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वर्तमान युग भौतिक वादी युग है | व्यक्ति प्रत्येक कार्य को सुविधा की दृष्टी से करना चाहता है परन्तु उसे सुख-चैन नहीं है | इसका मुख्य कारण है अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का विनाश | जब से रहन सहन में पाश्चात्य संस्कृति एवं सुविधावाद आया है तभी से विनाश को भी निमंत्रण मिला है | वर्तमान युग में आधुनिक भवनों एवं फ्लैटों में रहने वालो से गांवों के पुराने भवनों एवं भारतीय शैली से निर्मित गृहों में रहने वाले

कहीं अधिक सुखी एवं सम्पन्न है |
गत वर्षों में मेरा वास्तु से किसी न किसी प्रकार से सम्बन्ध बना रहा है | वास्तु चर्चा, वास्तु शास्त्र के ग्रंथो का अध्ययन एवं वास्तु शास्त्रियों से भी बराबर संपर्क रहा है | मैंने अलग अलग स्थानों के अनेक भवनों को देखा है , उनके वास्तु गुण दोषों को देखा है |
मानव जीवन को मुख्यतया दो चीजे प्रभावित करती है पहला उसका भाग्य और दूसरा वास्तु शास्त्र | अगर व्यक्ति का भाग्य अनुकूल हो एवं उसका गृह तथा व्यापारिक स्थल वास्तु के अनुकूल हो तो उसकी उन्नति तीव्र गति से होती है उसके मार्ग में रूकावट नहीं आती , भाग्य अगर अनुकूल हो परन्तु गृह एवं व्यापारिक संस्थान वास्तु नियमों के प्रतिकूल हो तो उसे यथेष्ट लाभ नहीं मिल पाता |इसी प्रकार भाग्य अगर प्रतिकूल हो एवं उसका गृह व्यापारिक संस्थान वास्तु सम्पन्न हो तो उसे विपति एक साथ नहीं आती | परन्तु भाग्य भी प्रतिकूल हो एवं वास्तु नियमों कि भी अनदेखी की गयी हो तो उसे दर दर कि ठोकरे खाने को मजबूर होना पड़ता है |
आप भी वास्तु नियमों के अनुसार रहकर सुखी जीवन जियें |
- रणजीत कुमार सुराना (वास्तु सलाहकार )

24/03/2017

अप्रेल के बाद पुनः वास्तु सुझाव की सृंखला चालू करुगाँ ।

26/07/2016

( वास्तु सलाह 17 )

आग्नेय स्थल पर गृह निर्माण हेतु सुझाव
--------------------------------------------------

1 , आग्नेय स्थल की दक्षिण की सड़क पूर्व दिशा की सड़क से नीची हो तो पूर्व दिशा की तरफ मुख्य द्वार बनाना चाहिए । परन्तु दिशा सूचक यंत्र द्वारा पूर्व दिशा 10 डिग्री से ज्यादा आग्नेय को देखे तो स्थल का द्वार पूर्व ईशान एवं भवन का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की तरफ बनावें ।

2 , गृह के दक्षिण आग्नेय द्वार रखकर आवागमन किया जा सकता है ।

3 , गृह में उपयोग में लिया जल एवं बरसात का जल आग्नेय क्षेत्र से बाहर नहीं निकलना चाहिए । उसे ईशान अथवा पूर्व दिशा से बाहर निकालना चाहिए ।

4 , आग्नेय क्षेत्र में शौचालय बना सकते है , परन्तु पूर्वी दीवार को छूना नहीं चाहिए । तथा उसके गड्ढे भी आग्नेय में नहीं होने चाहिए । कमोड को इस प्रकार लगावें कि उस पर बैठने वालों का मुँह उत्तर अथवा दक्षिण दिशा की तरफ हो ।

5 , अधिकांश मकानों में देखा गया है कि दक्षिण दिशा के बरामदों में लोहे की ग्रिल लगाई जाती है तथा उसके नीचे पतली दीवार बनाई जाती है । यह अच्छी नहीं मानी जाती इससे नैऋत्य दिशा बढ़कर अनर्थ कराती है । अतः दक्षिण दिशा की ग्रिल के नीचे की दीवार भवन की अन्य दीवारों के सामान ही होनी चाहिए ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409

