Astrologer Mohit Kumar Kakkar

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MOHIT KUMAR KAKKAR is an expert and practitioner of Astrology,Prashna Kundli,Kundli Milan, Palmist, Vaastu, Numerology, Flying stars, Reiki Healing. Apart from these I also offers consultation on Gemology and Rudraksh & in Fang-shui,Pyramids. ALSO GIVES TIPS ON SHARE MARKET[NIFTY]....WITH 80%ACCURACY

धार्मिक कार्यों से पहले शंख क्यों बजाया जाता है?1. हिंदू धर्म की महत्वपूर्ण विशेषता है शंख ध्वनिकिसी भी धार्मिक कार्यों ...
26/05/2020

धार्मिक कार्यों से पहले शंख क्यों बजाया जाता है?

1. हिंदू धर्म की महत्वपूर्ण विशेषता है शंख ध्वनि
किसी भी धार्मिक कार्यों के दौरान शंख बजाना हिंदू धर्म की एक बड़ी और महत्वपूर्ण विशेषता है। शताब्दियों से प्रचलित इस धार्मिक विधि को हर पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक रीति-रिवाजों के दौरान निश्चित रूप से अपनाया जाता है।

2. क्या आप जानते हैं कि शंख कब और कितनी बार बजाया जाता है?
तीन बार की जाती है शंख ध्वनि
पूजा आरंभ करने के पूर्व तीन बार शंख बजाने से वातावरण से सभी प्रकार की अशुद्धियां दूर होती हैं तथा नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है। शंख ध्वनि से देवता आकर्षित होते हैं तथा मन को भी शांति मिलती है। शंख ध्वनि मस्तिष्क में सत्व तत्व के उदय में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त शंख ध्वनि से पूजा की विविध वस्तुओं में चैतन्यता जाग्रत होती है ताकि पूजा सार्थक हो सके।

3. आरती के दौरान भी शंख बजाने का नियम :
कोई भी पूजा आरती के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती तथा आरती के अंत में भी शंख ध्वनि आवश्यक है। पूजा स्थल पर विविध देवी-देवताओं या प्राकृतिक शक्तियों की ऊर्जा का प्रवाह निर्बाध रूप से हो सके इसीलिए पूजा के अंत में भी आरती के दौरान शंख बजाने का नियम है।

4. शंख ग्रीवा (गर्दन) ऊपर कर ही क्यों बजाते हैं?

शंख बजाते समय व्यक्ति की ग्रीवा (गर्दन) ऊपर की ओर(भगवान के सामने) होनी चाहिए साथ ही उसे पूर्ण रूप से ध्यानमग्न अवस्था में स्थित हो जाना चाहिए। इस दौरान व्यक्ति के नेत्र मुंदे (बंद) होने चाहिए तथा उसकी भावना पूर्ण-रूपेण ईश्वर भक्ति में निमग्न होनी चाहिए।

5. शंख ध्वनि सुषुम्ना नाड़ी को जाग्रत करती है:
शंख बजाने वाले व्यक्ति की ऐसी अवस्था उसकी सुषुम्ना नाड़ी को जाग्रत कर देती है। यह व्यक्ति के भीतर मौजूद अग्नि व वायु तत्वों को संतुलित कर उसकी सत् अवस्था को प्रधानता प्रदान करती है। इस प्रकार शंख ध्वनि के कारण देवों के रक्षक व विनाशक गुणों का आवश्यकतानुसार जागरण होता है।

6. शंख ध्वनि के दौरान नेत्र क्यों बंद रखते हैं?
इस दौरान नेत्र मूंदने से ईश्वर की शक्ति का अप्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है। इसीलिए पूजा के दौरान उपस्थित सभी श्रद्धालु स्वतः अपनी आंखें बंद कर लेते हैं।

7. कैसे बजाएं शंख?
शंख बजाते के लिए श्वास की गति पूर्ण नियंत्रण में होनी चाहिए। जहां तक हो सके गहराई से सांस लेकर फेफड़े को पूरी तरह भर लीजिए तथा बिना सांस के व्यतिक्रम के शंख ध्वनि पैदा कीजिए तभी यह फलदायक होगी। इस प्रकार से पैदा की गई शंख ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा का विनाश कर व्यक्ति को शाश्वत ऊर्जा की ओर अभिमुख करने में सक्षम होती है।

8. शंख ध्वनि की तीव्रता धीरे-धीरे बढाएं:
शंख बजाते समय इसे बेहद कम तीव्रता से आरंभ करना सही होता है। इसे धीरे-धीरे क्रमागत रूप से प्रखर ध्वनि में तब्दील करना चाहिए ताकि शुरू से आखिर तक व्यक्ति की ऊर्जा का क्रम निश्चित रहे।

9. शंख ध्वनि के दौरान नकारात्मक ऊर्जा का होता है प्रत्यक्षीकरण
शंख ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा के बीच “हलचल” जन्म लेती है। इससे रज-तम तत्वों के बीच द्वंद पैदा होने लगता है तथा नकारात्मक ऊर्जा का विनाश आरंभ हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसी कारण नकारात्मक ऊर्जा शंख ध्वनि को सहन नहीं कर पाती और जल कर नष्ट हो जाती है। तथापि कुछ बेहद शक्तिशाली नकारात्मक शक्तियां फिर भी बची रह जाती हैं जिससे मनुष्य को यही प्रक्रिया बार-बार दुहरानी पड़ती है।

