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17/01/2024

आसान से वास्तु उपाय, सफलता दिलाए
भाग्य को चमकाएं, वास्तु के टिप्स आजमाएंयदि आपके घर का बजट गड़बड़ा गया हो, आप से ज्यादा खर्च होता है, परिवार में अशांति रहती है, नोट कमाने के सारे प्रयास व्यर्थ साबित हो रहे हों, तो भगवान को खुश करने के लिए पूजा कक्ष में लाल रंग का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करें।

जहां आप बटुआ रखते हों, उस स्थान को भी लाल व पीले कलर से रंग दें। कुछ ही दिनों में फर्क महसूस होगा। यदि आपको लगता है कि आपसे कोई ईर्ष्या करता है, आपके कई दुश्मन हो गए हैं। हमेशा असुरक्षा व भय के माहौल में जी रहे हों, तो मकान की दक्षिण दिशा में से जल के स्थान को हटा दें। इसके साथ ही एक लाल रंग की मोमबत्ती आग्नेय कोण में तथा एक लाल व पीली मोमबत्ती दक्षिण दिशा में नित्यप्रति जलाना शुरू कर दें।

घर में बेटी जवान है, उसकी शादी नहीं हो पा रही है, तो एक उपाय करें- कन्या के पलंग पर पीले रंग की चादर बिछाएं, उस पर कन्या को सोने के लिए कहें। इसके साथ ही बेडरूम की दीवारों पर हल्का रंग करें। ध्यान रहे कि कन्या का शयन कक्ष वायव्य कोण में स्थित होना चाहिए।कभी-कभी ऐसा होता है कि व्यक्ति सर्वगुण सम्पन्न होते हुए भी बेरोजगार रह जाता है। वह नौकरी के लिए जितना अधिक प्रयास करता है, उसकी कोशिश विफल होती जाती है। इसके लिए व्यक्ति भाग्य को जिम्मेदार ठहराता है। लेकिन अपने भाग्य को कोसने के बजाय एक उपाय करें- नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाएं, तो जेब में लाल रूमाल या कोई लाल कपड़ा रखें। सम्भव हो, तो शर्ट भी लाल हनें। आप जितना अधिक लाल रंग का प्रयोग कर सकते हैं, करें।

लेकिन यह याद रखें कि लाल रंग भड़कीला ना लगे सौम्य लगे। रात में सोते समय शयन कक्ष में पीले रंग का प्रयोग करें। याद रखें, लाल, पीला व सुनहरा रंग आपके भाग्य में वृद्धि लाता है। अतः हमेशा अपने साथ रखें व इन रंगों का व्यवहार ज्यादा से ज्यादा करें, सफलता मिलेगी।

जीवन में पीले रंग को सफलता का सूचक कहा जाता है। पीला रंग भाग्य में वृद्धि लाता है। कन्या की शादी में पीले रंग का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग किया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि कन्या ससुराल में सुखी रहेगी।

विवाह निर्विघ्न होने की शुभ सूचना वस्तुतः हल्दी से सम्पन्न होती है, क्योंकि हल्दी को गणेशजी की उपस्थिति माना जाता है। और जिस कार्य में गणेश जी स्वयं उपस्थित हों, उस कार्य को पूरा करने में विघ्न कैसे आ सकता है।

हल्दी की गांठों में कभी-कभी गणेश जी की मूर्ति का चित्र मिलता है। लक्ष्मी अन्नपूर्णा भी हरिद्रा कहलाती हैं। श्री सूक्त में वर्णन किया गया है कि लक्ष्मी जी पीत वस्त्र धारण किए है। अतः आप समझ सकते हैं कि हल्दी का कितना महत्व है। इतना ही नहीं, बृहस्पति का रंग भी पीत वर्ण का है, तभी तो पीत रंग का पुखराज पहनकर बृहस्पति की कृपा प्राप्त होती है।
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14/01/2024
श्री पुरातन जाग्रत शनि मंदिर में श्री शनिदेव महोत्सव जन्मोत्सव 2019 श्रावण कृष्णा पक्ष हरियाली जीवति अमावस्या बुधवार दिन...
19/06/2019

श्री पुरातन जाग्रत शनि मंदिर में श्री शनिदेव महोत्सव जन्मोत्सव 2019 श्रावण कृष्णा पक्ष हरियाली जीवति अमावस्या बुधवार दिन 31 जुलाई 2019 इस वर्ष की सबसे बड़ी कर्मदोष निवारण अमावस्या ।।
वर्षों बाद विशेष संयोग श्रवण मास दिन बुधवार जीवति हरियाली अमावस्या एवं गुरु का पुष्प नक्षत्र सिद्धि योग में कर्मो से उत्पन हुए दोष जैसे कि ।।।
1- कालसर्प योग
2- ग्रहण दोष
3- चांडाल दोष
4- पित्र दोष
5- विष दोष
6- रिन दोष
7-संतान दोष
8-मंगल दोष
9- नारायण नागबलि दोष
उनके निवारण हेतु अखंड ज्योत एवं शनि अभिसेक का आयोजन किया गया है ।। दिन 31 जुलाई से 5 अगस्त तक ज्योत का आयोजन किया गया है ।। ।। शनि की साढ़ेसाती एवं ढ़ैय्या निवारण हेतु ।।। आप सभी को आमंत्रित किया जाता है ।।। शनि मंदीर लोहापुल सीताबर्डी नागपुर ।।।
संपर्क - पं दिनेश शर्मा 9422111143💐🎂

दस महाविद्या✡🌺✡🌺✡ रहस्यतंत्र के क्षेत्र में सबसे प्रभावी हैं दस महाविद्या। उनके नाम हैं-काली, तारा, षोडषी, भुवनेश्वरी, भ...
25/10/2016

