31/08/2026
2014 का वादा, 2026 की वास्तविकता: प्रकाश आनन्द
क्या मोदी युग ने भारतीय लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था को मजबूत किया या केवल एक नए राजनीतिक आख्यान का निर्माण किया ?
यह लेख किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि सार्वजनिक रिकॉर्ड, सरकारी आँकड़ों, न्यायालयों के निर्णयों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कार्यकलापों के आधार पर वर्तमान केंद्र सरकार का आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
जनता ने परिवर्तन चुना था, व्यक्तिपूजा नहीं
सन् 2014 का आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र का एक ऐतिहासिक मोड़ था। लगभग तीन दशकों बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिला। कांग्रेस-नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के दस वर्षों के शासन के बाद देश में व्यापक असंतोष था। 2जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, कोयला आवंटन जैसे विवादों ने कांग्रेस सरकार की विश्वसनीयता को गहरी क्षति पहुँचाई। महँगाई, नीति-गत ठहराव और भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता में बदलाव की आकांक्षा पैदा की।
इसी पृष्ठभूमि में नरेंद्र मोदी ने स्वयं को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया जो निर्णायक, भ्रष्टाचार-विरोधी और विकासोन्मुख शासन देंगे। "अच्छे दिन", "न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन", "दो करोड़ रोजगार प्रति वर्ष", "विदेशों से काला धन", "न खाऊँगा, न खाने दूँगा"—ये केवल चुनावी नारे नहीं थे, बल्कि करोड़ों भारतीयों के विश्वास का आधार बने।
आज, एक दशक से अधिक समय बाद, यह पूछना लोकतांत्रिक अधिकार ही नहीं, लोकतांत्रिक दायित्व भी है कि इन वादों का परिणाम क्या रहा।
1. क्या सत्ता परिवर्तन से शासन संस्कृति बदली?
भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर परिवारवाद, भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण और संस्थागत क्षरण के आरोप लगाए। यह अपेक्षा बनी कि सत्ता में आने के बाद शासन अधिक पारदर्शी और संस्थागत होगा।
हालाँकि आलोचकों का कहना है कि समय के साथ सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा। अनेक राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की भूमिका अत्यधिक प्रभावशाली होती गई, जबकि मंत्रिमंडल और संसदीय विमर्श की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित दिखाई दी। समर्थक इसे "निर्णायक नेतृत्व" कहते हैं, जबकि आलोचक इसे संस्थागत संतुलन के लिए चुनौती मानते हैं।
यह बहस लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल प्रश्न से जुड़ी है—क्या मज़बूत नेतृत्व और मज़बूत संस्थाएँ साथ-साथ चल रही हैं, या एक दूसरे की कीमत पर?
2. नोटबंदी: सबसे बड़ा आर्थिक प्रयोग या सबसे बड़ी आर्थिक भूल?
8 नवंबर 2016 को ₹500 और ₹1000 के नोटों को चलन से बाहर कर दिया गया। सरकार ने इसके प्रमुख उद्देश्य बताए:
* काले धन पर प्रहार,
* नकली मुद्रा पर रोक,
* आतंकवाद की वित्तीय सहायता समाप्त करना,
* डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना।
लेकिन बाद के वर्षों में कई गंभीर प्रश्न सामने आए।
भारतीय रिज़र्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, चलन से बाहर की गई अधिकांश मुद्रा बैंकिंग प्रणाली में वापस लौट आई। इससे अर्थशास्त्रियों ने पूछा कि यदि लगभग पूरा नकद वापस आ गया, तो काले धन पर कितना प्रभाव पड़ा?
