31/10/2025
आम जनता की नजर से देखा जाए, तो भारत में कार मालिकों को सबसे ज्यादा परेशान करने वाला और सबसे “बेकार” नियम है 👇15 साल के बाद निजी पेट्रोल कारों को अनिवार्य रूप से “स्क्रैप” या दोबारा फिटनेस रिन्यू करने का नियम
(विशेष रूप से दिल्ली और एनसीआर में — जहां 15 साल पुरानी पेट्रोल कार और 10 साल पुरानी डीज़ल कारें पूरी तरह “बैन” कर दी गई हैं।)
🧩 क्यों यह नियम गलत या अव्यवहारिक है (जनता के दृष्टिकोण से): 1. उम्र नहीं, हालत मायने रखनी चाहिए 💨एक कार की हालत उसके मेंटेनेंस, चलने के किलोमीटर और उपयोग पर निर्भर करती है — न कि उसके जन्म साल पर।
15 साल पुरानी लेकिन अच्छी मेंटेन कार अक्सर नई कार से भी बेहतर परफॉर्म करती है। फिर भी, सिर्फ “उम्र” देखकर उसे सड़क से हटाना अन्यायपूर्ण है
2. आर्थिक अन्याय 💸 एक आम व्यक्ति 10–15 साल की मेहनत से कार खरीदता है। सरकार 15 साल बाद उसे “कबाड़” घोषित कर देती है, भले ही कार एकदम फिट हो।
इससे जनता को अनावश्यक आर्थिक नुकसान होता है।
3. पर्यावरण का झूठा तर्क 🌍 सरकार कहती है कि पुरानी कारें प्रदूषण करती हैं,
लेकिन सच्चाई यह है कि PUC (Pollution Under Control) प्रमाणपत्र हर कार के लिए अनिवार्य है।
अगर कोई कार PUC पास कर रही है, तो वह “कानूनी रूप से” प्रदूषण नहीं कर रही।
फिर उसे बैन करना विज्ञान और तर्क दोनों के खिलाफ है।
4. फिटनेस टेस्ट को नकारना 🚦
फिटनेस सर्टिफिकेट देने की व्यवस्था है, पर उसका महत्व घटा दिया गया है।
सही नीति यह होनी चाहिए थी:
“अगर कार फिटनेस पास करे — तो उसका टैक्स और रजिस्ट्रेशन बढ़ाया जाए, न कि उसे बैन किया जाए।”
5. सरकारी राजस्व बढ़ाने का छिपा मकसद 💰
पुराने वाहन हटाने से नए वाहन बिकते हैं → कंपनियों को फायदा → सरकार को टैक्स मिलता है।
यह नीति जनता के हित से ज्यादा व्यावसायिक हितों के लिए बनाई गई लगती है।
⚖️ क्या होना चाहिए था:
👉 कार की वैधता “सालों” से नहीं, “फिटनेस” से तय होनी चाहिए।
👉 हर 5 साल पर फिटनेस टेस्ट अनिवार्य हो — जो पास करे, वह चल सके, चाहे 25 साल पुरानी हो।
👉 PUC पास = प्रदूषण नियंत्रण में → उसे सजा क्यों?