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w and prosper. We help business owners do what they do best and so they can receive optimum results from their operations.

Employment News
12/11/2013

Employment News

Employment News Recruitment in the Clerical Cadre Posts of Pharmacists, Control Room Operators and Armourers (State Bank...
12/11/2013

Employment News
Recruitment in the Clerical Cadre Posts of Pharmacists, Control Room Operators and Armourers (State Bank of india)
1) Online registration From : 08/11/2013
2) Last date for online Registration : 22/11/2013
3) Payment of fees - online : 08/11/2013 - 22/11/2013
4) Payment of fees at branches : 11/11/2013 - 26/11/2013
http://www.sbi.co.in/webfiles/uploads/files/1383722728334_SBI_CLERICAL_ENGLISH_ADVERTISEMENT_NEW.pdf
u can apply online
http://www.sbi.co.in/user.htm

क्या करें जब बैंक की गलती से आपका चेक डिसऑनर हो जाएआपके अकाउंट में पर्याप्त फंड हो और फिर भी आपका चेक ऑनर न हो पाए तो इस...
11/11/2013

क्या करें जब बैंक की गलती से आपका चेक डिसऑनर हो जाए

आपके अकाउंट में पर्याप्त फंड हो और फिर भी आपका चेक ऑनर न हो पाए तो इसकी कई वजह हो सकती हैं। सबसे सामान्य वजह यह हो सकती है कि चेक पर किए गए आपके हस्ताक्षर बैंक में उपलब्ध डीटेल्स से मैच नहीं करते हों। अगर ऐसा है तो आपके पास और जिसे आपने चेक दिया है उसके अकाउंट स्टेटमेंट में यह वजह स्पष्ट कर दी जाती है। लेकिन किसी तकनीकी वजह से अगर बैंक आपका चेक ऑनर नहीं कर पाया तो आपके पास शिकायत का पूरा आधार है।

बैंक शाखा को इसकी सूचना तुरंत दें और कार्रवाई के लिए कहें। परेशानी का हल फिर भी नहीं मिलता है तो बैंक के क्षेत्रीय मुख्यालय को इसकी सूचना दें। एक माह के भीतर हल न निकलने पर आपको बैंकिग लोकपाल यानी ओम्बुड्समैन की शरण लेनी चाहिए। आप ओम्बुड्समैन ऑफिस में साधारण कागज पर अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं।

ई-मेल के माध्यम से भी शिकायत दर्ज कराने का प्रावधान है। चेक क्लीयरेंस में देरी की स्थिति में भी आपके पास यह रास्ता खुला है। आपकी ओर से कोई भी यह शिकायत दर्ज करा सकता है। शिकायत के लिए कोई कानूनी फीस नहीं लगती।

कई बार बैंक से आपका चेक गुम भी हो सकता है। ऐसे में अगर बैंक अपनी गलती मान लेता है तो आप बैंक से इस बारे में लिखित रूप से स्पष्टीकरण लेने के बाद दूसरा चेक इश्यू कर सकते हैं।

प्लानिंग रिटायरमेंट कीरिटायरमेंट प्लानिंग के लिए निवेश की पाठशाला जो तीन फैक्टर्स सबसे ज्यादा जरूरी हैं वो हैं-आपके ऊपर ...
11/11/2013

प्लानिंग रिटायरमेंट की

रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए निवेश की पाठशाला जो तीन फैक्टर्स सबसे ज्यादा जरूरी हैं वो हैं-


आपके ऊपर कोई देनदारी न हो

एक खुशहाल रियारमेंट जिंदगी जीने के लिए जरूरी है कि आपके ऊपर किसी की भी तरह की देनदारी न हो। कहते हैं कि चिन्ता चिता से भी बदतर होती है। इसलिए जरूरी है कि आप समय रहते अपने सारे लोन चुकता कर लें। कोई आश्चर्य नहीं जब आज कल के जमाने में आपका लोन चुकता करने के लिए कोई आगे न आए। रिटायरमेंट के बाद लोन की ईएमआई का बोझ आपकी कमर तोड़ सकता है क्योंकि बढ़ती मंहगाई के दौर में आपकी जिंदगी भर की बचत ईएमआई के लिए तो जोड़ी नहीं गई। तो बड़ी आवश्यकताओं के लिए बचत ज्यादा करें और लोन चुकता करें चाहे इसके लिए आपको युवावस्था के दौरान थोड़ी ज्यादा मुश्किलो का सामना क्यों न करना पड़े।

