31/08/2021
✨ब्रम्ह वास्तु: यश, कीर्ति(प्रसिद्धि)✨
✨ यश और कीर्ति यह हर सामान्य मनुष्य की चाहत होती हैं। समस्त अनुकूलता होते हुए भी यदि यह प्राप्त नहीं हो पा रही हो तो इसके लिये भवन भी एक कारण हो सकता है। भवन के कारण होने का अर्थ हैं कि वहां की वास्तु ऊर्जाये आपको सहयोग नहीं कर रही है या रुकावट पैदा कर रही है।
आइए समझते हैं इसके लिए कौन - कौन सी दिशा उत्तरदायी है।
📍 यश के लिए पूर्व दिशा को जाँचना चाहिए। यश का अर्थ हैं प्रभाव, चाहे वह सामजिक हो, अर्थिक हो या राजकीय हो। यह व्यक्ति की तात्कालिक अवस्था के साथ आता जाता है।
भवन के पूर्व दिशा में यदि यह दोष होंगे तो रहने वाले को यश प्राप्ति मे दिक्कत आएगी :
1. पूर्व दिशा बंद हो, वहाँ से कोई ऊर्जा प्रवाहित ना हो।
2. पूर्व दिशा में शौचालय हो।
3. पूर्व दिशा में कबाड़ रखा हो।
4. वह स्थान पश्चिम वा दक्षिण से ऊंचा हो।
5. पूर्व दिशा में विपरीत धातु या रंग का प्रयोग हो रहा हो।
6. पूर्व दिशा में सेप्टिक टैंक हो।
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📍 कीर्ति: कीर्ति का अर्थ हैं व्यक्ति का वह प्रभाव जो उसके बिना प्रयास किए फैलता है। व्यक्ति के उस स्थान पर होने ना होने पर भी उसकी कीर्ति दूर तक फैलती है। यश से बडा और स्थाई रुप है कीर्ति। इसको हम प्रसिद्धि भी कह सकते हैं।
आइए कीर्ति को प्रभावित करने वाले या अपयश के लिए वास्तु दोष कौन कौन से है।
1. भवन की पश्चिम की दिशा का प्रभाव इसके के लिए जिम्मेदार दिशा है।
2. पश्चिम दिशा स्थान दूसरे दिशाओं से नीचा हो।
3. वह SW दिशा स्थान से ऊंचा हो।
4. पश्चिम दिशा में सेप्टिक टंकी हों।
5. पश्चिम दिशा में विपरीत धातु या रंग का प्रयोग हों।
6. पश्चिम दिशा में बोर हों।
7. पश्चिम दिशा में कटा हुआ हो।
आज कल प्रचलन में चायनीज वास्तु के प्रभाव में आकर विद्वान मित्र दक्षिण की दिशा को यश की दिशा बताते है। हमारे भारतीय वास्तु ने ऊर्जा के प्रभाव का अध्ययन का तरीका अलग रहा है। भारतीय वास्तु ने उसे यम की दिशा माना है। उसे दक्षता की दिशा माना है। हमे भारतीय वास्तु की गरिमा वा विज्ञान को समझना चाहिए।
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