Vishwanath Nar

Vishwanath  Nar आपकी "बडी सोच" ही आप को बड़ा बना सखती है।

15/09/2023

Determination( निर्धार)

एक समय बात है एक तालाब में बहुत सारे मेंढक रहते थे। सरोवर के बीचों बीच एक बहुत पुराना का खम्भा भी लगा हुआ था। खम्भा बहुत ऊँचा था और उसकी सतह भी चिकनी थी। एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया की क्यों ना एक प्रतियोगिता करवाई जाये। इसमें भाग लेने वाले को खम्भे पर चढ़ना होगा और जो सबसे पहले ऊपर पहुंच जायेगा, उसे विजेता घोषित कर दिया जायेगा। तो उन्होंने प्रतियोगता का दिन फिक्स कर दिया। प्रतियोगिता का दिन आ गया, खम्भे के चारो और बहुत भीड इक्कठी हो गयी। आसपास के इलाकों से भी कई मेंढक इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने पहुंचे।

माहौल में सरगर्मी थी। हर तरफ शोर ही शोर था। प्रतियोगिता शुरू हुई… लेकिन खम्भे को देखकर भीड में से किसी भी मेंढक को यकीन नहीं हुआ, की कोई भी मेंढक इस खम्भे के ऊपर पहुंच पायेगा। चारो ओर यही शोर हो रहा था -“अरे ये बहुत कठिन हैं ” “वो कभी भी इसे नहीं जीत पाएंगे। “ऊपर पहुंचने का तो कोई सवाल ही नहीं हैं, इतने चिकने खम्भे पर नहीं चढ़ा जा सकता ” और यह हो भी रहा था की जो भी मेंढक कोशिश करते, वो थोडा ऊपर जाकर फिसलने के कारण नीचे गिर जाते।

कई मेंढक तो बार बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में में लगे हुए थे। पर भीड तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, “ ये नहीं हो सकता, ये असंभव हैं ” तो अब जो भी मेंढक उत्साहित थे, कोशिश कर रहे थे , वो भी ये सुन सुनकर हताश हो गए और उन्होंने अपना प्रयास करना छोड़ दिया। लेकिन उन्ही मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था। जो बार बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था…. वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और आखिरकार वह खम्भे के ऊपर पहुच गया।

और इस प्रतियोगिता का विजेतां बना। उसकी जीत पर सभी को बडा आश्यर्य हुआ, सभी मेंढक उसे घेर कर खडे हो गए और पूछने लगे ,” तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया, कैसे तुमने सबको पीछे छोड़ कर जीत प्राप्त करी?” तभी पीछे से किसी ने बोला … “अरे उससे क्या पूछते हो , ये तो बहरा है ” आपको समझ आया वो कैसे जीता ? जी हां उसके आसपास जितने भी टांग खींचने वाले थे, उनकी आवाज उसको नहीं सुनाई दी, जिससे वो नकारात्मक नहीं सोच पाया, और वो अपने लक्ष्य पर ज्यादा फोकस कर पाया और जीत गया।

शिक्षा:-

दोस्तों, हमारे अंदर भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की काबिलियत होती हैं, और हम शुरुआत भी करते हैं। लेकिन अपने आसपास के ज्ञान चंदो के कारण और अपने नकारात्मक माहौल के कारण, हम अपना काम या तो शुरू नहीं करते हैं या फिर बीच में ही छोड़ देते हैं। तो दोस्तों आपको जो भी पीछे रखने वाली आवाजे हैं वो कोई भी, कुछ भी हो सकती हैं। चाहे वो दोस्त हो, रिश्तेदार हो, या फिर आप खुद हो। इन सबको ignore करना ही होगा। अपने आपको एक मजबूत इंसान बनाते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हरसंभव प्रयास करने चाहिए। यदि आपने नकारात्मकता से दुरी बना ली, तो आपको सफलता के शिखर पर पहुंचने से कोई नहीं रोक सकताl

