Prachya jyotish anusandhan kendra

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15/02/2025
23/04/2023

*🌻🌺🌷कठिनाई आने पर इंसान, अकेला हो जाता है लेकिन कठिनाई आने पर ही अकेला व्यक्ति मजबूत होना सीख जाता है*
*🌻🌺🌷अपने पुराने दुःख से ज़ब तक नहीँ उबरेंगे तब तक दूसरे का सुख देखने का अनुभव नहीँ होगा*
*🌻🌺🌷सांसारिक जीवन की सबसे अधिक जिम्मा इंसान को मिला है, पैदा होने से मृत्यु क़े बीच कितना संघर्ष करना पड़ता है, फिर भी जाने क़े बाद लोग बोलते रहते है कुछ करके नहीँ गया,यही जीवन का सार है*
*🌻🌺🌷मन की बात जुबान मे बनी रहती है,मन भगवान को ढूड़ेगा तो, जुबान भजन करेगी किसी क़े प्रति कपट ईर्ष्या ढूढ़गे तो वकवास करेगी प्रेम ढूढ़गे तो सु प्रभात करेगी*
*🌻🌺🌷ईस्वरीय बिधान से चलने से विद्या की देवी सरस्वती स्वयं मस्तिस्क मे बैठकर इंसान का मार्ग दर्शन शुरू कर देती है*
*🌻🌺🌷हमारा विश्वास,पहाड़ को भी,खिसका सकता है,लेकिन हमारा शक,पहाड़,खड़ा कर सकता है.*
*🌻🌺🌷परिस्थिति को देखकर विचार बदलना आता है तो आप कामयाबी की राह पर है,मन होना चाहिए किसी को याद करने का वक्त तो अपने आप मिल जाता है,,,,!!* *🌻🌺🌷सारे साथी काम क़े सबका अपना मोल जो संकट मे साथ दे वो सबसे अनमोल,*
*🌻🌺🌷पयासी जी अपना पन दो आत्माओ क़ी एकाग्रता से निर्मित होता है, अगर हम सामने नहीँ भी होते आत्मा से निकले गए शब्द ही आभास करा देते है, और मन को खुशी दे जाते है*
*🌻🌞ॐभूर्भुवःस्वःतत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् 🌞🌻*
*।। जय सियाराम जी।।*
*।। ॐ नमः शिवाय।।*

13/04/2023

*ॐ श्री परमात्मने नमः*

*सबसे श्रेष्‍ठ भाव ‘माधुर्यभाव’ है । माधुर्यभावमें स्‍त्री-पुरुष नहीं हैं, प्रत्युत भक्त और भगवान् हैं । इसमें परकीया भावको श्रेष्‍ठ बतानेमें चार कारण हैं‒१. अपने जीवन-निर्वाहके लिये, अपने बालकोंके पालन-पोषणके लिये प्रेमास्पदसे कुछ नहीं चाहती, २. केवल प्रेमास्पदको सुख देती है, ३. अपने प्रेमको छिपाकर रखती है और ४. वियोगमें प्रेमास्पदको विशेष याद करती है ।*

*लोग प्रायः माधुर्यभावमें स्‍त्री-पुरुषका भाव ही समझते हैं; परन्तु यह भाव स्‍त्री-पुरुषके सम्बन्धमें ही होता है‒यह नियम नहीं है । माधुर्य नाम मधुरता अर्थात् मिठासका है, और वह मिठास आती है भगवान्‌के साथ अभिन्‍नता होनेसे । वह अभिन्‍नता जितनी अधिक होगी, मधुरता भी उतनी ही अधिक होगी । अतः दास्य, सख्य और वात्सल्यभावमेंसे किसी भी भावमें पूर्णता होनेपर उसमें मधुरता कम नहीं रहेगी । भक्तिके सभी भावोंमें माधुर्यभाव रहता है ।*

*गोपीभाव प्राप्‍त करनेके लिये त्यागकी जरूरत है । पति-पुत्रोंके साथ भी गोपियोंका राग नहीं था । कुटुम्बका मोह छूटे बिना गोपीभाव प्राप्‍त नहीं होता ।......भोग और संग्रहमें आसक्ति होनेसे धार्मिक प्रवृत्ति भी नहीं होती, फिर गोपीभाव तो धार्मिक प्रवृत्तिसे भी बहुत ऊँचा है ! उद्धवजी-जैसे ज्ञानी भक्त भी गोपियोंकी चरण-रज चाहते हैं !*

