16/05/2023
मेरा पैतृक गांव किशनासर है। किशनासर नाम पड़ा किशनदास राजपुरोहित के नाम के एक व्यक्ति के नाम पर। वो युद्ध में बलिदान हुए थे। बीकानेर नरेश ने उनके सम्मान में उनके पुत्र को एक गांव की जागीरी दी। पुत्र ने पिता के नाम पर अपने गांव का नाम रख दिया। वो मेरे पुरखे थे। मुझे उन पर गर्व है। इसलिए नहीं कि लड़ाकू थे। अपितु, इसलिए कि शौर्य-वीर्य को आस्तीन पर पहनकर चलते हुए भी मांस नहीं खाया। मुझे गर्व है कि मेरे पुरखे शाकाहार के सबसे अद्भुत ब्रांड एम्बेसडर हैं। उन्होंने शीश कटाए, सेनाएं संभाली, युद्ध लड़े, प्राण तजे, पर निरामिष रहे। अपने बल को शत्रु पर दिखाया, पशुओं पर नहीं।
पशु की जगह अपना रक्त देवी को समर्पित करने वाले जिस बाहुबली को लोगों ने सिनेमा में देखा है। मेरे पुरखों ने वही करुण, किंतु तेजस्वी जीवन सदियों तक जीया है।
तिंवरी के प्रताप हमारे ही पुरखे थे, जो गिरी सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी की सेना के काल बने। इसी युद्ध के बाद राव मालदेव ने उन्हें "सिंह" कहा। राजपूतों ने अपना विशेषाधिकार एक अन्य समुदाय के साथ साझा किया। उस समुदाय के लोग अब सिंह कहलाने लगे थे। ऐसे विचित्र सिंह जो पशुओं को अपने से हीन नहीं समझते। जो शाकाहारी थे, लेकिन, जिनके नाम से अरिदल भयाक्रांत रहते।
मेरे गांव के बारे में एक किंवदंती है। बीकानेर राज्य के राजकुमार आखेट से आते हुए गांव में ठहरे। मांस पकाने के लिए एक ठीकरा मांगा तो पूरे गांव ने मना कर दिया। कुंवर ने अभिमान में जूनागढ़ दरबार तक घोड़े दौड़ाए, लेकिन स्वयं बीकानेर धणी भी कुंवर के पक्ष में ना खड़े हो सके। यह साहस नैतिक बल के बूते आया था। मुझे उनसे परंपरा में तेज, बल और साहस की शिक्षाएं मिली, लेकिन, मांसाहार को त्याज्य समझने का संस्कार भी। यह अद्भुत विशेषता है, जो इस समुदाय को देश की अन्य लड़ाकू क़ौम से अलग करती है।
इसी समुदाय के विक्रमसि ने राव बीका के साथ बीकानेर की नींव रखी, गांव-गांव में जुंझार दिए, राजपूतों को विश्वस्त सेनापति दिए, जोधपुर को केशरीसिंह जैसा शूरवीर दिया, राठौड़ों के साथ मालवा तक गए... लेकिन, आहार की शुद्धता रखी। शत्रु के शीश उतारे पर पशु नहीं मारे। इन्हें राजपूत राजाओं ने दोहरी ताजिमी का हक़ दि