26/07/2016

( वास्तु सलाह 16 )

आग्नेय स्थल के अशुभ परिणाम
-----------------------------------------

1 , आग्नेय स्थल पर निर्मित भवन का पूर्व आग्नेय बढ़ा हुवा हो , आग्नेय में कुआँ अथवा गड्ढा हो , उत्तर दिशा की सीमा तक भवन बना हो , पूर्व आग्नेय अथवा दक्षिण नैऋत्य में मुख्य द्वार हो तो ऐसे गृह स्वामी का वंश नहीं बढ़ेगा , पुत्र संतान का आभाव रहेगा एवं सम्पति पुत्रियों के परिवार को मिलेगी ।

2 , दक्षिण दिशा में मुख्य द्वार हो , उत्तर एवं पूर्व में खाली जगह छोड़े बिना गृह निर्माण हुवा हो , दक्षिण एवं पश्चिम में खाली जगह छोड़ी गई हो तो गृह स्वामी अधेड़ अवस्था में लम्बी बीमारी से ग्रसित होगा अथवा लम्बी उम्र नहीं पायेगा ।

3 , स्थल के ईशान क्षेत्र में गृह निर्माण हो और ईशान में चबूतरा अथवा ऊँचा स्थल हो तो गृह स्वामी आकाल मृत्यु का शिकार होता है ।

4 , स्थल की उत्तरी सीमा से गृह निर्माण हो , तथा दक्षिण में खाली स्थल ज्यादा हो , पूर्व मुख्य द्वार हो , आग्नेय में कुआँ हो तो गृह स्वामी की दुर्घटना में मृत्यु होती है ।

5 , पूर्वी मुख्य द्वार वाले गृह का निर्माण अगर उत्तर पूर्व की सीमा से हो एवं दक्षिण पश्चिम दिशा में खाली स्थल हो तो गृह स्वामी का पति पत्नी के बीच मनोमालिन्य रहता है एवं सन्तान अविनीत और उदण्ड होती है ।

6 , इस स्थल का पूर्वी मार्ग अगर स्थल से आगे न जाकर स्थल तक ही समाप्त हो जाये तो वह गृह दूसरों के आधीन हो जायेगा ।

7 , आग्नेय स्थल पर निर्मित गृह के पूर्व में मुख्य द्वार हो , चाहर दीवारी के पूर्व आग्नेय में एक और द्वार हो , तथा चाहर दीवारी के नैऋत्य में भी द्वार हो , ईशान दिशा कटी हुवी हो , वायव्य में कुआँ हो , नैऋत्य में पश्चिम की तरफ ढलवाँ बरामदा हो , पश्चिम में स्थल नीचा हो तो गृह स्वामी आत्महत्या जैसा जघन्य कार्य करता है ।

8 , पूर्व दिशा की सीमा से गृह निर्माण हुवा हो , पश्चिम में खाली स्थल हो , पश्चिम में स्थल नीचा हो अथवा कुआँ हो , दक्षिण दिशा में मुख्य द्वार हो तो वँश का विनाश हो सकता है । गृह स्वामी की हत्या भी हो सकती है ।

9 , इस स्थल पर निर्मित गृह में पूर्व आग्नेय द्वार होने पर चोरी एवं अग्निभय रहता है । इसके कारण व्यक्ति जिद्दी स्वाभाव का हो जाता है तथा गृह कलह का भी कारण बनता है ।

10 , आग्नेय स्थल की आग्नेय दिशा अथवा इस पर निर्मित गृह का आग्नेय कोण के रूप में बढ़ा हो तो गृह कलह के साथ इस गृह के निवासियों को बीमारियां परेशां करती रहेगी । दक्षिण आग्नेय चतुष्कोण के रूप में बढ़ने पर दोष नहीं होता ।

11 , आग्नेय स्थल के स्थल एवं गृह का दक्षिण आग्नेय नीच हो , वायव्य एवं उत्तर दिशा ऊँची हो तो इस गृह के निवासी रोगी एवं कर्जदार होते हैं ।

12 , दक्षिण आग्नेय क्षेत्र नीचा हो , नैऋत्य , ईशान , वायव्य ऊँचा हो तो गृह स्वामी को आर्थिक बाधा के साथ स्वास्थ्य कमजोर रहेगा ।

