05/07/2025
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"माँ की परछाई"
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव बड़ागाँव में रहने वाली कमला देवी की दुनिया बहुत सीमित थी—एक मिट्टी की झोंपड़ी, दो गायें, एक बेटा सूरज, और एक सपना… उसका बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने।
कमला का पति रामस्वरूप, गाँव के पास ईंट भट्टे पर मजदूरी करता था। 2002 की गर्मियों में एक दिन, भट्टे में एक बड़ा हादसा हुआ, और रामस्वरूप वहीं दबकर मर गया। उस समय सूरज की उम्र मात्र पाँच साल थी।
कमला ने आँसू पोंछे, और उसी दिन से दोबारा काम पर लौट गई। अब ईंट उठाना, चूल्हा जलाना, सूरज को स्कूल भेजना और रात को हाथ जोड़कर ईश्वर से एक ही दुआ माँगना—"मेरा बेटा अफ़सर बने… बस एक बार, भगवान।"
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2. माँ की तपस्या
कमला अनपढ़ थी, लेकिन सूरज की कॉपियों में होमवर्क जाँचती थी। उसे नहीं आता था, लेकिन हर पन्ना उलटती-पलटती, जैसे वो खुद सीख रही हो। सूरज को भी माँ का सपना पता था, और वो पढ़ाई में अच्छा था।
गाँव के मास्टर साहब ने एक बार कहा, “कमला, लड़का बहुत तेज़ है, इसे शहर भेजो। यहाँ रहकर कुछ नहीं होगा।”
कमला ने वो बात गाँठ बाँध ली। अगले साल सूरज को इंटर के बाद इलाहाबाद भेजा गया। माँ ने अपने कान की बाली बेची, बकरी बेची, और एक पुराना गहना जो शादी में मिला था… सब कुछ।
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3. शहर में संघर्ष
इलाहाबाद में सूरज का दाखिला एक कोचिंग में हुआ। उसके कमरे का किराया 1800 था, खाने का अलग। माँ हर महीने 2500 भेजती थी—खुद भूखे रहकर भी।
कमला ने गाँव में लोगों के खेतों में काम करना शुरू किया, दूसरों के कपड़े धोने लगी। त्योहारों में भी नई साड़ी नहीं ली, लेकिन सूरज को कभी एक दिन भूखा नहीं सोने दिया।
सूरज भी मेहनती था। वह रोज़ 14-15 घंटे पढ़ता। वह जानता था, उसकी माँ का सपना उसकी आँखों में नहीं, बल्कि रोटी में था।
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4. पहली सफलता
2016 में सूरज का UPPCS का प्रीलिम्स निकला। माँ ने मंदिर में 3 दिन का व्रत रखा। उसके बाद सूरज ने मेन्स और इंटरव्यू भी पास किया। आखिरकार, एक दिन वो खबर आई—सूरज SDM बन गया।
गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। अखबारों में फोटो छपी: "मजदूर की माँ का बेटा बना अफसर।"
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5. बदलते दिन
पोस्टिंग के बाद सूरज शहर में ही रहने लगा। कुछ महीने बाद उसने एक लड़की से शादी की, जो पढ़ी-लिखी और बड़े परिवार से थी। कमला को इस रिश्ते से ऐतराज़ नहीं था। उसे खुशी थी कि उसका बेटा अब अपने पैरों पर खड़ा है।
लेकिन शादी के बाद से कुछ बदलने लगा।
सूरज अब कमला को फोन कम करने लगा। कहता, "अभी मीटिंग में हूँ माँ, बाद में बात करता हूँ।"
बहू कहती, "माँ गाँव में ही ठीक हैं। यहाँ उनकी जरूरत नहीं।"
कमला ने बहुत बार कहा, “बेटा, बस एक बार तुम्हारा घर देखना चाहती हूँ…” लेकिन सूरज ने टाल दिया।
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6. तिरस्कार
एक दिन कमला अचानक शहर पहुँची। झोंपड़ी बेचकर उसने किराया और एक नई साड़ी ली थी। SDM कार्यालय के बाहर खड़ी माँ के पैरों में चप्पल नहीं थी, लेकिन आँखों में बेटे का गर्व था।
लेकिन जब वो घर पहुँची, तो बहू ने दरवाजा ही नहीं खोला।
बेटे ने फोन पर कहा, "माँ, अचानक क्यों आईं? यहाँ व्यवस्था नहीं है। आप वापस गाँव चली जाओ, मैं पैसे भिजवा दूँगा।"
कमला वहीं सीढ़ियों पर बैठ गई। तीन घंटे इंतज़ार किया, फिर थककर लौट गई।
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7. अंतहीन इंतज़ार
कमला गाँव लौट आई, लेकिन अब उसकी आँखों में वो चमक नहीं रही। लोगों ने पूछा, “कैसा लगा बेटा अफसर बन गया?”
वो बस मुस्कुरा देती, "हां, बहुत अच्छा है… बहुत बड़ा अफसर है मेरा सूरज…"
पर उसकी आँखें कुछ और कहती थीं।
एक दिन उसकी तबियत खराब हुई। अकेले झोंपड़ी में उसे तेज बुखार आया। किसी ने सूरज को फोन किया, लेकिन उसने कहा, "मैं अगले हफ्ते आऊँगा।"
कमला ने अंतिम साँसें अपने बेटे की फोटो देख कर लीं। वो फोटो उसने अखबार से काटकर अपनी दीवार पर चिपकाई थी—जिसमें सूरज ने माँ के पैर छुए थे।
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8. अंतिम दृश्य
जब सूरज गाँव पहुँचा, माँ की चिता जल चुकी थी।
एक पुरानी औरत ने उसे पास बुलाकर कहा,
"बेटा, तेरा भाग्य बड़ा है। लेकिन तू ये न भूल—तेरी माँ तेरे बिना मरी है।"
सूरज चुप रहा… उसका सीना धड़क रहा था, लेकिन माँ का वो आशीर्वाद जो उसे हर रात सोने से पहले फोन पर मिलता था—वो हमेशा के लिए खामोश हो चुका था।
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कहानी का सार
> "माँ सिर्फ जनने वाली नहीं होती, वो तपस्विनी भी होती है। वो रोटी में भूख नहीं, बेटे का भविष्य देखती है। लेकिन जब वही बेटा माँ को भुला दे, तो वो माँ नहीं मरती… बस चुप हो जाती है, हमेशा के लिए।"