Ashutosh Sharma Astrologist & Vastu Consultant

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Mahalakshmi Vrat 2019: आज से प्रारंभ हो रहा है 16 दिनों का महालक्ष्मी व्रत, जानें व्रत, पूजा विधि और महत्व-:[13/09, 6:17...
13/09/2019

Mahalakshmi Vrat 2019: आज से प्रारंभ हो रहा है 16 दिनों का महालक्ष्मी व्रत, जानें व्रत, पूजा विधि और महत्व-:[13/09, 6:17 PM] Ashutosh Sharma: Mahalakshmi Vrat 2019: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से महालक्ष्मी व्रत का प्रारंभ होता है, जो 16 दिनों तक चलता है। महालक्ष्मी व्रत आज से प्रारंभ हो रहा है, जो 21 सितंबर तक चलेगा। आज अच्छा संयोग है कि महालक्ष्मी व्रत प्रारंभ के दिन राधाष्टमी भी मनाई जा रही है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से आरंभ होकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक होता है। 16 दिनों तक महालक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे धन-दौलत, वैभव आदि प्राप्त होता है।
[13/09, 6:18 PM] Ashutosh Sharma: महालक्ष्मी व्रत का महत्व

महालक्ष्मी का व्रत करने से दरिद्रता दूर होती है। भक्तों का घर धन-दौलत और वैभव से परिपूर्ण हो जाता है। माता लक्ष्मी धन और वैभव की देवी हैं, विधि विधान से 16 दिन या फिर 3 दिन व्रत करने से वह प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों के समस्त समस्याओं का निराकरण कर देती हैं। उनकी पूजा करने से भगवान विष्णु भी प्रसन्न होते हैं क्योंकि वह उनकी अर्धांगिनी हैं। इससे भक्तों पर भगवान श्रीहरि की कृपा भी बनी रहती है।
[13/09, 6:18 PM] Ashutosh Sharma: महालक्ष्मी का व्रत 16 दिनों का होता है। यदि कोई भी व्यक्ति किसी कारण से 16 दिनों का व्रत नहीं कर सकता है तो वह 3 महत्वपूर्ण तिथियों को व्रत करके महालक्ष्मी व्रत का पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकता है। व्रत के तीन दिनों के उपवास के लिए महालक्ष्मी व्रत का पहला दिन, आठवां दिन एवं अंतिम सोलहवां दिन।

Lakshmi Aarti 2019: 16 दिन के Mahalakshmi Vrat में जरूर करें माता लक्ष्मी की आरती

महालक्ष्मी व्रत एवं पूजा विधि

इस व्रत में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से लेकर अश्विन कृष्ण अष्टमी तक प्रतिदिन 16 अंजलि कुल्ले करके प्रातः स्नान आदि नित्य कर्म करना चाहिए। इसके पश्चात माता लक्ष्मी की प्रतिमा का स्थापना पूजा घर में करें।

उसके समीप 16 सूत्र के डोरे में 16 गांठ लगाएं। फिर उनका 'लक्ष्म्यै नमः' मंत्र से एक गांठ का पूजन करें। उसके पश्चात माता लक्ष्मी की प्रतिमा का विधि विधान से पूजन करें। पूजन सामग्री में चन्दन, पत्र, पुष्प माला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल, फल मिठाई रखें। पूजा के पश्चात इस मंत्र से पूजा किए गए डोरे को दाहिने हाथ में बांधें।

धनंधान्यं धरां हर्म्यं कीर्तिमायुर्यश: श्रियम्।

तुरगान् दन्तिन: पुत्रान् महालक्ष्मि प्रयच्छ मे।।

डोरा बांधने के बाद हरी दूर्वा के 16 पल्लव और 16 अक्षत् लेकर महालक्ष्मी व्रत की कथा सुनें। इस प्रकार आश्विन कृष्ण अष्टमी को माता लक्ष्मी की प्रतिमा का विसर्जन करें।

🏹रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹1:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे।2:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।3:~मानस में श्लोक संख्...
08/09/2019

🏹रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य🏹

1:~लंका में राम जी = 111 दिन रहे।
2:~लंका में सीताजी = 435 दिन रहीं।
3:~मानस में श्लोक संख्या = 27 है।
4:~मानस में चोपाई संख्या = 4608 है।
5:~मानस में दोहा संख्या = 1074 है।
6:~मानस में सोरठा संख्या = 207 है।
7:~मानस में छन्द संख्या = 86 है।

8:~सुग्रीव में बल था = 10000 हाथियों का।
9:~सीता रानी बनीं = 33वर्ष की उम्र में।
10:~मानस रचना के समय तुलसीदास की उम्र = 77 वर्ष थी।
11:~पुष्पक विमान की चाल = 400 मील/घण्टा थी।
12:~रामादल व रावण दल का युद्ध = 87 दिन चला।
13:~राम रावण युद्ध = 32 दिन चला।
14:~सेतु निर्माण = 5 दिन में हुआ।

15:~नलनील के पिता = विश्वकर्मा जी हैं।
16:~त्रिजटा के पिता = विभीषण हैं।

17:~विश्वामित्र राम को ले गए =10 दिन के लिए।
18:~राम ने रावण को सबसे पहले मारा था = 6 वर्ष की उम्र में।
19:~रावण को जिन्दा किया = सुखेन बेद ने नाभि में अमृत रखकर।

