11/04/2016
[09/03 11:43] Ranjeet Surana: ( वास्तु सलाह 14 )
आग्नेय स्थल ---
जिस स्थल के दक्षिण एवं पूर्व दिशा में मार्ग हो उसे आग्नेय स्थल कहते हैं । वास्तु शास्त्र के अनुसार यह अन्य स्थलों की अपेक्षा कम प्रभावशाली होता है । शुभ परिणाम देने की दृष्टि से यह निम्न होता है । परन्तु वास्तु शास्त्रानुसार इसे बनाया जाये तो यह शुभ फल देता है । अतः आग्नेय स्थल पर भवन विशेष सावधानी पूर्वक बनाना चाहिए ।
आग्नेय स्थल भवन बनाने पर दक्षिण दिशा की अपेक्षा उत्तर दिशा में खाली स्थल ज्यादा छोड़ना चाहिए । एवं पश्चिम दिशा की अपेक्षा पूर्व दिशा में खाली स्थल ज्यादा छोड़ना चाहिए । स्थल का वर्षा का पानी ईशान क्षेत्र से होकर निकलना चाहिए । आग्नेय से बरसात अथवा घर में उपयोग किया हुवा पानी आग्नेय से होकर नहीं निकलना चाहिए ।
आग्नेय स्थल के शुभ अशुभ परिणाम स्त्रियों , बच्चों एवं खासकर गृह स्वामी की द्वितीय सन्तान पर अधिक प्रभावी होते है ।
रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
98302 67409
[10/03 09:00] Ranjeet Surana: ( वास्तु सलाह 15 )
आग्नेय स्थल के शुभ परिणाम
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1 , स्थल के पूर्व दिशा में खाली स्थल हो एवं पश्चिम दिशा में खाली स्थल न हो अथवा अपेक्षाकृत कम हो । पश्चिम दिशा की अपेक्षा पूर्व दिशा में भूमि नीची हो तो गृह स्वामी सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे ।
2 , स्थल के ईशान क्षेत्र में कुआँ हो , उत्तर दिशा दक्षिण दिशा से नीची हो दक्षिण दिशा की अपेक्षा उत्तर दिशा में स्थल ज्यादा खाली छोड़ा गया हो तो गृह स्वामी वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे ।
3 , आग्नेय क्षेत्र में रसोईघर हो चूल्हा भी आग्नेय क्षेत्र में हो तो समस्त प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है ।
4 , इस स्थल पर आग्नेय दिशा में शौचालय शुभ फल देगा । परन्तु आग्नेय क्षेत्र में गढ्ढा नहीं हो एवं निर्माण पूर्व दिशा की दीवार को छुए बिना हो तो यह शुभ फल प्रदान करेगा ।
रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409
[04/04 07:59] Ranjeet Surana: ( वास्तु सलाह 16 )
आग्नेय स्थल के अशुभ परिणाम
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1 , आग्नेय स्थल पर निर्मित भवन का पूर्व आग्नेय बढ़ा हुवा हो , आग्नेय में कुआँ अथवा गड्ढा हो , उत्तर दिशा की सीमा तक भवन बना हो , पूर्व आग्नेय अथवा दक्षिण नैऋत्य में मुख्य द्वार हो तो ऐसे गृह स्वामी का वंश नहीं बढ़ेगा , पुत्र संतान का आभाव रहेगा एवं सम्पति पुत्रियों के परिवार को मिलेगी ।
2 , दक्षिण दिशा में मुख्य द्वार हो , उत्तर एवं पूर्व में खाली जगह छोड़े बिना गृह निर्माण हुवा हो , दक्षिण एवं पश्चिम में खाली जगह छोड़ी गई हो तो गृह स्वामी अधेड़ अवस्था में लम्बी बीमारी से ग्रसित होगा अथवा लम्बी उम्र नहीं पायेगा ।
3 , स्थल के ईशान क्षेत्र में गृह निर्माण हो और ईशान में चबूतरा अथवा ऊँचा स्थल हो तो गृह स्वामी आकाल मृत्यु का शिकार होता है ।
4 , स्थल की उत्तरी सीमा से गृह निर्माण हो , तथा दक्षिण में खाली स्थल ज्यादा हो , पूर्व मुख्य द्वार हो , आग्नेय में कुआँ हो तो गृह स्वामी की दुर्घटना में मृत्यु होती है ।
5 , पूर्वी मुख्य द्वार वाले गृह का निर्माण अगर उत्तर पूर्व की सीमा से हो एवं दक्षिण पश्चिम दिशा में खाली स्थल हो तो गृह स्वामी का पति पत्नी के बीच मनोमालिन्य रहता है एवं सन्तान अविनीत और उदण्ड होती है ।
