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“संविधान के मूल में जो समता, न्याय और सम्मान है—वह बाबासाहेब की सबसे बड़ी विरासत है।6 दिसंबर महापरिनिर्वाण दिवस पर शत-शत...
06/12/2025

“संविधान के मूल में जो समता, न्याय और सम्मान है—
वह बाबासाहेब की सबसे बड़ी विरासत है।
6 दिसंबर महापरिनिर्वाण दिवस पर शत-शत नमन।
जय भीम ✊”

Vikas Median
Vikas median

irvanDiwas

“जिस समाज ने हमें पहचान दी…अब उसी समाज को हम अपनी Skill देंगे — और उसकी ताकत बढ़ाएंगे।”My Skill For My Society (अभियान क...
15/11/2025

“जिस समाज ने हमें पहचान दी…
अब उसी समाज को हम अपनी Skill देंगे — और उसकी ताकत बढ़ाएंगे।”

My Skill For My Society
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उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव 2025
में जीत के लिए
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Vikas Median
Yashasvi Talwar
Vikas median























जब आपका प्रत्याशी डाक्टर हो ......
13/11/2025

जब आपका प्रत्याशी डाक्टर हो ......

Bihar - EXIT Poll - Gen AE 2025(243 Seats)
12/11/2025

Bihar - EXIT Poll - Gen AE 2025
(243 Seats)

26/07/2025
07/02/2025

माता रामाबाई आम्बेडकर: त्याग, संघर्ष और प्रेरणा की जीवंत मूर्ति

भारत के सामाजिक परिवर्तन में बाबा सहाब नेडॉ. भीमराव आम्बेडकर का योगदान अतुलनीय है, लेकिन उनकी सफलता के पीछे एक ऐसा व्यक्तित्व था, जिसने अपने त्याग, धैर्य और संघर्ष से उन्हें इस राह पर आगे बढ़ने में मदद की। वह थीं—रामाबाई आम्बेडकर। एक साधारण लेकिन अद्भुत स्त्री, जिन्होंने कठिनाइयों में भी अपने पति को उच्च शिक्षा और सामाजिक उत्थान के कार्यों के लिए प्रेरित किया। उनकी जयंती के अवसर पर, हम उनके संघर्षपूर्ण जीवन को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

साधारण परिवार से असाधारण सफर

रामाबाई का जन्म 7 फरवरी 1898 को मुंबई के वंजारपट्टी इलाके में हुआ था। वे एक गरीब परिवार से थीं, जहां जीवनयापन कठिन था, लेकिन उनके संस्कार और संघर्षशील स्वभाव ने उन्हें असाधारण बना दिया। 1906 में, मात्र 8 वर्ष की उम्र में, उनका विवाह भीमराव आम्बेडकर से हुआ, जो उस समय केवल 15 वर्ष के थे। उस युग में शिक्षा और सामाजिक समानता का अभाव था, लेकिन रामाबाई ने हर चुनौती को सहन करते हुए अपने पति का साथ दिया।
जब बाबा साहेब उच्च शिक्षा के लिए मुंबई और फिर विदेश गए, तब रामाबाई ने अत्यंत कठिनाइयों का सामना किया।
वे बेहद गरीबी में जीवन यापन कर रही थीं, लेकिन उन्होंने कभी भी गरीबी को अपने पति की शिक्षा में बाधा नहीं बनने दिया। परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी अकेले निभाते हुए उन्होंने हर परिस्थिति को सहन किया।
बाबा सहाब डा भीमराव आम्बेडकर के सामाजिक क्रांति के हर कार्यों में उनका पूरा समर्थन था, भले ही इसका अर्थ व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग हो।

