महादेव ज्योतिष केन्द्र

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महादेव ज्योतिष केन्द्र ज्योतिष कोई परमात्मा नहीं यह आपका मार?

वेदों में (विशेषकर यजुर्वेद ) कर्मकाण्ड के अन्तर्गत सकाम फल प्राप्ति के लिए बहुत से मन्त्र दिये गए हैं जो कि यज्ञ के दौरान आहुति में प्रयुक्त किये जाते हैं. इस सबसे यह सिद्ध होता है कि ज्योतिष शास्त्र बकवास नहीं यथार्थ है!

24/07/2025
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16/10/2022

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जय श्री राम
29/05/2020

जय श्री राम

ॐ श्री गणेशाय नम:ॐ सरस्वत्यै नमःबसंत पंचमी आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।तू स्वर की दाता हैं तू ही वर्णों की ज्ञाता तुझमे...
30/01/2020

ॐ श्री गणेशाय नम:
ॐ सरस्वत्यै नमः
बसंत पंचमी आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
तू स्वर की दाता हैं तू ही वर्णों की ज्ञाता तुझमे ही नवाते शीष हे सरस्वती मैया दे अपना आशीष।
या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणी, विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु में सदा सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥ वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌। हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌ वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

हे, ज्ञान की ज्योति, जगाने वाली......
हे, अमृत रस, वर्षाने वाली.........
तेरी, महिमा अपरम्पार,तुझको, पूज रहा संसार .........२
हे, ज्ञान की ज्योति, जगाने वाली.......
जो जन तेरी, शरण में आते,बल बुद्धि विद्या, ज्ञान हैं पाते .........
२हे मोक्षदायिनी, देवी माता ......
२कर दो बेड़ा पार ..........
तुझको पूज रहा संसार .........२
हे, ज्ञान की ज्योति, जगाने वाली.......
हम पर कृपा बनाये रखना ,ज्ञान से मन हर्षाये रखना ....
२हे वीणाधारिणी हंसवाहिनी .......
२हर लो, जग का सब अंधकार ......
तुझको पूज रहा संसार ....२
हे, ज्ञान की ज्योति, जगाने वाली.......2

शुभ मंगल मित्रो
13/11/2018

शुभ मंगल मित्रो

16/09/2018

।। शनिदेव के मन्त्र एवं उपाय ।।

शनि की अनुकूलता के लिए भैरव देव की पूजा करनी चाहिए।

पौराणिक मन्त्र

ॐ नीलाञ्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।

वैदिक मन्त्र

ऊँ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।
शं योरभिस्रवन्तु नः ।। ऊँ शनैश्चराय नमः।।

बीज मंत्र

ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।।

जप संख्या_ 23000

समय_ संध्या काल, शुक्ल पक्ष, शनि की होरा।
ग्रह पूजा मंत्र_ " ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः"

_________________________________________________

दान

शनि काले रंग कारक होता है। इन्हें दान में काला वस्त्र, नीलम, काली गाय, जूते, दवाइयां, काली भैंस, सरसो का तेल, नारियल, निले फूल, काले उड़द की दाल, काला तिल, चमड़े का जूता, नमक, लोहा, खेती योग्य भूमि देनी चाहिए। शनि ग्रह की शांति के लिए दान देते समय ध्यान रखें कि संध्या काल हो और शनिवार का दिन हो तथा दान प्राप्त करने वाला व्यक्ति ग़रीब और वृद्ध हो।

व्रत

शनि के प्रकोप से बचने हेतु व्यक्ति को शनिवार के दिन व्रत रखना चाहिए।

* शनिवार को पंचधातु की अंगूठी में नीलम रत्न को सीधे हाथ की मध्यमा उंगली में धारण करने से शनि बलवान हो जाते हैं, काले घोड़े की नाल या नाव के कांटे से बनी मुंदरी या छल्ला धारण करना भी लाभप्रद होता है।
आँखों में काला सुरमा लगाने से भी शनि बलवान होते हैं।
* सरसो के तेल से 27 शनिवार शरीर की मालिश करवाने से भी शनि मजबुत हो जाते हैं।