आपकी बुनियादी जरूरतें पूरी हो चुकी हों

दूसरी जिम्मेदारी अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की है। इसमें घर और गाड़ी के साथ साथ बच्चों की पढ़ाई और शादी की जिम्मेदारी के लिए अगर आप पहले से ही प्रबंध करके रखते हैं तो जीवन की सांझ शायद और भी खुशहाल हो सकती है। इसके लिए आप समय रहते म्युचुअल फंड में निवेश आदि का सहारा ले सकते हैं। किसी भी इमरजेंसी खर्च से बचने के लिए शुरुआत में ही बीमा का सुरक्षा कवच लेना ज्यादा बुद्धिमानी है।

आपकी नियमित आमदनी हो

तीसरी जरूरी चीज है कि आपके पास बुढ़ापे के दौरान नियमित आमदनी हो। इसके लिए आपका रीयल एस्टेट में निवेश आपको नियमित तौर पर किराये के तौर पर आमदनी दे सकता है। बैंक में डाली गई एफडी भी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकती है। इसके साथ ही एनपीएस में जमा राशि के जरिए आप बीमा कंपनी की एन्यूटी स्कीम के जरिए नियमित आमदनी का जुगाड़ कर सकते हैं।

क्या करें

रिटायरमेंट का गुल्लक अलग कर लें। नियमित बचत और नियमित निवेश का फंडा अपनाएं। पीपीएफ में कम उम्र में निवेश आपके पास रिटायरमेंट के वक्त खासी रकम दे सकता है। अगर आपने 2012 में भी पीपीएफ मे हर साल 10,000 रुपये का निवेश शुरु कर किया है तो 2026 तक आपके पास 2,94,000 रुपये होंगे। किसी बैलेंस म्युचुअल फंड में 10 फीसद का न्यूनतम रिटर्न भी आपको 20 साल में ठीक ठाक रकम दे देगा। उदाहरण के तौर पर 1000 रुपये की एसआईपी 20 सालों में आपको 10 फीसद के सालाना रिटर्न पर देगा 7,65,700 रुपये। लब्बोलुआब ये कि जो भी करें जल्दी ही करें। समय गवांने न तो आपके हित में है न ही आपके निवेश के हित में।

दूर भगाएं टैक्स रिफंड की चिंतारिफंड यानी सरकार ने अगर आपसे वाजिब टैक्स से ज्यादा वसूला है तो आपका हक है कि आप इसकी वापसी...
11/11/2013

दूर भगाएं टैक्स रिफंड की चिंता

रिफंड यानी सरकार ने अगर आपसे वाजिब टैक्स से ज्यादा वसूला है तो आपका हक है कि आप इसकी वापसी की मांग आयकर विभाग से करें। कई बार यह होता है कि आप कर के दायरे में नहीं आते फिर भी आपकी आमदनी पर 10 फीसद का टीडीएस काटकर सरकारी खाते में जमा कर दिया जाता है। रिटर्न भरते वक्त टीडीएस की राशि का डीटेल्स सही भरें। बैंक डीटेल्स जरूर भरें और देख लें कि वेरिफिकेशन फॉर्म तय वक्त के भीतर ही आयकर विभाग को भेज दिया है।

मुझे कैसे रिफंड मिलेगा?

रिफंड दो तरीके से मिल सकता है- ईसीएस यानी इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग मशीन और चेक या ड्राफ्ट के माध्यम से। ईसीएस के माध्यम से रिफंड सीधे बैंक अकाउंट में भेज दिया जाता है। रिटर्न दाखिल करते समय अपने अकाउंट का एमआइसीआर कोड, खाता संख्या, प्रकार व खाते का पूरा ब्योरा देना होगा। ईसीएस की सुविधा नहीं लेने वाले करदाताओं को रिफंड डाक के माध्यम से चेक के रूप में मिलेगा। इसके लिए रिटर्न में अपना पता स्पष्ट रूप में लिखना चाहिए।

अगर मैंने अपना पता बदला है तो रिफंड को नए पते पर पाने के लिए मुझे किनसे संपर्क करना होगा?

