Astrologer Monika Sharma

Astrologer Monika Sharma Karm hi dharm he....
Dhram hi jivan he....

23/01/2017

✍MUST READ जीवन की सच्चाई

एक आदमी की चार पत्नियाँ थी ।

वह अपनी चौथी पत्नी से बहुत प्यार करता था और
उसकी खूब देखभाल करता व उसको सबसे श्रेष्ठ देता ।

वह अपनी तीसरी पत्नी से भी प्यार करता था और
हमेशा उसे अपने मित्रों को दिखाना चाहता था ।
हालांकि उसे हमेशा डर था की वह कभी भी किसी
दुसरे इंसान के साथ भाग सकती है ।

वह अपनी दूसरी पत्नी से भी प्यार करता था । जब
भी उसे कोई परेशानी आती तो वे अपनी दुसरे नंबर
की पत्नी के पास जाता और वो उसकी समस्या
सुलझा देती ।

वह अपनी पहली पत्नी से प्यार नहीं करता था
जबकि पत्नी उससे बहुत गहरा प्यार करती थी
और उसकी खूब देखभाल करती ।

एक दिन वह बहुत बीमार पड़ गया और जानता था
की जल्दी ही वह मर जाएगा । उसने अपने आप से
कहा, "मेरी चार पत्नियां हैं, उनमें से मैं एक को अपने
साथ ले जाता हूँ..जब मैं मरूं तो वह मरने में मेरा साथ
दे ।"

तब उसने चौथी पत्नी से अपने साथ आने को कहा
तो वह बोली, "नहीं, ऐसा तो हो ही नहीं सकता और
चली गयी ।

उसने तीसरी पत्नी से पूछा तो वह बोली की,
"ज़िन्दगी बहुत अच्छी है यहाँ जब तुम मरोगे
तो मैं दूसरी शादी कर लूंगी ।"

उसने दूसरी पत्नी से कहा तो वह बोली, "माफ़ कर
दो, इस बार मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती ।
ज्यादा से ज्यादा मैं तुम्हारे दफनाने तक तुम्हारे साथ
रह सकती हूँ ।"

अब तक उसका दिल बैठ सा गया और ठंडा पड़
गया । तब एक आवाज़ आई, "मैं तुम्हारे साथ चलने
को तैयार हूँ । तुम जहाँ जाओगे मैं तुम्हारे साथ चलूंगी ।"

उस आदमी ने जब देखा तो वह उसकी पहली
पत्नी थी । वह बहुत बीमार सी हो गयी थी खाने
पीने के अभाव में ।

वह आदमी पश्चाताप के आंसूं के साथ बोला,
"मुझे तुम्हारी अच्छी देखभाल करनी चाहिए
थी और मैं कर सकता था ।"

दरअसल हम सब की चार पत्नियां हैं जीवन में ।

1. चौथी पत्नी हमारा शरीर है ।
हम चाहें जितना सजा लें संवार लें पर जब हम
मरेंगे तो यह हमारा साथ छोड़ देगा ।

2. तीसरी पत्नी है हमारी जमा पूँजी, रुतबा ।
जब हम मरेंगे तो ये दूसरों के पास चले जायेंगे।

3. दूसरी पत्नी है हमारे दोस्त व रिश्तेदार । चाहें वे
कितने भी करीबी क्यूँ ना हों हमारे जीवन काल में
पर मरने के बाद हद से हद वे हमारे अंतिम संस्कार
तक साथ रहते हैं ।

4. पहली पत्नी हमारी आत्मा है, जो सांसारिक
मोह माया में हमेशा उपेक्षित रहती है ।

यही वह चीज़ है जो हमारे साथ रहती है जहाँ भी
हम जाएँ.......कुछ देना है तो इसे दो.... देखभाल
करनी है तो इसकी करो.... प्यार करना है तो इससे
करो...

मिली थी जिन्दगी
किसी के 'काम' आने के लिए..

पर वक्त बीत रहा है
कागज के टुकड़े कमाने के लिए..
क्या करोगे इतना पैसा कमा कर..?
ना कफन मे 'जेब' है ना कब्र मे 'अलमारी..'

और ये मौत के फ़रिश्ते तो
'रिश्वत' भी नही लेते... ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖
✔इसे सिर्फ अपने तक ही मत रखिए ....

06/01/2017

🍃 चन्द्रगुप्त ने पुछा 🍃
अगर किस्मत
पहेले ही लिखी जा चुकी है तो,
कोशिश कर के क्या मिलेगा?

🍃 चाणक्य ने कहा 🍃
क्या पता किस्मत में लिखा हो की,
कोशिश करने से ही मिलेगा!