पूजा करते समय इन बातों का  ध्यान रखेंगे तो बहुत जल्दी शुभ फलों की प्राप्ति होगी :सुख और समृद्धि के लिए देवी-देवताओं के प...
24/05/2020

पूजा करते समय इन बातों का ध्यान रखेंगे तो बहुत जल्दी शुभ फलों की प्राप्ति होगी :

सुख और समृद्धि के लिए देवी-देवताओं के पूजा किये जाने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। आज भी लोग इस परंपरा को निभाते हैं। पूजा करने से हमारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, लेकिन पूजा करते समय कुछ खास नियमों का पालन भी किया जाना चाहिए। अन्यथा पूजा के शुभ फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो पाते है। यहां कुछ ऐसे नियम बताए जा रहे हैं जो सामान्य पूजन में भी ध्यान रखने चाहिए। इन बातों का ध्यान रखने से बहुत ही जल्दी शुभ प्राप्त हो जाते हैं।

ये नियम इस प्रकार हैं...

1. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं। इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी जी की कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है।

2. शिवजी, गणेशजी और भैरवजी को तुलसी नहीं चढ़ानी चाहिए।

3. मां दुर्गा को दूर्वा (एक प्रकार की घास) नहीं चढ़ानी चाहिए। यह गणेशजी को विशेष रूप से अर्पित की जाती है।

4. सूर्य देव को शंख के जल से अर्क नही देनी चाहिए।

5. तुलसी का पत्ता बिना स्नान किए नहीं तोडऩा चाहिए। शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बिना स्नान किये ही तुलसी के पत्तों को तोड़ता है तो पूजा में ऐसे पत्ते भगवान द्वारा स्वीकार नहीं किए जाते हैं।

6. शास्त्रों के अनुसार देवी-देवताओं की पूजा दिन में पांच बार करना चाहिए। सुबह 5 से 6 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त में पूजन और आरती होनी चाहिए। इसके बाद प्रात: 9 से 10 बजे तक दूसरी बार की पूजा। दोपहर में तीसरी बार पूजा करनी चाहिए। इस पूजन के बाद भगवान को शयन करवाना चाहिए। शाम के समय चार-पांच बजे पुन: पूजा और आरती। रात को 8-9 बजे शयन आरती करनी चाहिए। जिन घरों में नियमित रूप से पांच बार पूजा की जाती है। वहां सभी देवी-देवताओं का वास होता है और ऐसे घरों में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।

7. प्लास्टिक की बोतल में या किसी अपवित्र धातु के बर्तन में गंगाजल नहीं रखना चाहिए। अपवित्र धातु जैसे एल्युमिनियम और लोहे से बने बर्तन। गंगाजल तांबे के बर्तन में रखना शुभ रहता है।

8. स्त्रियों को और अपवित्र अवस्था में पुरुषों को शंख नहीं बजाना चाहिए। यह इस नियम का पालन नहीं किया जाता है तो जहां शंख बजाया जाता है, वहां से देवी लक्ष्मी चली जाती हैं।

9. मंदिर और देवी-देवताओं की मूर्ति के सामने कभी भी पीठ दिखाकर नहीं बैठना चाहिए।

10. केतकी का फूल शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए।

11. किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए। दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोडऩे का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोडऩे पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी।

12. दूर्वा (एक प्रकार की घास) रविवार को नहीं तोडऩी चाहिए।

13. मां लक्ष्मी को विशेष रूप से कमल का फूल अर्पित किया जाता है। इस फूल को पांच दिनों तक जल छिड़क कर पुन: चढ़ा सकते हैं।

14. शास्त्रों के अनुसार शिवजी को प्रिय बिल्व पत्र छह माह तक बासी नहीं माने जाते हैं। अत: इन्हें जल छिड़क कर पुन: शिवलिंग पर अर्पित किया जा सकता है।

15. तुलसी के पत्तों को 11 दिनों तक बासी नहीं माना जाता है। इसकी पत्तियों पर हर रोज जल छिड़कर पुन: भगवान को अर्पित किया जा सकता है।

16. आमतौर पर फूलों को हाथों में रखकर हाथों से भगवान को अर्पित किया जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए। फूल चढ़ाने के लिए फूलों को किसी पवित्र पात्र में रखना चाहिए और इसी पात्र में से लेकर देवी-देवताओं को अर्पित करना चाहिए।

17. तांबे के बर्तन में चंदन, घिसा हुआ चंदन या चंदन का पानी नहीं रखना चाहिए।

18. हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि कभी भी दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति दीपक से दीपक जलते हैं, वे रोगी होते हैं।

19. बुधवार और रविवार को पीपल के वृक्ष में जल अर्पित नहीं करना चाहिए।

20. पूजा हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख रखकर करनी चाहिए। यदि संभव हो सके तो सुबह 6 से 8 बजे के बीच में पूजा अवश्य करें।

21. पूजा करते समय आसन के लिए ध्यान रखें कि बैठने का आसन ऊनी होगा तो श्रेष्ठ रहेगा।

22. घर के मंदिर में सुबह एवं शाम को दीपक अवश्य जलाएं। एक दीपक घी का और एक दीपक तेल का जलाना चाहिए।

