Universal MIND

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30/06/2017
24/02/2016

मानव जीवन जितना खुली आंखों से दिखता है उतना ही रहस्मय भी है

मानव जीवन जितना खुली आंखों से दिखता है उतना ही रहस्मय भी है। रहस्य इसलिए है, क्योंकि एक दिन जीता-जागता व्यक्ति इस संसार में नहीं रहता। कुछ समय तक जीवित रह चुकने के बाद भी वह जीते-जागते अपने लोगों के लिए कालांतर में विडंबना बन जाता है। मृत्यु का सच सामने आने के बाद जीवित लोग भी अपरिचित व अदृश्य भय से भर जाते हैं। यह डर सबको लगता है। निर्धन, धनवान सभी मनुष्य इससे पीड़ित होते हैं। निर्धन मानव रोजगार के लिए संघर्ष करता है। रोजी-रोटी के प्रबंध में स्वयं को प्रवृत्त करता है। उसका जीवन परिश्रमी होता है। वह पसीना बहाता हुआ अपने रोजगार की दिशा में कार्यरत रहता है। इन गुणों के आधार पर उसका समय सदुपयोगी होकर व्यतीत होता रहता है।

धनवान व्यक्ति के पास जीने के लिए आधारभूत आवश्यक सुख-सुविधाएं विरासत के रूप में उपलब्ध हैं। आज संसार में बहुत लोग संसाधन-संपन्न हैं। अपनी समृद्धि की उपयुक्तता सिद्ध करने के लिए उन्हें सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के जीवन को भी समृद्ध बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। उन्हें अपनी धन-संपत्ति का उपयोग निर्धनता का उन्मूलन करने में करना चाहिए। निर्धन लोगों के परिश्रम को मान-सम्मान देने सहित उन्हें अच्छा पारिश्रमिक भी देना चाहिए। परोपकार का यह सूत्र निश्चय ही संसार में मानवता को बढ़ाएगा। अमीर लोगों को यह विचार अवश्य करना चाहिए कि जीवन क्षणभंगुर है। इसे जितना अधिक कल्याणकारी कार्यो में लगाया जाए उतना अच्छा प्रतिफल प्राप्त होगा।

आधारभूत जीवन आवश्यकताओं से पूर्ण मनुष्यों को अपनी दैनिक समझ को नए कोण से परखना होगा। किसी बात, अनुभव को वे अब तक जिस वर्षो पुराने दृष्टिकोण से देखते आए हैं उसमें अल्प परिवर्तन भी यदि वे करते हैं तो जीवन का उत्प्रेरक तत्व उन्हें स्पष्ट दिखाई देने लगेगा। नि:संदेह यहां से उनका जीवन संघर्षशील लोगों के लिए परोपकारी आयाम बन कर खड़ा होगा। समाज के बड़े व शक्तिशाली लोगों को अपनी तन-मन-धन की शक्तियों को गरीब जनता के उत्थान में लगाना चाहिए। इस उपक्रम से दो काम अवश्य होंगे। गरीबों का भला तो होगा ही, अमीर भी आनंदित, ऊर्जावान महसूस करेंगे

स्त्रोत से पढ़ें।

22/02/2016

हैरत में डाल देगी कामयाब लोगों के जिंदगी की सच्‍चाई, क्‍या आप वाकई में है कामयाब..!

जरूरी नहीं कि हर कामयाब दिखने वाला व्यक्ति सचमुच कामयाब हो। आमतौर पर जो ताकतवर है, पैसेवाला है, वैभवपूर्ण जीवन जीते दिखाई पड़ता है, उसे कामयाब मान लिया जाता है। फिर यदि ये कहा जाए कि जिसके पास ये सबकुछ है वो खुश नहीं है, परेशान रहता है, बीमारियों और बुरी लतों से घिरा हुआ है तो? तब भी कई लोग आंखों पर पट्टी बांधे यही सोचेंगे नहीं हमें ये सब मिलेगा तो हम बहुत खुश रहेंगे।

