06/08/2026
🏰 चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास | भाग – 1
पाडन पोल का इतिहास
📍 पाडन पोल नाम क्यों पड़ा?
चित्तौड़गढ़ किले का **पाडन पोल** सात प्रमुख प्रवेश द्वारों में से एक है और मेवाड़ के शौर्य व बलिदान का ऐतिहासिक प्रतीक माना जाता है। **"पाडन"** नाम की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार यह नाम **'पतन' (गिरना)** या **'पाड़ना' (मार गिराना)** शब्द से जुड़ा है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार युद्ध के दौरान इस स्थान पर अनेक वीर सैनिक शहीद हुए थे, जिसके कारण यह द्वार **पाडन पोल** के नाम से प्रसिद्ध हो गया। हालांकि इस नाम की उत्पत्ति का कोई एक निश्चित और सर्वसम्मत ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
⚔️ ऐतिहासिक महत्व
सन् 1535 ई. में गुजरात के सुल्तान **बहादुर शाह** ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया। इस युद्ध में **रावत बाघ सिंह देवलिया (प्रतापगढ़)** ने पाडन पोल के पास अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनकी स्मृति में आज भी पाडन पोल के बाहर एक **छतरी (स्मारक)** बनी हुई है, जो उनके बलिदान की अमर गाथा सुनाती है।
# # # **🏛️ स्थापत्य विशेषताएँ**
पाडन पोल मजबूत पत्थरों से निर्मित विशाल प्रवेश द्वार है। इसके भारी लकड़ी के फाटक पर लोहे की नुकीली कीलें लगाई गई थीं, ताकि दुश्मनों के हाथियों के हमलों को रोका जा सके। किले की घुमावदार चढ़ाई पर स्थित होने के कारण यह द्वार रक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था।
# # # **📜 निष्कर्ष**
पाडन पोल केवल एक प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि मेवाड़ की वीरता, स्वाभिमान और बलिदान का जीवंत प्रतीक है। आज भी यह ऐतिहासिक द्वार चित्तौड़गढ़ आने वाले पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को राजपूत वीरों की गौरवशाली गाथा से परिचित कराता है।
# # # **👉 अगले भाग (Part-2) में जानिए:**
**भैरव पोल का इतिहास, इस द्वार का नाम कैसे पड़ा और इससे जुड़ी वीरगाथा।**