दूसरा प्रश्न असंगठित क्षेत्र से जुड़ा था। भारत की बड़ी आबादी नकद लेन-देन पर निर्भर थी। छोटे व्यापारियों, दिहाड़ी मजदूरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर तत्काल प्रभाव व्यापक रहा। अनेक स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों ने तर्क दिया कि नकदी संकट ने लाखों छोटे कारोबारों को प्रभावित किया।
सरकार का पक्ष था कि नोटबंदी ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया, करदाताओं की संख्या बढ़ी और औपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ। किंतु आलोचक कहते हैं कि इन लक्ष्यों को कम विघटनकारी तरीकों से भी प्राप्त किया जा सकता था।
इस प्रकार नोटबंदी आज भी भारत की आर्थिक नीति के सबसे विवादास्पद निर्णयों में गिनी जाती है।
3. बेरोज़गारी: सबसे बड़ा अधूरा वादा
2014 के चुनाव अभियान में रोजगार प्रमुख मुद्दा था।
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। ऐसी स्थिति में रोजगार सृजन किसी भी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
सरकारी भर्तियों में विलंब, प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक, संविदा आधारित नियुक्तियों की बढ़ती प्रवृत्ति और निजी क्षेत्र में पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार का अभाव—ये सभी विषय लगातार सार्वजनिक चर्चा में रहे हैं।
सरकार ने स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया और उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) जैसी योजनाएँ शुरू कीं। समर्थकों का तर्क है कि इनसे विनिर्माण और उद्यमिता को बढ़ावा मिला।
दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि इन पहलों के बावजूद बड़ी संख्या में शिक्षित युवा स्थायी और सम्मानजनक रोजगार की तलाश में हैं। रोजगार का प्रश्न आज भी भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न बना हुआ है।
4. क्या व्यक्तित्व राजनीति ने संस्थाओं को पीछे छोड़ दिया?
भारतीय लोकतंत्र की शक्ति उसकी संस्थाओं में निहित है—संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, स्वतंत्र मीडिया और नागरिक समाज।
पिछले वर्षों में विपक्ष और कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि राजनीतिक विमर्श अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रित हो गया है। अनेक चुनाव स्थानीय उम्मीदवारों या क्षेत्रीय मुद्दों की बजाय प्रधानमंत्री के नेतृत्व पर केंद्रित रहे।
समर्थकों का कहना है कि यह लोकतांत्रिक जनादेश का स्वाभाविक परिणाम है।
आलोचकों का तर्क है कि लोकतंत्र में संस्थाएँ किसी भी नेता से बड़ी होनी चाहिएँ, क्योंकि व्यक्तित्व बदलते हैं, संस्थाएँ स्थायी रहती हैं।
2014 में जनता ने केवल सरकार नहीं बदली थी; उसने शासन की संस्कृति बदलने का जनादेश दिया था।
दस वर्षों से अधिक समय बाद भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या भारत में जवाबदेह, संस्थागत और पारदर्शी शासन की दिशा में अपेक्षित परिवर्तन हुआ, या सत्ता की शैली बदलने के बावजूद अनेक पुरानी चुनौतियाँ नए रूप में बनी रहीं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह सरकार से कठिन प्रश्न पूछने का अधिकार नागरिकों को देता है। किसी भी सरकार की आलोचना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी मजबूती का प्रमाण है—बशर्ते वह आलोचना तथ्यों, तर्कों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व पर आधारित हो।
क्या सत्ता की जवाबदेही कमजोर हुई?
चुनावी बॉन्ड, संस्थागत स्वायत्तता, संसद, मीडिया और बड़े उद्योग समूहों पर उठते प्रश्न
5. चुनावी बॉन्ड: राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता या अभूतपूर्व गोपनीयता?
यदि किसी एक नीति ने वर्तमान सरकार के "भ्रष्टाचार-मुक्त शासन" के दावे पर सबसे गंभीर प्रश्न खड़े किए, तो वह चुनावी बॉन्ड योजना थी।
सरकार ने इसे राजनीतिक चंदे को बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से लाने और नकद लेन-देन कम करने का माध्यम बताया। तर्क यह था कि इससे चुनावी वित्तपोषण अधिक औपचारिक होगा।
लेकिन आलोचकों ने शुरू से कहा कि इस व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी पारदर्शिता की है। जनता यह नहीं जान सकती थी कि किस कंपनी या व्यक्ति ने किस राजनीतिक दल को कितना धन दिया।
फरवरी 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि मतदाता को राजनीतिक वित्तपोषण की जानकारी मिलना लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा है। इसके बाद सार्वजनिक हुए आँकड़ों से यह स्पष्ट हुआ कि विभिन्न राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के माध्यम से बड़ी मात्रा में धन प्राप्त हुआ, जिसमें भाजपा को सबसे अधिक राशि मिली।
यह तथ्य अपने-आप में भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं करता, लेकिन इसने राजनीतिक वित्तपोषण की पारदर्शिता और सत्ता तथा धन के संबंधों पर गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े किए।
6. ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग: निष्पक्ष जाँच या राजनीतिक धारणा?