आपको अपने पैन के मास्टर डाटाबेस में जाकर अपने पते को बदलना होगा। अन्यथा आपका चेक वापस चला जाएगा। इसलिए जरूरी यह है कि आप ऑनलाइन रिटर्न भरते वक्त अपने बैंक अकाउंट के बारे में जानकारी दें। इससे रिफंड बैंकर स्कीम के तहत आपका रिफंड सीधे आपके अकाउंट में चला जाएगा।

मैं अपने रिफंड का स्टेटस कैसे जान सकता हूं?

रिफंड का स्टेटस इस वेबसाइट पर जाकर देख सकते हैं डब्ल्यूडब्ल्यूडबल्यूइनकमटैक्सइंडियाडॉटजीओवीडॉटइन,एनएसडीएल-टेन या डब्ल्यूडब्ल्यूडबल्यूडॉटटीआइएन-एनएसडीएलडॉटकॉम इस साइट पर स्टेटस ऑफ इनकम टैक्स रिफंड पर जाकर अपना रिफंड का स्टेटस देख सकते हैं। इसके लिए अपना पैन नंबर देना होगा। आप स्टेटस फोन पर भी निशुल्क जान सकते हैं इसके लिए नंबर है- 18004259760

रिफंड चेक में हुई तकनीकी भूल जैसे कि नाम, पैन नंबर, निर्धारण वर्ष आदि की त्रुटि होने पर मुझे क्या करना चाहिए?

ऐसा होने पर आप निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं: 1) उस चेक को उपर दिए गए पते पर भेज दें साथ में एक आवेदन भी संलग्न करें जिसमें चेक में हुई त्रुटि के बारे में उल्लेख किया गया हो।

2) उस चेक की छायाप्रति और आवेदन कर निर्धारण प्राधिकारी को भी भेजें।

3) अपने आवेदन और उस चेक की प्रति अपने पास संरक्षित रखें।

11/11/2013

नो क्लेम बोनस क्या है और कब मिलता है?
बीमा अवधि के दौरान किसी भी वर्ष में अगर बीमित व्यक्ति कोई क्लेम नहीं लेता है तो उसके अलगे वर्ष ऐसे ग्राहकों को बीमा कंपनियां की तरफ से पुरस्कृत किया जाता है।

यह पुरस्कार उन्हें प्रीमियम राशि में छूट दे कर या बीमा कवरेज की राशि बढ़ा कर दी जाती है। नो क्लेम बोनस का मोटर बीमा और स्वास्थ्य बीमा में दिया जाता है। लेकिन नो क्लेम बोनस देने के लिए भी कंपनियों की कुछ शर्ते होती है।

मोटर बीमा कपनियां मोटे तौर पर 90 दिनों के भीतर फिर से बीमा पॉलिसी को रिनीवल करने पर नो क्लेम बोनस देती हैं। हेल्थ बीमा कंपनियां 30 दिनों से लेकर 60 दिनों के बीच स्वास्थ्य बीमा को रिनीवल करने पर नो क्लेम बोनस देती हैं।

01/11/2013

Happy Diwali all of us at Sandeep Enterprises

31/10/2013

हेल्थ पॉलिसी चुनाव आसान व क्लेम भी

इसी वर्ष फरवरी में बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) ने हेल्थ इंश्योरेंस की कई उलझनों को सुलझाने के लिए दिशानिर्देश जारी किए। व्यक्तिगत पॉलिसियों के लिए ये दिशानिर्देश एक अक्टूबर, 2013 से लागू होंगे। इरडा ने हेल्थ इंश्योरेंस में प्रयुक्त कई शब्दों की परिभाषाओं का मानकीकरण किया है। पोर्टेबिलिटी की विभिन्न उलझनों को भी नियामक ने सरल बनाकर सुलझाया है। इसकी वजह से हेल्थ पॉलिसी को समझना आसान होगा। कंपनियां छुपी शर्तो के आधार पर पॉलिसी धारकों को गुमराह नहीं कर पाएंगी। नियामक ने हेल्थ इंश्योरेंस में प्रचलित लगभग 46 शब्दावलियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है। इसके अलावा इसने 11 गंभीर बीमारियों को भी स्पष्ट किया है। आइए, नई परिभाषाओं के लाभों को समझते हैं।