06/01/2017

इस बात की पुष्टि महाभारत में होती है जब खर मास के अन्दर अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युद्ध में बाणों की शैया से वेध दिया था। सैकड़ों बाणों से विद्ध हो जाने के बावजूद भी भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे। प्राण नहीं त्यागने का मूल कारण यही था कि अगर वह इस खर मास में प्राण त्याग करते हैं तो उनका अगला जन्म नर्क की ओर जाएगा। इसी कारण उन्होंने अर्जुन से पुनः एक ऐसा तीर चलाने के लिए कहा जो उनके सिर पर विद्ध होकर तकिए का काम करे। इस प्रकार से भीष्म पितामह पूरे खर मास के अन्दर अर्द्ध मृत अवस्था में बाणों की शैया पर लेटे रहे और जब सौर माघ मास की मकर संक्रांति आई उसके बाद शुक्ल पक्ष की एकादशी को उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया। इसलिए कहा गया है कि माघ मास की देह त्याग से व्यक्ति सीधा स्वर्ग का भागी होता है।

06/01/2017
01/01/2017

Jai shree readhey
Happy new year

30/12/2016

उपयोगी बाते
1. पूजा में एक से अधिक दीपक जलाने
हो तो कभी भी दीपक से
दीपक नहीं जलाना चाहिए | जो ऐसा करते
है उन्हें अनेक बार परेशानियों का सामना करना पड़
सकता है |
अतः प्रत्येक दीपक माचिस की तीली से
ही जलाए |

2. चन्दन को घिस कर कभी भी तांबे के पात्र
में नहीं रखना चाहिए |

3. यदि आप शंख की पूजा करते है और उसमे
पानी भरना है तो कभी भी डुबाकर
नहीं भरना चाहिए | ऐसा करने से पूजा का कार्य
सिद्ध नहीं हो पाता है | शंख में
आचमनी द्वारा ही जल डाले | संकल्प के
लिए जिस ताम्बे या चांदी के चम्मच का उपयोग
किया जाता है
उसे ही आचमनी कहते है |

4. शंख को पृथ्वी पर नहीं रखना चाहिए |
पूजा में अगर शंख की पूजा करते है तो उसे अनाज
की ढेरी पर रखना चाहिए |घर के पूजा स्थान
पर रखना हो तो आसन पर स्थान दे |तभी शंख
की कृपा प्राप्त होगी |

5. प्रसाद बाँटते समय धयान रखे
की प्रसादजमीन पर ना गिरे |अगर गिरता है
तो उसे तुरंत उठा ले और उसे किसी सुरक्षित स्थान पर
रख दे |प्रसाद को जूठे हाथ से नहीं बाटना चाहिए और
ना ही ग्रहण करना चाहिए | हाथो को धोकर
ही प्रसाद बांटे एवं ग्रहण करे |

6. पूजा प्रारम्भ करने के पश्चात चाहे
कैसी भी स्थिति हो ,
कभी भी जोर से नहीं बोले ,
किसी पर क्रोध करना अथवा अपशब्द
कहना पूजा को खंडित कर देता है |
हल्दी का ये छोटा सा उपाय करने से कभी घर
नहीं आती गरीबी :
------------------------------------------
स्वस्तिक का भारतीय संस्कृति में बड़ा महत्व है। हर
शुभ कार्य की शुरूआत स्वस्तिक बनाकर
ही की जाती है। यह मंगल
भावना एवं सुख सौभाग्य का प्रतीक है। ऋग्वेद में
स्वस्तिक के देवता सवृन्त का उल्लेख है। सवृन्त सूत्र के
अनुसार
इस देवता को मनोवांछित फलदाता सम्पूर्ण जगत
का कल्याण करने और
देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है।
स्वस्तिक शब्द
को 'सु' औरं 'अस्ति' दोनों से मिलकर बना है। 'सु'
का अर्थ है शुभ
और 'अस्तिका अर्थ है- होना यानी जिस से 'शुभ हो',
'कल्याण हो वही स्वस्तिक है।
यही कारण है कि घर के वास्तु को ठीक
करने के लिए स्वस्तिक का उपयोग किया जाता है।
स्वस्तिक के चिह्न
को भाग्यवर्धक वस्तुओं में गिना जाता है। इसे बनाने से
घर
की नकारात्मक ऊर्जा बाहर
चली जाती है। घर में
किसी भी तरह का वास्तुदोष होने पर घर के
मुख्यद्वार के बाहरी हिस्से को धोएं और गोमूत्र
का छिड़काव कर। दरवाजे के दोनों और नियम से
हल्दी-
कुमकुम का स्वस्तिक बनाएं। यह प्रयोग नियमित रूप से
करने पर कई
तरह के वास्तुदोष अपने आप खत्म हो जाएंगे। साथ
ही, मां लक्ष्मी प्रसन्न
होंगी और घर में
कभी दरिद्रता नहीं आएगी।
कहा गया है....
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न:
पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्तिनस्ता रक्षो अरिष्टनेमि:
स्वस्ति नो बृहस्पर्तिदधातु।।
माना जाता है कि इस मंत्र में चार बार आए 'स्वस्ति'
शब्द के रूप में
चार बार कल्याण और शुभ की कामना से
श्रीगणेश के साथ इन्द्र, गरूड़, पूषा और
बृहस्पति का ध्यान और आवाहन किया गया है।

