27/11/2023
आज कुछ लिखने का मन कर रहा है लेकिन मन इतना व्याकुल है कि समझ में नहीं आ रहा है क्या क्या लिखूँ….
आज के समाज के हालात इतने ख़राब होते जा रहे हैं कि पता ही नहीं चल रहा कि ये दुनिया कहाँ जा रही है। मन खिन्न सा हो रहा है सबकी बेपरवाही को देख कर….
आज के समाज की नई पीढ़ी की सोच बहुत अजीब हो गई है। कभी एक जमाना था कि माँ-बाप सच में पूजनीय होते थे। उनका कहा आख़िरी सच हुआ करता था। आज का जमाना अपना-अपना करने का है….
जैसे जैसे टेक्नॉलजी का जमाना एडवांस होता जा रहा है वैसे वैसे अब महसूस होने लगा है कि रिश्तों के मायने ही बिगड़ते जा रहे हैं….
पहले जो इक्का दुक्का देखने मिलता था अब लगभग हर घर में देखने मिल जाता है कि आजकल रिश्तों से बढ़ कर अपनी पर्सनल लाइफ रास आती है सबको।
अपनी ज़िंदगी, अपनी पसंद, अपने मन मर्ज़ी का काम, अपने हिसाब से सब कुछ….
मैंने कमाया है तो मुझे अपनी मर्ज़ी से खर्च करना है, परिवार, माँ-बाप या समाज भाँड़ में जायें….
ये मेरी ज़िंदगी है मुझे जैसे रहना है जहाँ रहना है ये मुझे ख़ुद तय करना है, परिवार के लिए ज़िम्मेदार मैं नहीं हूँ…. मुझे कहाँ जाना है, कब जाना है, कब वापस आना है, क्या करना है ये मुझे पता है, मुझे सिखाओ मत।
सब अपने सर ज़िम्मेदारियाँ लेने से बचते हैं….
लेकिन कब तक बचेंगे ऐसे लोग ज़िम्मेदारियों से?
कहीं न कहीं, कभी न कभी, आज नहीं तो कल ज़िम्मेदारियाँ तो मिलेंगी ही मिलेंगी….
जब एक समय पर और लोगों के लिए वही सब कुछ करना पड़ेगा जिससे आज तक बचते आये तब यकीनन समझ में आ जाएगा कि काश, मैंने ये तब किया होता….
लेकिन जहन में एक बात आती है कि सबके लिए करो पर ख़ुद को मत भूलना….
क्योंकि अंत में बस यही सोचने को रह जाएगा कि काश ये सबक़ पहले सिख लिया होता….
अल्फ़ाज़….