क्या है डिडक्टिबल:

डिडक्टिबल मेडिकल खर्च का वह हिस्सा है जिसका भुगतान आपको पहले करना होता है और शेष पैसों का भुगतान बीमा कंपनी बाद में करती है। उदाहरण के तौर पर किसी इंडेम्टिी पॉलिसी के मामले में अगर पॉलिसी के तहत डिडक्टिबल की राशि 2,000 रुपये है और इलाज में 10,000 रुपये खर्च होते हैं तो पॉलिसी धारक को 2,000 रुपये का वहन खुद करना होगा। शेष 8,000 रुपये का भुगतान बीमा कंपनी करेगी। अगर इलाज में सिर्फ 2,000 रुपये तक ही खर्च होते हैं तो बीमा कंपनी कोई भरपाई नहीं करेगी।

बीमा कंपनियों को स्पष्ट तौर पर जिक्र करना होगा कि अगर सालाना आधार पर लागू किया जाता है तो क्लेम चाहे एक साल के दौरान जितनी बार किया जाए, डिडक्टिबल का भुगतान पॉलिसी धारक एक बार ही करेगा। अगर प्रति क्लेम के आधार पर इसे लागू किया जाता है तो पॉलिसी धारक साल के दौरान चाहे जितनी बार क्लेम करे उस पर डिडक्टिबल लागू होगा। अगर आजीवन के लिए लागू किया जाता है तो पॉलिसी धारक कवर के दौरान जितने क्लेम करेगा डिडक्टिबल का भुगतान उसे खुद करना होगा।

पोर्टर्बिलिटी का लाभ कंपनी पर निर्भर:

हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टबिलिटी से जुड़ी उलझनों को भी इरडा ने सरल बनाया है। पोर्टबिलिटी का मतलब है कि बीमा कंपनी बदलते समय आपके वे लाभ यथावत रहें जो पुरानी कंपनी के पॉलिसी वषरें के दौरान आपने अर्जित किए हैं। इसमें पहले से मौजूद बीमारियों को कवर करने की समय-सीमा और वैसी बीमारियां शामिल होती हैं जिन्हें एक निश्चित अवधि के बाद कवर किया जाता है।

अस्पताल की परिभाषा में बदलाव:

नई परिभाषा के अनुसार, कोई भी अस्पताल या नर्सिंग होम जो क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट 2010 के तहत पंजीकृत होगा वहां इलाज मान्य होगा। अब तक 15 बेड वाले अस्पतालों में ही हेल्थ इंश्योरेंस की सुविधाएं मिल पाती हैं।

31/10/2013

आसान बनाएं थर्ड पार्टी मोटर इंश्योरेंस क्लेम
अगर आपके पास कार या बाइक है तो आपको मालूम ही होगा कि सड़क पर चलने के लिए थर्ड पार्टी इंश्योरेंस होना अनिवार्य है। दरअसल यह बीमा अपने लिए नहीं बल्कि अपने वाहन से किसी दूसरे व्यक्ति या उसकी संपत्ति को पहुंचने वाली क्षति की भरपाई करती है। थर्ड पार्टी इंश्योरेंस के प्रीमियम की दरें बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) करता है। पहली अप्रैल 2013 से थर्ड पार्टी मोटर इंश्योरेंस प्रीमियम में बीमा नियामक ने लगभग 20 फीसद का इजाफा किया है। इसलिए अगर आप अपने वाहन का इंश्योरेंस रिन्यू करवाने जा रहे हैं तो पहले से ही जेब ढीली करने के लिए तैयार रहें।

आपको यह समझना चाहिए कि किसी भी मोटर इंश्योरेंस के दो हिस्से होते हैं- पहला है थर्ड पार्टी कवर और दूसरा ओन डैमेज कवर। ओन डैमेज कवर के तहत किसी दुर्घटना की वजह से आपके वाहन को पहुंचने वाली क्षति कवर की जाती है। ओन डैमेज कवर की दरें बीमा नियामक तय नहीं करता। कंपनियां जोखिम और बाजार की प्रतिस्पर्धा के आधार पर इसे तय करती हैं। खैर मनाइए कि थर्ड पार्टी इंश्योरेंस प्रीमियम में हुई बढ़ोतरी के बाद कंपनियों ने ओन डैमेज कवर की दरों में बढ़ोतरी नहीं की है, नहीं तो वाहन के रख-रखाव के खर्च में सिर्फ इंश्योरेंस के कारण सालाना 20 फीसद से अधिक का इजाफा झेलना होता।