शनि के अशुभ होने की स्थिति में

* लोहे के बर्तन में दही चावल और नमक मिलाकर भिखारियों और कौओं को देना चाहिए।
* रोटी पर नमक और सरसों तेल लगाकर कौआ को देना चाहिए।
* तिल और चावल पकाकर ब्राह्मण को खिलाना चाहिए।
* अपने भोजन में से कौए के लिए एक हिस्सा निकालकर उसे दें।
* शनि ग्रह से पीड़ित व्यक्ति के लिए हनुमान चालीसा का पाठ, महामृत्युंजय मंत्र का जाप एवं शनिस्तोत्र का पाठ भी बहुत लाभदायक होता है।
* शनि ग्रह के दुष्प्रभाव से बचाव हेतु गरीब, वृद्ध एवं कर्मचारियो के प्रति अच्छा व्यवहार रखें, मोर पंख धारण करने से भी शनि के दुष्प्रभाव में कमी आती है।
* शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल्ली के तेल का दीपक जलाएँ।
* शनिवार के दिन लोहे, चमड़े, लकड़ी की वस्तुएँ एवं किसी भी प्रकार का तेल नहीं खरीदना चाहिए।
* 7 बादाम, 7 नारियल, 7 दाने काले मसूर काले कपडे में बांधकर दूध के साथ बहते पानी में बहाने पर शनि की पीड़ा से लाभ प्राप्त होता है।
* शनिवार को काले रंग की चिड़िया खरीदकर उसे दोनों हाथों से आसमान में उड़ा दें। आपकी दुख-तकलीफें दूर हो जायेंगी।
* शनिवार के दिन लोहे का त्रिशूल महाकाल शिव, महाकाल भैरव या महाकाली मंदिर में अर्पित करें।
* शनिवार को सरसों के तेल का छाया पत्र दान करें।
बहते पानी में नारियल विसर्जित करें।
* शनिवार को काले उड़द पीसकर उसके आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं।
* काले घोड़े की नाल या नाव की कील से बनी लोहे की अंगूठी मध्यमा उंगली में शनिवार को सूर्यस्त के समय पहनें।
________________________________________________
दशरथकृत शनि स्त्रोत्र जिसके शुक्लपक्ष के किसी भी शनिवार से सुरू कर के नित्य पाठ से साढ़ेसाती, ढैया तथा शनि की महादशा के पीड़ा से मुक्ति प्राप्त होती है। तथा कार्यों में सफलता प्राप्त होती है, और शरीर निरोग होता है।

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते।।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ।।

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ।।

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ।।

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ।।

12/09/2018

कुंडली में अकाल मृत्यु के योग एवं निवारण



कुंडली में अकाल मृत्यु के योग एवं निवारण



मौत का नाम सुनते ही शरीर में अचानक सिहरन दौड़ जाती है। मृत्यु एक अटल सत्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। कब, किस कारण से, किस की मौत होगी, यह कोई भी नहीं कह सकता। कुछ लोगों की अल्पायु में ही मौत हो जाती है। ऐसी मौत को अकाल मृत्यु कहते हैं। जातक की कुंडली के आधार पर अकाल मृत्यु के संबंध में जाना जा सकता है।



1- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।



2- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु आग से होती है।



3- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।



4- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो जातक की मृत्यु अस्वभाविक होती है।



5- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।



6- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का समसप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।



7- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो दुर्घटना होने का भय रहता है।



अष्टम भाव और लग्न भाव के स्वामी बलहीन हो और मंगल ६ घर के साथ बैठा हो तो ये योग बनता है |.

क्षीण चन्द्र ८ भाव में हो तो भी योग बनता है या लग्न में शनि हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तथा उसके साथ सूर्य, चन्द्र , या सूर्य राहू हो तो भी योग बनता है |.



ऐसे योंगों में मृत्यु के निम्न कारण होते है जैसे-



१– शस्त्र से , २- विष से, ३- फांसी लगाने से , आग में जलने से , पानी में डूबने से या मोटर -वाहन दुर्घटना से |.



1- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।



2- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का समसप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।





3- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो दुर्घटना होने का भय रहता है।





4- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।





5- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो जातक की मृत्यु अस्वभाविक होती है।





6- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो जातक क शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।





7- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु आग से होती है।







निवारण –



लग्नेश को मजबूत करे उपाय के द्वारा और रत्ना के द्वारा और इसके बाद भी यदि दुर्घटना होती है तो सर महाम्रिन्त्युन्जय का जाप या मृत्संजनी का जाप ही ऐसे जातक को
बचा सकता है

उदारहण के लिए श्रीमती इंदिरा गाँधी के कुंडली देखे जिनके लग्न में कर्क राशी का शनि है और ६ भाव में राहू और शुक्र …और लग्न का स्वामी चन्द्र ७ भाव में है..







क्या आप दीर्घायु होना चाहते है तो निम्न मंत्रो का ११ बार जाप करें और चमत्कार अपने आप देख्ने…



” अश्वथामा बलीर व्यासो हनुमानाश च विभिशाना कृपाचार्य च परशुरामम सप्तैता चिरंजीवानाम ”

१ अस्वधामा २- राजा बलि ३ व्यास ऋषि , ४-अनजानी नंदन श्री राम भक्त हनुमान ५- लंका के राजा विभीषण
६- महा तपश्वी परशुराम , ७- क्रिपाचार्य .. ये सात नाम है जो अजर अमर है और आज भी पृथ्वी पर विराजमान है…







अद्भुत कवच: सफलता का मंत्र, समस्याओं का निदान-



बग्लामुखी कवच :— यह समय घोर प्रतिस्पर्धा का है। आज व्यक्ति खुद के दुखों से ज्यादा दूसरों के सुख से दु:खी है। ऎसे में मनुष्य के कई शत्रु बन जाते हैं। दूसरों से आगे निकलने की होड में व्यक्ति एक-दूसरे का दुश्मन बनता चला जाता है। यहां तक की तांत्रिक प्रयोग करवाने से भी नहीं चूकते। इसलिए हमारे ग्रन्थों में शत्रुबाधा, मुकदमा, कलह, डर इत्यादि से रक्षा करने के लिए बग्लामुखी कवच धारण करना बताया गया है। बग्लामुखी कवच धारण करने के बाद व्यक्ति पर शत्रु द्वारा किया गए सभी तांत्रिक प्रयोग विफल हो जाते हैं। इस कवच को धारण करने से शत्रु भय दूर होता है व मुकदमों में विजय होती है।



अभेद्य महामृत्युंजय कवच : —जब जन्म कुंडली में मृत्यु का योग न हो लेकिन फिर भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो इसे अकाल मृत्यु कहा जाता है। हर समय किसी अनहोनी का डर लगा रहता है। इन्हीं कारणों से बचाव के लिए मां भगवती ने भगवान शिव से पूछा कि प्रभू अकाल मृत्यु से रक्षा करने और सभी प्रकार के अशुभों से रक्षा का कोई उपाय बताइए। तब भगवान शिव ने महामृत्युंजय कवच के बारे में बताया। महामृंत्युजय कवच को धारण करके मनुष्य सभी प्रकार के अशुभो से बच सकता है और अकाल मृत्यु को भी टाल सकता है।



सर्वजन वशीकरण कवच : —आकर्षण, व्यक्तित्व, मधुरता, मोहकता ये सब शब्द किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए बहुत मायने रखते हैं। आज के युग में हमें कई लोगों से मिलना पडता है जिसमें पुरूष, स्त्री, अधिकारी व अन्य तरह के लोग होते हैं। उन सब पर प्रभाव जमाने के लिए आवश्यक है कि हमारे व्यक्तित्व में कोई विशेष बात हो या हमारे चेहरे पर चुम्बकीय आर्कषण हो जिसे देखते ही सामने वाला प्रभावित हो जाए। सर्वजन वशीकरण कवच धारण करके आप महसूस करेंगे कि आपके व्यक्तित्व में एक अनोखा आर्कषण आ जाएगा। इसे धारण करने के बाद आप आर्कषण, शांति और सुकून महसूस करेंगे। साथ ही अपने आर्कषक व्यक्तित्व का परिणाम भी देखेंगे।



