05/08/2020
जब आप इतिहास पढ़ते हैं और एक के बाद एक राजाओं के आक्रमण और धर्म, कर्म को जानते, समझते हैं फिर अपने हिसाब से उसे प्राथमिकता देते हैं तब विषय पेचीदा हो जाता है। आप सोमनाथ के मंदिर को तोड़ने की घटना यदि याद रखते हैं तो बौद्ध मठों के खात्मे पर चर्चा क्यों नहीं करना चाहते? आप मोहम्मद गजनवी से लेकर औरँगजेब तक को याद करना चाहते हैं केवल धर्म के नाम पर बांटने, काटने को लेकर फिर चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर ब्रह्दरथ तक को याद क्यों नहीं करते?
जब आप अपने हिसाब से इतिहास को पढ़ना चाहते हैं तो सवाल उठता है कि आखिर तथ्य व सत्य क्या है? वेदों में जिन भगवानों का वर्णन नहीं है और व्यवस्था में जिन भगवानों की मौजूदगी है उनके बीच की कड़ी कहाँ गायब है? जिस समय का वर्णन शास्त्रों में हैं उस समय न दुनिया मे कोई लिपि उपलब्ध थी और न भाषा। फिर दृष्टि उठती है विज्ञान की तरफ कि वैज्ञानिक प्रमाण क्या कहते हैं क्योंकि ऐतिहासिक प्रमाण धराशायी नजर आते हैं या फिर अवसरवाद की चपेट में घिरे हुये पाए जाते हैं।
जब आप विज्ञान पढ़ते हैं और एक के बाद एक राजाओं के डीएनए से खुद के खून की तुलना करते हैं और कहते हैं कश्मीर से लेकर या हिंदुकुश पर्वत से कन्याकुमारी तक सब लोगों का डीएनए एक है और हिंदुओं का है फिर मुझे याद आता है 21 मई 2001 को जारी वैज्ञानिक रिपोर्ट जिसमें कहा जाता है कि समस्त आर्य पुरुष यूरेशियन डीएनए के है जिनमें r1 a1 फैक्टर मौजूद है जबकि द्रविड़ियन यह फैक्टर मौजूद नहीं और द्रविड़ियन तथा आर्यन में यह असमानता बहुत विस्तृत है।
ऐसी स्थिति में जब ऐतिहासिक, वैज्ञानिक प्रमाण एक जगह रखे जाते हैं तब हजार सवालों का जन्म होता है और वही सवाल तथा उनके अतार्किक जवाब एक अध्ययन करने वाले छात्र के गले नहीं उतरते हैं। फिर सवाल उठता है कि बुद्ध भारत से ही चलकर दुनिया मे छा गये लेकिन भारत मे ही विलुप्त हो गये और उड़ने, रूप बदलने, काया पलटने, दुनिया निगलने वाले भगवान दुनिया से विलुप्त हुये जब इन तमाम बातों के बीच कशमकश चलती है तब इंसान उलझ जाता है और विज्ञान को तरजीह देता है।
राजनीतिक स्थापत्य अलग विषय है और धार्मिक उन्माद भी अलग विषय। हमें मान्यताओं, धरणाओं, कल्पनाओं, जिज्ञासाओं, इच्छाओँ से परे ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की लालसा है। उसके प्रति कोई राग-द्वेष नहीं है बल्कि हार्दिक स्वीकारोक्ति है मगर कपोलकल्पना से मन की जिज्ञासाओं को सन्तुष्टि असम्भव है। दुनिया में विश्वगुरु, प्रकाशपुंज, दिव्यदर्शन का सार जिनसे मिला विश्व के सामने भारत उन्ही के आगे नतमस्तक क्यों नज़र आता है और भारत में वह अंधकारमय क्यों है वास्तविक तथ्यों की उत्सुकता हेतु इसकी एक वाज़िब अभिलाषा लगती है। ी_विशाल।