26/09/2022
नागरी दान दे।
मोहन जान दे।
ठाकुर जी दान मांग रहे हैं। गोपियाँ जाने देने के लिए कह रही हैं। ठाकुर जी कौनसा दान मांग रहे हैं?
ठाकुरजी न दूध दही का दान मांग रहे हैं, न देह का दान। ठाकुरजी भाव का दान मांग रहे हैं।
आप सर्व वस्तु के दानी हैं फिर आप कैसे दान मांगते हैं? आपको गोपियों के भाव का दान चाहिए। गोपियों को ठाकुरजी का भाव मिलता है। उसकी अपनी विशेषता है, अपना स्वरूप है मगर गोपियों के भाव का जो दान ठाकुरजी को मिलता है वह विलक्षण है, उसकी बात निराली है।
हम चर्चा कर सकते हैं कि यह गोपी भाव क्या है, कैसा है?
करते ही हैं। पर क्या भाव की चर्चा की जा सकती है?
भाव की चर्चा करने पर भाव का आभास मिलता है, भाव अपने शुद्ध रूप में नहीं होता।
भगवल्लीला की चर्चा भाववश,भाव मग्न होकर की जाती है वह अलग बात है। भाव के लिए चर्चा होती है, चर्चा के लिए भाव नहीं होता।
भाव स्वरुपात्मक है। जब हम कहते हैं यह स्वामिनी जी के भाव से है, यह चंद्रावलीजी के भाव से है तब क्या भाव अलग होता है?
नहीं। तब स्वामिनी जी स्वयं अपने भाव रुप से उस सामग्री के रूप में सेवा में संलग्न होती हैं। वहां वह वस्तु नहीं अपितु स्वयं उनका भाव स्वरूप होता है। ठाकुरजी को वही तो चाहिए।
अगर किसी को बिना भाव के पकवान खिलाये जायें और भाव सहित सूखी रोटी भी खिलाई जाय तो फर्क मालूम पडेगा। भाव है तो उसमें रस बरसता है।
भाव मुख्य है, वस्तु गौण है। तब भाव ही उस वस्तु का रुप ले लेता है। ग्रहण कर्ता वस्तु के रूप में भाव ग्रहण करता है।
ठाकुरजी दूध दही के बहाने वह भाव मांगते हैं। गोपियाँ कहती हैं-हमें जाने दो।
क्या गोपियाँ नहीं जानतीं,वे जानती हैं मगर दोनों में रस्साकशी कैसे हो? अंत में वह भाव, उस प्रेम का दान मिलता ही है प्रभु को।
एक दृष्टि से यह दान लीला जग में भी चल रही है। सब लोग भाव मांगते हैं, प्रेम चाहते हैं। कोई देता नहीं क्यों कि पास में है नहीं। सभी लोगों को भगवान से ही यह दान मिलेगा जो उनके पास है। भगवान कहते हैं-यह दान तो मैं भी गोपियों से मांगता हूँ। यह उनके पास है इसलिए। जिसके पास जो है वह उससे मांगा जाता है। हम यह उससे मांग रहे हैं जिसके पास है नहीं तो वह कैसे देगा? फिर हम बेचैन होकर कहते हैं कि इसमें भाव नहीं है, उसमें भाव नहीं है।
वह देगा कहाँ से? उसे भी चाहिए। हमारे पास नहीं है तो हम ठाकुरजी से मांगें, ठाकुरजी गोपियों से मांगेंगे। गोपियों क़ो मांगने की जरूरत नहीं। वे स्वयं भाव स्वरूप हैं। स्वर्ण के पर्वत से स्वर्ण का दान मांगा जाय तो क्या स्वर्ण पर्वत किसी दूसरे से मांगने जायेगा?
जरूरत ही नहीं। वह स्वयं समृद्ध है, परिपूर्ण है अपने आपमें, चाहे जितना दान दे सकता है।
वैसा ही गोपी जनों के साथ है। भगवान उन्हीं से मांगते हैं।
वैष्णव भी मांगते हैं। वल्लभ ने इसलिए उन्हें पुष्टि मार्ग की गुरु बनाया। गुरु से ज्ञान मिलता है। गुरु गोपी से भाव का दान मिलता है।
गुरु की व्याख्या है जो अज्ञान का अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश करे।
गोपी गुरु भाव की कमी को दूरकर हृदय को भाव से पूर्ण करती हैं। वल्लभ को गुरु मानते हैं तो वल्लभ स्वामिनी जी स्वरूप हैं। गोपी स्वरूप ही तो हैं। हम अप्रत्यक्ष रुप से वल्लभ के उसी स्वरूप से भाव मांगते हैं और वह मिलता भी है। क्या हम वल्लभ स्मरण, वल्लभ चर्चा करते हैं तब भाव उत्पन्न नहीं होता? वे स्वयं भाव हैं अतः वल्लभ का स्मरण करें, चाहे भाव का एक ही बात है। वल्लभ भाव का साकार रुप हैं अन्यथा निराकार रुप में भाव को भजना उतना ही कठिन है जैसे निराकार ब्रह्म को भजना। वल्लभ समर्थ गुरु हैं। वे भाव का दान कर हमें जन्म जन्म के लिए उसके अभाव से मुक्त कर सकते हैं।
श्री गिरिराज धरण की जय।