14/05/2022
वादी, अधिवक्ता और आस्तीन के सांप
न्याय भारत के संविधान द्वारा प्रदान किया गया मौलिक अधिकार है बिना न्याय के एक सभ्य समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती वैसे आजकल न्याय मिलना तो आकाश के तारे तोड़ने जैसे ही हो गया है हमारी लंगडी ( लंगडी ऐसे की न्याय व्यवस्था कुछ निश्चित नियमों पर चलती है जिनका पालन न्यायाधीश कठोरतम तरीके से करते हैं जैसे किसी पर यदि आईपीसी की धारा 376 का आरोप है तो केवल धारा देखकर निर्दोष व दोषी व्यक्तियों के साथ कुछ-कुछ समान व्यवहार किया जाता है अर्थात कभी-कभी तो निर्दोष को भी अपराध की गंभीरता को देखते हुए सुना ही नहीं जाता ) न्याय व्यवस्था को भ्रष्टाचार ने वैसे भी व्हील चेयर पर पहुंचा दिया है न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बहुत कुछ कहा सुना जा चुका है यह मेरा व्यक्तिगत मत है कि हजारों सालों से चले आ रहे इस सड़ांध को तो आसानी से व जल्द से जल्द समाप्त नहीं किया जा सकता किंतु छोटे-छोटे कुछ प्रयास आम जनमानस को कुछ राहत अवश्य प्रदान कर सकते हैं।
अधिवक्ता होने के कारण एक नासूर तो मैंने ना जाने कितनी बार अपनी आंखों से देखा है जहां प्रहार किया जा सकता है जिससे वादकारियों को कुछ राहत अवश्य मिल सकती है, तथा न्याय कुछ सस्ता व सुलभ अवश्य हो जाएगा। इसका कारण "आस्तीन के सांप" है जिनको आम बोलचाल की भाषा में बिचौलिया कहा जाता है यह परोपकार के चोले में अपनी रोटियां सेकने आपके पास आते हैं अथवा ज्यादातर आप इनके पास चले जाते हैं।
क्योंकि ये वस्तुतः आपके कोई तथाकथित दोस्त रिश्तेदार अथवा शुभचिंतक हो सकते हैं इसीलिए मैंने इनके लिए आस्तीन के सांप शब्द का प्रयोग किया है। कानून व्यवस्था से डर व भागदौड़ की परेशानी इन सर्पों के दो विष दन्त होते हैं।
जब भी आप पर कोई ऐसी परिस्थिति आ पड़ती है कि आपको न्यायालय की शरण लेनी पड़े तब आप इनके संपर्क में आते हैं आप की व्यथा जानने व सुनने के बाद यह महान कानून विद की तरह गर्दन चलाते हैं तथा अपना उल्लू सीधा करने के लिए आपके डर को भी अतिशय ही खाद पानी देने का कार्य करने के उपरांत यह अपना जाल फेंकते हैं "मैं फला या फला-फला वकील साहब को जानता हूं वह तो आपके जैसी समस्याओं के निवारण में सिद्धहस्त हैं कानून के अद्वितीय खिलाड़ी हैं" वगैरा-वगैरा आप इनकी बातों के प्रभाव में आ जाते हैं और यह आपको इस मतलबी दुनिया में अपने सबसे बड़े शुभचिंतक नजर आते हैं फिर प्रारंभ होता है इनका आपको काटने का सिलसिला।
आपकी जेब काटने के इनके दो विधान हैं प्रथम "वकील साहब की फीस बहुत हाई फाई है इसलिए आप फीस-फाटा की कोई बात मत करना अगर कोई बात हो तो सारा दारोमदार मुझ पर छोड़ देना" इस व्यवस्था में यदि आप से अधिवक्ता की फीस के नाम पर ₹1 लिया गया है तो अधिवक्ता को इसमें से 10 पैसे या पांच पैसे ही मिलते हैं ऐसी अवस्था में अधिवक्ता आपके वाद को न्यायालय में दायर तो कर देता है किंतु फीस ढंग से ना मिलने के कारण वह मुकदमे की कोई तैयारी नहीं करता है अपितु आपके भाग्य के भरोसे उस मुकदमे को देखता रहता है जिस कारण आपका कार्य या तो नहीं हो पाता अथवा अतिशय विलंब हो जाता है। विलंब होने की अवस्था में आप पुनः अपने उसी शुभचिंतक सर्प से मिलते हैं यद्यपि वह केस फाइल होने के उपरांत की कार्रवाई के लिए आपसे और भी पैसे ले चुका होता है अतः वह वकील साहब को आपके सामने जी भर कर कोसता है और दो-चार गंदी गालियां देकर आपकी फाइल लेकर किसी दूसरे रास्ते पर चल पड़ता है आपको कभी ना खत्म होने वाली पीड़ा देने।