23. पूजन-कर्म और आरती पूर्ण होने के बाद उसी स्थान पर खड़े होकर 3 परिक्रमाएं अवश्य करनी चाहिए।

24. रविवार, एकादशी, द्वादशी, संक्रांति तथा संध्या काल में तुलसी के पत्ते नहीं तोडऩा चाहिए।

25. भगवान की आरती करते समय ध्यान रखें कि भगवान के चरणों की चार बार आरती करें, नाभि की दो बार और मुख की एक या तीन बार आरती करें। इस प्रकार भगवान के समस्त अंगों की कम से कम सात बार आरती करनी चाहिए।

26. पूजाघर में मूर्तियाँ 1 ,3 , 5 , 7 , 9 ,11 इंच तक की होनी चाहिए, इससे बड़ी नहीं तथा खड़े हुए गणेश जी,सरस्वतीजी, लक्ष्मीजी, की मूर्तियाँ घर में नहीं होनी चाहिए।

27. गणेश या देवी की प्रतिमाए तीन तीन, शिवलिंग दो, शालिग्राम दो, सूर्य प्रतिमा दो,गोमती चक्र दो की संख्या में कदापि न रखें। घर मे बीच बीच में हवन अवश्य कराएं इससे वातावरण शुदध होता है ।

28. अपने मंदिर में सिर्फ प्रतिष्ठित मूर्ति ही रखें उपहार,काँच, लकड़ी एवं फायबर की मूर्तियां न रखें एवं खण्डित, जलीकटी फोटो और टूटा काँच तुरंत हटा दें। शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित मानी गई है। जो भी मूर्ति खंडित हो जाती है, उसे पूजा के स्थल से हटा देना चाहिए और किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। खंडित मूर्तियों की पूजा अशुभ मानी गई है। इस संबंध में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि सिर्फ शिवलिंग कभी भी, किसी भी अवस्था में खंडित नहीं माना जाता है।

29. मंदिर के ऊपर भगवान के वस्त्र, पुस्तकें एवं आभूषण आदि भी न रखें मंदिर में पर्दा अति आवश्यक है अपने पूज्य माता --पिता तथा पित्रों का फोटो मंदिर में कदापि न रखें,उन्हें घर के नैऋत्य कोण में स्थापित करें।

30. विष्णु की चार, गणेश की तीन,सूर्य की सात, दुर्गा की एक एवं शिव की आधी परिक्रमा कर सकते हैं।

घर में शंख रखने और बजाने के ये हैं 11 फायदे...पूजा-पाठ में शंख बजाना युगों-युगों से चला आ रहा है। लोग शंख को पूजाघर में ...
18/05/2020

घर में शंख रखने और बजाने के ये हैं 11 फायदे...

पूजा-पाठ में शंख बजाना युगों-युगों से चला आ रहा है। लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियम‍ित रूप से बजाते हैं। ऐसे में यह उत्सुकता एकदम स्वाभाविक है कि शंख केवल पूजा-अर्चना में ही उपयोग किया जाता है या इसके कुछ लाभ भी हैं।

घर में शंख रखने और बजाने के ये हैं 11 फायदे...पवित्र माना जाता है शंख

सनातन धर्म की कई ऐसी बातें हैं, जो न केवल आध्यात्मिक रूप से, बल्कि कई दूसरी तरह से भी लाभदायक हैं। शंख रखने और बजाने व इसके जल का उचित इस्तेमाल करने से कई तरह के लाभदायक हैं। कई फायदे तो सीधे तौर पर सेहत से जुड़े हैं। पूजा में शंख बजाने और इसके क्या-क्या फायदे होते हैं।

1. ऐसी मान्यता है कि जिस घर में शंख होता है, वहां लक्ष्मी का वास होता है। धार्मिक ग्रंथों में शंख को लक्ष्मी का भाई बताया गया है, क्योंकि लक्ष्मी की तरह शंख भी सागर से ही उत्पन्न हुआ था। शंख समुद्र मंथन से उत्पन्न चौदह रत्नों में से है।

2. शंख को इसलिए भी शुभ माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में इसे धारण करते हैं।

3. पूजा-पाठ के समय शंख बजाने से वातावरण शुद्ध होता है। जहां तक इसकी आवाज जाती है। इसे सुनकर लोगों के मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं।

4. शंख के जल से श‍िव, लक्ष्मी आदि का अभि‍षेक करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है।

‍5. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छ‍िड़कने से वातावरण शुद्ध होता है।

6. शंख की आवाज लोगों को पूजा-अर्चना की ओर अकर्षित करती है। ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से कामनाएं पूरी होती हैं। इससे दुष्ट आत्माओं का नाश होता हैं।

7. वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है। कई टेस्ट से इस तरह के नतीजे मिले हैं।

8. आयुर्वेद के मुताबिक, शंखोदक के भस्म के उपयोग से पेट की बीमारियां, पथरी, पीलिया आदि कई तरह की बीमारियां दूर होती हैं। इसका उपयोग एक्सपर्ट वैद्य की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

9. शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है। पुराणों के वर्णन है कि अगर श्वास का रोगी नियमि‍त तौर पर शंख बजाए, तो वह बीमारी से मुक्त हो सकते है।