13 , इस स्थल का आग्नेय तथा ईशान ऊँचा हो तथा नैऋत्य एवं वायव्य नीचा हो तो वंश के लिए हानिकारक होगा ।

14 , आग्नेय में कुआँ हो तो गृहणी अस्वस्थ रहेगी । तथा विवाद के कारण द्वीतीय सन्तान को नुकसान होता है ।

15 , आग्नेय स्थल के पूर्व आग्नेय में द्वार हो उसी से आवागमन करता हो तो व्यक्ति धोके का शिकार होगा अथवा धोका देगा । पति पत्नी के बीच भी विवाद रहता है ।

( कभी कभी भाग्य प्रबल होने के कारण दुष्परिणाम कुछ कम हो सकते हैं । पर भोगने तो पड़ते हैं । )

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409

26/07/2016

( वास्तु सलाह 15 )

आग्नेय स्थल के शुभ परिणाम
--------------------------------------

1 , स्थल के पूर्व दिशा में खाली स्थल हो एवं पश्चिम दिशा में खाली स्थल न हो अथवा अपेक्षाकृत कम हो । पश्चिम दिशा की अपेक्षा पूर्व दिशा में भूमि नीची हो तो गृह स्वामी सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे ।

2 , स्थल के ईशान क्षेत्र में कुआँ हो , उत्तर दिशा दक्षिण दिशा से नीची हो दक्षिण दिशा की अपेक्षा उत्तर दिशा में स्थल ज्यादा खाली छोड़ा गया हो तो गृह स्वामी वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे ।

3 , आग्नेय क्षेत्र में रसोईघर हो चूल्हा भी आग्नेय क्षेत्र में हो तो समस्त प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है ।

4 , इस स्थल पर आग्नेय दिशा में शौचालय शुभ फल देगा । परन्तु आग्नेय क्षेत्र में गढ्ढा नहीं हो एवं निर्माण पूर्व दिशा की दीवार को छुए बिना हो तो यह शुभ फल प्रदान करेगा ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409

11/04/2016

[09/03 11:43] Ranjeet Surana: ( वास्तु सलाह 14 )

आग्नेय स्थल ---

जिस स्थल के दक्षिण एवं पूर्व दिशा में मार्ग हो उसे आग्नेय स्थल कहते हैं । वास्तु शास्त्र के अनुसार यह अन्य स्थलों की अपेक्षा कम प्रभावशाली होता है । शुभ परिणाम देने की दृष्टि से यह निम्न होता है । परन्तु वास्तु शास्त्रानुसार इसे बनाया जाये तो यह शुभ फल देता है । अतः आग्नेय स्थल पर भवन विशेष सावधानी पूर्वक बनाना चाहिए ।

आग्नेय स्थल भवन बनाने पर दक्षिण दिशा की अपेक्षा उत्तर दिशा में खाली स्थल ज्यादा छोड़ना चाहिए । एवं पश्चिम दिशा की अपेक्षा पूर्व दिशा में खाली स्थल ज्यादा छोड़ना चाहिए । स्थल का वर्षा का पानी ईशान क्षेत्र से होकर निकलना चाहिए । आग्नेय से बरसात अथवा घर में उपयोग किया हुवा पानी आग्नेय से होकर नहीं निकलना चाहिए ।

आग्नेय स्थल के शुभ अशुभ परिणाम स्त्रियों , बच्चों एवं खासकर गृह स्वामी की द्वितीय सन्तान पर अधिक प्रभावी होते है ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
98302 67409
[10/03 09:00] Ranjeet Surana: ( वास्तु सलाह 15 )

आग्नेय स्थल के शुभ परिणाम
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1 , स्थल के पूर्व दिशा में खाली स्थल हो एवं पश्चिम दिशा में खाली स्थल न हो अथवा अपेक्षाकृत कम हो । पश्चिम दिशा की अपेक्षा पूर्व दिशा में भूमि नीची हो तो गृह स्वामी सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे ।

2 , स्थल के ईशान क्षेत्र में कुआँ हो , उत्तर दिशा दक्षिण दिशा से नीची हो दक्षिण दिशा की अपेक्षा उत्तर दिशा में स्थल ज्यादा खाली छोड़ा गया हो तो गृह स्वामी वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे ।