सौंदर्य कवच :— हर स्त्री की सदैव यही सोच बनी रहती है कि उसमें यौवन, रूप लावण्य, आर्कषण सदैव बना रहे। लेकिन कई लडकियों में विवाह योग्य उम्र हो जाने के बाद भी यौवन, रूप लावण्यता नहीं रहती है। ब्यूटी पार्लर अथवा सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करके बढती उम्र को छुपाने की कोशिश की जाती है। तंत्र में ऎसी औरते अनंग मरू साधना द्वारा काम संतुष्टी प्राप्त कर सकती हैं। लेकिन जो औरते नौकरी या व्यवसाय में है अथवा जो मंत्र जाप या पूजा नहीं कर सकती वे सौंदर्य कवच को धारण कर अपने जीवन में यौवन व रूप लावण्यता प्राप्त कर सकती हैं। इस कवच को धारण करने से शारीरिक ही नहीं अपितु आत्मिक सुंदरता का भी विकास होता है।



अकाल मृत्यु का भय नाश करतें हैं महामृत्युञ्जय—–
ग्रहों के द्वारा पिड़ीत आम जन मानस को मुक्ती आसानी से मिल सकती है। सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।



सावन में शिवशंकर की पूजा :—–
सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।



क्यों किया जाता है महादेव का अभिषेक ????
महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्चि्छत हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।



‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’



इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-



‘ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥



ध्यान के पश्चात ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ के अलावा जन साधारण को महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । अत: शिव-पार्वती जी का षोडशोपचार पूजन कर राशियों के अनुसार दिये मंत्र से अलग-अलग प्रकार से पुष्प अर्पित करें।

राशियों के अनुसार क्या चढ़ावें भगवान शिव को..????



भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 88 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।



मेष:-ऊँ ह्रौं जूं स:, इस त्र्यक्षरी महामृत्युछञ्जय मंत्र बोलते हुए11 बेलपत्र चढ़ावें।
वृषभ:- ऊँ शशीशेषराय नम: इस मंत्र से 84 शमीपत्र चढ़ावें।
मिथुन:- ऊँ महा कालेश्वराय नम: (बेलपत्र 51)।
कर्क:- ऊँ त्र्यम्बकाय नम: (नील कमल 61)।
सिंह:- ऊँ व्योमाय पाय्र्याय नम: (मंदार पुष्प 108)
कन्या:- ऊँ नम: कैलाश वासिने नंदिकेश्वराय नम:(शमी पत्र 41)
तुला:- ऊँ शशिमौलिने नम: (बेलपत्र 81) वृश्चिक:
ऊँ महाकालेश्वराय नम: ( नील कमल 11 फूल)
धनु:- ऊँ कपालिक भैरवाय नम: (जंवाफूल कनेर108)
मकर:- ऊँ भव्याय मयोभवाय नम: (गन्ना रस और बेल पत्र 108)
कुम्भ:- ऊँ कृत्सनाय नम: (शमी पत्र 108)
मीन:- पिंङगलाय नम: (बेलपत्र में पीला चंदन से राम नाम लिख कर 108)
सावन सोमवार व्रत नियमित रूप से करने पर भगवान शिव तथा देवी पार्वती की अनुकम्पा बनी रहती है।जीवन धन-धान्य से भर जाता है।
सभी अनिष्टों का भगवान शिव हरण कर भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं।

हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की 🙏🙏आप सभी को कृष्णजन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये
02/09/2018

हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की 🙏🙏
आप सभी को कृष्णजन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये

02/09/2018

बन रहा है 'द्वापर युग' वाला अद्भूत योग! 2 सितंबर रविवार को मनाई जाने वाली श्री कृष्ण जन्माष्टमी की व्रत विधि और धार्मिक महत्व !