बीमा नियामक ने साल 2011-12 में थर्ड पार्टी मोटर इंश्योरेंस में औसत 58 प्रतिशत, साल 2012-13 में 15 प्रतिशत और साल 2013-14 में 20 फीसद की बढ़ोतरी की है। बीमा नियामक के आंकड़ों के अनुसार मोटर इंश्योरेंस उद्योग का क्लेम रेशियो साल 2010-11 में 213 प्रतिशत था लेकिन साल 2011-12 में यह घट कर 145 प्रतिशत पर आ गया। थर्ड पार्टी मोटर इंश्योरेंस प्रीमियम में बढ़ोतरी की बड़ी वजह भी क्लेम रेशियो ही थी।

एक अप्रैल 2013 से प्रभावी थर्ड पार्टी इंश्योरेंस की दरें

कार

1,000 सीसी तक --- 941 रुपये

1,000 सीसी से अधिक लेकिन 1,500 सीसी से कम --- 1,110 रुपये

1,500 सीसी से अधिक --- 3,424 रुपये

बाइक एवं स्कूटर

75 सीसी तक --- 414 रुपये

75 सीसी से अधिक लेकिन 150 सीसी तक --- 422 रुपये

151 सीसी से 350 सीसी तक --- 420 रुपये

350 सीसी से अधिक --- 804 रुपये

स्त्रोत: आईआरडीए

थर्ड पार्टी बीमा के क्लेम की प्रक्रिया

किसी भी वाहन के लिए अनिवार्य होने की वजह से वाहन मालिक थर्ड पार्टी बीमा तो ले लेते हैं लेकिन ज्यादातर लोगों को इस बीमा के क्लेम प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं होती। सबसे पहले तो यह समझना चाहिए कि यह मोटर इंश्योरेंस के ओन डैमेज कवर से बिल्कुल भिन्न है इसलिए इसके क्लेम की प्रक्रिया भी भिन्न है। वाहन चालक मालिक को दुर्घटना के तुरंत बाद पुलिस को सूचित करते हुए प्राथमिकी दर्ज करानी चाहिए। साथ ही बीमा कंपनी को भी सूचित किया जाना चाहिए। थर्ड पार्टी इंश्योरेंस के मामलों का निपटारा मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (एमएसीटी) में होता है और थर्ड पार्टी की क्षतिपूर्ति की राशि का निर्धारण अदालत द्वारा तय किया जाता है जिसकी भरपाई थर्ड पार्टी इंश्योरेंस देने वाली बीमा कंपनी करती है।

थर्ड पार्टी क्लेम के मामले में कुछ दस्तावेजी प्रकिया पूरी करना भी जरूरी होता है। उदाहरण के तौर पर पॉलिसीधारक द्वारा पूरी तरह भरा गया क्लेम फॉर्म, ड्राइविंग लाइसेंस की कॉपी, पॉलिसी की कॉपी, पुलिस स्टेशन में कराई गई प्राथमिकी की कॉपी, वाहन के आरसी की कॉपी, अगर वाहन कंपनी के नाम से रजिस्टर्ड है तो उसके मूल दस्तावेज के मामले में स्टांप और कॉमर्शियल वाहनों के मामले में उनके परमिट और फिटनेस सर्टिफिकेट शामिल हैं।

कैसे बनाएं क्लेम को सरल

दुर्घटना के बारे में आप बीमा कंपनी को जितनी अधिक जानकारी देंगे आपके क्लेम की प्रक्रिया उतनी ही सरल होती जाएगी। इसलिए क्लेम फॉर्म को भरते समय औपचारिकता पूरी करने के बजाए उसमें विस्तार से दुर्घटना से जुड़ी जानकारी दें। अगर संभव हो तो दुर्घटना स्थल से वाहन हटाए जाने से पहले दुर्घटना स्थल की एक तस्वीर ले लें और इसे क्लेम फॉर्म के साथ संलग्न करें। अगर आपके वाहन से कोई घायल हुआ है और आपने उसे किसी नजदीकी निजी अस्पताल या नर्सिग होम में भर्ती करवाया, जहां इलाज के खर्च का भुगतान आपको करना है तो आप इसकी सूचना तुरंत अपनी बीमा कंपनी को दें। इलाज में होने वाले खर्च की भरपाई बीमा कंपनी करेगी।