श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?
नहीं तो जानिये-
1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,
3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |
6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,
8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,
9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,
10- अनरण्य से पृथु हुए,
11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,
12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,
14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,
16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,
18- भरत के पुत्र असित हुए,
19- असित के पुत्र सगर हुए,
20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,
22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,
26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,
28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,
30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,
32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,
34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,
36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37- अज के पुत्र दशरथ हुए,
38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ | शेयर करे ताकि हर हिंदू इस जानकारी को जाने..।

यह जानकारी महीनों के परिश्रम केबाद आपके सम्मुख प्रस्तुत है ।
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भारतीय सभ्यता में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दिया गया है। इस परंपरा को बनाये रखने के लिए हर साल आषाढ़ महीने की पूर्णिम...
15/07/2019

भारतीय सभ्यता में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दिया गया है। इस परंपरा को बनाये रखने के लिए हर साल आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का त्यौहार मनाया जाता है। इस साल आगामी 16 जुलाई को इस महत्वपूर्ण पर्व को मनाया जाएगा। गुरु की महिमा का गुणगान हमारे शास्त्रों में भी किया गया है। इसके साथ ही मध्य काल में कबीर दास जी ने भी गुरु की महिमा का बखान करते हुए कहा है कि “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांए। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताएं।” कबीर के इस दोहे से साफ़ साबित होता है की ईश्वर का ज्ञान देने वाले गुरु का स्थान ईश्वर से भी पहले है। गुरु पूर्णिमा के दिन मुख्य रूप से महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना करने वाले ऋषि वेद व्यास जी की पूजा की जाती है। आइये विस्तार से जानते हैं गुरु पूर्णिमा के महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा की संपूर्ण विधि के बारे में।

गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त

जुलाई 16, 2019 को 01:50:24 से पूर्णिमा आरम्भ होकर जुलाई 17, 2019 को 03:10:05 पर पूर्णिमा तिथि समाप्त होगी।गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा के लिए पूर्णिमा तिथि का सूर्योदय के बाद तीन मुहूर्तों में रहना आवश्यक माना जाता है। यदि वर्तमान दिन पूर्णिमा तीन तिथि से कम हो तो इस पर्व को पहले दिन भी मनाया जा सकता है।

गुरु पूर्णिमा पूजा विधि

इस दिन सबसे पहले सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि कार्यों से निवृत होकर साफ़ सुथरे कपड़े पहने।
गुरु पूजा करने के लिए केवल सफ़ेद या नीले रंग का वस्त्र ही धारण करें।
इसके बाद वेद व्यास जी की प्रतिमा लेकर उनपर फूल अर्पित करें।
उनकी चित्र पर फूल और माला आदि चढ़ाते हुए सच्चे मन से गुरु का मनन करें।
गुरु की पूजा करते समय अपना और अपने गोत्र का नाम लेते हुए हाथों में जल लेकर गुरु पूजा का संकल्प करें।
यदि आपको कोई गुरु मंत्र मिला है तो उस मंत्र का जाप इस पूजा के दौरान जरूर करें।
विधि पूर्वक गुरु पूजा करने के बाद भगवान सत्यनारायण की कथा भी अवश्य पढ़ें।
इस दिन पूर्णिमा होने की वजह से सत्यनारायण पूजा संपन्न करवाना भी ख़ासा महत्व रखता है।
गुरु पूर्णिमा का महत्व

“महाभारत” और “श्रीमद्भगवद” ऐसे महान साहित्यों के रचनाकार वेद व्यास जी का जन्म आषाढ़ माह की पूर्णिमा के दिन हुआ था। ऋषि पराशर के पुत्र वेदव्यास को तीन कालों का ज्ञाता माना गया है। पौराणिक धर्मशास्त्रों के अनुसार वेदव्यास जी को काफी पहले ही अपनी दिव्य दृष्टि से इस बात का ज्ञान हो गया था की कलयुग में लोगों की रुचि धर्म कर्म के प्रति कम हो जायेगी। इसलिए वेद व्यास जी ने लोगों की रुचि धर्म कर्म में बनाये रखने के लिए वेदों को चार भागों में बाँट दिया- ऋग्ग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों को चार हिस्सों में बाँटने की वजह से भी उन्हें वेदव्यास के नाम से जाना गया। गुरु पूर्णिमा के दिन वेद व्यास जी के साथ उनका अंश अपने गुरुओं में मानकर उनकी पूजा की जाती है। इस दिन को गुरुओं से मंत्र प्राप्ति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला जरूर बरतें ये सावधानियां.💐💐चाहे सूर्य हो या चंद्र ग्रहण, दोनों ही अपने बुरे प्रभाव के लिए ज...
30/06/2019

ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला जरूर बरतें ये सावधानियां.💐💐चाहे सूर्य हो या चंद्र ग्रहण, दोनों ही अपने बुरे प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। ना केवल शास्त्रीय दृष्टि सेम वरन् साइंस ने भी ग्रहण की वजह से होने वाले बुरे प्रभावों को माना है। ग्रहण के दौरान कुछ सावधनियां बरतनी जरूरी हैं यह वैज्ञानिकों ने भी माना है, क्यूंकि ग्रहण के दौरान निकलने वाली तरंगे हमें हानि पहुंचा सकती हैं।