3 , आग्नेय क्षेत्र में रसोईघर हो चूल्हा भी आग्नेय क्षेत्र में हो तो समस्त प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है ।

4 , इस स्थल पर आग्नेय दिशा में शौचालय शुभ फल देगा । परन्तु आग्नेय क्षेत्र में गढ्ढा नहीं हो एवं निर्माण पूर्व दिशा की दीवार को छुए बिना हो तो यह शुभ फल प्रदान करेगा ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409
[04/04 07:59] Ranjeet Surana: ( वास्तु सलाह 16 )

आग्नेय स्थल के अशुभ परिणाम
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1 , आग्नेय स्थल पर निर्मित भवन का पूर्व आग्नेय बढ़ा हुवा हो , आग्नेय में कुआँ अथवा गड्ढा हो , उत्तर दिशा की सीमा तक भवन बना हो , पूर्व आग्नेय अथवा दक्षिण नैऋत्य में मुख्य द्वार हो तो ऐसे गृह स्वामी का वंश नहीं बढ़ेगा , पुत्र संतान का आभाव रहेगा एवं सम्पति पुत्रियों के परिवार को मिलेगी ।

2 , दक्षिण दिशा में मुख्य द्वार हो , उत्तर एवं पूर्व में खाली जगह छोड़े बिना गृह निर्माण हुवा हो , दक्षिण एवं पश्चिम में खाली जगह छोड़ी गई हो तो गृह स्वामी अधेड़ अवस्था में लम्बी बीमारी से ग्रसित होगा अथवा लम्बी उम्र नहीं पायेगा ।

3 , स्थल के ईशान क्षेत्र में गृह निर्माण हो और ईशान में चबूतरा अथवा ऊँचा स्थल हो तो गृह स्वामी आकाल मृत्यु का शिकार होता है ।

4 , स्थल की उत्तरी सीमा से गृह निर्माण हो , तथा दक्षिण में खाली स्थल ज्यादा हो , पूर्व मुख्य द्वार हो , आग्नेय में कुआँ हो तो गृह स्वामी की दुर्घटना में मृत्यु होती है ।

5 , पूर्वी मुख्य द्वार वाले गृह का निर्माण अगर उत्तर पूर्व की सीमा से हो एवं दक्षिण पश्चिम दिशा में खाली स्थल हो तो गृह स्वामी का पति पत्नी के बीच मनोमालिन्य रहता है एवं सन्तान अविनीत और उदण्ड होती है ।

6 , इस स्थल का पूर्वी मार्ग अगर स्थल से आगे न जाकर स्थल तक ही समाप्त हो जाये तो वह गृह दूसरों के आधीन हो जायेगा ।

7 , आग्नेय स्थल पर निर्मित गृह के पूर्व में मुख्य द्वार हो , चाहर दीवारी के पूर्व आग्नेय में एक और द्वार हो , तथा चाहर दीवारी के नैऋत्य में भी द्वार हो , ईशान दिशा कटी हुवी हो , वायव्य में कुआँ हो , नैऋत्य में पश्चिम की तरफ ढलवाँ बरामदा हो , पश्चिम में स्थल नीचा हो तो गृह स्वामी आत्महत्या जैसा जघन्य कार्य करता है ।

8 , पूर्व दिशा की सीमा से गृह निर्माण हुवा हो , पश्चिम में खाली स्थल हो , पश्चिम में स्थल नीचा हो अथवा कुआँ हो , दक्षिण दिशा में मुख्य द्वार हो तो वँश का विनाश हो सकता है । गृह स्वामी की हत्या भी हो सकती है ।

9 , इस स्थल पर निर्मित गृह में पूर्व आग्नेय द्वार होने पर चोरी एवं अग्निभय रहता है । इसके कारण व्यक्ति जिद्दी स्वाभाव का हो जाता है तथा गृह कलह का भी कारण बनता है ।

10 , आग्नेय स्थल की आग्नेय दिशा अथवा इस पर निर्मित गृह का आग्नेय कोण के रूप में बढ़ा हो तो गृह कलह के साथ इस गृह के निवासियों को बीमारियां परेशां करती रहेगी । दक्षिण आग्नेय चतुष्कोण के रूप में बढ़ने पर दोष नहीं होता ।