दरअसल, वैभव, धन, ताकत में कोई बुराई नहीं है, बल्कि जिन लोगों ने इनका सही इस्तेमाल किया है, उन्हें ही दुनिया याद रखती है। फिर ऐसे भी बहुत से लोग हैं, जिनके पास ये सबकुछ नहीं था, लेकिन फिर भी उन्होंने दुनिया को वो सबकुछ दिया, जो कोई ताकतवर इंसान दे सकता था। यूं तो उदाहरणों कोई कमी नहीं, लेकिन सैंकड़ों साल बाद भी जिन दो हस्तियों का हम समाज में महत्वपूर्ण योगदान मानते हैं, उन्हें उदाहरण के तौर पर अपने सामने रखते हैं।

एक बुद्ध और दूसरे कबीर। एक राजा के घर पैदा हुए और तमाम सवालों में घिरे रहे। अंततः सबकुछ छोड़ने के बाद ही सत्य की खोज की शुरुआत कर पाए। दूसरे हैं कबीर, जिनके माता पिता तक का पता नहीं था। गरीब जुलाहे ने पाला खुद भी ताउम्र जुलाहे का ही काम करते रहे, लेकिन पहुंचे वहीं जहां राजा के हर पैदा हुआ गौतम पहुंचा था। बात सिर्फ आध्यात्मिक जीवन में उन्नति पाने वालों तक सीमित नहीं हैं। व्यवसाय, विज्ञान, राजनीति, शिक्षा और अन्य तमाम क्षेत्रों में भी आपको ऐसे लोगों की बहुतायत मिलेगी, जिन्होंने सचमुच सफलता को पाया।

एक तरहसे देखा जाए तो हम इन लोगों को आदर्श के तौर पर सामने रखते तो हैं, लेकिन सचमुच आदर्श बनाते नहीं हैं। इस फर्क को समझने के लिए हमें मानने और करने के फर्क को समझना होगा। बेशक हम इन सभी बड़े-बड़े व्यक्तित्वों के जीवन के बारे में जानकर उनसे प्रभावित तो होते हैं, लेकिन हम बनना किनकी तरह चाहते हैं?

हम अपने आसपास जो भी लोग दूसरों पर अधिकार जमाते दिखते हैं, ज्यादा धनवान दिखते हैं, ज्यादा लोगों के बीच पूछ परख वाले दिखते हैं, उनकी तरह बनना चाहते हैं। बहुत से तो ऐसे भी हैं, जो ऐसे लोगों के इर्दगिर्द बने रहने या उनके खास लोगों की सूची में शामिल होने को ही कामयाबी समझते हैं। आरामदायक जिंदगी को भी कामयाबी कहा जाता है, तो औरों की तारीफों में कई लोग अपनी कामयाबी को तलाशते हैं।

कामयाबी क्या है? इस सवाल का जवाब किसी और से कभी लिया ही नहीं जा सकता हैं। हां ये जरूर है कि सही तरीके से जवाब ढूंढा जाए, तो खुद इस सवाल का जवाब जरूर पाया जा सकता है। अपने जीवन में मिली कामयाबी के किसी भी मौके को याद कीजिए। वो कोई भी ऐसा मौका हो सकता है, जब आप बहुत खुश हुए हों। किसी के जन्म पर, किसी के मिलने पर, कुछ पाने पर आदि जैसे छोटे बड़े कई मौके आपके जीवन में हो सकते हैं।