डॉ. आम्बेडकर जब विदेश से लौटे, तो वे समझ गए कि रामाबाई ने कितना बड़ा त्याग किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक "थॉट्स ऑन लिंजले एंड बुद्धिज्म" को रामाबाई को समर्पित करते हुए लिखा—
"रामू, अगर तुम नहीं होतीं, तो मैं कुछ नहीं कर पाता।"
माता रामाबाई केवल एक आदर्श पत्नी ही नहीं, बल्कि भारतीय महिलाओं के लिए भी प्रेरणा हैं। उन्होंने यह साबित किया कि एक सशक्त स्त्री किस तरह अपने परिवार और समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
उनकी सादगी, त्याग और सेवा भावना डॉ. आम्बेडकर की प्रेरणा बनी, जिससे वे भारतीय समाज में समानता और न्याय की अलख जगा सके,
26 मई 1935 को, मात्र 37 वर्ष की अल्पायु में, माता रामाबाई का निधन हो गया। वे बाबा साहेब के सामाजिक परिवर्तन के स्वर्ण युग को देखने से पहले ही दुनिया छोड़ गईं, लेकिन उनका त्याग इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
डॉ. आम्बेडकर ने उनके सम्मान में कहा था कि रामाबाई ने अपनी इच्छाओं और सपनों का बलिदान करके उन्हें समाज सेवा के लिए समर्पित रहने दिया।
रामाबाई आम्बेडकर का जीवन यह सिखाता है कि—

1. संघर्ष में धैर्य और समर्पण की शक्ति होती है।

2. बड़े लक्ष्य के लिए व्यक्तिगत सुखों का त्याग करना आवश्यक होता है।

3. सच्ची नारी शक्ति वह होती है, जो अपने परिवार और समाज को नई दिशा देने में सहायक बने।

आज, जब हम उनकी जयंती मना रहे हैं, तो हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके धैर्य, त्याग और सेवा की भावना से प्रेरित होकर समाज में समानता और न्याय के लिए कार्य करेंगे।

जय भीम! जय रामाई!

विकास कुमार मैडियन

Celebrating my 10th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉
04/02/2025

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04/02/2025

मौत का फंदा बना चाइनीज मांझा: कब रुकेगा यह खूनी खेल?

चाइनीज मांझा, जो कभी पतंगबाजों के बीच लोकप्रिय था, अब मौत का फंदा बन चुका है। प्रतिबंध के बावजूद इसका अवैध कारोबार जारी है, और आए दिन यह किसी न किसी की जान ले रहा है। हाल ही में उत्तराखंड के हरिद्वार में एक रेलवे जूनियर इंजीनियर की गर्दन कटने से मौत हो गई, जबकि वाराणसी में मकर संक्रांति के अवसर पर पतंगबाजों ने इसके खतरों के प्रति लोगों को चेताया।

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हरिद्वार में चाइनीज मांझे से रेलवे इंजीनियर की मौत

हरिद्वार के गुरुकुल इलाके में 2 फरवरी 2025 को रेलवे जेई सुलेख चंद अपनी पत्नी के साथ ऋषिकेश से बाइक पर लौट रहे थे। रास्ते में अचानक उनकी गर्दन में चाइनीज मांझा फंस गया। धारदार मांझे ने गला काट दिया, जिससे अत्यधिक खून बहने के कारण मौके पर ही उनकी मौत हो गई। यह घटना क्षेत्र में दहशत का कारण बन गई।

स्थानीय प्रशासन ने पतंग विक्रेताओं पर छापेमारी की, लेकिन किसी दुकान से चाइनीज मांझा बरामद नहीं हुआ। यह घटना प्रशासन की लचर व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है।

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बनारस में पतंगबाजों ने चेताया: चाइनीज मांझा मत उड़ाओ

मकर संक्रांति (14 जनवरी 2025) को वाराणसी के पतंगबाजों ने 'चाइनीज मांझा हटाओ, सुरक्षित पतंग उड़ाओ' अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने बताया कि यह नायलॉन से बना मांझा इतना तेज और मजबूत होता है कि इंसानों की गर्दन तक काट सकता है।

स्थानीय पतंग विक्रेता रवि शर्मा ने कहा,
"पारंपरिक मांझा महंगा होता है, लेकिन सुरक्षित है। चाइनीज मांझा सस्ता है, लेकिन यह मौत का सामान है।"

इसी तरह, समाजसेवी संस्थाओं ने भी प्रशासन से इसकी बिक्री पर कड़ी निगरानी रखने की मांग की।

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चाइनीज मांझे से होने वाले खतरे

1. इंसानों के लिए घातक: दोपहिया वाहन चालकों के गले कटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