11 , आग्नेय स्थल के स्थल एवं गृह का दक्षिण आग्नेय नीच हो , वायव्य एवं उत्तर दिशा ऊँची हो तो इस गृह के निवासी रोगी एवं कर्जदार होते हैं ।

12 , दक्षिण आग्नेय क्षेत्र नीचा हो , नैऋत्य , ईशान , वायव्य ऊँचा हो तो गृह स्वामी को आर्थिक बाधा के साथ स्वास्थ्य कमजोर रहेगा ।

13 , इस स्थल का आग्नेय तथा ईशान ऊँचा हो तथा नैऋत्य एवं वायव्य नीचा हो तो वंश के लिए हानिकारक होगा ।

14 , आग्नेय में कुआँ हो तो गृहणी अस्वस्थ रहेगी । तथा विवाद के कारण द्वीतीय सन्तान को नुकसान होता है ।

15 , आग्नेय स्थल के पूर्व आग्नेय में द्वार हो उसी से आवागमन करता हो तो व्यक्ति धोके का शिकार होगा अथवा धोका देगा । पति पत्नी के बीच भी विवाद रहता है ।

( कभी कभी भाग्य प्रबल होने के कारण दुष्परिणाम कुछ कम हो सकते हैं । पर भोगने तो पड़ते हैं । )

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409
[04/04 07:59] Ranjeet Surana: ( वास्तु सलाह 17 )

आग्नेय स्थल पर गृह निर्माण हेतु सुझाव
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1 , आग्नेय स्थल की दक्षिण की सड़क पूर्व दिशा की सड़क से नीची हो तो पूर्व दिशा की तरफ मुख्य द्वार बनाना चाहिए । परन्तु दिशा सूचक यंत्र द्वारा पूर्व दिशा 10 डिग्री से ज्यादा आग्नेय को देखे तो स्थल का द्वार पूर्व ईशान एवं भवन का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की तरफ बनावें ।

2 , गृह के दक्षिण आग्नेय द्वार रखकर आवागमन किया जा सकता है ।

3 , गृह में उपयोग में लिया जल एवं बरसात का जल आग्नेय क्षेत्र से बाहर नहीं निकलना चाहिए । उसे ईशान अथवा पूर्व दिशा से बाहर निकालना चाहिए ।

4 , आग्नेय क्षेत्र में शौचालय बना सकते है , परन्तु पूर्वी दीवार को छूना नहीं चाहिए । तथा उसके गड्ढे भी आग्नेय में नहीं होने चाहिए । कमोड को इस प्रकार लगावें कि उस पर बैठने वालों का मुँह उत्तर अथवा दक्षिण दिशा की तरफ हो ।

5 , अधिकांश मकानों में देखा गया है कि दक्षिण दिशा के बरामदों में लोहे की ग्रिल लगाई जाती है तथा उसके नीचे पतली दीवार बनाई जाती है । यह अच्छी नहीं मानी जाती इससे नैऋत्य दिशा बढ़कर अनर्थ कराती है । अतः दक्षिण दिशा की ग्रिल के नीचे की दीवार भवन की अन्य दीवारों के सामान ही होनी चाहिए ।

17/03/2016

( वास्तु सलाह 13 )

ईशान स्थल पर गृह निर्माण हेतु सुझाव

1 , दिशा सूचक यंत्र द्वारा सही माप कर मुख्य द्वार उत्तर अथवा पूर्व दिशा में उच्च स्थान पर रखना चाहिए । एवं ईशान द्वार रखकर उसे ज्यादातर खुला रखना चाहिए ।

2 , सम्पूर्ण गृह का ईशान बढ़ाया जा सकता है परन्तु प्रत्येक कक्ष का ईशान नहीं बढ़ाना चाहिए ।

3 , गृह के ईशान दिशा के कक्ष के दक्षिण अथवा पश्चिम दिशा में द्वार हो तो पूर्व ईशान अथवा उत्तर ईशान में अन्य द्वार बनाना चाहिए ।

4 , किसी भी कक्ष की ईशान दिशा को पूर्ण रूप से खाली रखें , उसमें झाड़ू , डंडा , छाता इत्यादि कुछ भी ना रखें ।

