13/04/2023
*ॐ श्री परमात्मने नमः*
*सबसे श्रेष्ठ भाव ‘माधुर्यभाव’ है । माधुर्यभावमें स्त्री-पुरुष नहीं हैं, प्रत्युत भक्त और भगवान् हैं । इसमें परकीया भावको श्रेष्ठ बतानेमें चार कारण हैं‒१. अपने जीवन-निर्वाहके लिये, अपने बालकोंके पालन-पोषणके लिये प्रेमास्पदसे कुछ नहीं चाहती, २. केवल प्रेमास्पदको सुख देती है, ३. अपने प्रेमको छिपाकर रखती है और ४. वियोगमें प्रेमास्पदको विशेष याद करती है ।*
*लोग प्रायः माधुर्यभावमें स्त्री-पुरुषका भाव ही समझते हैं; परन्तु यह भाव स्त्री-पुरुषके सम्बन्धमें ही होता है‒यह नियम नहीं है । माधुर्य नाम मधुरता अर्थात् मिठासका है, और वह मिठास आती है भगवान्के साथ अभिन्नता होनेसे । वह अभिन्नता जितनी अधिक होगी, मधुरता भी उतनी ही अधिक होगी । अतः दास्य, सख्य और वात्सल्यभावमेंसे किसी भी भावमें पूर्णता होनेपर उसमें मधुरता कम नहीं रहेगी । भक्तिके सभी भावोंमें माधुर्यभाव रहता है ।*
*गोपीभाव प्राप्त करनेके लिये त्यागकी जरूरत है । पति-पुत्रोंके साथ भी गोपियोंका राग नहीं था । कुटुम्बका मोह छूटे बिना गोपीभाव प्राप्त नहीं होता ।......भोग और संग्रहमें आसक्ति होनेसे धार्मिक प्रवृत्ति भी नहीं होती, फिर गोपीभाव तो धार्मिक प्रवृत्तिसे भी बहुत ऊँचा है ! उद्धवजी-जैसे ज्ञानी भक्त भी गोपियोंकी चरण-रज चाहते हैं !*
*गोपीभाव भगवान्की कृपासे ही प्राप्त होता है, साधनसे प्राप्त नहीं होता । भगवान् गोपीभाव दें या न दें, उनकी मरजी । मनुष्यका तो यह कर्तव्य है कि सब संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाय । सर्वथा भगवान्के चरणोंके शरण हो जाय, अपना कुछ भी भाव न रखे । फिर भगवान्की मरजी कि वे गोपीभाव दें, गोपभाव दें, नन्दभाव दें या यशोदाभाव दें । भगवान्की मरजीमें अपनी मरजी मिला दें । सख्य, दास्य, वात्सल्य आदि किस भावकी प्राप्ति होगी, कैसे होगी‒यह भगवान् जानें, भगवान्का काम जाने । अपनी मरजी सर्वथा भगवान्पर छोड़ दें कि हे नाथ, मैं तो आपका हूँ बस । आपकी जैसी मरजी हो, वैसे रखो; जहाँ मरजी हो, वहाँ रखो ।*
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