अब वहीं दूसरी ओर, जरा किसी ऐसी घटना को याद करते हुए उसी समय में जाने की कोशिश करिए। कुछ देर के लिए फिर वैसा ही महसूस करने का प्रयास कीजिए। ये अहसास ही आप बार बार जीवन में चाहते हैं क्‍योंकि ये स्थायी नहीं होता, इसलिएकुछ देर रहने के बाद आप दोबारा वहीं होते हैं, जहां से आपने शुरुआत की थी। ये प्रक्रिया ऐसे ही चलती रहती है। फिर एक समय ऐसा आता है, जब आप और बेहतर की एक अनंत दौड़ में दौड़ने लगते हैं। खुशी चाहे छोटी वजहों से मिले या बड़ी वजहों से उसके स्वरूप में कोई बदलाव नहीं होता, हां वजहें बदलती जाती हैं और इन बदलती वजहों से भी आप बोर होने लगते हैं।

यही वजह है कि कई लोग जिन्हें आप कामयाब समझते हैं, हकीकत में वे बहुत ही दयनीय जीवन जीते हैं। यदि उनके पारिवारिक जीवन को आप देखें या उनकी मानसिक स्थिति को समझने का आपको मौका मिले, तो आप कहेंगे ईश्वर दुश्मन को भी ऐसी कामयाबी न दे। इस अनंत दौड़ में कुछ पाने, दूसरों की नजरों में कुछ बनने और फिर उस स्थिति को बरकरार रखने के लिए प्रयासरत रहते हैं। पाने और बनने में भी कोई बुराई नहीं है बुराई है उसके नहीं मिलने पर होने वाली बेचैनी से।

दरअसल, कामयाबी खुशी का नाम है न कि लत का नाम। ये खुशी जब लत बन जाती है, तो हमारे निजी जीवन और सोच को छिन्न-भिन्न कर देती है। कामयाबी के मतलब को समझने के लिए अपने भीतर झांकने और अपनी खुशी को जानने की जरूरत है। बाहर दुनिया बहुत झूठी है, आपको ये दुनिया खूबसूरत लगे इसलिए बहुत से स्वांग रचे गए हैं। आप इसी झूठ को कामयाबी का सच मान लेंगे तो भटकाव शुरू हो जाएगा। खुद के साथ कुछ समय बिताइए और रोज खुद से सवाल पूछकर खुद से जवाब लेने का एक अभ्यास शुरू कीजिए। समय लगेगा, लेकिन वो समय भी आएगा जब आप ठीक-ठीक वो जवाब पाएंगे जो आपके लिए जरूरी हैं।

21/02/2016

राष्ट्र उभे राहते ते सत्य, तथ्य आणि भविष्याचा उमेदी जतन करु शकणा-या स्नेहमय पायावर.

ज्या राष्ट्राचा पायाच विद्वेष, खोटेपणा आणि भविष्याच्या पिढ्या वैचारिक प्रदुषनावर आधारित घडवणारा असतो त्या राष्ट्राचे भवितव्यही दुषित असणार यात शंका बाळगायचे कारण नाही.

आम्हा, आमच्या भावी पिढ्यांना सत्य हवे आहे. सत्य नसेल तर सत्याची प्रामणिक तळमळ हवी आहे. उन्माद नको तर सत्याची प्रामाणिक तळमळ हवी आहे. कोणी चुकत असेल तर त्याला मार्गावर आणण्याची आस हवी आहे.

असे वातावरण आम्ही निर्माण करू शकत नसू तर आम्ही आमचेच उद्याचे वधक, द्वेष्टे निर्माण करत राहू याबाबत शंका बाळगायचे कारण नाही.

आज आम्ही ज्यांना गोळ्या घालु असे बिनदिक्कत उन्मादात म्हणतो ते उद्या आम्हालाच गोळ्या घालणार नाहीत असे नाही.

आम्ही पेरतो ते उगवते हा जगाचा अबाधित नियम.