5 , कुआँ , बोरिंग , अथवा भूमिगत पानी की टंकी उत्तर ईशान एवं पूर्व ईशान में खुले स्थान में ही बनवानी चाहिए । गृह के नीचे नहीं बनानी चाहिए ।

6 , ईशान दिशा की चाहर दीवारी गोलाई लिए नहीं होनी चाहिए , इससे ईशान घट कर अनिष्ट का कारन बनता है ।

7 , अपने स्थल का ईशान क्षेत्र कभी भी नहीं बेचना चाहिए , ना ही किसी को देना चाहिए , अपितु अपने स्थल से ईशान दिशा का क्षेत्र अगर मिले तो अधिक कीमत देकर भी ले लेना चाहिए ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409

17/03/2016

( वास्तु सलाह 12 )

ईशान स्थल के अशुभ परिणाम

ईशान स्थल के अशुभ परिणाम उस स्थल के निवासी पुरुषों एवम् उनकी पुरुष सन्तान पर अधिक प्रभावी होते हैं ।

1 , ईशान स्थल की पूर्वी सीमा पर गृह निर्माण किया गया हो तथा पश्चिम दिशा में खाली स्थल हो तो गृह स्वामी एवं उसके ज्येष्ठ पुत्र को उसके दुष्परिणाम भोगने पड़ते है । तीसरी पीढ़ी से अधिक वंश चलने में कठिनाई होती है ।

2 , ईशान स्थल की उत्तरी सीमा पर गृह निर्माण किया गया हो तथा दक्षिण दिशा में खाली स्थल हो तो उस गृह की गृहणी रोगग्रस्त रहती है । अथवा उसकी आयु भी क्षीण हो सकती है ।

3 , ईशान स्थल की चाहर दिवारी का ईशान एवम् उस पर निर्मित गृह का भी ईशान घटा हुवा हो तो गृह स्वामी को पुरुष सन्तान नहीं होती । अगर पुत्र होता है तो वह मानसिक रोगी , विकलांग अथवा अल्पायु होता है ।

4 , गृह का ईशान घटने पर गृह स्वामी की पुरुष संतान लम्बी उम्र नहीं पाती ।

5 , ईशान स्थल का ईशान ऊँचा होने से धन तथा सन्तान की हानि होती है ।

6, ईशान स्थल पर निर्मित गृह के ईशान क्षेत्र में रसोईघर हो तो गृह कलह के साथ धन की हानि होती है ।

7 , ईशान स्थल के ईशान क्षेत्र में शौचालय हो तो गृह कलह , लम्बी बीमारी के साथ पुरष सन्तान नहीं होती है अगर हो तो दुष्चरित्र वाले होते हैं ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409

17/03/2016

ईशान स्थल के शुभ परिणाम -------

ईशान स्थल के शुभ परिणाम गृह स्वामी एवम् उसकी पुरुष सन्तान पर अधिक प्रभावी होते है । अगर इस स्थल पर निर्माण वास्तु अनुसार किया जाये तो निम्न परिणाम होते है ।

1 , इस स्थल के निवासी वैभव पूर्ण जीवन जीने वाले सुखी एवम् समृद्धिशाली होंगे ।

2 , इस स्थल के गृह स्वामी की पुरुष सन्तान मेधावी , आज्ञाकारी एवं सुसंस्कारी होगी ।

3 , अगर इस स्थल के उत्तर ईशान में मार्ग प्रहार हो तो इस स्थल के निवासी राजसी जीवन व्यतीत करने वाले होंगे ।

4 , अगर इस स्थल के पूर्व ईशान में मार्ग प्रहार हो तो इस स्थल के निवासीयों के मान सम्मान में वृद्धि होती है ।

5 , इस स्थल पर गृह निर्माण में समस्त कक्ष , बरामदे , आँगन में ईशान दिशा नीची हो तो इस स्थल के निवासी सुखी एवं सम्पन्न होते है ।

6 , इस स्थल पर निर्मित गृह में नैऋत्य , आग्नेय , वायव्य एवं ईशान क्रमशः नीचे हो स्थल की ईशान दिशा नीची हो अथवा ईशान में गढ्ढे हो या कुआँ अथवा अन्य भूमिगत जल स्रोत हो तो इस स्थल के निवासी अकूत सम्पदा के स्वामी होते है ।