13/09/2023

एक चूहा कसाई के घर में बिल बना कर रहता था ।एक दिन कसाई और उसकी बीवी बाजार से आए । उनके हाथ में एक थैले में कुछ सामान था .! कसाई की औरत ने जब थैले से वह सामान को बाहर निकाला। तो उसमें चूहे दानी थी .
देखकर चूहा बहुत डर गया !उसी कसाई के घर में एक बकरा, एक कबूतर ,और एक मुर्गा भी रहता था.। चूहा घबराकर कबूतर के पास गया। उसने कबूतर से सारा हाल बताया.। कबूतर उसकी बात सुनकर हंसने लगा और बोला यह समस्या मेरी नहीं है? तेरी है I फिर चूहा भागते हुए मुर्गे के पास गया।. मुर्गे को भी वही बात बताया मुर्गा भी हंसते हुए उसकी बात को मजाक में डाल दिया ।.फिर चूहा भागते हुए बकरे के पास गया ।बकरे को सारी दास्तां सुनाया" बकरा बोला तुम्हारी परेशानी है" ।मेरा इस से कोई लेना देना नहीं है । यह तुम्हारी समस्या है। तुम समझो!! चूहा निराश होकर चले गया। फिर रात हुई रात को "चूहे दानी" कसाई की औरतने लगा दि। रात को चूहे दानी में एक सांप आकर फस गया। कसाई की औरत को लगा । चूहा फस गया है। अंधेरे में ही चूहे दानी को हटाने गई ।सांप ने हाथ को काट लिया। कसाई औरत को लेकर हकीम के पास पहुंचा। हकीम ने दवा दीया। थोड़ी ठीक हुई फिर हकीम जी ने बोला । उनीको कबूतर का सूप पिलाओ ।फिर कसाई घरा आया कबूतर को काटा और उसका सूप बनाया। अपनी औरत को पिलाया। फिर अगले दिन रिश्तेदार लोग देखने के लिए आए। तो कसाई ने सोचा कि इतने रिश्तेदार लोग आए हुए हैं । खाने का इंतजाम करते है। उसने मुर्गा को जमा कर दिया। और सबको खिला दिया। कुछ दिन के बाद जब उसकी औरत ठीक हो गई ।तो उसने खुशी में सारे गांव और मोहल्ले के लोगों को दावत दियी । और बकरे को जमा कर दिया ।ं इस कहानी का निष्कर्ष यह है कि, दूसरे की समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। भले आज उसकी समस्या है ।कल हमारी हो सकती है ़

17/08/2022

अपने सपने को पाने के लिए प्रेरित रहें
सपनों और लक्ष्यों को प्राप्त करने में मुख्य बाधाओं में से एक प्रेरणा की कमी है। बहुत से लोग अपने सपनों को पूरा करना छोड़ देते हैं क्योंकि वे बीच में थक जाते हैं और छोटा रास्ता देखने की सोचते हैं। सपने पूरे करने के लिए प्रेरित रहना जरूरी है और जब आप अपना सपना पूरा कर लेंगे तब ही रूकें। आपको प्रेरित रखने के लिए यहां कुछ युक्तियां दी गई हैं:

अपना लक्ष्य याद रखें

यदि कभी आप अपने आप को निराश और थका हुआ मानते हैं तो यह आपको अपने अंतिम लक्ष्य को याद करने का समय है और असली आनंद तथा गौरव का अनुभव आपको तब होगा जब आप इसे प्राप्त करेंगे। यह एक थके हुए दिमाग को फिर से रीसेट बटन दबा कर शुरू करने जैसा है।

स्वयं को पुरस्कृत करें

जैसे-जैसे आप छोटे-छोटे लक्ष्यों को निर्धारित करते हैं आप प्रत्येक मील का पत्थर हासिल करने के लिए भी इनाम रखें। खुद को एक पोशाक खरीदने या अपने पसंदीदा कैफे पर जाकर या दोस्तों के साथ बाहर जाने जैसा कुछ भी हो सकता है। अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित रहने का यह एक अच्छा तरीका है।

कुछ समय छुट्टी लें

बहुत ज्यादा काम और किसी प्रकार का खेल ना खेलना आपकी उत्पादकता को कमजोर कर सकता है और आपकी उत्पादकता में बाधा डाल सकता है जो आपको प्रेरित कर सकती है। इस प्रकार यह एक अच्छा विचार है कि आप अपने काम से कुछ समय निकले और ऐसा काम करे जिसे करने में आपको आनंद आता है। आदर्श रूप से आप अपने पसंदीदा खेल में शामिल होने के लिए प्रत्येक दिन अपने कार्यक्रम से आधा घंटा निकाल ले।