2 / 11💐💐गर्भवती महिलाओं पर होता है असर
खासतौर से गर्भवती महिलाओं के लिए ग्रहण अन्य लोगों की तुलना में अधिक नुकसानदेह होता है। इसलिए उन्हें कुछ खास नियमों का पालन करना पड़ता है। दरअसल ग्रहण के दौरान ना गर्भ में पल रहे बच्चे पर बुरा असर होने का डर होता है।💐💐ऐसे होता है असर
उदाहरण के तौर पर यदि सूर्य ग्रहण लगा है, और इस दौरान गर्भवती महिला सूरज की रोशनी में आ जाए तो सूर्य की किरणे गर्भ में पल रहे बच्चे पर बुरा असर करती हैं। सूर्य की किरणों में उस समय कुछ ऐसी दूषित तरंगे मौजूद होती हैं, जो अजन्मे शिशु को प्रभावित करती हैं।💐💐कुछ निर्देश
इसलिए आज हम आपको कुछ ऐसे निर्देश बताने जा रहे हैं, जो ग्रहण के दौरान एक गर्ब्भवती महिला के जरूर काम आएंगे। यदि वह महिला इन निर्देशों का भली-भांति पालन करती है, तो उसके आने वाले बच्चे पर ग्रहण का कोई बुरा असर नहीं होगा💐💐स्नान करें
सबसे पहली बात, ग्रहण आरंभ होने से पहले स्नान अवश्य करें। ग्रहण स्माप्त होने पर भी स्नान करना चाहिए। क्योंकि ग्रहण की तरंगों के कारण वातावरण दूषित हो जाता है, इसलिए यह जरूरी है कि गर्भवती महिला ग्रहण खत्म होने पर स्नान करके वापस शुद्ध हो जाए।💐💐भोजन ना करें
ग्रहण के दौरान वातावरण में जिन तरंगों का प्रवाह होता है, वे ना केवक जीवित वरन् बीजान वस्तुओं पर भी असर करती हैं। इसलिए ग्रहण से पहले जो खाना पका होता है या यहां तक कि घर में पड़ा पानी भी दूषित हो जाता है।💐💐तुलसी का पत्ता
इसलिए ऐसा कहा जाता है कि ऐसे दूषित भोजन का सेवन किसी को भी नहीं करना चाहिए। लेकिन पानी दूषित ना हो, इसके लिए एक उपाय किया जा सकता है। ग्रहण से पहले ही पानी या जिन खाद्य पदार्थों को आप पका चुके हैं और बाद में इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनमें तुलसी के पौधे की पत्तियां डाल दें।💐💐पवित्र होती है तुलसी
तुलसी का पौधा शास्त्रों के अनुसार पवित्र माना गया है। वैज्ञानिक रूप से भी यह सक्षम है, इसमें मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट आसपास मौजूद दूषित कणों को मार देते हैं। इसलिए खाद्य पदार्थ में डालने से उस भोजन पर ग्रहण का असर नहीं होता।💐💐नुकीली वस्तुओं से दूर रहें
ग्रहण के दौरान एक गर्भवती महिला को नुकीली या तेज़-तरार वस्तुओं से दूर रहना चाहिए। जैसे कि चाकू, कैंची, सुई, या पेन-पेनसिल भी।💐💐सब्जी ना काटें
गर्भवती महिलाओं को नुकीली वस्तुओं से ना केवल दूर, साथ ही उनका इस्तेमाल भी नहीं करना चाहिए। ग्रहण के दौरान गलती से भी सब्जी ना काटें, और जितना हो सके घर के कार्यों को ना करने का फैसला लें।💐💐बाहर ना निकलें
यह ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाओं के लिए जानने योग्य सबसे जरूरी बात है... इस दौरान बाहर निकलने की भूल ना करें। ग्रहण की तरंगे आपके अजन्मे शिशु पर बुरा प्रभाव कर सकती हैं।💐💐

🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞⛅ *दिनांक 18 मई 2019*⛅ *दिन - शनिवार* ⛅ *विक्रम संवत - 2076 (गुजरात. 2075)*⛅ *शक संवत -1941...
18/05/2019

🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞
⛅ *दिनांक 18 मई 2019*
⛅ *दिन - शनिवार*
⛅ *विक्रम संवत - 2076 (गुजरात. 2075)*
⛅ *शक संवत -1941*
⛅ *अयन - उत्तरायण*
⛅ *ऋतु - ग्रीष्म*
⛅ *मास - वैशाख*
⛅ *पक्ष - शुक्ल*
⛅ *तिथि - पूर्णिमा 19 मई रात्रि 02:41 तक तत्पश्चात प्रतिपदा*
⛅ *नक्षत्र - विशाखा 19 मई प्रातः 02:23 तक तत्पश्चात अनुराधा*
⛅ *योग - वरीयान् शाम 03:12 तत्पश्चात परिघ*
⛅ *राहुकाल - सुबह 09:06 से सुबह 10:45 तक*
⛅ *सूर्योदय - 06:01*
⛅ *सूर्यास्त - 19:08*
⛅ *दिशाशूल - पूर्व दिशा में*
⛅ *व्रत पर्व विवरण - व्रत पूर्णिमा, वैशाख-बुद्ध पूर्णिमा, वैशाख स्नान समाप्त, कूर्म जयंती*
💥 *विशेष - पूर्णिमा के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)*
💥 *ब्रह्म पुराण' के 118 वें अध्याय में शनिदेव कहते हैं- 'मेरे दिन अर्थात् शनिवार को जो मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा मुझसे उनको कोई पीड़ा नहीं होगी। जो शनिवार को प्रातःकाल उठकर पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उन्हें ग्रहजन्य पीड़ा नहीं होगी।' (ब्रह्म पुराण')*
💥 *शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए 'ॐ नमः शिवाय।' का 108 बार जप करने से दुःख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है। (ब्रह्म पुराण')*
💥 *हर शनिवार को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है ।(पद्म पुराण)*
💥 *नौकरी - व्यवसाय में सफलता, आर्थिक समृद्धि एवं कर्ज मुक्ति हेतु कारगर प्रयोग शनिवार के दिन पीपल में दूध, गुड, पानी मिलाकर चढायें एवं प्रार्थना करें - 'हे प्रभु ! आपने गीता में कहा है कि वृक्षों में पीपल मैं हूँ । हे भगवान ! मेरे जीवन में यह परेशानी है । आप कृपा करके मेरी यह परेशानी (परेशानी, दुःख का नाम लेकर ) दूर करने की कृपा करें । पीपल का स्पर्श करें व प्रदक्षिणा करें ।*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *श्रीमद्भागवत पुराण* 🌷
🙏🏻 *श्रीमद्भागवत पुराण हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इस ग्रंथ की रचना आज से लगभग 5000 साल पहले कर दी गई थी। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि कलयुग में क्या-क्या घटित होगा इसकी भविष्यवाणी भागवत पुराण में पहले ही दे दी गई थी। जानिए श्रीमद्भागवत पुराण में की गई कलियुग से जुड़ी 10 भविष्यवाणियां..*
1⃣ *ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया ।*
*कालेन बलिना राजन् नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः ॥*
💥 *अर्थ - कलयुग में धर्म, स्वच्छता, सत्यवादिता, स्मृति, शारीरक शक्ति, दया भाव और जीवन की अवधि दिन-दिन घटती जाएगी.*
2⃣ *वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।*
*धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि ॥*
💥 *अर्थ - कलयुग में वही व्यक्ति गुणी माना जायेगा जिसके पास ज्यादा धन है. न्याय और कानून सिर्फ एक शक्ति के आधार पे होगा !*
3⃣ *दाम्पत्येऽभिरुचि र्हेतुः मायैव व्यावहारिके ।*
*स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥*
💥 *अर्थ - कलयुग में स्त्री-पुरुष बिना विवाह के केवल रूचि के अनुसार ही रहेंगे.*
*व्यापार की सफलता के लिए मनुष्य छल करेगा और ब्राह्मण सिर्फ नाम के होंगे.*
4⃣ *लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।*
*अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः ॥*
💥 *अर्थ - घूस देने वाले व्यक्ति ही न्याय पा सकेंगे और जो धन नहीं खर्च करेगा उसे न्याय के लिए दर-दर की ठोकरे खानी होंगी. स्वार्थी और चालाक लोगों को कलयुग में विद्वान माना जायेगा.*
5⃣ *क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव संतप्स्यन्ते च चिन्तया ।*
*त्रिंशद्विंशति वर्षाणि परमायुः कलौ नृणाम.।।*
💥 *अर्थ - कलयुग में लोग कई तरह की चिंताओं में घिरे रहेंगे. लोगों को कई तरह की चिंताए सताएंगी और बाद में मनुष्य की उम्र घटकर सिर्फ 20-30 साल की रह जाएगी.*
6⃣ *दूरे वार्ययनं तीर्थं लावण्यं केशधारणम् ।*
*उदरंभरता स्वार्थः सत्यत्वे धार्ष्ट्यमेव हि॥*
💥 *अर्थ - लोग दूर के नदी-तालाबों और पहाड़ों को तीर्थ स्थान की तरह जायेंगे लेकिन अपनी ही माता पिता का अनादर करेंगे. सर पे बड़े बाल रखना खूबसूरती मानी जाएगी और लोग पेट भरने के लिए हर तरह के बुरे काम करेंगे.*
7⃣ *अनावृष्ट्या विनङ्‌क्ष्यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिताः ।* *शीतवातातपप्रावृड् हिमैरन्योन्यतः प्रजाः ॥*
💥 *अर्थ - कलयुग में बारिश नहीं पड़ेगी और हर जगह सूखा होगा.मौसम बहुत विचित्र अंदाज़ ले लेगा. कभी तो भीषण सर्दी होगी तो कभी असहनीय गर्मी. कभी आंधी तो कभी बाढ़ आएगी और इन्ही परिस्तिथियों से लोग परेशान रहेंगे.*
8⃣ *अनाढ्यतैव असाधुत्वे साधुत्वे दंभ एव तु ।*
*स्वीकार एव चोद्वाहे स्नानमेव प्रसाधनम् ॥*
💥 *अर्थ - कलयुग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा उसे लोग अपवित्र, बेकार और अधर्मी मानेंगे. विवाह के नाम पे सिर्फ समझौता होगा और लोग स्नान को ही शरीर का शुद्धिकरण समझेंगे.*
9⃣ *दाक्ष्यं कुटुंबभरणं यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ।*
*एवं प्रजाभिर्दुष्टाभिः आकीर्णे क्षितिमण्डले ॥*
💥 *अर्थ - लोग सिर्फ दूसरो के सामने अच्छा दिखने के लिए धर्म-कर्म के काम करेंगे. कलयुग में दिखावा बहुत होगा और पृथ्वी पे भृष्ट लोग भारी मात्रा में होंगे. लोग सत्ता या शक्ति हासिल करने के लिए किसी को मारने से भी पीछे नहीं हटेंगे.*
1⃣0⃣ *आच्छिन्नदारद्रविणा यास्यन्ति गिरिकाननम् ।*
*शाकमूलामिषक्षौद्र फलपुष्पाष्टिभोजनाः ॥*
💥 *अर्थ - पृथ्वी के लोग अत्यधिक कर और सूखे के वजह से घर छोड़ पहाड़ों पे रहने के लिए मजबूर हो जायेंगे. कलयुग में ऐसा वक़्त आएगा जब लोग पत्ते, मांस, फूल और जंगली शहद जैसी चीज़ें खाने को मजबूर होंगे.*