10. शंख में रखे पानी का सेवन करने से हड्डियां बलिष्ठ होती हैं।यह दांतों के लिए भी लाभदायक है। शंख में कैल्श‍ियम, फास्फोरस व गंधक के गुण होते हैं। अतः यह फायदेमंद है।

11. वास्तुशास्त्र के मुताबिक भी शंख में ऐसे कई गुण होते हैं, जिससे घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है। शंख की आवाज से 'सोई हुई भूमि' जाग्रत होकर शुभ फल देती है।

सूचना : वास्‍तु शास्‍त्र के अनुसार अगर किसी को प्रसिद्धी पानी हो तो उसे शंख को दक्षिण दिशा में रखना चाहिए। लेकिन ध्‍यान रखें कि इसे घर में कहीं भी नहीं रखना चाहिए। बल्कि उसे लिविंग रूम में दक्षिण दिशा में रखें। ऐसा करने से जातक को हर जगह नेम-फेम मिलेगा।

लोहड़ी:लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था। यह शब्द तिल तथा रोड़ी (गुड़ की रोड़ी) शब्दों के मेल से बना है, जो समय के साथ बदल ...
13/01/2020

लोहड़ी:

लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था। यह शब्द तिल तथा रोड़ी (गुड़ की रोड़ी) शब्दों के मेल से बना है, जो समय के साथ बदल कर लोहड़ी के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

लोहड़ी के त्यौहार क्यों मनाया जाता है, इतिहास:

लोहड़ी पंजाब और हरियाणा में बहुत उल्लास से मनाया जाता हैं। देश के उत्तर भाग में ज्यादा मनाया जाता हैं। पुरे देश में भिन्न-भिन्न मान्यताओं के साथ इस दिन त्यौहार का आनंद लिया जाता हैं।
लोहड़ी पौष माह की अंतिम रात को एवम मकर संक्राति की सुबह तक मनाया जाता हैं। यह प्रति वर्ष मनाया जाता हैं।
लोहड़ी पंजाबी बड़े जोरो शोरो से मनाते हैं। यह समय देश के हर हिस्से में अलग- अलग नाम से त्यौहार मनाये जाते हैं जैसे मध्य भारत में मकर संक्रांति, दक्षिण भारत में पोंगल का त्यौहार ।

सामान्तः त्यौहार प्रकृति में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता हैं, इस दिन वर्ष की सबसे लम्बी अंतिम रात होती हैं इसके अगले दिन से धीरे-धीरे दिन बढ़ने लगता है, राते छोटी होती जाती हैं ।साथ ही इस समय किसानों के लिए भी उल्लास का समय माना जाता हैं। खेतों में अनाज लहलहाने लगती हैं ।
पुराणों के आधार पर सती के त्याग के रूप में प्रतिवर्ष याद करके मनाया जाता हैं। कथानुसार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती के पति महादेव शिव का तिरस्कार किया था और उन्हें यज्ञ में शामिल ना करने से उनकी पुत्री सती ने अपने आपको को अग्नि में समर्पित कर दिया था।
लोहड़ी के पीछे एक एतिहासिक कथा एक यह भी हैं कि जिसे दुल्ला भट्टी के नाम से जाना जाता हैं। यह कथा अकबर के शासनकाल की हैं उन दिनों दुल्ला भट्टी पंजाब प्रान्त का सरदार था। इसे पंजाब का नायक कहा जाता था। उन दिनों संदलबार नामक एक जगह थी। जो अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं। वहाँ लड़कियों की बाजारी होती थी। तब दुल्ला भट्टी ने इस का विरोध किया और लड़कियों को सम्मानपूर्वक इस दुष्कर्म से बचाया और उनकी शादी करवाकर उन्हें सम्मानित जीवन दिया। इस विजय के दिन को लोहड़ी के गीतों में गाया जाता हैं और दुल्ला भट्टी को याद किया जाता हैं।
इन्ही पौराणिक एवम एतिहासिक कारणों के चलते पंजाब प्रान्त में लोहड़ी का उत्सव उल्लास के साथ मनाया जाता हैं।
कैसे मनाया जाता हैं लोहड़ी का पर्व ।
पंजाबियों के विशेष त्यौहार हैं, लोहड़ी जिसे वे धूमधाम से मनाते हैं। नाच, गाना और ढोल तो पंजाबियों की शान होते हैं और इसके बिना इनके त्यौहार अधूरे हैं।

लोहड़ी से कुछ दिनों पहले लोहडी के गीत गाना शुरू कर दिए जाते हैं, जिन्हें घर-घर जाकर गया जाता हैं। इन गीतों में वीर शहीदों को याद किया जाता हैं जिनमे दुल्ला भट्टी के नाम विशेष रूप से लिया जाता हैं।

लोहड़ी में रबी की फसले कट कर घरों में आती हैं और उसका जश्न मनाया जाता हैं। किसानों का जीवन इन्ही फसलो के उत्पादन पर निर्भर करता हैं और जब किसी मौसम के फसले घरों में आती हैं हर्षोल्लास से उत्सव मनाया जाता हैं। लोहड़ी में खासतौर पर इन दिनों गन्ने की फसल बोई जाती हैं और पुरानी फसले काटी जाती हैं। इन दिनों मुली की फसल भी आती हैं और खेतो में सरसों भी आती हैं। यह ठण्ड की बिदाई का त्यौहार माना जाता हैं।
लोहड़ी में गजक, रेवड़ी, मुंगफली आदि खाई जाती हैं। इस दिन विशेषरूप से सरसों का साग और मक्का की रोटी बनाई एवं खाई जाती हैं ।