अपने आसपास सकारात्मक लोगों को रखें

उन लोगों के साथ रहकर जो आपके सपनों में विश्वास रखते हैं और आपको प्रेरित रहने के लिए कड़ी मेहनत करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह प्रेरित रहने के लिए एक अच्छा तरीका है।

अपनी गलतियों से सबक लें निराश होने और अपने सपनों को छोड़ने के बजाए जब आप गलती करते हैं और कठिन समय का सामना करते हैं तो आपको अपनी गलतियों से सीखने और खुद को मजबूत करने की कोशिश करनी चाहिए।

एक बार की बात है कि एक आश्रम में एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर और सम्मान करता था परंतु पढ़ने और काम करने में बहुत आलसी ...
14/08/2022

एक बार की बात है कि एक आश्रम में एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर और सम्मान करता था परंतु पढ़ने और काम करने में बहुत आलसी था। हालांकि वह कार्य करता जरूर था परंतु दीर्घसूत्री था। दीर्घसूत्री अर्थात जब कोई कार्य करना चाहिए तब नहीं बाद में करने की सोचता था। उसके गुरु उसके इस स्वभाव से बड़े चिंतित रहते थे कि कहीं यह अपने जीवन में असफल होकर संघर्ष में ना फंस जाए। यह ऐसा व्यक्ति है जो बगैर परिश्रम के ही फल पाना चाहता है। हमेशा सुअवसार की तलाश में रहता और भाग्य के भरोसे ही जीवित है। ऐसे में गुरुजी ने उसका उद्धार करने की सोची।



उन्होंने शिष्य को सूर्योदय के समय अपने पास बुलाया और सफेद पत्थर का एक टुकड़ा देकर बोले कि यह एक जादुई पत्थर है। मैं अभी दूसरे गांव जा रहा हूं तब तक तुम इसे रख लो। इस पत्‍थर को जिस भी लोहे की वस्तु से स्पर्श कराओगे वह स्वर्ण में बदल जाएगा लेकिन दूसरे दिन में सूर्यास्त के बाद लौटूंगा तो इसे तुम्हें लौटाना होगा। बस कल सूर्यास्त तक का ही समय है तुम्हारे पास।....वह पत्‍थर देकर गुरुजी चले गए।



यह सुन और देखकर शिष्य तो बड़ा ही खुश हो गया। परंतु आलसी व्यक्ति की सोच भी बड़ी आलसी होती है। उसने आज का दिन कल्पना करने में ही बिता दिया कि मेरे पास इतना सारा स्वर्ण होगा तो मैं क्या-क्या करूंगा। मैं हर तरह से सुखी, समृद्ध और संतुष्ट रहूंगा। मेरे आसपास कई नौकर चाकर होंगे। ऐसा होगा, वैसा होगा। बस इसी कल्पना में उसने पूरा दिन गुजार दिया।



फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल उठा तो उसने सोचा कि आज तो स्वर्ण बनाने का अंतिम दिन है। सूर्यास्त के समय तो गुरुजी लौट आएंगे। आज तो इस पत्‍थर का उपयोग करना बहुत जरूरी है। हालांकि अभी तो पूरा दिन पड़ा है। घर में तो बहुत कम लोहा है इन्हें तो बाद में देखेंगे पहले तो मैं बाजार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर ले आता हूं। लेकिन कौन से सामान खरीदूं? ऐसा सामान खरीदना होगा जिसमें भारी लोहा हो। लोहे के खंबे तो कहीं ना कहीं मिलते होंगे? नहीं खंबों को तो घर पर लाना मुश्किल होगा। खैर ठीक है यह तो कर ही लेंगे पहले खाना खा लेते हैं।