7 , ईशान स्थल पर निर्मित भवन के पूर्वी दिशा में बरामदा हो अन्य दिशा में चाहे बरामदा हो सभी बरामदे पूर्व दिशा की तरफ ढलवां हो तो इस गृह के पुरुषों को समस्त शुभ फल प्राप्त होते है । उत्तर की तरफ ढलवां होने पर स्त्रियों को शुभ फल प्राप्त होते हैं ।
( क्रमशः)

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409

17/03/2016

दिशा के आधार पर स्थल एवं शुभ अशुभ परिणाम ----- ( क्रमशः )

ईशान स्थल - जिस स्थल के उत्तर दिशा एवं पूर्व दिशा में मार्ग हो उसे ईशान स्थल कहते है । वास्तुशास्त्र के अनुसार यह स्थल सभी स्थलों में श्रेष्ठ होता है । हमारे ऋषि मुनियों एवं वास्तु शास्त्रियों ने इसकी तुलना कुबेर की नगरी अलकापुरी से की है । ईशान के शुभ अशुभ परिणाम गृह स्वामी एवं उसकी पुरुष सन्तान पर अधिक प्रभावी होते हैं ।

आठों दिशाओं में ईशान का स्थान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है ।वास्तु के अनुसार होने पर जहाँ ईशान अत्यन्त वैभव पूर्ण जीवन तथा धन सम्पति देता है वहीँ वास्तु विपरीत जीवन कष्ट मय बना देता है । ईशान में वास्तु दोष हो और सभी दिशाओं में वास्तु सम्मत निर्माण हो तब भी उस गृह के निवासी उन्नति नहीं कर पते । ईशान के दोष के कारण सारी आय व्यय में बदल जायेगी । अतः गृह निर्माण कर्ता को प्रारम्भ से ही ईशान दिशा को ठीक रखना चाहिए ।

गृह निर्माण में स्थल ईशान दिशा में ऊँचा ना हो , कटा व् ढका हुवा भी नहीं हो । स्थल में बरसात का पानी ईशान दिशा से होकर बाहर निकलना चाहिए । गृह निर्माण में भी ध्यान रखना चाहिए की प्रत्येक कक्ष का ईशान नीचा हो । किसी भी कक्ष का ईशान कटा हुवा न हो ।

ईशान स्थल में निर्माण करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि दक्षिण दिशा की अपेक्षा उत्तर दिशा में खाली स्थल ज्यादा छोड़ना चाहिए एवं पश्चिम की अपेक्षा पूर्व दिशा में खाली स्थल ज्यादा छोड़ना चाहिए । कुआँ , बोरिंग , ट्यूबवेल अथवा भूमिगत पानी टंकी उत्तर ईशान अथवा पूर्व ईशान में बनावें ध्यान रहे ईशान कटे नहीं । स्थल का ईशान कोण गोलाई में नहीं बनाना चाहिए अन्यथा वास्तु दोष होगा ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
9830267409

17/03/2016

कोण निर्णय

वास्तुशास्त्र में कोनों को भी महत्त्व दिया गया है । कोनों के घटने अथवा बढ़ने से ही दिशा का घटना अथवा बढ़ाना माना जाता है ।

किसी भी स्थल के एक कोण को निर्धारित करें । उस कोने को आधार मानकर एक तरफ 3 फुट पर चिन्ह लगावें एवम् दूसरी तरफ 4 फुट पर चिन्ह लगावें , दोनों चिन्हों के बीच की दूरी अगर 5 फुट हो तो कोण भी 90 डिग्री का होगा । अगर नाप 5 फुट से कम है , तो कोण भी 90 डिग्री से कम होगा , यह उस कोण के बढ़ने का संकेत है , और अगर नाप 5 फुट से ज्यादा है तो कोण भी 90 डिग्री से ज्यादा होगा , यह कोण के घटने का संकेत है ।

