As kosan at matres mekar

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24/05/2022

लब्बैक या रसूल अल्लाह 🌹👑

आने वाले दिनों में यह पांच  दिन विशेष हैं 1- वर्ल्ड स्टूडेंट्स डे = 15 अक्टूबर 2- सर सैयद डे       = 17 अक्टूबर3- वर्ल्ड...
12/10/2021

आने वाले दिनों में यह पांच दिन विशेष हैं

1- वर्ल्ड स्टूडेंट्स डे = 15 अक्टूबर

2- सर सैयद डे = 17 अक्टूबर

3- वर्ल्ड उर्दू डे। = 9 नवंबर

4_ नेशनल एजूकेशन डे = 11 नवंबर

5- नेशनल बर्ड डे = 12 नवंबर

अपनी पहचान व आइडेंटिटी के लिए इन पांचों दिनों में स्कूलों व कालिजों में प्रोग्राम्स ज़रूर करें चाहे आप को इन से जुड़ी शख्सियतों से इखतेलाफ ही क्यों न हो ।

18/09/2021

जनरल ग्राज़ानी की एक चाल से उमर मुख़्तार को गिरफ़्तार कर लिया जाता है, 15 सितम्बर 1931 को हाथों में, पैरों में, गले में हथकड़ी जकड़ उमर मुख़्तार को जनरल ग्राज़ानी के सामने पेश किया गया, 73 साल के इस बूढे शेर से जनरल ग्राज़ानी ने कहा " तुम अपने लोगों को हथियार डालने कहो"

इसका जवाब उमर मुख़्तार ने बड़ी बहादुरी से दिया और कहा "हम हथियार नही डालंगे, हम जीतेंगे या मरेंगे और ये जंग जारी रहेगी.. तुम्हे हमारी अगली पीढ़ी से लड़ना होगा औऱ उसके बाद अगली से... और जहां तक मेरा सवाल है मै अपने फांसी लगाने वाले से ज़्यादा जीऊंगा ..और उमर मुख़्तार की गिरफ़्तारी से जंग नही रुकने वाली ...

जनरल ग्राज़ानी ने फिर पुछा "तुम मुझसे अपने जान की भीख क्युं नही मांगते ? शायद मै युं दे दुं..."

उमर मुख़्तार ने कहा "मैने तुमसे ज़िन्दगी की कोई भीख ऩही मांगी दुनिया वालों से ये न कह देना के तुमसे इस कमरे की तानहाई मे मैने ज़िन्दगी की भीख मांगी" इसके बाद उमर मुख़्तार उठे और ख़ामोशी के साथ कमरे से बाहर निकल गए।

इसके बाद 16 सितम्बर सन 1931 ईसवी को इटली के साम्राज्यवाद के विरुद्ध लीबिया राष्ट्र के संघर्ष के नेता उमर मुख़्तार को उनके ही लोगो के सामने फांसी दे दी गयी।

Photo :- History of Indian subcontinent

15/09/2021

अमेरिका ने ईरान में अपनी कठपुतली प्लांट की हुई थी जिसका नाम शाह रज़ा पहलवी था।

क्योंकि ईरानी जनता बहुत स्वाभिमानी होती हैं तो उस समय अमेरिका का गुलाम तो नहीं कहते थे लेकिन थे तो।

सेना से लेकर सभी विभागों में यूएस की सीधी दखलंदाजी थी और राजधानी तेहरान के बीचोबीच यूएस का सैनिक अड्डा था जहां अमिरिकी फोर्सेज़ नियुक्त रहती थी।

खुली दारू, रात्रि क्लब और वहशी संस्कृति के विरुद्घ जनता ने विद्रोह कर दिया लेकिन गांधीजी के रास्ते पर।

तत्कालीन गुप्तचर एजेंसी सावाक के एजेंट और सेना तथा पुलिस लगभग प्रत्येक व्यक्ति के पीछे लगा दी गई।

महिलाओं ने अपने गोद के बच्चों को लिया और सैनिकों की बंदूकों पर फूल अर्पित करने शुरू कर दिए।