- इस मंगल-प्रतीक का गणेश की उपासना,
धन, वैभव और ऐश्वर्य
की देवी लक्ष्मी के साथ,
बही-खाते
की पूजा की परंपरा आदि में विशेष स्थान है।
चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, अग्नि, इन्द्र,
वरुण और सोम
की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद
को पाने के लिए स्वस्तिक बनाया जाता है। यह
चारों दिशाओं और
जीवन चक्र का भी प्रतीक है।
शास्त्रों के मुताबिक स्वस्तिक परब्रह्म, विघ्रहर्ता व
मंगलमूर्ति भगवान श्रीगणेश का भी साकार रूप
है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा 'गं' बीजमंत्र होता है,
जो भगवान श्रीगणेश का स्थान माना जाता है। इसमें
जो चार
बिंदियां होती है, उनमें गौरी,
पृथ्वी, कूर्म यानी कछुआ और अनन्त
देवताओं का वास माना जाता है।
इसी तरह वेद भी 'स्वस्तिक'
श्रीगणेश का स्वरूप होने की बात कहते
हैं। स्वस्तिक बनाने के धर्म दर्शन में व्यावहारिक नजरिए
से संकेत
यही है कि जहां माहौल और संबंधों में प्रेम,
प्रसन्नता, श्री, उत्साह, उल्लास, सौंदर्य व विश्वास
होता है, वहां शुभ, मंगल और कल्याण होता है
यानी श्री गणेश का वास होता है।
उनकी कृपा से अपार सुख और सौभाग्य प्राप्त
होता है।

- स्वस्तिक का आविष्कार आर्यों ने किया और पूरे
विश्व में यह फैल
गया। आज तक स्वस्तिक का प्रत्येक धर्म और संस्कृति में अलग-
अलग रूप में इस्तेमाल किया गया है। कुछ धर्म और
समाजों में
स्वस्तिक का गलत अर्थ लेकर उसका गलत जगहों पर
इस्तेमाल
किया तो कुछ ने उसके सकारात्मक पहलू को समझा।
स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, दुनिया के
कई दूसरे देशों में विभिन्न स्वरूपों में देखा गया है।
जर्मनी, यूनान, अमेरिका, स्कैण्डिनेविया,
सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत,
चीन, साइप्रस और जापान, फ्रंस, रोम, मिस्र, ब्रिटेन,
आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन
किसी न किसी रूप में मिलता है।

* तुलसी की है ये एक महिमा.....!
* तुलसी के निकट जिस मन्त्र-स्तोत्र आदि का जप-
पाठ
किया जाता है, वश सब अनंत गुना फल
देनेवाला होता है |
* प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, भूत, दैत्य आदि सब
तुलसी के पौधे से दूर भागते है |
* ब्रह्महत्या आदि पाप तथा पाप और खोटे विचार से
उत्पन्न
होनेवाले रोग तुलसी के सामीप्य एवं सेवन से
नष्ट हो जाते है |
* तुलसी का पूजन, रोपण व धारण पाप को जलाता है
और
स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदायक है |
* श्राद्ध और यज्ञ आदि कार्यों में तुलसी का एक
पत्ता भी महान पुण्य देनेवाला है |
* जो चोटी में तुलसी स्थापित करके
प्राणों का परित्याग करता है, वह पापराशि से मुक्त
हो जाता है |
* तुलसी के नाम-उच्चारण से मनुष्य के पाप नष्ट
हो जाते हैं तथा अक्षय पुण्य
की प्राप्ति होती है |
* तुलसी ग्रहण करके मनुष्य पातकों से मुक्त
हो जाता है |
* तुलसी पत्ते से टपकता हुआ जल जो अपने सिर पर
धारण करता है, उसे गंगास्नान और १० गोदान का फल
प्राप्त
होता है |
*आदिवासियों द्वारा शिवलिंगी के
बीजों को तुलसी और गुड़ के साथ
पीसकर नि:संतान महिला को खिलाया जाता है,
महिला को जल्द ही संतान सुख
की प्राप्ति होती है।
*औषधीय गुणों से भरपूर तुलसी के रस में
थाइमोल तत्व पाया जाता है जिससे त्वचा के रोगों में
लाभ होता है।
पातालकोट के आदिवासी हर्बल जानकारों के
अनुसार
तुलसी के पत्तों को त्वचा पर रगड़ दिया जाए
तो त्वचा पर
किसी भी तरह के संक्रमण में आराम
मिलता है।
*किडनी की पथरी में
तुलसी की पत्तियों को उबालकर
बनाया गया काढ़ा शहद के साथ नियमित 6 माह सेवन
करने से
पथरी मूत्र मार्ग से बाहर निकल आती है।
*दिल की बीमारी में यह वरदान
साबित होती है क्योंकि यह खून में कोलेस्ट्राल
को नियंत्रित करती है। जिन्हें हॄदयाघात हुआ हो,
उन्हें तुलसी के रस का सेवन नियमित रूप से
करना चाहिए। तुलसी और हल्दी के
पानी का सेवन करने से शरीर में कोलेस्ट्राल
की मात्रा नियंत्रित रहती है और इसे कोई
भी स्वस्थ वयक्ति सेवन में ला सकता है।