दूसरा तरीका उन वादकारियों हेतु अपनाया जाता है जोकि प्रथम दर्जे के वादकारियों से थोड़ा होशियार होते हैं ये अपने अधिवक्ता से उसकी फीस भी पूछ लेते हैं इन परिस्थितियों में आपके अधिवक्ता व उस आस्तीन के सांप के बीच में पूर्व में ही इस बात का समझौता हो जाता है की अधिवक्ता अपनी फीस का दोगुना तीन गुना चार्ज करता है जिसमें उस सर्प के हिस्से का पैसा भी होता है और पुनः आप ठगे जाते हैं और आपको पता भी नहीं चल पाता।
यह बिचौलियों वाली दुर्व्यवस्था अब तो और भी विकराल रूप लेती जा रही है जिसका कारण है कुकुरमुत्ते की तरह गली गली में खुलने वाले विधि विश्वविद्यालय जहां चंद पैसों में कानून की डिग्रियां बांटी जाती हैं ऐसे विद्यालयों से अब यह बिचौलिए कानून की बाकायदा डिग्री प्राप्त कर बार एसोसिएशन में रजिस्ट्रेशन कराते हैं फिर इनका अपना पुराना काम पुराने तरीके से ही होता है फर्क इतना अवश्य हो जाता है की पूर्व में आप इनके व्यवहार पर उंगली उठा सकते थे किंतु वकीलों की पोशाक पहनने के बाद यदि आप इन पर उंगली उठाने का प्रयास करते हैं तो ये काटने वाले कुत्ते की तरह आप पर हमला कर देते हैं किंतु आप स्वयं सोचिए की कोई अधिवक्ता किसी वाद को स्वयं ना करके किसी और अधिवक्ता को क्यों इंगेज करेगा यदि कोई अधिवक्ता किसी अन्य अधिवक्ता को किसी वाद का अधिवक्ता नियुक्त करता है तो यह अवश्यंभावी हो जाता है की वह अब मात्र दलाली कर रहा है।
हमारा बार एसोसिएशन भी आ मानता है कि प्रदेश में लगभग 45 परसेंट तक अधिवक्ता फर्जी हैं तथा छद्म वेश धारी हैं यह तो बार काउंसिल का अनुमान है मेरा मत है कि यह आंकड़ा साठ से सत्तर परसेंट तक या उसके ऊपर भी हो सकता है।
यह छद्म विषधारी सांप तो उन दलालों से भी अधिक खतरनाक हैं जो खुद को कम से कम अधिवक्ता तो नहीं बताते, इन सर्पों के लपेट में आमजन ज्यादा आसानी से आ जाते हैं तहसील से लेकर बड़ी-बड़ी अदालतों तक इनका जाल बिछा होता है जिसमें फस जाने के उपरांत वाद व वादी को तड़पने के सिवा और कुछ भी हासिल नहीं होता तथा वादी अनजाने डर में एक का दस देकर कंगाल होता रहता है।
इसलिए सतर्क रहिए सावधान रहिए जिस कोर्ट में आपको वाद करना है वहां के 2-4 अधिवक्ताओं से मिलिए फिर अपनी अर्थव्यवस्था व वकील के ज्ञान को परख कर अपना अधिवक्ता ही नियुक्त कीजिए कोई अधिवक्ता भी यदि आपको किसी अन्य अधिवक्ता के पास भेजता है तो उससे खुलकर मुकदमे और फीस की बात कीजिए मुझे पूरा भरोसा है कि इतना जागरूक होने पर ही आप पाएंगे कि न्याय इतना भी महंगा नहीं है जितना इन "आस्तीन के सांपों" ने उसे बना दिया है।
बृजेश कुमार
अधिवक्ता उच्च न्यायालय
खण्डपीठ लखनऊ
E-mail- [email protected]
Mo. 7459074708