लोकतंत्र में जाँच एजेंसियों की विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि जनता को यह लगे कि एजेंसियाँ केवल कानून के अनुसार कार्य कर रही हैं, तो लोकतांत्रिक विश्वास मजबूत होता है।
पिछले वर्षों में विपक्षी दलों ने लगातार आरोप लगाया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED), केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) और आयकर विभाग का उपयोग राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध अधिक होता है। कई विपक्षी नेताओं के यहाँ छापे पड़े और अनेक गिरफ्तारियाँ हुईं।
सरकार ने इन सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि एजेंसियाँ स्वतंत्र हैं और केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई करती हैं।
यहीं लोकतंत्र का मूल प्रश्न खड़ा होता है—केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं, बल्कि जनता को निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक है। यदि एजेंसियों की कार्रवाई पर व्यापक राजनीतिक संदेह उत्पन्न हो जाए, तो उनकी संस्थागत विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
7. संसद: बहस का मंच या औपचारिकता?
भारतीय संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च विधायी मंच है। परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण विधेयकों पर विस्तृत चर्चा होती थी और अनेक विधेयक स्थायी समितियों के पास भेजे जाते थे।
आलोचकों का कहना है कि हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण विधेयक अपेक्षाकृत कम चर्चा के साथ पारित हुए। विपक्ष ने आरोप लगाया कि उनकी आवाज़ को पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
संसद से विपक्षी सांसदों के निलंबन की घटनाओं ने भी व्यापक बहस को जन्म दिया। समर्थकों का कहना था कि संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए अनुशासन आवश्यक है। आलोचकों का तर्क था कि लोकतंत्र में असहमति का उत्तर बहस से दिया जाना चाहिए, न कि केवल दंडात्मक उपायों से।
लोकतंत्र में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं होती; वह सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने का भी माध्यम है।
8. मणिपुर: प्रशासनिक चुनौती और राजनीतिक प्रश्न
2023 में मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा स्वतंत्र भारत की सबसे गंभीर आंतरिक चुनौतियों में से एक थी।
सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुई, हजारों विस्थापित हुए और व्यापक संपत्ति का नुकसान हुआ। महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार के वीडियो सामने आने के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया।
सरकार ने सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई और स्थिति सामान्य करने के प्रयास किए। लेकिन आलोचकों का कहना था कि प्रारंभिक चरण में प्रतिक्रिया पर्याप्त तेज़ नहीं थी और राजनीतिक नेतृत्व की ओर से अपेक्षित संवेदनशीलता तथा संवाद देर से दिखाई दिया।
यह प्रश्न केवल कानून-व्यवस्था का नहीं था, बल्कि शासन की क्षमता और संकट प्रबंधन का भी था।
9. मीडिया: प्रहरी या प्रचारक?
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया है।
पिछले कुछ वर्षों में यह आरोप बार-बार लगाया गया कि मुख्यधारा के अनेक समाचार चैनलों ने सरकार से कठिन प्रश्न पूछने की अपनी भूमिका कमजोर कर दी है।
टीवी बहसों में वास्तविक आर्थिक और सामाजिक मुद्दों की अपेक्षा राजनीतिक ध्रुवीकरण, भावनात्मक विषयों और टकराव को अधिक स्थान मिलने की आलोचना होती रही।
दूसरी ओर सरकार के समर्थक कहते हैं कि डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ने पहले से कहीं अधिक विविधता पैदा की है।
फिर भी प्रेस स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों और पत्रकारों से जुड़े मामलों ने यह बहस जारी रखी है कि आलोचनात्मक पत्रकारिता के लिए वातावरण कितना अनुकूल है।
10. अडानी विवाद: पारदर्शिता का प्रश्न
गौतम अडानी समूह भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक है। 2023 में अमेरिकी निवेश शोध संस्था हिंडनबर्ग रिसर्च ने समूह पर गंभीर वित्तीय आरोप लगाए। अडानी समूह ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार और दुर्भावनापूर्ण बताया।
विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार और समूह के बीच निकटता की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए तथा संसद में इस विषय पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए।
सरकार ने किसी भी प्रकार की अनुचित सहायता के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में सेबी की जाँच और नियामकीय प्रक्रिया पर विचार किया तथा व्यापक षड्यंत्र के आरोपों को उपलब्ध सामग्री के आधार पर स्थापित नहीं माना, हालांकि नियामकीय सुधारों और पारदर्शिता पर चर्चा जारी रही।
लोकतंत्र में प्रश्न पूछना और उत्तर माँगना वैध है। लेकिन किसी भी उद्योगपति या सरकार पर अवैध मिलीभगत का निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है जब उसके समर्थन में प्रमाण हों।
11. क्या सत्ता का केंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए चुनौती है?
