15/05/2026
यह एक बहुत बड़ा सामाजिक भ्रम है कि “कोर्ट में सिर्फ झूठ चलता है।”
वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। विशेष रूप से उच्च न्यायालयों में व्यवस्था केवल “कह देने” पर नहीं चलती, बल्कि रिकॉर्ड, प्रक्रिया, दस्तावेज़ों की सत्यता और न्यायिक परीक्षण पर चलती है।
बहुत से लोग यह समझते हैं कि कोई भी व्यक्ति हाई कोर्ट में कुछ भी गलत तथ्य लिखकर, फर्जी दस्तावेज़ लगाकर या झूठा शपथपत्र देकर आसानी से आदेश ले सकता है। जबकि सच यह है कि उच्च न्यायालय केवल Court of Justice ही नहीं बल्कि “Court of Law” भी है — और Court of Law का सबसे बड़ा आधार होता है रिकॉर्ड की विश्वसनीयता।
हाई कोर्ट में झूठ पकड़ने की पहली व्यवस्था — Registry
बहुत लोग केवल जज को देखते हैं, लेकिन हाई कोर्ट की Registry System को नहीं समझते।
वास्तव में किसी भी याचिका के न्यायालय तक पहुँचने से पहले रजिस्ट्री उसका प्रारंभिक परीक्षण करती है। इसे Scrutiny कहा जाता है।
रजिस्ट्री कई बातों को देखती है:
दस्तावेज़ पूरे हैं या नहीं,
Annexures सही हैं या नहीं,
Certified copies लगी हैं या नहीं,
शपथपत्र विधिवत है या नहीं,
पक्षकारों का विवरण सही है या नहीं,
आदेश की कॉपी वास्तविक है या संदिग्ध,
Pagination और indexing सही है या नहीं।
कई बार तो मामला कोर्ट रूम तक पहुँचने से पहले ही defect में चला जाता है।
फर्जी दस्तावेज़ कैसे पकड़ में आते हैं
आजकल न्यायालयों में केवल कागज देखकर भरोसा नहीं किया जाता। कई स्तरों पर सत्यापन होता है।
जैसे:
आदेशों का online verification,
Case status matching,
FIR number verification,
Revenue record comparison,
Certified copy authentication,
Digital signatures,
सरकारी पोर्टल रिकॉर्ड।
यदि कोई व्यक्ति किसी आदेश, नोटिस, रिपोर्ट या सरकारी दस्तावेज़ में छेड़छाड़ करता है, तो उसका format, numbering, seal, signature pattern और रिकॉर्ड mismatch बहुत जल्दी पकड़ में आ जाता है।
झूठे शपथपत्र का खतरा
लोग अक्सर सोचते हैं कि affidavit में कुछ भी लिख देंगे तो चल जाएगा।
लेकिन न्यायालय में affidavit केवल “कागज” नहीं होता। वह शपथ पर दिया गया कथन होता है।
यदि यह साबित हो जाए कि:
तथ्य जानबूझकर छुपाए गए,
गलत तथ्य दिए गए,
दस्तावेज़ fabricated हैं,
तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं:
Petition dismiss,
Heavy cost,
Perjury proceedings,
Contempt,
IPC की धाराएँ,
भविष्य में credibility समाप्त।
“Court of Law” का वास्तविक अर्थ
High Court भावनाओं से नहीं, रिकॉर्ड से चलता है।
कई बार बाहर बैठा व्यक्ति सोचता है “सामने वाले ने झूठ बोल दिया इसलिए केस जीत गया।”
लेकिन वास्तविकता यह होती है कि:
दूसरा पक्ष रिकॉर्ड साबित नहीं कर पाया,
सही दस्तावेज़ नहीं लगाए,
limitation में चूक हुई,
pleadings कमजोर थीं,
या कानून उसके पक्ष में नहीं था।
कोर्ट “किसकी कहानी अच्छी है” इस आधार पर नहीं चलता। कोर्ट इस आधार पर चलता है कि:
रिकॉर्ड क्या कहता है,
कानून क्या कहता है,
और कौन अपने कथन को प्रमाणित कर पा रहा है।
Registry की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण क्यों है
रजिस्ट्री केवल clerical office नहीं होती।
वह न्यायिक प्रक्रिया का gatekeeper होती है।
विशेषकर हाई कोर्ट में:
defect scrutiny,
limitation scrutiny,
vakalatnama verification,
certified copies,
maintainability objections
बहुत गंभीरता से देखे जाते हैं।
कई याचिकाएँ महीनों तक defects में पड़ी रहती हैं।
क्या कभी झूठ अंदर पहुँच जाता है?
हाँ, मानवीय व्यवस्था में कभी-कभी गलत तथ्य प्रारंभिक स्तर पर अंदर पहुँच सकते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि “झूठ ही चलता है।”
क्योंकि आगे:
opposite party,
counter affidavit,
सरकारी रिकॉर्ड,
cross verification,
judicial questioning
के दौरान चीजें खुलती जाती हैं।
और जब न्यायालय को लगता है कि जानबूझकर गुमराह किया गया है, तब अदालतें बहुत कठोर टिप्पणियाँ भी करती हैं।
सबसे बड़ी गलतफहमी
लोग समझते हैं:
“कोर्ट में बड़ा झूठ बोल दो, काम हो जाएगा।”
जबकि अनुभवी अधिवक्ता जानते हैं कि न्यायालय में सबसे खतरनाक चीज़ क्या है?
“False Pleading” और “Suppression of Material Facts”
एक बार credibility चली जाए, तो पूरा केस कमजोर हो जाता है।
इसलिए अनुभवी अधिवक्ता क्या करते हैं?
अच्छे अधिवक्ता:
कमजोर तथ्य भी disclose करते हैं,
रिकॉर्ड आधारित pleading करते हैं,
verified documents लगाते हैं,
और कोर्ट को mislead करने से बचते हैं।
क्योंकि न्यायालय को कानून से अधिक “bona fide conduct” प्रभावित करता है।
यह कहना कि “कोर्ट में सिर्फ झूठ चलता है” — न्यायिक व्यवस्था को समझे बिना दिया गया अधूरा निष्कर्ष है।
सच्चाई यह है कि:
High Court की Registry,
Judicial Scrutiny,
Affidavit system,
Certified records,
और adversarial process
मिलकर झूठ और फर्जी दस्तावेज़ों को पकड़ने का मजबूत तंत्र बनाते हैं।
हाँ, प्रक्रिया लंबी हो सकती है…
लेकिन न्यायालय की पूरी संरचना रिकॉर्ड की सत्यता पर ही टिकी हुई है।