लोहड़ी बहन बेटियों का त्यौहार हैं ।
इस दिन बड़े प्रेम से घर से बिदा हुई बहन और बेटियों को घर बुलाया जाता हैं और उनका आदर सत्कार किया जाता हैं। पुराणिक कथा के अनुसार इसे दक्ष की गलती के प्रराश्चित के तौर पर मनाया जाता हैं और बहन बेटियों का सत्कार कर गलती की क्षमा मांगी जाती हैं।इस दिन नव विवाहित जोड़े को भी पहली लोहड़ी की बधाई दी जाती हैं और शिशु के जन्म पर भी पहली लोहड़ी के तोहफे दिए जाते हैं।

लोहड़ी के कई दिनों पहले से कई प्रकार की लकड़ियाँ इक्कट्ठी की जाती हैं। जिन्हें नगर के बीच के एक अच्छे स्थान पर जहाँ सभी एकत्र हो सके वहाँ सही तरह से जमाई जाती हैं और लोहडी की रात को सभी अपनों के साथ मिलकर इस अलाव के आस पास बैठते हैं। कई गीत गाते हैं, एक दुसरे को गले लगाते हैं और लोहड़ी की बधाई देते हैं। इस लकड़ी के ढेर पर अग्नि देकर इसके चारों तरफ परिक्रमा करते हैं और अपने लिए और अपनों के लिये दुआए मांगते हैं। विवाहित लोग अपने साथी के साथ परिक्रमा लगाते हैं. इस अलाव के चारों तरफ बैठ कर रेवड़ी, गन्ने, गजक आदि खाये जाते हैं।

लोहड़ी का आधुनिक रूप :
आज भी लोहड़ी की धूम वैसी ही होती हैं बस आज जश्न ने पार्टी का रूप ले लिया हैं। और गले मिलने के बजाय लोग मोबाइल और इन्टरनेट के जरिये एक दुसरे को बधाई देते हैं। बधाई सन्देश भी व्हाट्स एप और इ-मेल किये जाते हैं।
लोहड़ी के त्यौहार को इस तरह पुरे उत्साह से मनाया जाता हैं। देश के लोग विदेशों में भी बसे हुए हैं जिनमे पंजाबी ज्यादातर विदेशों में रहते हैं इसलिये लोहड़ी विदेशों में भी मनाई जाती हैं। खासतौर पर कनाडा में लोहड़ी का रंग बहुत सजता हैं।

आप सभी को लोहडीके पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ।

प्रेषक: मोहित कक्कङ।

आप हिन्दू हैं तो एक बार जरूर पढियेगा :-जब मैं किसी मुस्लिम परिवार के पांच साल के बच्चे को भी बाक़ायदा नमाज़ पढ़ते देखता हूँ...
12/01/2020

आप हिन्दू हैं तो एक बार जरूर पढियेगा :-
जब मैं किसी मुस्लिम परिवार के पांच साल के बच्चे को भी बाक़ायदा नमाज़ पढ़ते देखता हूँ, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मुस्लिम परिवारों की ये अच्छी चीज़ है कि वो अपना धर्म और अपने संस्कार अपनी अगली पीढ़ी में ज़रूर देते हैं। कुछ पुचकारकर तो कुछ डराकर, लेकिन उनकी नींव में अपने मूलभूत संस्कार गहरे समाय होते हैं।

यही ख़ूबसूरती सिखों में भी हैं। एक बार बचपन में मैंने एक सरदार का जूड़ा पकड़ लिया था। उसने मुझे उसी वक़्त तेज़ आवाज़ में न सिर्फ समझाया ही नहीं, धमकाया भी था। तब बुरा लगा था, लेकिन आज याद करता हूँ तो अच्छा लगता है।

हिन्दू धर्म चाहें कितना ही अपने पुराने होने का दावा कर ले, पर इसका प्रभाव अब सिर्फ उपनाम (सरनेम) तक सीमित होता जा रहा है। मैं अक्सर देखता हूँ कि मज़ाक में लोग किसी ब्राह्मण की चुटिया खींच देते हैं। वो हँस देता है।

एक माँ आरती कर रही होती है, उसका बेटा जल्दी में प्रसाद छोड़ जाता है। लड़का कूल-डूड है, उसे इतना ज्ञान है कि प्रसाद गैरज़रूरी है।

बेटी इसलिए प्रसाद नहीं खाती क्योंकि उसमें कैलोरीज़ ज़्यादा हैं, उसे अपनी फिगर की चिंता है।

छत पर खड़े अंकल जब सूर्य को जल चढ़ाते हैं, तो लडके हँसते हैं।

दो वक़्त पूजा करने वाले को हम सहज ही मान लेते हैं कि साला दो नंबर का पैसा कमाता होगा, इसीलिए इतना अंधविश्वास करता है। 'राम-राम जपना, पराया माल अपना' ये तो फिल्मों में भी सुना है।