दस महाविद्या
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रहस्यतंत्र के क्षेत्र में सबसे प्रभावी हैं दस महाविद्या। उनके नाम हैं-काली, तारा, षोडषी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगला, मातंगी और कमला। गुण और प्रकृति के कारण इन सारी महाविद्याओं को दो कुल-कालीकुल और श्रीकुल में बांटा जाता है। साधकों का अपनी रूचि और भक्ति के अनुसार किसी एक कुल की साधना में अग्रसर हों। ब्रह्मांड की सारी शक्तियों की स्रोत यही दस महाविद्या हैं। इन्हें शक्ति भी कहा जाता है। मान्यता है कि शक्ति के बिना देवाधिदेव शिव भी शव के समान हो जाते हैं। भगवान विष्णु की शक्ति भी इन्हीं में निहित हैं। सिक्के का दूसरी पहलू यह भी है कि शक्ति की पूजा शिव के बिना अधूरी मानी जाती है। इसी तरह शक्ति के विष्णु रूप में भी दस अवतार माने गए हैं। किसी भी महाविद्या के पूजन के समय उनकी दाईं ओर शिव का पूजन ज्यादा कल्याणकारी होता है। अनुष्ठान या विशेष पूजन के समय इसे अनिवार्य मानना चाहिए।

उनका विवरण निम्न है👉

महाविद्या शिव के रूप

1👉 काली------------------- महाकाल
2👉 तारा-------------------- अक्षोभ्य
3👉 षोडषी------------------ कामेश्वर
4👉 भुवनेश्वरी--------------- त्रयम्बक
5👉 त्रिपुर भैरवी------------ दक्षिणा मूर्ति
6👉 छिन्नमस्ता------------ क्रोध भैरव
7👉 धूमावती--------------- चूंकि विधवा रूपिणी हैं, अत: शिव नहीं हैं
8👉 बगला----------------- मृत्युंजय
9👉 मातंगी---------------- मातंग
10👉कमला--------------- विष्णु रूप

दस महाविद्या से ही विष्णु के भी दस अवतार माने गए हैं। उनके विवरण भी निम्न हैं👇

महाविद्या विष्णु के अवतार

1👉 काली--------------------कृष्ण
2👉 तारा---------------------मत्स्य
3👉 षोडषी--------------------परशुराम
4👉 भुवनेश्वरी----------------वामन
5👉 त्रिपुर भैरवी--------------बलराम
6👉 छिन्नमस्ता--------------नृसिंह
7👉 धूमावती-----------------वाराह
8👉 बगला---------------------कूर्म
9👉 मातंगी--------------------राम
10👉कमला-----------------बुद्ध

विष्णु का कल्कि अवतार दुर्गा जी का माना गया है।दस महाविद्या के बारे में कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। सारी शक्ति एवं सारे ब्रह्मांड की मूल में हैं ये दस महाविद्या। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक जिन जालों में उलझा रहता है और जिस सुख तथा अंतत: मोक्ष की खोज करता है, उन सभी के मूल में यही दस महाविद्या हैं। दस का सबसे ज्यादा महत्व है। संसार में दस दिशाएं स्पष्ट हैं ही, इसी तरह 1 से 10 तक के बिना अंकों की गणना संभव नहीं है। ये दशों महाविद्याएं आदि शक्ति माता पार्वती की ही रूप मानी जाती हैं। कथा के अनुसार महादेव से संवाद के दौरान एक बार माता पार्वती अत्यंत क्रुद्ध हो गईं। क्रोध से माता का शरीर काला पडऩे लगा। यह देख विवाद टालने के लिए शिव वहां से उठ कर जाने लगे तो सामने दिव्य रूप को देखा। फिर दूसरी दिशा की ओर बढ़े तो अन्य रूप नजर आया। बारी-बारी से दसों दिशाओं में अलग-अलग दिव्य दैवीय रूप देखकर स्तंभित हो गए। तभी सहसा उन्हें पार्वती का स्मरण आया तो लगा कि कहीं यह उन्हीं की माया तो नहीं। उन्होंने माता से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि आपके समक्ष कृष्ण वर्ण में जो स्थित हैं, वह सिद्धिदात्री काली हैं। ऊपर नील वर्णा सिद्धिविद्या तारा, पश्चिम में कटे सिर को उठाए मोक्षा देने वाली श्याम वर्णा छिन्नमस्ता, वायीं तरफ भोगदात्री भुवनेश्वरी, पीछे ब्रह्मास्त्र एवं स्तंभन विद्या के साथ शत्रु का मर्दन करने वाली बगला, अग्निकोण में विधवा रूपिणी स्तंभवन विद्या वाली धूमावती, नेऋत्य कोण में सिद्धिविद्या एवं भोगदात्री दायिनी भुवनेश्वरी, वायव्य कोण में मोहिनीविद्या वाली मातंगी, ईशान कोण में सिद्धिविद्या एवं मोक्षदात्री षोडषी और सामने सिद्धिविद्या और मंगलदात्री भैरवी रूपा मैं स्वयं उपस्थित हूं। उन्होंने कहा कि इन सभी की पूजा-अर्चना करने में चतुवर्ग अर्थात- धर्म, भोग, मोक्ष और अर्थ की प्राप्ति होती है। इन्हीं की कृपा से षटकर्णों की सिद्धि तथौ अभिष्टि की प्राप्ति होती है। शिवजी के निवेदन करने पर सभी देवियां काली में समाकर एक हो गईं।

✡✡✡जय माता जी की✡✡✡

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