*इसकी पत्तियों का रस निकाल कर बराबर मात्रा में
नींबू का रस मिलायें और रात को चेहरे पर लगाये
तो झाईयां नहीं रहती,
फुंसियां ठीक होती है और चेहरे
की रंगत में निखार आता है।
*फ्लू रोग तुलसी के पत्तों का काढ़ा, सेंधा नमक
मिलाकर
पीने से ठीक होता है। डाँग- गुजरात में
आदिवासी हर्बल जानकार फ्लु के दौरान बुखार से
ग्रस्त
रोगी को तुलसी और सेंधा नमक लेने
की सलाह देते हैं।
*माइग्रेन" के निवारण में मदद मिलती है। प्रतिदिन
दिन में
4-5 बार तुलसी से 6-8 पत्तियों को चबाने से कुछ
ही दिनों में माईग्रेन की समस्या में आराम
मिलने लगता है।
घर के माहौल को पवित्र बनाने के लिए शास्त्रों में एक
फायदेमंद उपाय
बताया गया है।
वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाए रखने के लिए घर में
शास्त्रोक्त
धुआं करना चाहिए। यह कोई सामान्य धुआं नहीं है।
इसके लिए निम्न सामग्री का उपयोग
किया जाता है। बाजार
से किसी भी पूजन
सामग्री की दुकान से लोबान, कपूर, गुगल,
देशी घी और चंदन लेकर आएं। प्रतिदिन घर
के मंदिर में भगवान की विधिवित पूजा-
आरती के बाद गाय के गोबर से बने कंडे या उपले
को जलाएं। अब थोड़ा लोबान, कपूर, गुगल,
देशी घी और चंदन उस पर रख दें। जब
धुआं होने लगे तब इस धुएं को पूरे घर में फैलाएं।
इस धुएं के प्रभाव से घर के वातावरण में मौजूद
सभी सुक्ष्म कीटाणु नष्ट हो जाएंगे,
हवा में पवित्र सुगंध फैल जाएगी। इसके अलावा घर
की सभी नेगेटिव
एनर्जी निष्क्रीय
हो जाएगी और सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़
जाएगा।
आपके आसपास का वातावरण पूरी तरह पवित्र और
शुद्ध हो जाएगा। प्रतिदिन ऐसा होने पर
सभी देवी-देवताओं की कृपा आप
पर बनी रहेगी।

जानिये महत्वपूर्ण बातें -
महत्वपूर्ण बातें -
[१] मुख्य द्वार के पास कभी भी कूड़ादान
ना रखें इससे पड़ोसी शत्रु हो जायेंगे |
[२] सूर्यास्त के समय
किसी को भी दूध,दही या प्याज
माँगने पर ना दें इससे घर की बरक्कत समाप्त
हो जाती है |
[३] छत पर कभी भी अनाज या बिस्तर
ना धोएं..हाँ सुखा सकते है इससे ससुराल से सम्बन्ध
खराब होने
लगते हैं |
[४] फल खूब खाओ स्वास्थ्य के लिए अच्छे है लेकिन
उसके छिलके
कूडादान में ना डालें वल्कि बाहर फेंकें इससे मित्रों से
लाभ होगा |
[५] माह में एक बार किसी भी दिन घर में
मिश्री युक्त खीर जरुर बनाकर परिवार सहित
एक साथ खाएं अर्थात जब पूरा परिवार घर में
इकट्ठा हो उसी समय खीर खाएं
तो माँ लक्ष्मी की जल्दी कृपा होती है
|
[६] माह में एक बार अपने कार्यालय में भी कुछ मिष्ठान
जरुर ले जाएँ उसे अपने साथियों के साथ या अपने अधीन
नौकरों के साथ मिलकर खाए तो धन लाभ होगा |
[७] रात्री में सोने से पहले रसोई में
बाल्टी भरकर रखें इससे क़र्ज़ से शीघ्र
मुक्ति मिलती है और यदि बाथरूम में
बाल्टी भरकर रखेंगे तो जीवन में उन्नति के
मार्ग में बाधा नही आवेगी |
[८] वृहस्पतिवार के दिन घर में कोई
भी पीली वस्तु अवश्य खाएं
हरी वस्तु ना खाएं तथा बुधवार के दिन
हरी वस्तु खाएं लेकिन
पीली वस्तु बिलकुल ना खाएं इससे सुख
समृद्धि बड़ेगी |
[९] रात्रि को झूठे बर्तन कदापि ना रखें इसे पानी से
निकाल
कर रख सकते है हानि से बचोगें |
[१०] स्नान के बाद गीले या एक दिन पहले के प्रयोग
किये गये तौलिये का प्रयोग ना करें इससे संतान हठी व
परिवार से अलग होने लगती है अपनी बात
मनवाने लगती है अतः रोज़ साफ़ सुथरा और
सूखा तौलिया ही प्रयोग करें |
[११] कभी भी यात्रा में पूरा परिवार एक साथ
घर से ना निकलें आगे पीछे जाएँ इससे यश
की वृद्धि होगी |
ऐसे ही अनेक अपशकुन है जिनका हम ध्यान रखें
तो जीवन में
किसी भी समस्या का सामना नही करना पड़ेगा तथा सुख
समृद्धि बड़ेगी |
वास्तु टिप्स-
[१] जिस घर में
बांसुरी रखी होती है
वहां प्रेम और धन की कोई
कमी नहीं रहती है। घर
में बांसुरी ऐसे स्थान पर रखनी चाहिए
जहां से वह आसानी से नजर
आती रहे। किसी दीवार पर
भी सुंदर सी बांसुरी लगाई
जा सकती है। इससे घर
की सुंदरता भी आकर्षक
हो जाएगी।
[२] तुलसी का पौधा हमेशा घर के पूर्व दिशा या उत्तर
दिशा की ओर ही लगाना चाहिए, दक्षिण
दिशा में तुलसी कठोर यातना और कारागार का भय
देती है।
[३] फेंगशुई के अनुसार हंसों का जोड़ा शयनकक्ष में रखने
से
पति और पत्नी के बीच प्यार और
विश्वास में वृद्धि होती है।
[४] अगर पति-पत्नी में लगातार झगड़ा होता है
तो उन्हें वास्तु के हिसाब से अपने डबल-बेड पर
इकहरा गद्दा बिछाना चाहिए।
[५] कमरे में हर तरह के सामान को सलीके से
रखना चाहिए। इससे घर तो सुव्यवस्थित
रहता ही है, घर में खुशहाली और
शांति का माहौल भी बनता है।
[६] बेडरूम में पलंग के ठीक सामने
आईना होना अशुभ होता है। इससे
गृहस्वामी को अनिद्रा,
बेचैनी जैसी परेशानियां हो सकती हैं।
[७] ध्यान रखे कि कम से कम कीलें
दीवार में लगाई जाएं। यानी जितने
की जरूरत हो,
उतनी ही कीलें
लगाना श्रेयस्कर रहेगा। वास्तु के अनुसार
ज्यादा कीलें अशुभ्ा होती हैं।
इसी वजह से प्राचीन काल में लोग
लोहे के स्थायन पर
लकड़ी की कीलें इस्तेमाल में
लाते थे।
[८] डूबती नाव या जहाज अगर घर में
रखा हो तो अपने साथ आपका सौभाग्य भी डुबा ले
जाता है। घर में रखी डूबती नाव
की तस्वीर या कोई शोपीस
सीधा आपके घर के रिश्तों पर आघात करता है।
रिश्तों में डूबते मूल्यों का प्रतीक है यह चिह्न।
इसे अपने घरौंदे से दूर रखें।
[९] दक्षिण की दीवार पर दर्पण
कभी भी न लगाएं। दर्पण हमेशा पूर्व
या उत्तर की दीवार पर
ही लगाना चाहिए।
[१०] फटे-पुराने जूते-मौजे, छाते, अण्डर गारमेंट्स
आदि जितनी जल्दी हो सके घर से
बाहर फैंक दें अन्यथा घर में सकारात्मक
ऊर्जा का सर्वथा अभाव
रहेगा और व्यर्थ की परेशानियां घेरे
रहेंगी।
ऐसी जानकारी जो शायद आपने पहले
कभी