इसपर माँ टालती हैं 'अरे आज की जेनरेशन है जी, क्या कह सकते हैं, मॉडर्न बन रहे हैं।'

पिताजी खीज के बोलते हैं 'ये तो हैं ही ऐसे, इनके मुँह कौन लगे'।

नतीजतन बच्चों का पूजा के वक़्त हाज़िर होना मात्र दीपावली तक सीमित रह जाता है।

यही बच्चे जब अपने हमउम्रों को हर शनिवार गुरुद्वारे में मत्था टेकते या हर शुक्रवार विधिवत नमाज़ पढ़ते या हर सन्डे चर्च में मोमबत्ती जलाते देखते हैं तो बहुत फेसिनेट होते हैं। सोचते हैं ये है असली गॉड, मम्मी तो यूंही थाली घुमाती रहती थी। अब क्योंकि धर्म बदलना तो पॉसिबल नहीं, इसलिए मन ही मन खुद को नास्तिक मान लेते हैं।

शायद हिन्दू अच्छे से धर्म का प्रचार नहीं कर पाए। शायद उन्हें कभी ज़रूरत नहीं महसूस हुई या शायद आपसी वर्णों की मारामारी में रीतिरिवाज और पूजा पाठ 'झेलना' सौदा बन गया ।

वर्ना...

सूरज को जल चढ़ाना सुबह जल्दी उठने की वजह ले आता है। सुबह पूजा करना नहाने का बहाना बन जाता है और मंदिर घर में रखा हो तो घर साफ सुथरा रखने का कारण बना रहता है। घण्टी बजने से जो ध्वनि होती है वो मन शांत करने में मदद करती है तो आरती गाने से आत्मविश्वास (कॉन्फिडेंस लेवल) बढ़ता है। हनुमान चालीसा तो डर को भगाने और शक्ती संचार करने के लिए सर्वोत्तम है। आदि....

सुबह टीका लगा लो तो ललाट चमक उठता है। प्रसाद में मीठा खाना तो शुभ होता है भई, टीवी में एड नहीं देखते?

संस्कार घर से शुरु होते हैं। जब घर के बड़े ही आपको अपने संस्कारों के बारे में नहीं समझाते तो आप इधर-उधर भटकते ही हैं जो की बुरा नहीं, भटकना भी ज़रूरी है। लेकिन इस भटकन में जब आपको कोई कुछ ग़लत समझा जाता हैं तो आप भूल जाते हो कि आप उस शिवलिंग का मज़ाक बना रहे हो जिसपर आपकी माता-पिता हर सोमवार जल चढ़ाती है।

लेकिन मैं किसी को बदल नहीं सकता। मैं किसी के ऊपर कुछ थोपना नहीं चाहता हूँ।

मैं गुरुद्वारे भी जाता हूँ। चर्च भी गया हूँ। कभी किसी धर्म का मज़ाक नहीं उड़ाया है, हर धर्म के रीतिरिवाज़ पर मैं तार्किक बहस कर सकता हूँ, लेकिन किसी को भी इतनी छूट नहीं देता हूँ कि मेरे सामने धर्म एवं रीति रिवाजों का मज़ाक बनाये।

मेरे लिए तो हिन्दू होना गर्व की बात हैं और गर्व है मुझे की हिन्दू धर्म दुनिया का सबसे पुराना धर्म हैं। सिर्फ हिन्दू धर्म मे ही किसी भी प्रकार की विवशता नही हैं। चाहें जिसकी आराधना करें लेकिन मूर्तियों का सम्मान करें।

बाकी आपकी राय आमंत्रित है।

🙏🏻🌹।यत्र धर्मस्य ततो जयः।🌹🙏🏻

26/10/2019

छोटी दीपावली: नरक चतुर्दशी

नरक चतुर्दशी (Narak Chaturdashi) 2019: दीवाली के दिन ही पड़ रही है नरक चतुर्दशी, जानिए स्‍नान का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

नरक चतुर्दशी (Narak Chaturdashi) कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। वैसे तो नरक चतुर्दशी धनतेरस (Dhanteras) के अगले दिन मनाई जाता है, लेकिन पंचांग के अनुसार इस बार यह दिपावली (Deepawali) की ही सुबह पड़ रही है।

खास बातें

नरक चतुर्दशी के दिन यम पूजा का विशेष महत्‍व है।

इस दिन सुबह तड़के उठकर अभ्‍यंग स्‍नान किया जाता है।

मान्‍यता है क‍ि इस दिन यम की विशेष कृपा मिलती है।

छोटी दीपावली: धनतेरस (Dhanteras) के अगले दिन और दीपावली (Deepawali) से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी (Narak Chaturdashi) मनाई जाती है। इसे यम चतुर्दशी (Yam Chaturdashi) और रूप चतुर्दशी (Roop Chaturdashi) या रूप चौदस भी कहते हैं। यह पर्व नरक चौदस (Narak Chaudas) और नरक पूजा के नाम से भी प्रसिद्ध है। आमतौर पर लोग इस पर्व को छोटी दीपावली (Chhoti Deepawali) भी कहते हैं. इस दिन यमराज की पूजा करने और व्रत रखने का व‍िधान है। ऐसी मान्‍यता है, कि इस दिन जो व्‍यक्ति सूर्योदय से पूर्व अभ्‍यंग स्‍नान यानी तिल का तेल लगाकर अपामार्ग (एक प्रकार का पौधा) यानी कि चिचिंटा या लट जीरा की पत्तियां जल में डालकर स्नान करता है। उसे यमराज की व‍िशेष कृपा म‍िलती है। नरक जाने से मुक्ति म‍िलती है और सारे पाप नष्‍ट हो जाते हैं। स्‍नान के बाद सुबह-सवेरे राधा-कृष्‍ण के मंदिर में जाकर दर्शन करने से पापों का नाश होता है और रूप-सौन्‍दर्य की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि महाबली हनुमान का जन्म इसी दिन हुआ था इसीलिए बजरंगबली की भी विशेष पूजा की जाती है।

प्र: नरक चतुर्दशी कब है?

