19/08/2021
प्रकृति की एक और अनमोल देन हैं 'पान' पाइपरेसी कुल का बेल के रूप में औषधीय पौधा है। यह द्विबीजपत्रीय होता है। इसका वानस्पितिक नाम ‘पाइपर विटिल’ है।
वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में सर्वप्रभम आसाम के जंगलों में वृक्षों पर लता के रूप में देखा गया, बाद में उसकी पहचान पान के रूप में की गई।
पान की उत्पत्ति को लेकर भिन्न-भिन्न चर्चायें पढ़ने और सुनने को मिलती हैं। तथापि कहा जाता है कि पान की बेल नागलोक से प्राप्त हुई है।
कहते हैं कि नागलोक के राजा वासुकि ने अपनी कन्या के विवाहोत्सव में उपहार स्वरुप नागबेल दी थी।
एक अन्य कथा के अनुसार जब पृथ्वी लोक पर ब्रह्मा जी ने यज्ञ प्रारम्भ किया तब देवपूजनार्थ पान की आवश्यकता हुई। पान पाताल में नागों के पास थे। बृहस्पति अपने तपोबल, मनोबल और बुद्धिचातुर्य से नागदेव से पान का बेल लाये और नागलोक से पान के रक्षार्थ तक्षक, डेढ़ादेव और जाखदेव आदि भेजे गए।
आज भी बरेजों पर इनकी वार्षिक पूजा नागपंचमी के दिन करने की लोक प्रथा पान कृषकों के मध्य चली आ रही है।
शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि पान के अग्रभाग में आयु, मूल अर्थात डंठल में यशकीर्ति, मध्य भाग में लक्ष्मी का निवास है।
पान भारत के इतिहास एवं परंपराओं से गहरे से जुड़ा है। इसका उद्भव स्थल मलाया द्वीप है। पान विभिन्न भारतीय भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे ताम्बूल (संस्कृत), पक्कू (तेलगु), वेटिलाई (तमिल और मलयालम), नागवेल ( मराठी) और नागुरवेल (गुजराती) आदि।
पान का प्रयोग सनातन संस्कारों से जुड़ा है और प्रत्येक धार्मिक कार्यों में पान का प्रयोग होता हैं ।
वेदों में भी पान के सेवन की पवित्रता का वर्णन है। यह तांबूली या नागवल्ली नामक लता का पत्ता है। खैर, चूना , सुपारी के योग से इसका बीड़ा लगाया जाता है और मुख की सुंदरता, सुगंधि, शुद्धि, श्रृंगार आदि के लिये चबा चबाकर उसे खाया जाता है।
इसके साथ विभिन्न प्रकार के सुगंधित, असुगंधित तम्बाकू , तरह तरह के पान के मसाले, लौंग , कपूर, सुगंधद्रव्य आदि का भी प्रयोग किया जाता है। विभिन्न प्रदेशों में अपने अपने स्वाद के अनुसार इसके प्रयोग में तरह तरह के मसालों के साथ पान खाने का रिवाज है।
इस लता के पत्ते छोटे, बड़े अनेक आकार प्रकार के होते हैं। बीच में एक मोटी नस होती है और प्राय: इस पत्ते की आकृति मानव के हृदय (हार्ट) से मिलती जुलती होती है।
भारत के विभिन्न भागों में होनेवाले पान के पत्तों की सैकड़ों किस्में हैं - कड़े, मुलायम, छोटे, बड़े, लचीले, रूखे आदि। उनके स्वाद में भी बड़ा अंतर होता है। कटु, कषाय, तिक्त और मधुर-पान के पत्ते प्राय: चार स्वाद के होते हैं। उनमें औषधीय गुण भी भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं। भारत, बर्मा,श्रीलंका आदि में पान की अघिक पैदावार होती है।
महोबा का देशावरी पान आज भी पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अन्य खाड़ी के देशों में लोकप्रिय है।
बुंदेलखण्ड में पछुआ व दक्षिणी हवाएं कुछ ज्यादा ही गर्म होती हैं, अस्तु पान के बरेज भी मदनसागर, कीरत सागर व अन्य सरोवरों के किनारे-किनारे लगाने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई ताकि गर्म हवाओं से उनकी रक्षा की जा सके तथा सिंचाई हेतु पर्याप्त जल की उपलब्धता सुनिश्चित बनी रहे।
पान को संस्कृत में ताम्बूल कहते हैं। यह हमारे खान-पान, अतिथि सत्कार के रूप में प्राचीन काल से भारतीय संस्कार का अभिन्न अंग बनकर चला आ रहा है। इतना ही नहीं, पान पूजा का भी आवश्यक व अनिवार्य सामग्री के रूप में वैदिक काल से चला आ रहा है।
‘ताम्बूलम समर्पयामि’ का बार-बार उच्चारण भारतीय कर्मकाण्ड का अभिन्न हिस्सा बनकर आज भी सर्वत्र महिमामण्डित हो रहा है। भारत की सांस्कृतिक दृष्टि से तांबूल (पान) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पुराणों, संस्कृत साहित्य के ग्रंथों, स्तोत्रों आदि में तांबूल के वर्णन भरे पड़े हैं। शाक्त तंत्रों (संगमतंत्र-कालीखंड) में इसे सिद्धिप्राप्ति का सहायक ही नहीं कहा है वरन् यह भी कहा है कि जप में तांबूल-चर्वण और दीक्षा में गुरु को समर्पण किए बिना सिद्धि अप्राप्त रहती है।
उसे यश, धर्म, ऐश्वर्य, श्रीवैराग्य और मुक्ति का भी साधक कहा है। "वात्स्यायनकामसूत्र" और रघुवंश आदि प्राचीन ग्रंथों में "तांबूल" शब्द का प्रयोग मिलता है। इस शब्द को अनेक भाषाविज्ञ आर्येतर मूल का मानते है।
भारत में पान के विविध प्रकार प्रचलित हैं जैसे ..