ही डाल
करे 9 आदतों मै सुधार , घर मे
होगी खुशिया अपार :--

१) - अगर आपको कहीं पर भी थूकने
की आदत है तो यह निश्चित है
कि आपको यश, सम्मान अगर मुश्किल से मिल
भी जाता है
तो कभी टिकेगा ही इस लिये केवल पिक
दान मे में ही यह काम कर आया करें !

२) -जिन
लोगों को अपनी जूठी थाली या बर्तन
वहीं उसी जगह पर छोड़ने
की आदत होती है
उनको सफलता कभी भी स्थायी
रूप से नहीं मिलती हे .!
बहुत मेहनत करनी पड़ती है और
ऐसे लोग अच्छा नाम नहीं कमा पाते.!
अगर आप अपने जूठे बर्तनों को उठाकर
उनकी सही जगह पर रख आते हैं
तो चन्द्रमा और शनि का आप सम्मान करते हैं !

३) - जब भी हमारे घर पर कोई
भी बाहर से आये, चाहे मेहमान हो या कोई काम
करने वाला, उसे स्वच्छ पानी जरुर पिलाएं !
ऐसा करने से हम राहू का सम्मान करते हैं.!
जो लोग बाहर से आने वाले लोगों को स्वच्छ
पानी हमेशा पिलाते हैं उनके घर में
कभी भी राहू का दुष्प्रभाव
नहीं पड़ता.!

४) - घर के पौधे आपके अपने परिवार के सदस्यों जैसे
ही होते हैं, उन्हें भी प्यार और
थोड़ी देखभाल की जरुरत
होती है.!
जिस घर में सुबह-शाम
पौधों को पानी दिया जाता है
तो हम बुध, सूर्य और चन्द्रमा का सम्मान करते हुए
परेशानियों से डटकर लड़ पाते हैं.!
जो लोग नियमित रूप से पौधों को पानी देते हैं, उन
लोगों को नसो की बीमारी ओर
परेशानियाँ जल्दी से नहीं पकड़
पातीं.!

५) - जो लोग बाहर से आकर अपने चप्पल, जूते, मोज़े
इधर-
उधर फैंक देते हैं, उन्हें उनके शत्रु बड़ा परेशान करते हैं.!
इससे बचने के लिए अपने चप्पल-जूते करीने से
लगाकर रखें,
आपकी प्रतिष्ठा बनी रहेगी .
ओर शत्रु स्वयं ही पराजित होंगे !

