्यवसायिक प्रतिष्ठान न हो। क्योंकि किसी भी प्रकार के आस पास वास्तु भूमि खरीद कर निवास के लिए भवन निर्माण करने से परिवार के सदस्यों पर वहाँ के निम्न एवं अभद्र परिवेश का असर पड़ जाता है।
८) आवास स्थान के सामने या आसपास चाक-छुरी या अन्य किसी वस्तुओं को धार या पालिश करने के लिए यन्त्र चालित मशीन-अथवा कूड़ादान इत्यादि नहीं होना चाहिए।
९) वास्तु भवन के चारों तरफ से आने-जाने वाले रास्ते वास्तु भवन के पास ही समाप्त हो जायँ, ऐसा नहीं होना चाहिये।
१०) अपने घर के ईशान कोण की दिशा में भूमिगत पानी टंकी का होना अच्छा है। इसे शुभकारक माना जाता है। इस प्रकार की पानी टंकी आग्नेय दिशा अर्थात् अग्नि कोण में रखने से बुरे असर पड़ते हैं।
११) जिस भूमि पर वास्तु भवन निर्माण किया जाएगा, उस भूमि के आस पास कोई भी धर्म स्थान न हो तो अच्छा है। लगभग चालीस-पचास फीट की दूरी पर कोई भी धर्मस्थान या मन्दिर, मसजिद इत्यादि रहे तो वास्तु भूमि पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता।
१२) वास्तु भवन के आस पास तीव्र अथवा कर्कश ध्वनि करने वाली कोई भी चीजें न हों तो अच्छा रहता है। क्योंकि तीव्र ध्वनि या शब्दों से वास्तु पर हानि पहुँच सकती है। १३) यदि वास्तु भवन के आग्नेय दिशा में विद्युत निर्माण केन्द्र हों तो वह अत्यन्त शुभकर और लाभदायक माने जाते हैं। इसके विपरीत ईशान दिशा में सभी प्रकार के विद्युत उत्पादन उपकरण अशुभकर प्रमाणित होते हैं।
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