देसी, दिसावरी पान :- इसमें करारापन, कम रेशे, हल्की कड़ुवाहट, स्वादिष्ट, पत्ता गोल व नुकीला होता है।
खाँसी पान :- यह वन्य प्रजाति होती है। असमिया आदिवासी इसका औषधीय प्रयोग करते हैं। यह अपेक्षाकृत छोटा और अधिक कसैला होता है।
साँची पान :- यह पान मोटा, हरा तथा अधिक रेशेदार होता है।
कपुरी पान :- यह हल्का कड़ुवा होता है। पत्ती हल्के पीले रंग की होती है। यह प्रजाति हल्के पीले रंग की है तथा पत्तियाँ चबाना लोग पसंद करते हैं।
बांग्ला पान :- इसका स्वाद कड़ुवा होता है।
इसका पत्ता ह्रदयाकार गोला है। इसकी शिरायें मोटी तथा रेशेदार होती हैं। इसमें बांग्ला पानों की सभी किस्में शामिल होती है। पान के साथ जो आयुर्वेदिक औषधियाँ सेवनीय हैं वे बांग्ला पान के साथ ही ग्रहण की जाती हैं।
सौफिया पान :- इसमें रेशे कम, कड़ुवा, सौफ की सुगंध तथा मीठे स्वाद का होता है। पत्ता गहरे हरे रंग का होता है।
जहाँ वह एक ओर धूप, दीप और नैवेद्य के साथ आराध्य देव को चढ़ाया जाता है, वहीं श्रृंगार और प्रसाधन का भी अभिन्न अंग है।
अपने देश में पान का खान-पान, अतिथि सत्कार तथा पूजा सामग्री के साथ-साथ युद्ध संस्कृति से भी चोली-दामन का साथ रहा है।
वैज्ञानिक दृष्टि से पान एक महत्वपूर्ण वनस्पति है। रासायनिक गुणों में वाष्पशील तेल का मुख्य योगदान रहता है। ये सेहत के लिये भी लाभकारी है।
खाना खाने के बाद पान का सेवन पाचन में सहायक होता है पान में वाष्पशील तेलों के अतिरिक्त अमीनो अम्ल कार्बोहाइड्रेड और कुछ विटामिन प्रचुर मात्रा में होते हैं।
पान के औषधीय गुणों का वर्णन चरक संहिता में भी किया गया है। ग्रामीण अंचलों में पान के पत्तों का प्रयोग लोग फोड़े-फुंसी उपचार में पुल्टिस के रूप में करते हैं।
हितोपदेश के अनुसार पान के औषधीय गुण हैं बलगम हटाना, मुख शुद्धि, अपच, श्वांस संबंधी बीमारियों का निदान। पान की पत्तियों में विटामिन ए प्रचुर मात्रा में होता है। प्रात:काल नाश्ते के उपरांत काली मिर्च के साथ पान के सेवन से भूख ठीक से लगती है स्वास्थ बेहतर रहता हैं ।
ऐसा यूजीनॉल अवयव के कारण होता है। सोने से थोड़ा पहले पान को नमक और अजवाइन के साथ मुंह में रखने से नींद अच्छी आती है। यही नहीं पान सूखी खांसी में भी लाभकारी होता है।
मुखशुद्धि का साधन भी है और औषधीय गुणों से संपन्न भी माना गया है।
संस्कृत की एक सूक्ति में तांबूल के गुणवर्णन में कहा है - वह वातध्न, कृमिनाशक, कफदोषदूरक, (मुख की) दुर्गंध का नाशकर्ता और कामग्नि संदीपक है।
उसे र्धर्य उत्साह, वचनपटुता और कांति का वर्धक कहा गया है। सुश्रुत संहिता के समान आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ में भी इसके औषधीय द्रव्यगुण की महिमा वर्णित है।
आयुर्वेदिक चिकित्सको द्वारा विभिन्न रोगों में औषधों के अनुपान के रूप में पान के रस का प्रयोग होता है। इसके पत्तों से वाष्पशील तेल एवं सुगंधित होने के कारण इसका आर्थिक महत्त्व भी है।
शास्त्रों में कहा गया है कि पान कुछ कड़वा, तीखा, मधुर, कसैला व क्षारीय, पाँचों रसों से युक्त होता है। पान के सेवन से वायु कुपित नहीं होती है, कफ मिटता है । मुख की शोभा बढ़ाता है, दुर्गन्ध मिटाता है तथा मुँह की शुद्धि करता है
मानवीय स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी इसमें सभी अपेक्षित तत्वों का समावेश है। आयुर्वेद के अनुसार “यह बल प्रदायक, कामोत्तेजक है।
प्रतिदिन सोकर उठने पर पान के सेवन से मनुष्य की समस्त सुषुप्त इंद्रियों में चैतन्यता रहती है। रेगिस्तान या जल के अभाव में यदि पान का सेवन किया जाये तो प्यास भी बुझ जाती है।”
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