2. पक्षियों के लिए जानलेवा: हर साल हजारों पक्षी इसकी चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं।

3. बिजली आपूर्ति में बाधा: यह हाई-वोल्टेज तारों में उलझकर शॉर्ट सर्किट और आग लगने का कारण बनता है।

4. पर्यावरण के लिए हानिकारक: प्लास्टिक से बना होने के कारण यह आसानी से नष्ट नहीं होता और कचरे का बड़ा कारण बनता है।

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कानूनी स्थिति: प्रतिबंध के बावजूद जारी है बिक्री

भारत में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने 2017 में चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बावजूद, यह चोरी-छिपे बाजार में बिकता है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध रहता है।

हाल ही में दिल्ली, जयपुर, मुंबई और लखनऊ में प्रशासन ने चाइनीज मांझे की दुकानों पर छापेमारी की और हजारों गुच्छे जब्त किए, लेकिन इस पर पूरी तरह से रोक नहीं लग पाई है।

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समाधान: कैसे रोका जाए यह खूनी खेल?

1. सख्त कानून और उसका कड़ाई से पालन: प्रतिबंधित होने के बावजूद यह बिक रहा है, जिसे रोकने के लिए प्रशासन को और अधिक सतर्कता बरतनी होगी।

2. जागरूकता अभियान: स्कूलों, कॉलेजों और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को इसके खतरों के बारे में बताया जाए।

3. ऑनलाइन बिक्री पर निगरानी: कई ई-कॉमर्स साइट्स पर इसे बेचा जाता है, जिन पर कड़ी निगरानी जरूरी है।

4. पारंपरिक मांझे को बढ़ावा: सूती और बायोडिग्रेडेबल मांझों का उत्पादन और उपयोग बढ़ाया जाए।

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निष्कर्ष

चाइनीज मांझा केवल एक पतंग उड़ाने का धागा नहीं, बल्कि मौत का जाल बन चुका है। हर साल कई लोग इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा रहे हैं, जबकि हजारों पक्षी इसकी वजह से मर रहे हैं। सरकार को चाहिए कि इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाकर इसका व्यापार जड़ से खत्म करे।

हम सबकी भी जिम्मेदारी है कि हम इस खतरनाक मांझे का इस्तेमाल न करें और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करें। क्योंकि एक छोटी-सी लापरवाही किसी की जान ले सकती है!
साभार
विकास कुमार मैडियन
लेखक राजनैतिक ओर सामाजिक मामलों के विशेषज्ञ हैं

02/02/2025

अमर शहीद बाबू जगदेव प्रसाद: शोषितों की क्रांति के जनक

भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में अनेक क्रांतिकारी नेता हुए, जिन्होंने अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई। इन्हीं महान नेताओं में से एक थे बाबू जगदेव प्रसाद। उन्हें "बिहार के लेनिन" और "शोषितों की क्रांति के जनक" के रूप में जाना जाता है। उन्होंने सामाजिक न्याय, समता और दलित-शोषित समाज के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

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प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

बाबू जगदेव प्रसाद का जन्म 2 फरवरी 1922 को बिहार के कुआकोल (अब नवादा जिला) के कुरहारी गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनका बचपन संघर्षों से भरा था, लेकिन उन्होंने शिक्षा के महत्व को समझा और कड़ी मेहनत से पटना विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। हिंदी और अंग्रेजी साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी, और वे बचपन से ही सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज़ उठाने लगे थे।

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राजनीतिक जीवन और अर्जक संस्कृति का उदय

जगदेव प्रसाद जी का राजनीति में प्रवेश कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक बदलाव लाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने भारतीय राजनीति में शोषितों, दलितों और पिछड़ों को उनका हक दिलाने के लिए अर्जक संस्कृति आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन का उद्देश्य था समाज में फैली जाति-व्यवस्था, अंधविश्वास और आर्थिक शोषण को समाप्त करना।

उन्होंने 1967 में शोषित दल की स्थापना की, जो आगे चलकर शोषित समाज दल बना। उनका नारा –

"सौ में नब्बे शोषित हैं, शोषितों ने ललकारा है।
धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है।"

यह नारा सामाजिक क्रांति का प्रतीक बन गया। उन्होंने कहा कि शोषित समाज की आबादी 90% है, तो फिर सत्ता, संसाधन और संपत्ति पर उनका समान अधिकार क्यों नहीं?