दलालों के फेर में न पड़ें

दुर्घटना के बाद आपसे ऐसे लोग भी संपर्क करेंगे जो थर्ड पार्टी क्लेम मुआवजे की राशि आसानी से दिलाने का वादा करेंगे। ऐसे बिचौलियों और दलालों से सावधान रहें। अगर आपके दस्तावेज पूरे हैं तो आप सीधे बीमा कंपनी से संपर्क करें। थर्ड पार्टी क्लेम जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी दर्ज करवाएं। अगर मामला अदालत में है तब भी आपको लगातार बीमा कंपनी के संपर्क में रहना चाहिए। इससे आपको क्लेम के चरण की जानकारी मिलती रहेगी। अक्सर ऐसा देखा गया है कि पालिसीधारक की दिलचस्पी कम होने की वजह से क्लेम के पैसे मिलने में देर होती है। अदालत से समय पर अपने पक्ष में पैसे मिल जाएं, यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

31/10/2013

चैन से घूमना है तो बीमा चाहिए
अपने सैर सपाटे को और भी चिंता मुक्त बनाने के लिए जरूरी है कि आप ट्रैवल बीमा के बारे में जानें। साथ ही, जहां तक संभव हो उसका उपयोग भी करें। यह बीमा आप और आपके परिवार को यात्रा के दौरान किसी दुर्घटना, मेडिकल इमरजेंसी, एयरपोर्ट पर सामान गुम हो जाने, पासपोर्ट खोने जैसी स्थितियों में आपको आर्थिक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। कुछ कंपनियां हवाई यात्रा में देरी अथवा फ्लाइट कैंसिल होने की स्थिति में भी बीमा कवर देती हैं।

आम तौर पर आपको एक निश्चित अवधि के लिए बीमा कवर मिलता है। लेकिन आप अलग अलग कंपनियों से उनकी ट्रैवल बीमा योजनाओं की जानकारी ले सकते हैं। कुछ कंपनियां बिजनेस ट्रैवलर के लिए विशेष पैकेज भी देती हैं।

फायदे का ट्रैवल बीमा:

सबसे बड़ा फायदा यह है कि विदेश में किसी आपात परिस्थिति में आपको मेडिकल सहायता काफी मंहगी पड़ सकती है। ट्रैवेल बीमा कराने पर विदेश में व्यक्तिगत दुर्घटना की स्थिति में आपको बड़ी राहत मिल सकती है। किसी कारणवश अगर आपको देश वापस भेजा जाता है, अथवा किसी रिश्तेदार के मृत शरीर को वापस देश में लाना है तो बीमा कवर काफी काम की चीज होती है।

अगर आपको विदेश में रहते हुए अपनी बीमा की अवधि को बढ़ाना पड़ सकता है तो अपनी बीमा कंपनी से शतरें को पूछना न भूलें। कुछ कंपनियां यात्रा की अवधि बढ़ाने को पॉलिसी में शामिल करती हैं। कुछ खास तरह के वीजा जैसे सेन्जेन वीजा के लिए आपको ट्रैवल बीमा कराना अनिवार्य है।
-कुछ बीमा कंपनियां आपका यात्रा पर जाने के बाद भी आपको बीमा उपलब्ध कराती हैं। बीमा एजेंट से जानकारी ले सकते हैं।

-यात्रा के दौरान अपनी पॉलिसी ले जाना न भूलें। पॉलिसी नंबर, संपर्क सूत्र, टीपीए आदि के संपर्क में रहने से आपका क्लेम मिलने में आसानी होगी।

-अगर आपके ट्रैवल प्लान में कुछ बदलाव हो गया है तो कुछ कंपनियां आपका प्रीमियम वापस भी करती हैं।

-पासपोर्ट खो जाने की स्थिति में डुप्लिेकट अथवा अस्थायी पासपोर्ट का खर्च आपके ट्रैवल बीमा में शामिल है।

31/10/2013
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25/10/2013

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Address

Near Guru Nanak Public School, Vpo. Kohara
Ludhiana
141112

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