फिर भोजन करने के चक्कर में दोपहर हो जाती है। भोजन करने के बाद आलस्य छा जाता है तो वह सोचता है कि अभी तो सूर्यास्त में बहुत समय है। बाजार का काम तो एक घंटे में निपटा लेंगे, पहले थोड़ा सो लेते हैं 4 बजे उठकर बाजार जाएंगे और एक झटके में सभी लोहे के सामान खरीदकर घर ले आएंगे और बस फिर हो जाएगा काम स्वर्ण बानाने का।...ऐसा सोचकर वह सो जाता है।



आसली व्यक्ति को कुछ ज्यादा ही गहरी नींद आती है। वह नींद की गहराइयों में खो गया और जब नींद खुली तो देखा की बस अब तो सूर्यास्त होने ही वाला है। अब वह जल्दी-जल्दी बाजार की तरफ भागने लगा। आधे रास्ते में सोचने लगा कि अरे, वह पतथर भी साथ ले आता तो अच्छा होता, क्योंकि लौटने से पहले ही सूर्यास्त हो जाएगा और गुरुजी आ गए तो। तभी रास्ते में उसे गुरुजी मिल जाते हैं। उन्हें देखकर वह घबरा जाता है और उनके चरणों में गिरकर कहता है। क्षमा करना गुरुजी उस जादुई पत्थर को एक दिन और मेरे पास रखने दीजिये।



लेकिन गुरुजी कहते हैं कि नहीं, यह नहीं हो सकता। अब तुम अवसर चुक गए। गुरुजी के मना करने के बाद शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया।



महाभारत में भीष्म पितामह ने कहा था युधिष्‍ठिर से कि दीर्घसूत्रा मनुष्य का जीवन नष्ट ही समझो। अकर्मण्य, आलसी और भाग्य के भरोसे रहने वाला मनुष्य जीवन में कभी कुछ नहीं कर पाता है। इसीलिए कहते हैं कि काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब।

05/08/2022

किसी व्यक्ति की महानता तब पहचानी जाती है, जब वो किसी इम्तिहान से गुजरता है या किसी बहुत बड़ी विपदा का सामना करता है। मानसिक तौर पर कोई, कितना कमजोर या सशक्त है, ये तब पता चलता है, जब वो किसी बड़ी चुनौती का सामना करता है, या जब किसी व्यक्ति का बहुत बड़ा नुकसान हो जाये। उस वक्त उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है या उस वक्त उसका व्यवहार कैसा होता है, ये ही महत्वपूर्ण है। क्या वो अपने ऊपर काबू रख पाता है या उस नुकसान, दुःख या परेशानी में बिखर जाता है। वो अपने आप को दुबारा से, आगे बढ़ने के लिए, खुद को तैयार कर पाता है या सब कुछ छोड़ देता है, और "गिव-अप" कर देता है।*

*10 दिसंबर 1914 की बात है। एडिसन की प्रयोग-शाला में आग लग गई। उनकी लैब में एक केमिकल विस्फोट हुआ और विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि, सारी लैब जल कर राख हो गई थी। उस लैब में एडिसन की सारी जिंदगी का काम था। उनके बहुत सारे आविष्कार, जिन पर वो काम कर रहे थे, और बहुत अविष्कारों के रिकार्ड वहां पर थे, जो अब जल चुके थे। एडिसन की सालों की मेहनत उनके सामने राख हो चुकी थी। उनके करीबी, दोस्त और उनके पड़ोसी, उनको सांत्वना दे रहे थे। नुकसान बहुत ज्यादा हुआ था। सब को लग रहा था कि, एडिसन इस नुकसान के दुःख से टूट जायेंगे।*

*लेकिन एडिसन ने अपने बेटे चार्ल्स को पास बुलाया और कहा-"जाओ, जाकर अपनी माँ और बाकी रिश्तेदारों को बुलाओ। उन्होंने शायद पहले कभी ऐसी आग न देखी हो।"उन्होंने अपने दोस्तों को बुलाकर कहा- "आज मेरी जिन्दगी की सब बेवकूफियां और गलतियाँ जल गई। ईश्वर ने मुझे अपनी गलतियों को दुरुस्त करने का एक और मौका दिया है। अभी मैं 67 साल का हूँ, दुबारा से इस जगह पर एक और शुरुआत करने के लिए, अभी मेरी ज्यादा उम्र नहीं है, और अगले 4 सालों में उन्होंने फिर से बहुत सारे आविष्कार किये।*