६) - जो लोग जब भी सो कर उठते हे वे
अपना बिस्तर छोड़ेंगे तो उनका बिस्तर
हमेशा फैला हुआ होगा,
सिलवटें ज्यादा होंगी, चादर कहीं,
तकिया कहीं, कम्बल कहीं ? उसपर
ऐसे लोग अपने पुराने पहने हुए कपडे तक फैला कर रखते
हैं ! ऐसे
लोगों की पूरी दिनचर्या कभी भी व्यवस्थित
नहीं रहती,
जिसकी वजह से वे खुद भी परेशान
रहते हैं और दूसरों को भी परेशान करते हैं.! एसे
लोगों का राहू और शनि खराब होगा,
इससे बचने के लिए उठते ही स्वयं अपना बिस्तर
समेट दें.!

७) - पैरों की सफाई पर हम लोगों को हर वक्त
ख़ास ध्यान देना चाहिए,
जो कि हम में से बहुत सारे लोग भूल जाते हैं ! नहाते
समय
अपने पैरों को अच्छी तरह से धोयें,
कभी भी बाहर से आयें तो पांच मिनट
रुक कर मुँह और पैर धोयें.!
आप खुद यह पाएंगे कि आपका चिड़चिड़ापन कम होगा,
दिमाग
की शक्ति बढेगी और क्रोध
धीरे-धीरे कम होने लगेगा.!

८) - रोज़ खाली हाथ घर लौटने पर
धीरे-धीरे उस घर से
लक्ष्मी चली जाती है और
उस घर के सदस्यों में नकारात्मक या निराशा के भाव
आने लगते
हैं.!
इसके विपरित घर लौटते समय कुछ न कुछ वस्तु लेकर आएं
तो उससे घर में बरकत बनी रहती है.!
उस घर में लक्ष्मी का वास होता जाता है.!
हर रोज घर में कुछ न कुछ लेकर आना वृद्धि का सूचक
माना गया है.!
ऐसे घर में सुख, समृद्धि और धन हमेशा बढ़ता जाता है और
घर
में रहने वाले
सदस्यों की भी तरक्की होती है.!

9) - निती सुबाह उठते
ही कयी लोग व्यर्थ के द्रश्य
ही प्रथम बार देख कर उठते हे जिन से उन
का दिन ठिक नही जाता, इस लिये
रोजना उठतेही अपने
दोनो हाथो की हथेलिया देखे और जमीन
को पेर पढ कर ही दिन की शुरुवात
करना चाहिये.

30/12/2016

पुरुष का बखान..

पुरुष का श्रृंगार तो स्वयम प्रकृति ने किया है..

स्त्रीया कांच का टुकड़ा है..
जो मेकअप की रौशनी पड़ने पर ही चमकती है..
किन्तु पुरुष हीरा है जो अँधेरे में भी चमकता है और उसे मेकअप की कोई आवश्यकता नहीं होती।

खूबसूरत मोर होता है मोरनी नहीं.. मोर रंग बिरंगा और हरे नीले रंग से सुशोभित..
जबकि मोरनी काली सफ़ेद..
मोर के पंख होते है इसीलिए उन्हें मोरपंख कहते है..
मोरनी के पंख नहीं होते..

दांत हाथी के होते है,हथिनी के नहीं। हांथी के दांत बेशकीमती होते है। नर हाथी मादा हाथी के मुकाबले बहुत खूबसूरत होता है।

कस्तूरी नर हिरन में पायी जाती है। मादा हिरन में नहीं।
नर हिरन मादा हिरन के मुकाबले बहुत सुन्दर होता है।

मणि नाग के पास होती है ,
नागिन के पास नहीं।
नागिन ऐसे नागो की दीवानी होती है जिनके पास मणि होती है।

रत्न महासागर में पाये जाते है, नदियो में नहीं..
और अंत में नदियो को उसी महासागर में गिरना पड़ता है।

वैसे ही मनुष्यो में बुद्धि विवेक और बल मर्दों के पास होता है औरतो के पास नहीं..

संसार की बेशकीमती तत्व इस प्रकृति ने पुरुषो को सौंपे..
प्रकृति ने पुरुष के साथ
अन्याय नहीं किया..
9 महीने स्त्री के गर्भ में रहने के बावजूद भी औलाद का चेहरा स्वाभाव पिता की तरह होना, ये संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य है..
क्योंकि पुरुष का श्रृंगार प्रकृति ने करके भेजा है,
उसे श्रृंगार की आवश्यकता नहीं...
🎄 जरूर शेयर करे पहली बार कोई लेख पुरुषो के लिए आया है 👍

