Astha Jyotish & Vastu Consulted

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18/11/2023

राजस्थान का राजनीतिक विश्लेषण
आज 17 नवंबर 2023 समय 6:24 पीएम आज की प्रश्न कुंडली के अनुसार वृषभ लग्न बनती है लग्न का मालिक शुक्र केतु के साथ पंचम स्थान में सप्तम घर में सूर्य मंगल बुध अष्टम का चंद्र दशम का शनि 11वें घर का राहु और 12वीं घर में गुरु स्थिर लगन की कुंडली बनती है जो की सत्ता पक्ष के लिए अच्छा नहीं है लग्न का मालिक पीड़ित है और अष्टम घर का चंद्रमा सत्ता पक्ष के लिए नुकसानदायक साबित होता है दशम घर का मालिक दशम में यह सत्ता पक्ष को सम्मानजनक स्थिति में बनाए रखने में सक्षम रहेगा इस चुनाव में दोनों पक्ष में ही कांटे की टक्कर रहेगी तीसरी पार्टी का भी अबकी बार सरकार बनाने में सहयोग साबित होगा राजस्थान में बीजेपी सरकार बना सकती हैं अबकी बार किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नही मिल पायेगा
क्रिकेट में रोहित शर्मा कप जीतने में सफल रहेगा
पंडित ओंकार
4/4 हाउसिंग बोर्ड प्रतापगढ़
9413018305

18/11/2023

प्रतापगढ़ की राजनीति यहां पर तीन कैंडिडेट मैदान में उतरे हुए हैं कांग्रेस से रामलाल जी मीणा उनका जन्म 2 दिसंबर 1984 समय शाम को 6:00 बजे प्रतापगढ़ इनकी वृषभ लग्न की कुंडली बनती है लग्न में राहु छठे घर का शनि उच्च का सप्तम घर में सूर्य केतु अष्टम घर में गुरु शुक्र बुध भाग्य घर का मंगल उच्च का और लाभ स्थान का चंद्र इनके अभी शुक्र की महादशा चल रही है जिसमें मंगल का अंतर है अब इनके चलित के हिसाब से देखें तो इनके साडेसाती लगी हुई है जिससे उनका दिमाग अस्थिर डिसीजन लेने में कमजोर साबित होंगे शुक्र की दशा छठे घर की दशा है लग्न की दशा है जो इनके लिए अच्छी साबित नहीं होगी दूसरे नंबर पर है बीजेपी से हेमंत जी मीणा इनका जन्म 13 मार्च 1979 समय 2:30 बजे दोपहर प्रतापगढ़ इनकी कर्क लग्न की कुंडली है दूसरे घर के राहु चंद्र शनी लग्न में उच्च का गुरु सप्तम घर में शुक्र अष्टम का मंगल सूर्य केतु भाग्य घर का बुद्ध इनके अभी राहु की महादशा चल रही है राहु में भी चंद्र का अंतर चल रहा है राजनीति के लिए राहु की दशा सर्वश्रेष्ठ होती है जब इसमें भी लग्न की दशा चलेगी जो इनके लिए उत्तम फल देने वाली रहेगी तीसरे नंबर पर है बाप पार्टी से मांगीलाल जी इनका जन्म 1 जनवरी 1985 सुबह 8:00 बजे प्रतापगढ़ इनकी धनु लग्न की कुंडली बनती है लग्न में सूर्य गुरु तीसरे स्थान में मंगल शुक्र पंचम घर का चंद्र छठे घर का राहु और 12 घर में केतु बुध शनि इनके अभी चंद्र की दशा चल रही है चंद्रमा में सूर्य का अंतर है इनके अष्टम घर की दशा है जो की मार केस है जो कि उनके लिए अच्छा फल प्रदान नहीं कर पाएगी लेकिन यह है राजनीतिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का डंका जरूर बजाएंगे
तीनों कैंडिडेट की कुंडली का विश्लेषण करने के उपरांत मेरा यह डिसीजन होता है कि इसमें हेमंत जी मीणा की कुंडली एवं चलित के हिसाब से हेमंत जी मीणा जीते हुए नजर आ रहे हैं पंडित ओंकार
4/4 हाउसिंग बोर्ड प्रतापगढ़ मोबाइल नंबर 9413 018 305