*ये है सशक्त मानसिकता, कि कुछ भी हो जाए जिन्दगी में, बस आपको आगे बढ़ते रहना है...*

27/07/2022

दो घोड़ों की कहानी*

*चुनौतियों पर काबू पाने की सीख देती प्रेरणादायक कहानी*

बादल अरबी नस्ल का एक शानदार घोड़ा था। वह अभी 1 साल का ही था और रोज अपने पिता – “राजा” के साथ ट्रैक पर जाता था।

राजा घोड़ों की बाधा दौड़ का चैंपियन था और कई सालों से वह अपने मालिक को सर्वश्रेष्ठ घुड़सवार का खिताब दिला रहा था।

एक दिन जब राजा ने बादल को ट्रैक के किनारे उदास खड़े देखा तो बोला, ” क्या हुआ बेटा तुम इस तरह उदास क्यों खड़े हो?”

“कुछ नहीं पिताजी…आज मैंने आपकी तरह उस पहली बाधा को कूदने का प्रयास किया लेकिन मैं मुंह के बल गिर पड़ा…मैं कभी आपकी तरह काबिल नहीं बन पाऊंगा…”


राजा बादल की बात समझ गया। अगले दिन सुबह-सुबह वह बादल को लेकर ट्रैक पर आया और एक लकड़ी के लट्ठ की तरफ इशारा करते हुए बोला- ” चलो बादल, ज़रा उसे लट्ठ के ऊपर से कूद कर तो दिखाओ।”

बादला हंसते हुए बोला, “क्या पिताजी, वो तो ज़मीन पे पड़ा है…उसे कूदने में क्या रखा है…मैं तो उन बाधाओं को कूदना चाहता हूँ जिन्हें आप कूदते हैं।”

“मैं जैसा कहता हूँ करो।”, राजा ने लगभग डपटते हुए कहा।

अगले ही क्षण बादल लकड़ी के लट्ठ की और दौड़ा और उसे कूद कर पार कर गया।

“शाबाश! ऐसे ही बार-बार कूद कर दिखाओ!”, राजा उसका उत्साह बढाता रहा।

अगले दिन बादल उत्साहित था कि शायद आज उसे बड़ी बाधाओं को कूदने का मौका मिले पर राजा ने फिर उसी लट्ठ को कूदने का निर्देश दिया।

करीब 1 हफ्ते ऐसे ही चलता रहा फिर उसके बाद राजा ने बादल से थोड़े और बड़े लट्ठ कूदने की प्रैक्टिस कराई।

इस तरह हर हफ्ते थोड़ा-थोड़ा कर के बादल के कूदने की क्षमता बढती गयी और एक दिन वो भी आ गया जब राजा उसे ट्रैक पर ले गया।

महीनो बाद आज एक बार फिर बादल उसी बाधा के सामने खड़ा था जिस पर पिछली बार वह मुंह के बल गिर पड़ा था… बादल ने दौड़ना शुरू किया… उसके टापों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी… 1…2…3….जम्प….और बादल बाधा के उस पार था।

आज बादल की ख़ुशी का ठिकाना न था…आज उसे अन्दर से विश्वास हो गया कि एक दिन वो भी अपने पिता की तरह चैंपियन घोड़ा बन सकता है और इस विश्वास के बलबूते आगे चल कर बादल भी एक चैंपियन घोड़ा बना।

*दोस्तों, बहुत से लोग सिर्फ इसलिए goals achieve नहीं कर पाते क्योंकि वो एक बड़े challenge या obstacle को छोटे-छोटे challenges में divide नहीं कर पाते। इसलिए अगर आप भी अपनी life में एक champion बनना चाहते हैं…एक बड़ा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं तो systematically उसे पाने के लिए आगे बढिए… पहले छोटी-छोटी बाधाओं को पार करिए और ultimately उस बड़े goal को achieve कर अपना जीवन सफल बनाइये।*

Moral of the story

*जल्दी हार मत मानिए, बल्कि छोटे से शुरू करिए और प्रयास जारी रखिये…इस तरह आप उस लक्ष्य को भी प्राप्त कर पायेंगे जो आज असंभव लगता है।*

08/06/2022

*डरपोक पँथर*

एक बार की बात है एक मूर्तिकार भगवान की मूर्ति बनाने के लिए पत्थरो की तलाश मे जंगल गया.वहाँ से दो बड़े बड़े पत्थर घर लें कर आया.