अंतिम चरण में सेना एवम पुलिस ने आदेश मानने से इंकार कर दिया और "शाह" अपने परिवार सहित अमेरिका भाग गया जहां बाद में कैंसर से सड़ सड़ कर मरा।

कोई भी तानाशाह कितना भी क्रूर हो अंत में जनमत के सामने झुकना ही पड़ता है और उसका अंत कभी सुखद नही होता।

इतिहास गवाह हैं।।

Tohid Raees shaha

09/09/2021

मायूसी कुफ्र है और मायूस लोग कैंसर के सामान है जो धीरे-धीरे आपका मनोबल खा जाते है. जो लोग ये कहते है कि मुसलमान इसलिए आज पिछड़ा हुआ है क्योंकि वो हिंदुस्तान पर मुस्लिम हुक्मरानों द्वारा किये गए 800 सालों के शासन पर गर्व करता है और कोई काम नहीं करता दरअसल ऐसे लोग हमारे दरम्यान सबसे ज्यादा मायूसी और इंतेशार फैलाते है. क्यों ना करे गर्व हम अपने गौरवशाली इतिहास पर ? क्यों ना करें हम गर्व हम उन हुक्मरानों पर जिनके लिए इंसाफ सबसे अहम था, जिन्होंने तमाम रियासतों को इकठ्ठा कर के अखंड भारत का निर्माण किया. हिन्दकुश की पहाड़ियों से लेकर सुदूर पूर्वोत्तर की पहाड़ियों तक अपना परचम फैलाया. हिमालय से लेकर मालाबार के पठारों तक ज़ुल्म का खात्मा किया. मुफ्त तालीम, मुफ्त चिकित्सा, सिंचाई, सड़क, न्याय, ज़िला, तहसीलदारी, मालगुज़ारी, बंदरगाह, आयात-निर्यात, एक मुद्रा का निज़ाम क़ायम किया. विस्तार से लिखा जाना यहां सम्भव नहीं है.
आजादी के 75 साल बाद भारतीय मुसलमानों के पास उम्मीद के सिवा बचा क्या है ? उम्मीद ये कि वो दिन जरूर आएगा जब हमारे साथ इंसाफ होगा. समाज में पहचान की बुनियाद पर होने वाला भेद-भाव खत्म होगा. हमें हमारा हक़ मिलेगा क्योंकि हमारे पुरखों ने 800 सालों तक बिना भेद-भाव के लोगों के दिलों पर राज़ किया था. ज़ालिम चाहे किसी भी धर्म के हो उनको खौफ़नाक सज़ा मिलती थी. साशन में गैर मुस्लिम ऊंचे पदों पर विराजमान थे. इसको नज़ीर बना कर अगर हम अपना सीना गर्व से चौड़ा करते है तो तुम बैलेंसवादी लोगों को क्या तकलीफ है ? हम लोग मज़लूमो के साथ इंसाफ के हिमायती है. मक़ाम और ओहदे दुनिया मे रह जाते है.
आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक शासन ब्यवस्था की जिम्मेदारी थी कि वो हर तबके के साथ न्याय करता लेकिन सवर्ण मानसिकता की देन है कि आज तालीम और तिज़ारत में मुसलमानों को उतना हिस्सा नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे. इसके बावजूद अपनी मेहनत और काबिलियत से अपनी अलग पहचान बनाई है. कारीगरी, दस्तकारी, मज़दूरी, सिलाई, बुनाई, कढ़ाई जैसे लघु एवं कुटीर उद्योगों में महारत हासिल किया है. मायूसी फैलाने वाले प्रोपेगैंडा बाजों से आप लोग दूर रहिए. इनका काम सिस्टम को जस्टिफाई करना और देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के साथ होने वाले पक्षपात के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराना है.

अब कहाँ ढूंढने जाओगे हमारे कातिल
आप तो क़त्ल का इल्ज़ाम हमी पर रख दो

28/04/2021

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