25/05/2025
आदमी है, पर आत्मा नहीं...
आत्मीयता का स्पर्श भी नहीं,
और अब तो आत्मीयता की चाह भी जैसे खो चुकी है।
जब उसकी ज़रूरत महसूस हुई,
वक़्त ही साथ छोड़ गया।
ज़िंदगी को जीते-जीते,
उसे समझने में ही देर हो गई।
काश, ज़िंदगी की भी कोई Rule Book होती—
हर कदम सही दिशा में उठता।
पर हम तो मग्न हैं,
क्षणिक लाभों की दौड़ में।
ज़िंदगी की विशालता को,
उसकी गहराई में उतरकर कभी समझा ही नहीं।
जो नहीं करना चाहिए था,
वही करते चले जा रहे हैं।
और जो करना चाहिए था,
उसका बोध तक नहीं।
अज्ञान के अंधकार में,
अज्ञानता स्वीकारने का साहस भी नहीं।
चालाक बनने की होड़ में,
बुद्धि और विवेक कहीं खो गए हैं।
सब दिशाहीन, बिखरे हुए,
अव्यवस्थित।
सभ्यता अभी अधूरी है।
सबको भटकने दो,
इस भटकाव में ही सच्चाई छनकर निकलेगी।
जो बचेंगे,
वही प्रकृति का सत्य जानेंगे।
वही सही मायने में ज़िंदगी को जी पाएंगे।
इस जीवन की सार्थकता,
शायद अंत में समझ आएगी,
या शायद कभी नहीं।
पर एक बात निश्चित है—
केवल वही टिकेगा,
जो प्रकृति और अपनी आत्मा के साथ सामंजस्य बना पाएगा।