वर्तमान सरकार की सबसे बड़ी विशेषता उसका अत्यधिक केंद्रीकृत नेतृत्व माना जाता है।
समर्थकों के अनुसार इससे निर्णय तेज़ होते हैं, नीतियों में स्पष्टता आती है और प्रशासनिक समन्वय बेहतर होता है।
आलोचकों का मत है कि अत्यधिक केंद्रीकरण से मंत्रिमंडल, संसद और संस्थागत विमर्श की भूमिका सीमित हो सकती है। लोकतंत्र की दीर्घकालिक मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि निर्णय केवल लोकप्रिय नेतृत्व पर नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं पर आधारित हों।
किसी लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल चुनाव जीतने की क्षमता से नहीं होता। वास्तविक कसौटी यह है कि सत्ता कितनी पारदर्शी है, संस्थाएँ कितनी स्वतंत्र हैं, संसद कितनी प्रभावी है, मीडिया कितना निर्भीक है और नागरिक कितनी स्वतंत्रता से प्रश्न पूछ सकते हैं।
वर्तमान सरकार के समर्थक उसकी निर्णायक नेतृत्व शैली, अवसंरचना निवेश, कल्याणकारी योजनाओं और वैश्विक कूटनीति को उसकी प्रमुख उपलब्धियाँ बताते हैं। वहीं आलोचक चुनावी वित्तपोषण, संस्थागत स्वायत्तता, संसद की भूमिका, मीडिया, नागरिक स्वतंत्रताओं और आर्थिक चुनौतियों को लेकर गंभीर प्रश्न उठाते हैं।
लोकतंत्र में इन दोनों दृष्टिकोणों की परीक्षा अंततः तथ्यों, सार्वजनिक विमर्श और मतदाताओं के निर्णय से होती है।
लोकतंत्र का भविष्य: आर्थिक चुनौतियाँ, सामाजिक ध्रुवीकरण और जवाबदेही का प्रश्न
12. क्या आर्थिक विकास का लाभ समान रूप से पहुँचा?
पिछले एक दशक में भारत ने दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपना स्थान बनाए रखा। सरकार ने राजमार्गों, रेलवे, डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, रक्षा उत्पादन और अवसंरचना निवेश को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया।
लेकिन किसी भी अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन केवल जीडीपी वृद्धि से नहीं किया जाता। यह भी देखा जाता है कि उस वृद्धि का लाभ किसे मिला।
आलोचकों का कहना है कि आर्थिक वृद्धि के बावजूद आय और संपत्ति की असमानता बढ़ी है। संगठित और बड़े कॉरपोरेट क्षेत्र की तुलना में छोटे और मध्यम उद्योगों को अधिक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। कोविड-19 महामारी के बाद अनेक सूक्ष्म उद्यम पूरी तरह उबर नहीं सके।
यह प्रश्न केवल विकास का नहीं, बल्कि विकास के वितरण का है।
13. किसान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और नीति
तीनों कृषि कानूनों का विरोध स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े किसान आंदोलनों में से एक था।
सरकार का कहना था कि इन कानूनों से किसानों को अधिक बाज़ार और विकल्प मिलेंगे।
किसानों के बड़े वर्ग ने आशंका व्यक्त की कि इससे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और मंडी व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
लंबे आंदोलन के बाद सरकार ने कानून वापस ले लिए।
यह घटना लोकतंत्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बड़े बहुमत वाली सरकार भी व्यापक जनविरोध के सामने अपने निर्णय पर पुनर्विचार कर सकती है। साथ ही, यह भी प्रश्न उठा कि इतने बड़े सुधार को पर्याप्त संवाद और सहमति के बिना क्यों लागू किया गया।
14. संघवाद और राज्यों के साथ संबंध
भारतीय संविधान एक सहकारी संघीय व्यवस्था की परिकल्पना करता है।
हाल के वर्षों में विपक्ष-शासित राज्यों ने आरोप लगाया कि राज्यपालों की भूमिका, वित्तीय आवंटन, केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और कुछ नीतिगत निर्णयों ने केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ाया।
सरकार का तर्क रहा कि संविधान के अनुसार सभी संस्थाएँ अपने-अपने दायरे में कार्य कर रही हैं।
संघवाद का वास्तविक परीक्षण तब होता है जब केंद्र और राज्य अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा संचालित हों।
15. क्या चुनाव ही लोकतंत्र का एकमात्र प्रमाण हैं?