📖 *Ashutosh Sharma*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞
🙏🏻🌷💐🌸🌼🌹🍀🌺💐🙏🏻

जनेऊ संस्कार, हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार है। जनेऊ सफेद रंग के तीन सूत्र से बना पवित्र धागा होत...
05/04/2019

जनेऊ संस्कार, हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार है। जनेऊ सफेद रंग के तीन सूत्र से बना पवित्र धागा होता है जिसे बाएँ कंधे से दायें बाजू की ओर पहना जाता है। सनातन धर्म में इसे उपनयन संस्कार के रूप में भी जाना जाता है। यहाँ उपनयन का तात्पर्य ईश्वर के निकट जाना होता है। देव वाणी संस्कृत में इसे यज्ञोपवीत संस्कार कहा जाता है। यह यज्ञ और उपवीत शब्दों के मिश्रण से बना है जिसका मुख्य अर्थ होता है कि यज्ञ-हवन करने का अधिकार प्राप्त होना। बिना जनेऊ संस्कार के पूजा पाठ करना, विद्या प्राप्त करना और व्यापार आदि करना सब कुछ निरर्थक माना जाता है।

शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि जनेऊ संस्कार की विधि से बालक के पिछले जन्मों में किए पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए यह बालक का दूसरा जन्म भी माना जाता है। क्योंकि जनेऊ संस्कार होने के बाद ही बालक का धर्म में प्रवेश माना जाता है। प्राचीन काल में इसी संस्कार के पश्चात ही बालक को शिक्षा दी जाती थी। बालक की आयु और बुद्धि बढ़ाने के लिए जनेऊ संस्कार अति आवश्यक है।

जनेऊ संस्कार कब होना चाहिए?सामान्य रूप से जनेऊ संस्कार किसी बालक के किशोरावस्था से युवा अवस्था में प्रवेश करने पर किया जाता है। शास्त्रों की मानें तो ब्राह्मण बालक के लिए 07 वर्ष, क्षत्रिय के लिए 11 वर्ष और वैश्य समाज के बालक का 13 वर्ष के पूर्व जनेऊ संस्कार होना चाहिये और किसी भी परिस्थिति में विवाह योग्य आयु के पूर्व यह संस्कार अवश्य हो जाना चाहिए।

जनेऊ संस्कार के लिए शुभ समय – हिन्दू पंचांग के माघ माह से लेकर अगले छ: माह तक यह संस्कार किया जाता है। माह की प्रथमा, चतुर्थी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या या फिर पूर्णिमा तिथि जनेऊ संस्कार को संपन्न करने के लिए शुभ तिथियाँ होती हैं। वहीं यदि हम वार की बात करें तो सप्ताह में बुध, बृहस्पतिवार एवं शुक्रवार इसके लिए अति उत्तम दिन माने जाते हैं। रविवार मध्यम तथा सोमवार बहुत कम योग्य है। लेकिन मंगलवार एवं शनिवार के दिन को त्यागा जाता है क्योंकि इसके लिए ये दोनों ही दिन शुभ नहीं होते हैं।
जनेऊ संस्कार के लिए शुभ मुहूर्त – नक्षत्रों में हस्त, चित्रा, स्वाति, पुष्य, घनिष्ठा, अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, श्रवण एवं रेवती इस संस्कार के लिए शुभ नक्षत्र माने जाते हैं। एक दूसरे नियमानुसार यह भी कहा जाता है कि भरणी, कृत्तिका, मघा, विशाखा, ज्येष्ठा, शतभिषा नक्षत्र को छोड़कर सभी अन्य नक्षत्रों में जनेऊ संस्कार की विधि संपन्न की जा सकती है।
जनेऊ संस्कार का महत्व

हिन्दू धर्म में प्रत्येक पूजा-पद्धति का एक विशेष महत्व हमेशा से ही रहा है। उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य ही छिपा होता है। फिर चाहें वह विशेष कारण धार्मिक हो, वैज्ञानिक हो या फिर ज्योतिषीय ही क्यों न हो। ठीक इसी प्रकार जनेऊ संस्कार के पीछे भी विशेष कारण छिपा है। इसके पीछे धार्मिक, वैज्ञानिक, ज्योतिषीय के साथ-साथ चिकित्सीय कारण भी जुड़ा हुआ है। आइए इन कारणों पर डालते हैं एक नज़र…

धार्मिक महत्व
जनेऊ संस्कार को धार्मिक दृष्टि से देखें तो इसका सीधा संबंध ब्रहमा, विष्णु और महेश (शंकर जी) से है। इसके तीन सूत्र त्रिदेव का प्रतीक माने गए हैं। मनु स्मृति में ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचनाकार कहा गया है, जबकि विष्णु को पालनहार और भगवान शिव को संहारक कहा गया है। अतः जनेऊ एक पवित्र धागा होता है। इसलिए इसे अपवित्र नहीं करना चाहिए। यदि यह किसी कारणवश दूषित हो जाए तो इसे तुरंत विधि अनुसार बदल लिया जाता है।