मूर्तिकार ने एक पत्थर उठाया और उस पर अपनी छेनी और हथौड़े की मदद से धीरे धीरे वार करने लगा.

यानी पत्थर को मूर्ति का आकार देने के लिए उसको छेनी से तोड़ने लगा.

अब जैसे जैसे मूर्ति कार पत्थर पर वार करता तब तब पत्थर को खूब पीड़ा होती.

तभी पत्थर बोल उठा की रुको भाई बस करो. अब मत मारो मुझे… बहुत दर्द होता है.

मुझे नहीं बनना मूर्ति. मैं ऐसे ही ठीक हूं.

मूर्तिकार बोला अरे मूर्ति बनने के लिए थोड़ा दर्द तो सहना ही पड़ेगा.

मूर्तिकार ने बहुत समझाया लेकिन पत्थर नहीं माना.

मूर्तिकार ने बोला ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा.

फिर मूर्तिकार ने उस पत्थर को साइड मे रख दिया, और दूसरा पत्थर लिया और उस पर अपने छैनी हथौड़े से वार करता गया.

ये वाला पत्थर चुप चाप बिना आवाज़ किये दर्द सहता रहा.धीरे धीरे पत्थर एक खूबसूरत मूर्ति का आकार लेने लगी.

देखते ही देखते वो पत्थर छैनी और हथौड़े की मार सह कर एक खूबसूरत भगवान की मूर्ति मे बदल गया. मूर्तिकार ने वो मूर्ति अपने दुकान पर रख दी. एक पुजारी बड़े मंदिर के लिए भगवान की मूर्ति खरीदने आया .

पुजारी को वो मूर्ति बहुत पसंद आई और उसे खरीद ली. पुजारी बोला मुझे साथ मे एक मजबूत पत्थर भी दे दो जिस पर श्रद्धालु नारियल फोड़ सकें.

वरना मंदिर की फर्श खराब हो जाएगी.

तब मूर्तिकार ने पुजारी को वहीं पत्थर उठा कर दे दिया जो पत्थर ये बोल रहा था मुझ पर चोट मत मारो. और वो पत्थर मूर्ति नहीं बन पाया था.

अब पुजारी ने उस खूबसूरत मूर्ति को मंदिर मे वहाँ स्थापित कर दिया जहाँ लोग रोज उसकी पूजा करते. फूल चढ़ाते, और उस मूर्ति की खूबसूरती की तारीफे की जाती.

और जो पत्थर था वो वहीं मंदिर मे मूर्ति के ठीक सामने नीचे की तरफ रख दिया गया. लोग आते और उस पत्थर पर नारियल फोड़ते जिससे उसको बहुत दर्द होता. ऐसा रोज होता.

ये देख उस खूबसूरत मूर्ति ने उस पत्थर से कहा, – देखा ! यदि तुम उस समय दर्द को सहन कर लेती ज़ब मूर्तिकार तुम्हे एक मूर्ति मे बदल रहा था तब आज यहां मेरी जगह तुम होती और तुम्हारी पूजा हो रही होती.

उस पत्थर की अब खुद पर बहुत पछतावा हो रहा था.

तो दोस्तों इस short moral story से हमें ये सीख मिलती है
की जीवन मे कितनी भी मुश्किलें आए हमें उससे डरना और घबराना नहीं चाहिए बल्कि उन हिम्मत रख कर उन मुश्किलों का सामना करना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए. ठीक उस मूर्ति बनने वाले पत्थर की तरह.