30/12/2016

ब्राह्मण कौन है?
✨✨✨✨✨✨
ब्राह्मण जप से पैदा हुई शक्ति का नाम है,
ब्राह्मण त्याग से जन्मी भक्ति का धाम है।
✨✨✨✨✨✨
ब्राह्मण ज्ञान के दीप जलाने का नाम है
ब्राह्मण विद्या का प्रकाश फैलाने का काम है।
✨✨✨✨✨✨
ब्राह्मण स्वाभिमान से जीने का ढंग है,
ब्राह्मण सृष्टि का अनुपम अमिट अंग है।
✨✨✨✨✨✨
ब्राह्मण विकराल हलाहल पीने की कला है,
ब्राह्मण कठिन संघर्षों को जीकर ही पला है।
✨✨✨✨✨✨
ब्राह्मण ज्ञान, भक्ति, त्याग, परमार्थ का प्रकाश है,
ब्राह्मण शक्ति, कौशल, पुरुषार्थ का आकाश है।
✨✨✨✨✨✨
ब्राह्मण न धर्म, न जाति में बंधा इंसान है,
ब्राह्मण मनुष्य के रूप में साक्षात भगवान है।
✨✨✨✨✨✨
ब्राह्मण कंठ में शारदा लिए ज्ञान का संवाहक है,
ब्राह्मण हाथ में शस्त्र लिए आतंक का संहारक है।
✨✨✨✨✨✨
ब्राह्मण सिर्फ मंदिर में पूजा करता हुआ पुजारी नहीं है,
ब्राह्मण घर-घर भीख मांगता भिखारी नहीं है।
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ब्राह्मण गरीबी में सुदामा-सा सरल है,
ब्राह्मण त्याग में दधीचि-सा विरल है।
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ब्राह्मण विषधरों के शहर में शंकर के समान है,
ब्राह्मण के हस्त में शत्रुओं के लिए परशु कीर्तिवान है।
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ब्राह्मण सूखते रिश्तों को संवेदनाओं से सजाता है,
ब्राह्मण निषिद्ध गलियों में सहमे सत्य को बचाता है।
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ब्राह्मण संकुचित विचारधारों से परे एक नाम है,
ब्राह्मण सबके अंत:स्थल में बसा अविरल राम है।
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13/12/2016

दान का महत्व

अक्सर जीवन मे दान का महत्व है,माता अपने ममत्व को बच्चे के लिये दान करती है पिता अपने पुरुषार्थ के लिये अपने जीवन के की जाने वाली मेहनत का दान अपने बच्चे के लिये करता है,भाई अपने बाहुबल को दान करता है,बहिन अपने तरीके से सम्बन्ध बनाकर और समाज बनाकर अपने भाई के क्षेत्र का दान करती है,भाई अपनी बहिन के लिये आजीवन अपनी सहायता और शक्ति का दान करता है,बडा होकर बच्चा अपने माता पिता के वृद्ध होने पर उनकी देख रेख और भोजन का दान करता है,पत्नी पति को रति सुख प्रदान करती है,अपने द्वारा पति के लिये निस्वार्थ भाव से भोजन और पति सुख और आयु वृद्धि के प्रति पूजा पाठ करती है आगे के लिये वंश चलाने के प्रति अपनी कामना को समर्पित करती है।

बहू अपने स्वार्थ को त्याग कर पति के कुल मे शांति और सम्पन्नता बनाने के प्रति अपने ज्ञान का दान करती है,दामाद अपने बाहुबल और सम्मान के द्वारा अपने ससुराली जनो का मान बढाने में अपनी शक्ति का दान करता है। कुछ लोग अपने व्यवसाय स्थान पर बैठ कर रास्ता बताकर अपने ज्ञान का दान करते है,कुछ लोग प्यासों के लिये प्याऊ खुलवाकर धर्मशाला बनवा कर लोगों के जीवन को सर्दी गर्मी से बचाने के लिये अपने बाहुबल का दान करते है। हकीकत मे देखा जाये तो यह शरीर ही दान से और दान के लिये बना है। एक व्यक्ति एक लाख रोजाना कमा रहा है लेकिन वह अपने लिये मात्र कुछ सौ रुपया में अपना पेट भर लेता है,और बाकी का धन वह अपने परिवार के लिये जमा करता है कि वह अपनी संतान के लिये इतना इकट्ठा कर दे कि उसके बाद उसकी संतान किसी की मोहताज नही रहे और वह सुखी रहे। लेकिन इस सुखी रखने के कारणों में मोह पैदा हो जाता है,यह मोह करना ही उसकी भूल है और इसी मोह के चक्कर में शरीर से की जाने वाली मेहनत दान स्वरूप न होकर मोह के जंजाल में चली जाती है।

माता ने अगर पुत्र को जन्म देने के बाद यह सोच लिया कि उसका पुत्र बडा होकर उसकी पालना करेगा,उसकी सेवा करेगा,उसके लिये बहू लाकर उसकी आज्ञा का पालन करवायेगा तो माता का यह मोह उस समय बेकार हो जाता है जब लडका बडा होता है और अपनी मर्जी से शादी विवाह करने के बाद अपना घर अलग बसा लेता है माता अपने पुत्र के सहारे रहने के कारण और अपने लिये कुछ न बचाकर केवल पुत्र के लिये ही सब कुछ करने के बाद जब पुत्र पास से निकल जाता है और पत्नी के लिये सोचने लगता है तो माता का वह पालन पोषण से लेकर पढाने लिखाने और सभी साधन पुत्र के लिये जुटाने के प्रति बेकार हो जाता है। उस समय माता और पुत्र के बीच तनातनी चलती है और बहू जो दूसरे घर से आयी है उसके अन्दर यह भावना घर कर जाती है कि माँ केवल बेटे से धन का मोह करती है और बेटा माँ के कहे पर चलता है उसकी बात को नही सुनता है,इस प्रकार से तकरार बढ कर बडी तकरार बन जाती है,बेटा न तो माँ को छोड सकता है और न ही पत्नी को छोड सकता है,पत्नी के पास दो रास्ते होते है एक अपने माता पिता का और दूसरा कानून का,लेकिन माता के पास एक ही रास्ता होता है वह होता है