वहीं यज्ञोपवीत को गायत्री की प्रतिमा के रूप में भी जाना जाता है। इस प्रतिमा को शरीर या मंदिर में स्थापित या धारण करने पर इसकी पूजा-आराधना का उत्तरदायित्व भी होता है। इसके लिए नित्य रूप से एक माला गायत्री मंत्र को जपना चाहिए। गायत्री मंत्र में तीन पद हैं और यज्ञोपवीत में भी तीन सूत्र हैं। प्रत्येक लड़ में तीन सूत्र हैं। गायत्री के एक-एक पद को लेकर ही उपवीत की रचना हुई है।

शास्त्रों में दाएँ कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है। आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएँ कान में होने के कारण उसे दाएँ हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। जनेऊ में पाँच गाँठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्ध, काम और मोक्ष का प्रतीक है। यह पाँच यज्ञों, पाँच ज्ञानेद्रियों और पंच कर्मों का भी प्रतीक भी है।

अन्य धर्मों में जनेऊ संस्कार

भारत वर्ष में शिक्षा-दीक्षा लेने की संस्कृति वैदिक काल से ही चली आ रही है। इसलिए हिन्दू धर्म में बालक के लिए यह संस्कार किया जाता है। लेकिन जनेऊ संस्कार केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं होता है। यह अन्य धर्मों में भिन्न-भिन्न तरीके और नाम से पहचाना जाता है।

इस्लाम मज़हब में मक्का में काबा की परिक्रमा से पहले यह संस्कार किया जाता है।
वहीं सारनाथ की बहुत प्राचीन बुद्ध की मूर्ति को यदि ग़ौर से देखें तो यह ज्ञात होता है कि उनकी छाती पर यज्ञोपवीत की पतली रेखा दिखाई देती है।
वहीं जैन धर्म में भी यह संस्कार संपन्न होता है।
इसके अलावा पारसी और यहूदी धर्म के अनुयायी भी इस परंपरा का पालन करते हैं।
सिख धर्म में इसे अमृत संचार के रूप में जाना जाता है।
ईसाई धर्म में इसे बपस्तिमा कहते हैं।
वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिक रूप से उपनयन संस्कार का विशेष महत्व बताया गया है। विशेषरूप से यह चिकित्सा की दृष्टि से एक बालक के लिए बहुत ही कारगर साबित होता है। इसलिए वैदिक शास्त्रों में इसे केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि एक आरोग्य पोषक की भी संज्ञा दी गई है। चिकित्सीय विज्ञान के अनुसार, शरीर के पिछले हिस्से में पीठ पर जाने वाली एक नस है, जो विद्युत के प्रवाह की तरह कार्य करती है। यह रेखा दाएँ कंधे से लेकर कमर तक स्थित होती है। यह अति सूक्ष्म नस है। अगर यह नस संकूचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लाँघ पाता है और जनेऊ इस नस को सकंचित अवस्था में ही रखता है। इसलिए जनेऊ को धारण करने वाला व्यक्ति शुद्ध चरित्र वाला होता है। उसके अंदर मानवीय गुणों का विकास होता है। यह उसकी आयु, बल और बुद्धि में वृद्धि के लिए सहायक होता है।

एक शोध के अनुसार जो व्यक्ति जनेऊ धारण करता है वह ब्लड प्रेशर और हृदय रोग से मुक्त होता है। दरअस्ल, जनेऊ शरीर में संचार होने वाले रक्त को नियंत्रित बनाए रखता है। चिकित्सकों का ऐसा मानना है कि जनेऊ हृदय के पास से गुजरता है जिससे हृदय रोग की संभावना कम हो जाती है। साथ ही दायें कान के पास से ऐसी नसें गुजरती हैं जिनका संबंध सीधे हमारी आंतों से होता है। जब मल-मूत्र विसर्जन के समय कान में जनेऊ लपेटने से इन नसों में दबाव पड़ता है। ऐसे में पेट अच्छी तरह से साफ़ हो जाता है और पेट से संबंधित रोगों से भी मुक्ति मिलती है।

ज्योतिषीय महत्व

वैदिक ज्योतिष में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु समेत कुल नौ ग्रह होते हैं और इन ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। जनेऊ में तीन सूत्र में कुल नौ लड़ें होती हैं जो नवग्रह का प्रतीक मानी जाती है। ज्योतिष शास्त्र में ऐसा माना जाता है जो व्यक्ति जनेऊ धारण करता है उस व्यक्ति को नवग्रहों का आशीर्वाद प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होता है। इसके साथ ही जनेऊ में उपयोग होने वाला श्वेत रंग का धाग शुक्र ग्रह से संबंध को दर्शाता है। शुक्र ग्रह सौन्दर्य, काम, सुख-वैभव, कला आदि का कारक होता है। इसके साथ ही यज्ञोपवीत को पीले रंग से रंगा जाता है। यह रंग गुरु बृहस्पति से संबंध रखता है। बृहस्पति ग्रह ज्ञान, धर्म, गुरु, अच्छे कर्मों आदि का कारक माना जाता है।