27/08/2022

जय श्री कृष्ण

25/04/2021

*दिशाओ पर ग्रहों का आधिपत्य एवं उनके फलाफल*

पूर्व दिशा- सूर्य पूर्व दिशा का स्वामी है यह पुरुष जाति का सूचक, रक्तवर्ण तथा पित्त प्रकृति वाला ग्रह है| यह आत्मा, आरोग्य, स्वभाव, राज्य, देवालय का सूचक एवं पितृ कारक है| यही वजह है कि पूर्व दिशा ज्ञान, प्रकाश और आध्यात्म की प्राप्ति में व्यक्ति की मदद करती है| और पूर्व दिशा पिता का स्थान भी होता है इसलिए यदि पूर्व दिशा बंद, दबी और ढकी हो तो गृहस्वामी कष्टों से घिर जाता है| पूर्व दिशा में दोष या जन्मपत्री में सूर्य के पीड़ित होने पर पिता से सम्बन्धों में कटुता रहती है| सूर्य की इस स्थिति के फलस्वरूप सरकार से परेशानी, सरकारी नौकरी में परेशानी, सिरदर्द, नेत्र रोग, हृदय रोग, चर्म रोग, अस्थि रोग, पीलिया, ज्वर, क्षय रोग व मस्तिष्क की दुर्बलता आदि की सम्भावना रहती है| इसीलिए वास्तु शास्त्र में इन्हीं बातों का ख्याल रखते हुए पूर्व दिशा को खुला छोड़ने की सलाह दी जाती है|

पश्चिम दिशा- ज्योतिषीय आधार पर शनि पश्चिम दिशा का स्वामी है और शनि एक नपुंसक जाति का कृष्ण वर्ण तथा वायु तत्व वाला ग्रह है| इसकी स्थिति के आधार पर आयु, बल, दृढ़ता, विपत्ति, यश व नौकर-चाकरों का विचार किया जाता है| यह इकलौता ऐसा ग्रह है जो मोक्ष कारक है, शनि व्यक्ति को दुर्भाग्य तथा संकटों के चक्कर में डालकर अंत में शुद्ध और सात्विक बना देता है| वहीँ वास्तु में इसे वरुण का स्थान बताया गया है और यह सफलता, यश और भव्यता का द्योतक माना गया है| पश्चिम दिशा में दोष या जन्मपत्री में शनि के पीड़ित होने पर नौकरों से क्लेश, नौकरी में परेशानी, वायु विकार, लकवा, रीढ़ की हड्डी में तकलीफ, भूत-प्रेत का भय, चेचक, कैंसर, कुष्ठ रोग, मिर्गी, नपुंसकता, पैरों में तकलीफ आदि होने की सम्भावना बनी रहती है|



उत्तर दिशा- यह दिशा मातृ स्थान और कुबेर की दिशा है और इस दिशा का स्वामी बुध ग्रह है| बुध नपुंसक जाति का, श्यामवर्ण, पृथ्वी तत्व तथा त्रिदोष प्रकृति का ग्रह है| ज्योतिषीय विचार के आधार पर यह ज्योतिष, चिकित्सा, शिल्प, कानून तथा व्यवसाय का स्वामी है| उत्तर दिशा में दोष या जन्मपत्री में बुध के पीड़ित होने पर विद्या-बुद्धि में कमी, वाणी दोष, मामा से संबंध में कटुता, स्मृति लोप, मिर्गी, गले के रोग, नाक के रोग, उन्माद, मतिभ्रम, व्यवसाय में हानि, शंकालुता, विचार में अस्थिरता आदि होता है| इसीलिए वास्तु के अनुसार उत्तर में खाली स्थान का होना अतिआवश्यक होता है|



दक्षिण दिशा- वास्तु में दक्षिण दिशा यम की दिशा बताई गयी है और यम बुराइयों का नाश करने वाला देव है और पापों से छुटकारा दिलाते हैं| पितरों का वास इसी दिशा में होता है साथ ही यह दिशा सुख समृद्धि और अन्न का स्रोत होती है और यदि यह दिशा दूषित हो तो गृहस्वामी का विकास रुक जाता है| वहीँ ज्योतिषीय आधार पर दक्षिण दिशा का स्वामी मंगल को बताया गया है और मंगल पुरुष जाति का रक्तवर्ण, अग्नि तत्व तथा पित्त प्रकृति वाला ग्रह है| यह धैर्य, पराक्रम, भाई-बन्धु, रक्त एवं शक्ति का कारक ग्रह है| दक्षिण दिशा में दोष या जन्मपत्री में मंगल के पीड़ित होने पर भाइयों से संबंध में कटुता, क्रोध की अधिकता, दुर्घटनाएं, रक्त विकार, कुष्ठ रोग, फोड़ा-फुंसी, उच्च रक्त चाप, बवासीर, चेचक, प्लेग आदि होने की सम्भावना बलवती होती है|