30/05/2022

जीवन का प्रशिक्षण

बाज पक्षी के बचपन की शुरूआत बहुत ही मुश्किल से होती है। बाज पक्षी को बचपन में ही ऐसी ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे वह अपने जीवन में बड़ी-बड़ी मुश्किलों से भी आसानी से सामना कर पाते हैं।
जब किसी भी पक्षी का बच्चा पैदा होता है तो वह कम से कम एक महीने तक तो अपने माता-पिता पर निर्भर रहता ही है। वह अपने खाने-पीने से लेकर जब तक चलना नहीं सीख जाता, तब तक वह अपने माता पिता की नजर में रहता है। लेकिन बाज पक्षियों में ऐसा नहीं होता है।
बाज पक्षी सबसे उल्टा चलते हैं। जब एक बाज मादा अपने बच्चे को जन्म देती है तो उस समय से ही उसके बच्चे की ट्रेनिंग शुरू हो जाती है कि उसे अपने जीवन में कैसे संघर्ष करना है। पैदा होने के कुछ ही दिन बाद बाज के बच्चे का प्रशिक्षण शुरू हो जाता है।
उसके प्रशिक्षण के पहले पड़ाव में मादा बाज अपने बच्चे को चलना सिखाती है। जब बच्चा भूखा होता है तो उसकी मां खाना लाती है। जैसा कि सभी पक्षी करते हैं। लेकिन बाज सीधा अपने बच्चे को खाना नहीं देते। मादा बाज खाना लाकर अपने घोंसले से कुछ दूरी पर खड़ी रह जाती है और तब तक उसे खाना नहीं देती। जब तक वह खुद चलकर उसके पास नहीं आ जाता।

जब बाज के बच्चे को तेज भूख लगती है तो वह खाने के लिए अपनी मां के पास जाता है। धीरे-धीरे संघर्ष करके मुश्किल से चलकर अपनी मां के पास पहुंचता है। उस समय उसे कई सारी मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता है। उसे कई चोटें भी लगती है। लेकिन उसकी मां उसे खाना तक तक नहीं देती, जब तक वह खुद उसके पास चलकर नहीं आ जाता। उसकी मां कठोर दिल रखकर सिर्फ उसके पास आने का इंतजार करती है। उसे कोई मदद नहीं करती है।
जब वह चलना सीख जाता है तो दूसरा पड़ाव आता है। यह पड़ाव उसके लिए बहुत ही मुश्किल होता है। इसमें मादा बाज अपने बच्चे को अपने पंजों में पकड़कर उसे खुले आसमान में ले उड़ती है। अपने बच्चे को पंजों में दबाकर वह लगभग 12 से 14 किलोमीटर ऊपर तक ले जाती है और वहां से उसे छोड़ देती है।
तब वह बच्चा नीचे गिरने लगता है और वह उसे देखती है। जब उसका बच्चा 1 या 1.5 किलोमीटर तो बच्चे को डर लगने लगता है कि वह अब मर जायेगा और अपने पंख फड़फड़ाने लगता है। उड़ने की पूरी कोशिश करता है। फिर भी वह उड़ नहीं पाता तो मादा बाज उसे झट से आकाश में ही पंजों में पकड़ लेती है और उसे जमीन पर गिरा देती है।

ऐसा उसकी मां तब तक करती हैं जब तक वह पूरी तरह से उड़ना नहीं सीख जाता। इस प्रकार से एक बाज के बचपन की शुरूआत होती है और उसे इस कठिन प्रशिक्षण को करना पड़ता है। इस कठिन प्रशिक्षण से वह अपने जीवन में बहुत कुछ सीखता है।
इसके कारण ही वह अपने से दुगुना वजनी का भी आसानी से शिकार कर सकता है और उसे आसमान में ले उड़ता हैं। इस प्रशिक्षण से वह मजबूत और शक्तिशाली हो जाता है।
हमें बाज के इस प्रशिक्षण से जीवन में बड़ी सीख मिलती है। हर व्यक्ति, जानवर या पक्षी अपने बच्चों से बहुत प्यार करता है। इसका मतलब ये नहीं कि वह उसे अपने पर ही निर्भर रहने दें। उसे जिन्दगी में मुश्किलों का सामना करना भी सिखाएं, जिसके कारण वह अपनी प्रतिभा दिखा सके और अपने एक बेहतर व्यक्तित्व कायम कर सके।
हमेशा अपने बच्चों को ये ही सिखाये कि जिन्दगी का दूसरा नाम ही संघर्ष है। अपने जीवन में यदि कुछ भी हासिल करना है तो संघर्ष करना ही पड़ेगा।

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