जनेऊ संस्कार की विधि

जनेऊ संस्कार के लिए एक यज्ञ का आयोजन होता है।
इस दौरान जिस बालक का संस्कार होता है वह सहपरिवार यज्ञ में हिस्सा लेता है।
जनेऊ पूर्ण विधि के अनुसार बाएँ कंधे से दाएँ बाजू की ओर शरीर में धारण किया जाता है।
जनेऊ के समय बिना सिले वस्त्र धारण किया जाता है।
इस दौरान हाथ में एक दंड लिया जाता है।
गले में पीले रंग का एक वस्त्र डाला जाता है।
मुंडन के पश्चात एक चोटी रखी जाती है।
पैरों में खड़ाऊ होती हैं।
इस दौरान मेखला या कोपीन धारण की जाती है।
यज्ञ के दौरान सूत्र को विशेष विधि से बनाया जाता है।
यज्ञोपवीत को पीले रंग से रंगा जाता है।
गुरु दीक्षा के बाद ही इसे हमेशा धारण किया जाता है।
ऐसे किया जाता है संस्कार

जनेऊ संस्कार के दिन बालक का मुंडन करवाया जाता है।
स्नान के बाद उसके सिर पर चंदन केसर का लेप लगाया जाता है और उसे जनेऊ पहनाकर ब्रह्मचारी बनाते हैं।
फिर हवन का आयोजन होता है और विधिपूर्वक देवताओं का पूजन, यज्ञवेदी एवं बालक को अधोवस्त्र के साथ माला पहनाकर बैठाया जाता है।
इसके पश्चात दस बार गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके देवताओं के आह्वान के साथ उससे शास्त्र शिक्षा और व्रतों के पालन का वचन लिया जाता है।
इसके बाद उसकी उम्र के बच्चों के साथ बिठाकर चूरमा खिलाते हैं।
फिर स्नान कराकर उस वक्त गुरु, पिता या बड़ा भाई गायत्री मंत्र सुनाकर उस बालक से कहता है कि “आज से तू अब ब्राह्मण हुआ”।
इसके बाद मृगचर्म ओढ़कर मुंज (मेखला) का कंदोरा बांधते हैं और एक दंड हाथ में दे देते हैं।
तत्पश्चात्‌ वह बालक उपस्थित लोगों से भीक्षा मांगता है।
शाम को खाना खाने के पश्चात्‌ दंड को कंधे पर रखकर घर से भागता है और कहता है कि “मैं पढ़ने के लिए काशी जा रहा हूँ”।
बाद में कुछ लोग शादी का लालच देकर पकड़ लाते हैं।
इसके बाद ही बालक ब्राह्मण मान लिया जाता है।
यज्ञोपवीत संस्कार हेतु मंत्र –

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्रं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

जनेऊ संस्कार से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

किसी भी मांगलिक कार्य से पहले जनेऊ पहनना अनिवार्य है।
विवाह के लिए यह संस्कार ज़रुरी है, क्योंकि इसके बिना विवाह नहीं होता है।
मल-मूल विसर्जन के समय जनेऊ को दाहिने कान से लपेटना अनिवार्य होता है।
अगर जनेऊ का कोई सूत्र टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए तो यह बदल लेना चाहिए।
जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परंपरा है।
साफ करने के लिए इसे कण्ठ में घुमाकर धो लें। यदि ये भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करके इसे बदल लेने का नियम है।
देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बांधें।
बालक उपरोक्त नियमों के पालन करने योग्य हो जाए, तभी उनका यह संस्कार करें।
जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है। क्योंकि इसे धारण करने वाले बालक को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्र ग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि सम्मिलित हैं।

🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞⛅ *दिनांक 27 सितम्बर 2018*⛅ *दिन - गुरुवार* ⛅ *विक्रम संवत - 2075 (गुजरात. 2074)*⛅ *शक संवत...
27/09/2018

🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞
⛅ *दिनांक 27 सितम्बर 2018*
⛅ *दिन - गुरुवार*
⛅ *विक्रम संवत - 2075 (गुजरात. 2074)*
⛅ *शक संवत -1940*
⛅ *अयन - दक्षिणायन*
⛅ *ऋतु - शरद*
⛅ *मास - अश्विन (गुजरात एवं महाराष्ट्र अनुसार भाद्रपद)*
⛅ *पक्ष - कृष्ण*
⛅ *तिथि - द्वितीया सुबह 09:02 तक तत्पश्चात तृतीया*
⛅ *नक्षत्र - अश्विनी 28 सितम्बर रात्रि 02:23 तक तत्पश्चात भरणी*
⛅ *योग - व्याघात 28 सितम्बर प्रातः 01:25 तक तत्पश्चात हर्षण*
⛅ *राहुकाल - दोपहर 01:47 से शाम 03:16 तक*
⛅ *सूर्योदय - 06:17*
⛅ *सूर्यास्त - 18:18*
⛅ *दिशाशूल - दक्षिण दिशा में*
⛅ *व्रत पर्व विवरण - तृतीया का श्राद्ध*
💥 *विशेष - द्वितीया को बृहती (छोटा बैंगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
💥 *श्राद्ध और व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *श्राद्ध के दिन* 🌷
🙏🏻 *जिस दिन आप के घर में श्राद्ध हो उस दिन गीता का सातवें अध्याय का पाठ करे । पाठ करते समय जल भर के रखें । पाठ पूरा हो तो जल सूर्य भगवन को अर्घ्य दें और कहें की हमारे पितृ के लिए हम अर्पण करते हें। जिनका श्राद्ध है , उनके लिए आज का गीता पाठ अर्पण।*
🙏
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *श्राद्ध कर्म* 🌷
🌞 *अगर पंडित से श्राद्ध नहीं करा पाते तो सूर्य नारायण के आगे अपने बगल खुले करके (दोनों हाथ ऊपर करके) बोलें :*
🌞 *"हे सूर्य नारायण ! मेरे पिता (नाम), अमुक (नाम) का बेटा, अमुक जाति (नाम), (अगर जाति, कुल, गोत्र नहीं याद तो ब्रह्म गोत्र बोल दे) को आप संतुष्ट/सुखी रखें । इस निमित मैं आपको अर्घ्य व भोजन करता हूँ ।" ऐसा करके आप सूर्य भगवान को अर्घ्य दें और भोग लगायें ।*
🙏 *
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *तुलसी* 🌷
🌿 *श्राद्ध और यज्ञ आदि कार्यों में तुलसी का एक पत्ता भी महान पुण्य देनेवाला है | पद्मपुराण (ऋषिप्रसाद – अक्टूबर २०१४ से )*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *श्राद्ध के लिए विशेष मंत्र* 🌷
🙏 *" ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा । "*
🌞 *इस मंत्र के जप कर के हाथ उठाकर सूर्य नारायण को पितृ की तृप्ति एवं सदगति के लिए प्राथना करें । स्वधा ब्रह्माजी की मानस पुत्री हें। इस मंत्र के जप से पितृ की तृप्ति अवश्य होती है और श्राद्ध में जो त्रुटी रह गई हो वे भी पूर्ण हो जाती है
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *श्राद्ध में करने योग्य* 🌷
🙏 *श्राद्ध पक्ष में १ माला रोज द्वादश मंत्र " ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " की करनी चाहिए और उस माला का फल नित्य अपने पितृ को अर्पण करना चाहिए।*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞
🙏🍀🌷🌻🌺🌸🌹🍁🙏

ग्रहण में क्या करें, क्या न करें ? चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। श्रेष...
27/07/2018

ग्रहण में क्या करें, क्या न करें ? चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्धि होने पर उस घृत को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाक् सिद्धि प्राप्त कर लेता है। सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक 'अरुन्तुद' नरक में वास करता है। सूर्यग्रहण में ग्रहण चार प्रहर (12 घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर (9) घंटे पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए। ग्रहण वेध के प्रारम्भ में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही करना चाहिए और ग्रहण शुरू होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिए। ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और श्राद्ध तथा अंत में सचैल (वस्त्रसहित) स्नान करना चाहिए। स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं। ग्रहण पूरा होने पर सूर्य या चन्द्र, जिसका ग्रहण हो उसका शुद्ध बिम्ब देखकर भोजन करना चाहिए। ग्रहणकाल में स्पर्श किये हुए वस्त्र आदि की शुद्धि हेतु बाद में उसे धो देना चाहिए तथा स्वयं भी वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए। ग्रहण के स्नान में कोई मंत्र नहीं बोलना चाहिए। ग्रहण के स्नान में गरम जल की अपेक्षा ठंडा जल, ठंडे जल में भी दूसरे के हाथ से निकाले हुए जल की अपेक्षा अपने हाथ से निकाला हुआ, निकाले हुए की अपेक्षा जमीन में भरा हुआ, भरे हुए की अपेक्षा बहता हुआ, (साधारण) बहते हुए की अपेक्षा सरोवर का, सरोवर की अपेक्षा नदी का, अन्य नदियों की अपेक्षा गंगा का और गंगा की अपेक्षा भी समुद्र का जल पवित्र माना जाता है। ग्रहण के समय गायों को घास, पक्षियों को अन्न, जरूरतमंदों को वस्त्रदान से अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है। ग्रहण के दिन पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ने चाहिए। बाल तथा वस्त्र नहीं निचोड़ने चाहिए व दंतधावन नहीं करना चाहिए। ग्रहण के समय ताला खोलना, सोना, मल-मूत्र का त्याग, मैथुन और भोजन – ये सब कार्य वर्जित हैं। ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए। ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए। तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किन्तु संतानयुक्त गृहस्थ को ग्रहण और संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिए। भगवान वेदव्यासजी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- 'सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्यग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। यदि गंगाजल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है।' ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम-जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है। ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। (स्कन्द पुराण) भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिए। (देवी भागवत) अस्त के समय सूर्य और चन्द्रमा को रोगभय के कारण नहीं देखना चाहिए।

अक्षय_तृतीया का महत्व क्यों है ?जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी :--🙏 आज ही के दिन जैन के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी भगवा...
18/04/2018

अक्षय_तृतीया का महत्व क्यों है ?
जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी :-
-🙏 आज ही के दिन जैन के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी भगवान ने 13 महीने का कठीन निरंतर उपवास (बिना जल का तप) का पारणा (उपवास छोडना) इक्षु (गन्ने) के रस से किया था। और आज भी बहुत जैन भाई व बहने वही वर्षी तप करने के पश्चात आज उपवास छोड़ते है और नये उपवास लेते है। और भगवान को गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।।
-🙏 आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था।
🙏-महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था।
🙏-माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था।
🙏-द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था।
🙏- कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था।
🙏- कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था।
🙏-सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था।
🙏-ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था।
🙏- प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है।
🙏- बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है। अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है।
🙏- इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था।
🙏- अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है।।
🙏आप सभी को अक्षयतृतीया की बहुत सारी शुभ कामना

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