मान ले निर्धारित कोण नैऋत्य है , दिशा सूचक यंत्र के अनुसार
अगर पश्चिम की दीवार सीधी है , कोनों को मापने पर अगर 5 फुट से कम है तो दक्षिण आग्नेय घटेगा , अगर दुरी 5 फुट से ज्यादा है तो दक्षिण आग्नेय बढ़ेगा ।
इसी प्रकार दक्षिण की दीवार सीधी है तो उसका असर वायव्य पर होगा , साथ ही इन दोनों का असर नैऋत्य पर भी होगा ।
इसी प्रकार चरों कोनों को जांचा जाता है ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
98302 67409

17/03/2016

वास्तु सलाह

ऊंचाई एवं ढलान के आधार पर अशुभ स्थल

1 , जिस स्थल की पूर्व दिशा ऊँची एवं पश्चिम दिशा नीची हो तो वह स्थल अर्थ हानि के साथ सन्तान हानि का कारण बनता है ।

2 , जिस स्थल की उत्तर दिशा ऊँची एवं दक्षिण दिशा नीची हो तो वह स्थल अर्थ हानि का कारण होने के साथ दीर्घ व्याधि का कारण बनता है । एवं उक्त स्थल पर रहने वाली स्त्री प्रायः अस्वस्थ रहती है ।

3 , जिस स्थल की ईशान दिशा ऊँची और नैऋत्य दिशा नीची हो तो वह स्थल घोर कष्टप्रद होता है।

4 , जिस स्थल की वायव्य दिशा ऊँची हो तथा आग्नेय दिशा नीची हो तो उस स्थल के निवासी अर्थ हानि के अस्वस्थ रहते है ।

5 , जिस स्थल की नैऋत्य , वायव्य एवं ईशान दिशा ऊँची हो तथा आग्नेय दिशा नीची हो तो वह स्थल गृह स्वामी के नाश एवं मृत्यु का कारण बनता है ।

6 , जिस स्थल की ईशान , पूर्व तथा आग्नेय दिशा ऊँची हो एवं नैऋत्य , वायव्य तथा पश्चिम दिशा नीची हो तो उस स्थल के निवासी को धन तथा पुत्र की हानि होती है ।

7 , जिस स्थल की ईशान दिशा ऊँची हो नैऋत्य , आग्नेय एवं वायव्य दिशा नीची हो तो वह स्थल सभी प्राणियों के लिए अशुभ होता है ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार

17/03/2016

ऊंचाई एवं ढलान के आधार पर शुभ स्थल

1, जिस स्थल की पश्चिम दिशा ऊँची एवं पूर्व दिशा क्रमशः नीची हो तो वह स्थल पुत्र संतान वृद्धिदायक होता है , एवं धन लाभ देता है ।

2 , जिस स्थल की दक्षिण दिशा ऊँची एवम् उत्तर दिशा क्रमशः नीची होती है तो वह स्थल स्वास्थ्य और धन लाभ देता है ।

3 , जिस स्थल का नैऋत्य कोण ऊँचा हो तथा आग्नेय , वायव्य एवं ईशान क्रमशः नीचे हो तो वह स्थल सभी के लिए हर दृष्टि से शुभ फलदायक होता है ।

4 , जिस स्थल की नैऋत्य एवं दक्षिण दिशा ऊँची हो
ईशान एवं उत्तर दिशा नीची हो तो वह स्थल वंश वृद्धिदायक के साथ धन लाभ देता है ।

5 , जिस स्थल की नैऋत्य पश्चिम और वायव्य दिशा ऊँची हो तथा पूर्व दिशा क्रमशः नीची हो तो उस स्थल के निवासी धन वैभव के साथ निर्भीक जीवन व्यतीत करते हैं ।

6 , जिस स्थल की दक्षिण , पश्चिम , नैऋत्य एवं वायव्य दिशा ऊँची हो , स्थल का मध्य भाग भी ऊँचा हो तथा आग्नेय , पूर्व और ईशान दिशा नीची हो तो उस स्थल के निवासी धन , वैभव संपन्न सुखी और स्वस्थ होते है ।

7 , जिस स्थल का मध्य भाग ऊँचा हो शेष आठों दिशाओं में स्थल ढलवां हो तो वह स्थल गज पृष्ठ कहलाता है । ऐसे स्थल के निवासी उत्साही , सुखी एवं संपन्न होते हैं ।

रणजीत कुमार सुराणा
वास्तु सलाहकार
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