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राजनीतिक विचारधारा और संघर्ष

बाबू जगदेव प्रसाद की विचारधारा पूरी तरह से समाजवाद और सामाजिक न्याय पर आधारित थी। वे मानते थे कि भारत में सदियों से दलितों, पिछड़ों और गरीबों का शोषण किया गया है, और जब तक उन्हें समान अधिकार नहीं मिलते, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।

उन्होंने मनुवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद के खिलाफ खुलकर संघर्ष किया। उनका मानना था कि –

1. आरक्षण की जरूरत तब तक है, जब तक सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित नहीं हो जाती।

2. जातिवाद को खत्म किए बिना, सच्चा लोकतंत्र संभव नहीं।

3. धर्म और परंपराओं के नाम पर शोषण को बढ़ावा देना बंद होना चाहिए।

उनकी स्पष्ट विचारधारा के कारण उन्हें कई बार सत्ता और पूंजीपतियों के विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपने मार्ग से पीछे नहीं हटे।

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शहादत: एक क्रांतिकारी का बलिदान

5 सितंबर 1974 को बिहार के कुर्था (अरवल) में एक आंदोलन के दौरान पुलिस ने उन पर गोली चला दी। बुरी तरह घायल होने के बावजूद, उन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया। सत्ता के इशारे पर उन्हें भीषण अत्याचारों का सामना करना पड़ा और मौके पर ही शहीद कर दिया गया।

उनकी शहादत ने पूरे बिहार और भारत के शोषित समाज को झकझोर दिया। उनके विचार और आंदोलन आज भी जीवंत हैं और सामाजिक न्याय के संघर्ष में एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य कर रहे हैं।

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बाबू जगदेव प्रसाद की विरासत

बाबू जगदेव प्रसाद का योगदान केवल राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज में वैचारिक जागरूकता भी फैलाई। अर्जक संस्कृति के माध्यम से उन्होंने धार्मिक पाखंड, जातिवाद और सामाजिक अन्याय के खिलाफ बिगुल फूंका।

आज भी उनकी जयंती पर देशभर में सामाजिक न्याय के समर्थक उन्हें याद करते हैं। बिहार और अन्य राज्यों में उनके नाम पर कई स्मारक बनाए गए हैं, और उनका संघर्ष आज भी लोगों को प्रेरित करता है।

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निष्कर्ष

बाबू जगदेव प्रसाद भारतीय राजनीति और समाज सुधार के इतिहास में एक क्रांतिकारी नायक थे। उन्होंने अपने जीवन को शोषितों के अधिकारों की लड़ाई में समर्पित कर दिया और इसके लिए अपने प्राणों की आहुति भी दे दी।

उनका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल बातों से नहीं, बल्कि संकल्प और संघर्ष से आता है। अगर आज हम एक समान, न्यायपूर्ण और शोषणमुक्त समाज की कल्पना करते हैं, तो हमें बाबू जगदेव प्रसाद के विचारों और आदर्शों को अपनाना होगा।

उनकी जयंती पर हम सभी उन्हें शत-शत नमन करते हैं और उनके सपनों को साकार करने का संकल्प लेते हैं।

जय अर्जक! जय समाजिक न्याय!

विकास कुमार मैडियन
राजनीतिक विश्लेषक
8267061001

चंद्रचूड़ जब बढ़िया बढ़िया प्रवचन देने लगें तो आप समझ जाइए कि जल्द ही सुप्रीम कोर्ट कुछ ऐसा फैसला देने वाला है जिससे SC-...
01/09/2024

चंद्रचूड़ जब बढ़िया बढ़िया प्रवचन देने लगें तो आप समझ जाइए कि जल्द ही सुप्रीम कोर्ट कुछ ऐसा फैसला देने वाला है जिससे SC-ST का भारी नुकसान होगा।

इसे ही Image Building कहते है। पहले लच्छेदार भाषण देकर विश्वास जीतेंगे, फिर विरोधी फैसला देंगे।

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