आग्नेय कोण- इस कोण के अधिपति अग्नि देवता है, अग्निदेव व्यक्ति के व्यक्तित्व को तेजस्वी, सुंदर और आकर्षक बनाते है और जीवन में सभी प्रकार के सुख प्रदान करते है| जीवन में खुशी और स्वास्थ्य के लिए इस दिशा में ही आग, भोजन पकाने तथा भोजन से सम्बंधित कार्य करना चाहिए| वहीँ ज्योतिष में आग्नेय कोण का अधिष्ठाता शुक्र ग्रह है, शुक्र स्त्री जाति का श्याम और गौरवर्ण तथा जलीय तत्व वाला ग्रह है| यह काव्य, संगीत, वस्त्रा, आभूषण, वाहन, स्त्री, कामवासना तत्व व सांसारिक सुखों के कारक बताये गए हैं| आग्नेय दिशा में दोष या जन्मपत्री में शुक्र के पीड़ित होने पर पत्नी सुख में बाधा, प्रेम में असफलता, वाहन से कष्ट, शृंगार के प्रति अरुचि, नपुंसकता, हर्निया, मधुमेह, धातु एवं मूत्र संबंधी रोग, स्त्री होने की स्थिति में गर्भाशय संबधी रोग आदि हो सकते हैं|

नैऋत्य कोण- नैऋत्य कोण को वास्तु में मृत्यु का स्थान बताया गया है, यहां पिशाचों का वास होता है| ज्योतिष में नैऋत्य कोण का अधिष्ठाता ग्रह राहु है, यह कृष्ण वर्ण का एक क्रूर ग्रह है और कुण्डली में इसकी स्थिति के आधार पर गुप्त युक्ति बल, कष्ट और त्रुटियों का विचार किया जाता है| नैऋत्य कोण में दोष या जन्मपत्री में राहु के पीड़ित होने पर परिवार में असमय मौत की आशंका, दादा से परेशानी, मन में अहंकार की भावना की उत्पत्ति, त्वचा रोग, कुष्ठ रोग, मस्तिष्क रोग, भूत-प्रेत का भय आदि की सम्भावनाएं प्रबल रहती हैं|

केतु भी राहु की तरह कृष्ण वर्ण का एक क्रूर ग्रह है, इसकी स्थिति के आधार पर नाना से परेशानी, किसी के द्वारा किए गए जादू-टोने से परेशानी, छूत की बीमारी, रक्त विकार, दर्द, चेचक, हैजे, चर्म रोग का विचार किया जाता है|

वायव्य कोण- वायव्य दिशा का स्वामी चन्द्रमा है, यह स्त्री जाति का, श्वेतवर्ण तथा जलीय प्रकृति वाला ग्रह है| यह मन, चित्तवृत्ति, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, संपत्ति व माता का कारक है| वहीँ वास्तु में वायव्य कोण वायुदेव स्थान है, वायुदेव हमें शक्ति, प्राण, स्वास्थ्य प्रदान करते है और यह दिशा ही मित्रता और शत्रुता का आधार बनती है| वायव्य दिशा में दोष या जन्मपत्री में चंद्रमा के दूषित होने पर माता से संबंध में कटुता, मानसिक परेशानियां, अनिद्रा, दमा, श्वास रोग, कफ, सर्दी जकुाम, मूत्र रोग, स्त्रियों को मासिक धर्म संबंधी रोग, पित्ताशय की पथरी, निमोनिया आदि होने की सम्भावना बनती है|



ईशान कोण- ईशान दिशा का स्वामी है गुरु है यह पुरुष जाति का, पीतवर्ण आकाश तत्व वाला ग्रह है| ज्योतिष में इसके द्वारा पारलौकिक एवं आध्यात्मिक सुखों का विशेष रूप से विचार किया जाता है| वहीँ वास्तु में इसे शिव अर्थात सोम (दिन) का स्थान बताया गया है जो ज्ञान एवं विद्या के अधिष्ठाता हैं| वास्तु के अनुसार पूजा का स्थान ईशान कोण की ओर बनाना भी अतिशुभ रहता है| यह कोण धन, स्वास्थ्य ऐश्वर्य, वंश में वृद्धि कर उसे स्थायित्व प्रदान करने वाला है इस कोण को भवन में सदैव स्वच्छ एवं पवित्र रखना चाहिये| ईशान कोण में दोष और जन्मपत्री में गुरु के पीड़ित होने पर पूजा पाठ के प्रति विरक्ति, देवताओं, गुरुओं और ब्राह्मणों पर आस्था में कमी, आय में कमी, संचित धन में कमी, विवाह में देरी, संतानोत्पत्ति में देरी, मूर्च्छा, उदर विकार, कान का रोग, गठिया, कब्ज, अनिद्रा आदि कष्ट होने की सम्भावना रहती है|