6 , इस स्थल का पूर्वी मार्ग अगर स्थल से आगे न जाकर स्थल तक ही समाप्त हो जाये तो वह गृह दूसरों के आधीन हो जायेगा ।
7 , आग्नेय स्थल पर निर्मित गृह के पूर्व में मुख्य द्वार हो , चाहर दीवारी के पूर्व आग्नेय में एक और द्वार हो , तथा चाहर दीवारी के नैऋत्य में भी द्वार हो , ईशान दिशा कटी हुवी हो , वायव्य में कुआँ हो , नैऋत्य में पश्चिम की तरफ ढलवाँ बरामदा हो , पश्चिम में स्थल नीचा हो तो गृह स्वामी आत्महत्या जैसा जघन्य कार्य करता है ।
8 , पूर्व दिशा की सीमा से गृह निर्माण हुवा हो , पश्चिम में खाली स्थल हो , पश्चिम में स्थल नीचा हो अथवा कुआँ हो , दक्षिण दिशा में मुख्य द्वार हो तो वँश का विनाश हो सकता है । गृह स्वामी की हत्या भी हो सकती है ।
9 , इस स्थल पर निर्मित गृह में पूर्व आग्नेय द्वार होने पर चोरी एवं अग्निभय रहता है । इसके कारण व्यक्ति जिद्दी स्वाभाव का हो जाता है तथा गृह कलह का भी कारण बनता है ।
10 , आग्नेय स्थल की आग्नेय दिशा अथवा इस पर निर्मित गृह का आग्नेय कोण के रूप में बढ़ा हो तो गृह कलह के साथ इस गृह के निवासियों को बीमारियां परेशां करती रहेगी । दक्षिण आग्नेय चतुष्कोण के रूप में बढ़ने पर दोष नहीं होता ।
11 , आग्नेय स्थल के स्थल एवं गृह का दक्षिण आग्नेय नीच हो , वायव्य एवं उत्तर दिशा ऊँची हो तो इस गृह के निवासी रोगी एवं कर्जदार होते हैं ।
12 , दक्षिण आग्नेय क्षेत्र नीचा हो , नैऋत्य , ईशान , वायव्य ऊँचा हो तो गृह स्वामी को आर्थिक बाधा के साथ स्वास्थ्य कमजोर रहेगा ।
13 , इस स्थल का आग्नेय तथा ईशान ऊँचा हो तथा नैऋत्य एवं वायव्य नीचा हो तो वंश के लिए हानिकारक होगा ।
14 , आग्नेय में कुआँ हो तो गृहणी अस्वस्थ रहेगी । तथा विवाद के कारण द्वीतीय सन्तान को नुकसान होता है ।
15 , आग्नेय स्थल के पूर्व आग्नेय में द्वार हो उसी से आवागमन करता हो तो व्यक्ति धोके का शिकार होगा अथवा धोका देगा । पति पत्नी के बीच भी विवाद रहता है ।
( कभी कभी भाग्य प्रबल होने के कारण दुष्परिणाम कुछ कम हो सकते हैं । पर भोगने तो पड़ते हैं । )
रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409
[04/04 07:59] Ranjeet Surana: ( वास्तु सलाह 17 )
आग्नेय स्थल पर गृह निर्माण हेतु सुझाव
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1 , आग्नेय स्थल की दक्षिण की सड़क पूर्व दिशा की सड़क से नीची हो तो पूर्व दिशा की तरफ मुख्य द्वार बनाना चाहिए । परन्तु दिशा सूचक यंत्र द्वारा पूर्व दिशा 10 डिग्री से ज्यादा आग्नेय को देखे तो स्थल का द्वार पूर्व ईशान एवं भवन का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की तरफ बनावें ।
2 , गृह के दक्षिण आग्नेय द्वार रखकर आवागमन किया जा सकता है ।
3 , गृह में उपयोग में लिया जल एवं बरसात का जल आग्नेय क्षेत्र से बाहर नहीं निकलना चाहिए । उसे ईशान अथवा पूर्व दिशा से बाहर निकालना चाहिए ।
4 , आग्नेय क्षेत्र में शौचालय बना सकते है , परन्तु पूर्वी दीवार को छूना नहीं चाहिए । तथा उसके गड्ढे भी आग्नेय में नहीं होने चाहिए । कमोड को इस प्रकार लगावें कि उस पर बैठने वालों का मुँह उत्तर अथवा दक्षिण दिशा की तरफ हो ।
5 , अधिकांश मकानों में देखा गया है कि दक्षिण दिशा के बरामदों में लोहे की ग्रिल लगाई जाती है तथा उसके नीचे पतली दीवार बनाई जाती है । यह अच्छी नहीं मानी जाती इससे नैऋत्य दिशा बढ़कर अनर्थ कराती है । अतः दक्षिण दिशा की ग्रिल के नीचे की दीवार भवन की अन्य दीवारों के सामान ही होनी चाहिए ।