वेगवेगळ्या विचारसरण्या असू शकतात. नव्हे त्या असतातच. शाब्दिक वादावादी अगदीच योग्य आहे. पण प्रथमपासून आम्ही कोणाला दुष्ट ठरवून त्याला खोट्यानाट्याचा आधार घेत आरोपी बनवत जात असु, तर लक्षात घ्या, आम्ही आमच्याच हाताने एक समाजशत्रू निर्माण केला आहे. ते आमच्या पापाचेच फळ आहे. आमच्या समाजात कोणी चोर अथवा कोणी दहशतवादी पैदा होत असेल तर त्याच्या निर्मितीमागे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष आम्हीच असतो हे आम्हाला कधी समजणार? उन्मादाच्या बाहेर पडत जगाकडे, आपल्या माणसांकडे आम्ही कधी पाहणार?

जो समाज प्रगल्भ असतो तो समाज मुळात गुन्हेगार प्रसवत नाही. अशा समाजात कायद्यांचीही गरज कमीच असते.

गुन्हेगारी मनोवृत्तीचाच समाज जेंव्हा असतो तेंव्हा तो समाज गुन्हेगार/देशद्रोहीच अधिक प्रसवणार हे उघड आहे.

गरज आहे, आमचीच मनोवृती बदलण्याची. समाजाभिमुख होत त्याला आपले मानायची. ओपन होण्याची. समजण्याची व समजून घेण्याची संधी देण्याची.

08/10/2015

ऐसे जानें दूसरों के मन की बात
दूसरों के मन की बात जानने की उत्सुकता प्रत्येक व्यक्ति में होती है। मनोवैज्ञानिक सहित बहुत से लोग बहुत हद तक चेहरे के भावों को पढ़कर दूसरों के मन की बात जान लेते हैं अर्थात वे मनोभाव को जानने में माहिर होते हैं, लेकिन आपके मन में क्या चल रहा है इसे शब्दश: जानकर बता देना आश्चर्य ही है। योग से यह आश्चर्य प्राप्त किया जा सकता है। आप सोचे और हम बता दें कि आपने क्या सोचा तो आप आश्चर्य नहीं करेंगे?

योग के विभूतिपाद में अ‍ष्टसिद्धि के अलावा अन्य अनेकों प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है। उनमें से ही एक है मन: शक्ति योगा। इस योग की साधना करने से व्यक्ति दूसरों के मन की बात शब्दश: जान सकता है और यह बहुत ही सरल साधना है, लेकिन उन लोगों के लिए कठिन हैं जो अपने मन का अस्त-व्यस्त उपयोग करते हैं।

कैसे होगा यह संभव : ज्ञान की स्थिति में संयम होने पर दूसरे के चित्त का ज्ञान होता है। यदि चित्त शांत है तो दूसरे के मन का हाल जानने की शक्ति हासिल हो जाएगी। चित्त शांत होता है चित्त की दिशा और दशा को जानने व समझने से। दशा और दिशा जानी जाती है ध्यान द्वारा होशपूर्ण जीने से।

सीधा-सरल-सा सूत्र है कि जब तक आप बोलते हैं सामने वाला सुनता है। आप बोलना बंद करते हैं तभी सामने वाला जो बोल रहा है उसे आप सुन पाते हैं और समझ पाते हैं। यदि दोनों ही लगातार बोलते रहें तो दोनों को कुछ भी समझ में नहीं आएगा।

ठीक इसी तरह यदि आपका मन चुप है तभी आपको दूसरे का मन सुनाई देने लगेगा। मन का चुप होने का मतलब की आप विचार और कल्पनाओं से बाहर निकलकर पूर्णत: शांत हैं। इसे ही चित्त का शांत होना कहते हैं। कहते हैं कि इस मन: शक्ति योग के बल पर योगी चिंटियों के पैरों में बंधें घुंघरू की आवाज भी सुन सकता है तो आपके मन में तो दुनिया भर का शोर मचा हुआ है।

खैर यदि अभ्यास द्वारा दूसरों के मन की बात जानने में आप सक्षम नहीं भी हो पाएं तो चित्त तो शांत हो ही जाएगा और शांत चिंत से सभी तरह के रोग और शोक मिट जाते हैं। सेहत के लिए यह लाभदायक है।

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