सत्ता पक्ष का प्रमुख तर्क यह है कि लगातार चुनाव जीतना जनता के विश्वास का प्रमाण है।
यह तर्क आंशिक रूप से सही है। चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला हैं।
लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है।
लोकतंत्र में स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रेस, प्रभावी संसद, निष्पक्ष जाँच एजेंसियाँ, शांतिपूर्ण असहमति, नागरिक स्वतंत्रता और मजबूत स्थानीय संस्थाएँ भी समान रूप से आवश्यक हैं।
यदि चुनाव नियमित हों लेकिन अन्य लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर पड़ जाएँ, तो लोकतंत्र का संतुलन प्रभावित हो सकता है। यह चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि विश्व के अनेक लोकतंत्रों में चर्चा का विषय रही है।
16. विपक्ष की विफलता भी लोकतंत्र का संकट है
वर्तमान सरकार की आलोचना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक विपक्ष का मूल्यांकन भी है।
कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही और उस पर भ्रष्टाचार, परिवारवाद, संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व संकट के आरोप लगते रहे। अनेक क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने राज्यों में पारदर्शिता और सुशासन के आदर्श प्रस्तुत नहीं कर सके।
इस कारण अनेक मतदाताओं के सामने विकल्प सीमित दिखाई देते हैं।
लोकतंत्र तब सबसे मजबूत होता है जब सत्ता भी मजबूत हो और विपक्ष भी सक्षम।
17. नागरिक की भूमिका
लोकतंत्र में नागरिक केवल मतदाता नहीं होता।
वह करदाता है।
वह प्रश्न पूछने वाला है।
वह सरकार से जवाबदेही माँगने वाला है।
वह संविधान का अंतिम संरक्षक भी है।
सरकार चाहे किसी भी दल की हो, नागरिक का अधिकार है कि वह उससे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, आर्थिक अवसर और पारदर्शिता पर उत्तर माँगे।
निष्कर्ष
2014 में भारतीय जनता पार्टी को केवल सत्ता नहीं मिली थी; उसे एक ऐतिहासिक अवसर मिला था—भारतीय राजनीति की संस्कृति बदलने का अवसर।
उसने कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय पहलें भी कीं—डिजिटल अवसंरचना का विस्तार, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, राजमार्ग निर्माण, वित्तीय समावेशन और कुछ प्रशासनिक सुधार इसके उदाहरण हैं।
साथ ही, नोटबंदी की प्रभावशीलता, बेरोज़गारी, राजनीतिक वित्तपोषण की पारदर्शिता, संस्थागत स्वायत्तता, संसद में सीमित विमर्श, मीडिया की स्वतंत्रता, मणिपुर जैसी घटनाओं के प्रबंधन और सत्ता के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर गंभीर प्रश्न भी बने रहे।
लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात से तय नहीं होता कि सरकार कितनी शक्तिशाली है, बल्कि इस बात से तय होता है कि वह आलोचना को कितना स्थान देती है, संस्थाओं को कितना स्वतंत्र रखती है और नागरिकों के प्रति कितनी जवाबदेह रहती है।
भारत का भविष्य किसी एक नेता, एक दल या एक चुनाव से निर्धारित नहीं होगा। वह इस बात से निर्धारित होगा कि संविधान की संस्थाएँ कितनी मजबूत रहती हैं, नागरिक कितने सजग रहते हैं और राजनीतिक दल कितनी ईमानदारी से सार्वजनिक उत्तरदायित्व स्वीकार करते हैं।
इतिहास में हर सरकार का अंतिम मूल्यांकन उसके प्रचार से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों, उनके परिणामों और आने वाली पीढ़ियों पर पड़े प्रभाव से होता है। यही कसौटी वर्तमान सरकार पर भी लागू होगी, और यही किसी भी भविष्य की सरकार पर भी लागू होगी।