अपने पुत्र का,बहू या तो अपने माता पिता से प्रताणना दिलवाती है अथवा कानून का सहारा लेकर माता पिता को बजाय भोजन और सहायता देने के जेल की हवा दिलवाने का काम करती है,बेटे के सामने दो ही रास्ते होते है या तो वह बहू को लेकर अलग रहना शुरु कर दे या बहू को तलाक देकर फ़िर से माता पिता के कहने में चलने लगे,उसे दूसरा साधन ही सही लगता है,लेकिन इन सब के पीछे जो था वह माता का लोभ ही था,अगर माता ने पिता के साथ मिलकर पहले से ही पुत्र की शिक्षा के बाद उसे जीविका के साधन देकर अलग कर दिया होता,और बहू को पहले से ही अलग करने का मानस बना लिया होता तो जेल जाने की या प्रताणित होने की समस्या ही नही आती,यह सब मोह के कारण ही माना जा सकता है,जब पालने पोषणे मे कोई मोह नही था,अगर उस समय मोह होता तो डाक्टर के पास बच्चे के बीमार होने के बाद नही ले जाया गया होता,शिक्षा के स्थानों में एडमिसन नही करवाया गया होता,सर्दी गर्मी के समय में उसे कपडे और रहने के स्थान का बंदोबस्त भी नही करवाया गया होता,लेकिन जैसे ही वह कमाने लायक हुआ और माता के अन्दर मोह ने जन्म ले लिया।

12/12/2016

मन का सौंर्दय महत्त्वपूर्ण

महाकवि कालीदास से राजा विक्रमादित्य ने एक दिन अपने दरबार में
पूछा, 'क्या कारण है, आपका शरीर मन और बुद्धी के अनुरूप् नहीं है?' इसके उत्तर में कालिदास ने अगले दिन दरबार में सेवक से दो घड़ों में पीने का पानी लाने को कहा। वह जल से भरा एक स्वर्ण निर्मित घड़ा और दूसरा मिट्टी का घड़ा ले आया। अब महाकवि ने राजा से विनयपूर्वक पूछा, 'महाराज!' आप कौनसे घड़े का जल पीना पसंद करेंगे?' विक्रमादित्य ने कहा, 'कवि महोदय, यह भी कोई पूछने की बात है? इस ज्येष्ठ मास की तपन में सबको मिट्टी के घड़े का
ही जल भाता है।' कालिदास मुस्कराकर बोले, 'तब तो महाराज, आपने अपने प्रश्न का उत्तर स्वयंम ही दे दिया।' राजा समझ गए कि जिस प्रकार जल की शीतलता बर्तन की सुंदरता पर निर्भर नहीं करती, उसी प्रकार मन-बुद्धी का सौंदिर्य तन की सुंदरता से नहीं आँका जाता। यह है मन का सौंर्दय, जो मनुष्य को महान बना देता है और उसका सर्वत्र सम्मान होता है।

12/12/2016

🌷"गुरु गूंगे गुरू बावरे गुरू के रहिये दास "
🌷गुरु जो भेजे नरक नु स्वर्ग कि रखिये आस !

🌷एक बार की बात है नारद जी विष्णु जी से मिलने गए !
विष्णु जी ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णु जी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो !

🌷जब विष्णु जी यह बात कह रहे थे तब नारद जी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु जी से पुछा हे विष्णु जी जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो !

🌷विष्णु जी ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है !

🌷यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! विष्णु जी बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो !

🌷नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस विष्णु जी के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ !

🌷यह सुनकर विष्णु जी ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया !

🌷मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस विष्णु जी के पास गए और कहा हे विष्णु जी मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा !

🌷यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे विष्णु जी इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये ! विष्णु जी ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा !

🌷नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा विष्णु जी मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया !

🌷गुरु की महिमा अपरम्पार है ! मैंने लोगो को कहते हुए सुना है कि गुरु पूरा होना चाहिए इसलिए वो ऐसे लोगो को गुरु बनाते है जिनका नाम बडा होता है । दर्शनों से भक्तो पर कृपा आने लगती है पर ऐसा कुछ नहीं होता !

🌷कोई भी साधक कभी पूरा नहीं हो सकता क्योंकि पूरे तो केवल ईश्वर है और दूसरा ईश्वर कोई बन नहीं सकता ! इसलिए माना जाता है कि…

*🌷गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास*
*गुरु जो भेजे नरक नु स्वर्ग कि रखिये आस !*

🌷गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा स्वयं गुरु भी नहीं कर सकते !
गुरु तो केवल गुरु है फिर चाहे वे लोक गुरु हो या पंथक गुरु !

🌷गुरू मेरी पुजा
🌷गुरू गोविंद
🌷गुरु मेरा पारब्रम्ह
🌷गुरू भगवंत
*🌷🙏🏻शुभ रात्रि मित्रों🙏🏻🌷*

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