नटखट नंद गोपाल, यशोदा के नंद लाल और भक्तों के भगवान श्री कृष्ण का जन्म उत्सव इस वर्ष भी धूमधाम से मनाया जाएगा। वैसे तो श्री कृष्ण जन्माष्टमी हर साल मनाई जाती है लेकिन इस बार जन्माष्टमी पर अद्भूत योग बन रहा है। ये ठीक वैसा ही योग है जो द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के जन्म के समय बना था। इस योग को श्री कृष्ण जयंती के नाम से जाना जाता है।

(सूचना: स्मार्त संप्रदाय के लोग श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2 सितंबर को मनाएंगे जबकि वैष्णव पंथ के अनुयायी जन्माष्टमी का पर्व 3 सितंबर को मनाएंगे। वैष्णव और स्मार्त सम्प्रदाय मत को मानने वाले लोग इस त्यौहार को अलग-अलग नियमों से मनाते हैं।)

हिन्दू धर्म ग्रन्थ निर्णय सिंधु के अनुसार,

जब भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में अर्ध रात्रि 12 बजे रोहिणी नक्षत्र हो और सूर्य सिंह राशि में तथा चंद्रमा वृष राशि में हो, तब श्री कृष्ण जयंती योग बनता है। द्वापर युग में घटित यह काल चक्र 2 सितंबर 2018, रविवार को भी घटित होगा। 2 सितंबर को रात्रि 6 बजकर 36 मिनट के बाद अष्टमी तिथि लग रही है और इस तिथि में रोहिणी नक्षत्र व्याप्त होगा।

जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त 2018

निशीथ पूजा मुहूर्त

23:58:25 से 24:43:35

तकअवधि0 घंटे 45

नोटः ऊपर दिया गया मुहूर्त 2 सितंबर के लिए है।

बैष्णव जन्माष्टमी का शुभ मुहुर्त

3 सितंबर 23:55 से 24:40 तक

सुखी जीवन के लिए जन्माष्टमी पर करें ये काम

प्रेम में सफलता और बढ़ोत्तरी के लिए गाय के दूध से भगवान कृष्ण को भोग लगाएं और पंचामृत से उनका अभिषेक करें।

भौतिक सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए भगवान श्री कृष्ण को माखन मिश्री का भोग लगाएं और कच्ची लस्सी से अभिषेक करें।

शारीरिक व्याधि और रोगों से मुक्ति पाने के लिए दूध में तुलसी डालकर भगवान को भोग लगाएं और कच्चे दूध से अभिषेक करें।

कार्यों में आ रही परेशानियों और सफलता प्राप्ति के लिए भगवान श्री कृष्ण को लड्डुओं का भोग अर्पित करें और गन्ने के रस से अभिषेक करें।

विस्तार से जानें: जन्माष्टमी पूजा विधि

निःसंतान दंपतियों के लिए श्री कृष्ण जयंती का महत्व

इस वर्ष श्री कृष्ण जयंती योग बनना निःसंतान दंपतियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। ऐसे तमाम लोग जिन्हें अभी तक संतान की प्राप्ति नहीं हुई है। वे इस जन्माष्टमी पर पूरे विधि विधान से भगवान श्री कृष्ण का पूजन करें और व्रत रखें। साथ ही संतान गोपाल मंत्र का जाप करें और हो सके तो संतान गोपाल यंत्र की स्थापना भी करें।

“ऊं श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविंद वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्णं त्वामहं शरणं गत:।।”

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व

शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी के व्रत एवं पूजन का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री कृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार थे। कहा जाता है कि इनके दर्शन मात्र से मनुष्य के समस्त दुःख दूर हो जाते हैं। शास्त्रों में जन्माष्टमी के व्रत को व्रतराज कहा गया है। जो भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन करते हैं उन्हें महापुण्य की प्राप्ति होती है। इसके अलावा संतान प्राप्ति, वंश वृद्धि और पितृ दोष से मुक्ति के लिए जन्माष्टमी का व्रत एक वरदान है।

Address

67-A RATTAN NAGAR, TRIPURI TOWN
Patiala

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