हिन्‍दू पंचांग के अनुसार नरक चतुर्दशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। वैसे तो नरक चतुर्दशी धनतेरस के अगले दिन मनाई जाता है, लेकिन पंचांग के अनुसार इस बार यह दीवाली की ही सुबह पड़ रही है। इस बार नरक चतुर्दशी 27 अक्‍टूबर को है।
नरक चतुदर्शी की तिथि और शुभ मुहूर्त
नरक चतुदर्शी की तिथि: 27 अक्‍टूबर 2019

चतुदर्शी तिथि प्रारंभ: 26 अक्‍टूबर 2019 को दोपहर 03 बजकर 46 मिनट से

चतुदर्शी तिथि समाप्‍त: 27 अक्‍टूबर 2019 को दोपहर 12 बजकर 23 मिनट तक।

अभिज्ञान स्‍नान मुहूर्त: 27 अक्‍टूबर 2019 को सुबह 05 बजकर 16 मिनट से सुबह 06 बजकर 33 मिनट तक ।
कुल अवधि: 01 घंटे 17 मिनट ।

नरक चतुर्दशी के दिन पूजा करने की व‍िध‍ि
- मान्‍यताओं के अनुसार नरक से बचने के लिए इस दिन सूर्योदय से पहले शरीर में तेल की मालिश करके स्‍नान किया जाता है।
- स्‍नान के दौरान अपामार्ग की टहनियों को सात बार सिर पर घुमाना चाहिए।
- टहनी को सिर पर रखकर सिर पर थोड़ी सी साफ मिट्टी रखें लें।
- अब सिर पर पानी डालकर स्‍नान करें।
- इसके बाद पानी में तिल डालकर यमराज को तर्पण दिया जाता है।
- तर्पण के बाद मंदिर, घर के अंदरूनी हिस्‍सों और बगीचे में दीप जलाने चाहिए।

यम तर्पण मंत्र:

यमय धर्मराजाय मृत्वे चान्तकाय च |
वैवस्वताय कालाय सर्वभूत चायाय च ||

प्न: नरक चतुर्दशी के दिन कैसे करें हनुमान जी की पूजा?

मान्‍यता के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन भगवान हनुमान ने माता अंजना के गर्भ से जन्‍म लिया था।इस दिन भक्‍त दुख और भय से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हैं।इस दिन हनुमान चालीसा और हनुमान अष्‍टक का पाठ करना चाहिए।

प्न: नरक चतुर्दशी को क्‍यों कहते हैं रूप चतुर्दशी?

मान्‍यता के अनुसार हिरण्‍यगभ नाम के एक राजा ने राज-पाट छोड़कर तप में विलीन होने का फैसला किया। कई वर्षों तक तपस्‍या करने की वजह से उनके शरीर में कीड़े पड़ गए। इस बात से दुखी हिरण्‍यगभ ने नारद मुनि से अपनी व्‍यथा कही। नारद मुनि ने राजा से कहा कि कार्तिक मास कृष्‍ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगाकर सूर्योदय से पूर्व स्‍नान करने के बाद रूप के देवता श्री कृष्‍ण की पूजा करें। ऐसा करने से फिर से सौन्‍दर्य की प्राप्ति होगी। राजा ने सबकुछ वैसा ही किया जैसा कि नारद मुनि ने बताया था। राजा फिर से रूपवान हो गए. तभी से इस दिन को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं।

07/11/2018
धनतेरस किस दिन पड़ रहा है धनतेरस और खरीदारी का शुभ मुहूर्त क्या हैं: सनातन धर्म में दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस का पर्...
04/11/2018

धनतेरस किस दिन पड़ रहा है धनतेरस और खरीदारी का शुभ मुहूर्त क्या हैं:

सनातन धर्म में दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस का पर्व मनाया जाता है। इसे भगवान धन्वन्तरि के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प
मनाय जाता है। इस दिन को भगवान कुबेर और धन की देवी मां लक्ष्मी की अराधना से जोड़ा जाता है। इनकी पूजा कर धनवान बनाने के लिए प्रार्थना की जाती है। इस साल धनतेरस 5 नवंबर 2018 को है। इस दिन नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।

धनतेरस पर खरीदारी का शुभ मुहूर्त

सुबह। 09:00 बजे से 10:30 बजे तक।
दोपहर। 01:30 बजे से 06:00 बजे तक।
शाम। 06:00 बजे से 07:30 बजे तक।

इस दिन लक्ष्मी पूजन हेतु श्रेष्ठ मुहूर्त्त प्रदोष काल एवं वृष लग्न 05:35 से 07:30 बजे रात तक है।
कैसे करें पूजा:

सबसे पहले मिट्टी का हाथी और धन्वंतरि भगवानजी की फोटो स्थापित करें।

भगवान गणेश जी तथा भगवान धन्वंतरि को चांदी या तांबे के छोटे चम्मच से जल अर्पित करें।

भगवान गणेश का ध्यान और पूजन करें और फल-फूल अर्पित करे।

हाथ में अक्षत-फूल लेकर भगवान धन्वंतरि का ध्यान करें। भगवान को अर्पित करे।

अब मिठाई अर्पित करे तथा विधि -विधान से पूजन सम्पूर्ण करे ।

प्रेषक : अचार्य ज्योतिष शिरोमणि मोहित कक्कड़

04/11/2018

Happy Diwali to all ✨🙏✨

दीपावली पर्व पर इन सात वस्तुओं उप‌‌‍‌हार में किसी को न दें , नहीं तो लक्ष्मी जी का आगमन घर में हो जाएगा बंद:-दीपावली का ...
02/11/2018

दीपावली पर्व पर इन सात वस्तुओं उप‌‌‍‌हार में किसी को न दें , नहीं तो लक्ष्मी जी का आगमन घर में हो जाएगा बंद:-

दीपावली का त्यौहार में अब कुछ ही दिन बाकी रह ग‌ए हैं इसलिए सभी त्यौहार की तैयारी में लगे हुऐ हैं। दीपावली वाले दिन लोग अपनों मित्रों तथा रिश्तेदारों को उपहार देते हैं। अपनो को दीपावली पर्व पर उपहार देना अच्छी बात हैं, वहीं दूसरी ओर दीपावली वाले दिन आपको दूसरों को कुछ चीजें देते वक्त विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

यदि आप कुछ खास वस्तुओं को दीपावली पर्व पर दूसरों को देते हैं, तो आपके घर में लक्ष्मी जी का आगमन बंद हो जायेगा।

∆ पहली वस्तु है, लोहे या स्टील (Steel) का वस्तुएं:

दीपावली के दिन किसी को भी उपहार नहीं दें। ऐसी कोइ भी वस्तु जिस पर इस धातु की परत चढ़ी हुई हो, इस धातु से बनी वस्तुओं को दीपावली के दिन घर पर लेकर आए इससे आपको फायदा होगा।

∆ दूसरी वस्तु हैं, कई बार हम अपनों को तोहफे में कपड़े देते हैं:
लेकिन कपड़े खरीदते समय आप इस बात का ध्यान रखें कि वह कपड़ा सिल्क का ना बना हो। सिल्क से बने कपड़े दीपावली पर किसी को भी उपहार में देने से सामने वाले व्यक्ति के लिए अपशगुन का कार्य करता हैं। इसीलिए सिल्क की वस्तु दीपावली के दिन किसी को भी तोहफे में नहीं देनी चाहिए।

∆ तीसरी वस्तु हैं, लक्ष्मी जी और गणेश जी की प्रतिमा:

दीपावली के दिन इन दोनों देवी देवता का खास महत्व होता हैं। यदि आप किसी को लक्ष्मी जी और गणेश जी की प्रतिमा दीपावली वाले दिन उपहार में देते हैं तो आपके घर की लक्ष्मी जी दूसरे के यहां चली जाती है। इसलिए लक्ष्मी जी और गणेश जी की प्रतिमा सिर्फ अपने लिए ही खरीद कर घर लाए किसी ओर को नहीं देनी चाहिए।

∆ चौथी वस्तु है सोना और चांदी:
दीपावली के दिन सोना और चांदी से बनी वस्तुएं घर लाना शुभ माना जाता हैं, लेकिन जब आप यही सोना या चांदी किसी को उपहार मे देते हो तो यह आपके लिए अशुभ बन जाता हैं और आपके घर धन की कमी हो जाती है। इसलिए सोने / चांदी से बनी वस्तुएं किसी और को नहीं दे.

∆ पांचवी वस्तु हैं, तेल और लकड़ी:
दीपावली का पर्व आरंभ होते ही चाहे आप कुछ उपहार से खरीदें और ना खरीदें। यदि आप तेल लकड़ी की आवश्यकता है तो दीपावली से पहले ही खरीद कर घर पर लाकर रख ले। दीपावली पर यह वस्तुएं उधार में या उपहार दे देना यानि सीधे-सीधे मां लक्ष्मी को नाराज करना है।

∆ छठी वस्तुए रुमाल है:
रुमाल को सामान्यता हम लोग नाक साफ करने आया पसीना पहुंचने के काम में लेते हैं ऐसे में किसी रुमाल को उपहार करने से नकारात्मक ऊर्जा का अदान - प्रदान होता हैं, इसलिए दीपावली पर किसी को भी रुमाल देने से बचें।

∆ सातवीं वस्तु है काला रंग की वस्तुएं:
काला रंग दीपावली पर अशुभ माना गया हैं। दीपावली वाले दिन काले रंग की वस्तुओं को ना तो आप ख़रीदे , ना ही किसी को उपहार में दें।इस वजह से आपको मां लक्ष्मी की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है।
प्रेषक: अचार्य ज्योतिष शिरोमणि मोहित कक्कड़।

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