*गोपीभाव भगवान्‌की कृपासे ही प्राप्‍त होता है, साधनसे प्राप्‍त नहीं होता । भगवान् गोपीभाव दें या न दें, उनकी मरजी । मनुष्यका तो यह कर्तव्य है कि सब संसारसे विमुख होकर भगवान्‌के सम्मुख हो जाय । सर्वथा भगवान्‌के चरणोंके शरण हो जाय, अपना कुछ भी भाव न रखे । फिर भगवान्‌की मरजी कि वे गोपीभाव दें, गोपभाव दें, नन्दभाव दें या यशोदाभाव दें । भगवान्‌की मरजीमें अपनी मरजी मिला दें । सख्य, दास्य, वात्सल्य आदि किस भावकी प्राप्‍ति होगी, कैसे होगी‒यह भगवान् जानें, भगवान्‌का काम जाने । अपनी मरजी सर्वथा भगवान्‌पर छोड़ दें कि हे नाथ, मैं तो आपका हूँ बस । आपकी जैसी मरजी हो, वैसे रखो; जहाँ मरजी हो, वहाँ रखो ।*
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सुप्रभात मित्रों
05/04/2023

सुप्रभात मित्रों

04/04/2023

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*मैं और मेरा: सब मिथ्या है*

*ब्रह्मकेतु नामक एक चोर मिथिला नरेश जनक के दरबार में हाजिर किया गया। राजा जनक ने कहा ब्रह्मकेतु, तुमने चोरी की है। उचित दण्ड तो यह था कि तुम्हारा हाथ कटवा दिया जाता, परन्तु तुम विद्वान हो, इसलिए इतना ही दण्ड देता हूँ कि तुम मेरे राज्य से बाहर निकल जाओ।*

*ब्रह्मकेतु ने पूछा- यह राज्य आपका है?*

*जनक बोले- हाँ, यह राज्य मुझे अपने पिता से प्राप्त हुआ है।*

*ब्रह्मकेतु ने प्रश्न किया- आपके पहले यह राज्य आपके पिता का था?*

*जनक ने कहा - मेरे दादा का था।*

*ब्रह्मकेतु ने पूछा- और जब आप नहीं रहेंगे तब यह राज्य किसका होगा?*

*जनक ने उत्तर दिया- तब यह मेरे पुत्र का होगा।*

*ब्रह्मकेतु ने कहा- यह राज्य पहले आपके पिता का था। उससे पहले आपके दादा का था। दादा नहीं रहे, तो राज्य उनके साथ समाप्त हो जाना चाहिये था। पर ऐसा नहीं हुआ। फिर आपके पिता ने यह मान लिया कि यह राज्य उनका है, पर यह राज्य उनके साथ समाप्त नहीं हुआ। आप नहीं रहेंगे, तो क्या यह राज्य फिर भी आपका रहेगा?*

*यह सुनकर जनक ने सोचा- मेरा मिथिला राज्य से क्या संबंध है? मैं इस राज्य को अपना कैसे कह सकता हूँ? फिर उन्होंने अपने शरीर को निहारा। सोचने लगे- ये हाथ-पाँव, मुँह, आँख, नाक, कान क्या मेरे अपने हैं? मैं कौन हूँ? क्या संसार की कोई वस्तु मेरी है? जब शरीर ही अपना नहीं है, तो यह राज्य मेरा कैसे हो सकता है? यह सोचकर जनक सिंहासन से नीचे उतर गये और विनम्र भाव से बोले ब्राह्मण! आपने मेरी आँखें खोल दी। यह राज्य तो क्या, यह शरीर भी मेरा नहीं है। यह राज्य आप सबका है। आप लोग कहीं भी विचरण कीजिये।*

*अचानक ब्रह्मकेतु का रूप बदल गया। उसने कहा- राजन, मैंने आपको सांसारिक बंधनों से मुक्त करने के लिये ही चोरी का स्वांग भरा था। मेरा लक्ष्य पूरा हो गया। मैं धर्म हूँ। इतना कहकर धर्म वहाँ से चला गया।*

*मैं और मेरा - सब मिथ्या है। एक सत्य में आत्मा हूं और मेरी पिता है शिव निराकार परम पिता परमात्मा..!!*

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