Amit Joshi

Amit Joshi Vaidik Shastri, Astrologer, Palmist, Face reader, Vastu consultant, with Vast Experience and Vaidik

01/09/2022
Mahamrutujay Anusthan मृत्युञ्जयो रक्षतु सवॅ कालम्
30/06/2020

Mahamrutujay Anusthan
मृत्युञ्जयो रक्षतु सवॅ कालम्

05/09/2019

श्रेष्ठ वर की प्राप्ति हेतु उपाय :

लड़की के माता-पिता आदि कन्या के विवाह के लिये सुयोग्य वर की प्राप्ति के निमित्त प्रयासरत रहते हैं और कभी-कभी अनेक प्रयास करने पर भी वर की तलाश नहीं कर पाते।

यदि किसी कन्या के विवाह में किसी भी कारण से अनावश्यक विलंब हो रहा हो, बाधायें आ रही हों तो कन्या को स्वयम् 21 दिनों तक निम्न मंत्र का प्रतिदिन 108 बार पाठ करना चाहिये और पाठ के उपरांत इसी मंत्र के अंत में ''स्वाहा'' शब्द लगाकर 11 आहुतियां (शुद्ध घी, शक्कर मिश्रित धूप से) देना चाहिये।

यह दशांश हवन कहलाता है। 108 बार पाठ का दसवां हिस्सा यानि 10.8 = 11 (ग्यारह) आहुतियां भी प्रतिदिन देना है, इक्कीस दिनों तक।

सिर्फ स्थान, समय और आसन निश्चित होना चाहिये। इसका अर्थ यह है कि यदि कोई कन्या प्रथम दिन प्रातः काल 9.00 बजे पाठ करती है तो 21 दिनों तक उसे प्रतिदिन 9.00 बजे ही पाठ आरंभ करना चाहिये। यदि प्रथम दिन घर की पूजा-स्थली में बैठकर पाठ शुरू किया है तो प्रतिदिन वहीं बैठकर पाठ करना चाहिये।

वैसे ही प्रथम दिन जिस आसन पर बैठकर पाठ आरंभ किया गया हो, उसी आसन पर बैठकर 21 दिनों तक पाठ करना है। सार यह है कि मंत्र पाठ का समय, स्थान और आसन बदलना नहीं है और न ही लकड़ी के पटरे पर बैठकर पाठ करना है न ही पत्थर की शिला पर बैठकर।

विधि : अपने समक्ष दुर्गा जी की मूर्ति या उनकी तस्बीर रखें। कात्यायनी देवी का यंत्र मूर्ति के समक्ष लाल रेशमी कपड़े पर स्थापित करें। यंत्र और मूर्ति का सामान्य पूजन रोली, पुष्प, गंध, नैवेद्य इत्यादि से करें। 5 अगरबत्ती और धूप दीप जलायें और मंत्र का 108 बार पाठ करें। पाठ के पूर्व कुलदेवी का स्मरण करना चाहिये।

मंत्र :

कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंदगोप सुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नमः।।
Pandit ji Amit Joshi
+917208474426

30/06/2017

उद्वाहे चोत्सवे जीव: सूर्यो भूपालदर्शने
संग्रामे धरणी पुत्रो विद्याभ्यासे बुधो बली।

यात्रायां भार्गव: प्रोक्त: दीक्षायां च शनैश्चर:।
चन्द्रमा सर्वकार्येषु प्रशस्तो गृह्यते बुधै:।।

(बृहद्दैवज्ञरञ्जनम् ३२।४४,४५)

विवाह तथा उत्सव में गुरु का, राजदर्शन में सूर्य का, युद्ध में मंगल का, विद्याभ्यास में बुध का, यात्रा में शुक्र का, दीक्षा (मन्त्र ग्रहण) में शनि का तथा समस्त कार्यों में चन्द्रमा का बल देखना चाहिए.

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