इस प्रकार वास्तु और ज्योतिष के अनुसार सभी दिशाओं के स्वामी अलग अलग ग्रह और देवता होते है और उनका जीवन में अलग अलग प्रभाव उनकी स्थिति और भवन के वास्तु के अनुसार पडता है|

06/10/2020

1. मान-सम्मान की प्राप्ति हेतु -
यदि संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी मान-सम्मान नहीं मिल रहा है, समाज में आप अपनी बात नहीं कह पा रहे हैं। करना जाते हैं अच्छा और बुरा हो जाता है। लोगों ने आपसे कहा है कि निजकृत कर्मों की वजह से आपका शनि अनुकूल नहीं है तो मंगलवार के दिन यह पूजा प्रारंभ करें और लगातार 40 दिन करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत गीले कपड़ों में 9, 11 या 21 श्वेतार्क के पुष्प हनुमान जी के श्रीचरणों में अर्पित करें। अवश्य लाभ मिलेगा। हर रोज ऊँ हं पवननदनाय स्वाहा मंत्र की 5 माला का जाप करें।

2. चल-अचल संपत्ति हेतु-
लाख कोशिशें के बावजूद भी आप भूमि-भवन और वाहन की प्राप्ति नहीं कर पा रहे हैं। आपके पास धन है उसके बाद बावजूद भी आप संपत्ति नहीं खरीद पा रहे हो और किसी ने आपसे कहा है कि जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की यह पूजा आपको लाभ देगी। किसी भी मंगलवार को यह पूजा प्रारंभ करें और लगातार 21 दिन तक करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत भगवान सूर्य को जल देने के बाद लाल कपड़े में श्रद्घानुसार मसूर की दाल बांधकर सुहागिन कर्मचारी महिला को दान में दे। हर रोज 9 माला ऊँ राम भक्ताय नम: इस मंत्र का जाप करें।

3. पारिवारिक सुख हेतु-
संपूर्ण मेहनत और परिश्रम के बावजूद भी पारिवारिक सदस्य एक साथ नहीं रह पा रहे हो, घर में हमेशा कलाह रहता हो, बाहर सब कुछ ठीक है और घर में प्रवेश करते ही आपस में टकराव हो जाता है और लोगों ने आपको भयभीत किया है कि जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की यह पूजा आपको लाभ देगी। किसी भी मंगलवार के दिन यह पूजा प्रारंभ करें। लगातार 43 दिन तक करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नान करने वाले जल में हल्दी की गांठ डालकर स्नान करें। ततपश्चात गीले वस्त्रों में भगवान सूर्य को जल चढ़ाएं। ऊँ कपिराजाय नम: मंत्र का 108 बार जाप करें।

4. वाहन प्राप्ति हेतु-
संपूर्ण आर्थिक संपन्नता के बावजूद भी वाहन प्राप्ति में तकलीफ आ रही हो, लोगों ने आपको डराया हो कि जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की यह पूजा आपके लिए रामबाण रहेगी। किसी भी मंगलवार के दिन यह पूजा प्रारंभ करें। लगातार 40 दिन करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत 400 ग्राम साबूत मसूर गंगाजल से धोकर अपने ऊपर से 7 बार उसारकर बहते पानी में प्रवाह करें। साथ ही हनुमान जी के ऊँ नमो भगवते आन्ञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा। मंत्र 3 माला हर रोज करें।

5. संतान सुख हेतु -
प्रयासों के बावजूद भी प्रयासों भी संतान आपके हाथ से निकल रही हो, आपकी बात नहीं मानती हो, संतान को सफलता नहीं मिल रही हो, संतान की शादी नहीं हो रही हो, संतान गलत राह पर चल रही हो तो हनुमान जी का यह उपाय आपके लिए राम बाण रहेगा। यह उपाय आप मंगलवार को प्रारंभ करें। लगातार 40 दिन करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत हनुमान जी की मूर्ति जो आशीर्वाद देते हुए नजर आती हो उसे 108 गुलाब के पुष्पों की माला अर्पित करें। वहीं बैठकर ऊँ वायु पुत्राय नम: मंत्र का जाप करें।

6. कोर्ट-कचहरी के मसलें निवारण हेतु-
ईमानदारी, मेहनत, परिश्रम और सच्चाई से काम करने के बावजूद भी कोई न कोई अड़चनें आपको परेशान करती हो और किसी ने आपसे कहा है कि जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की यह आराधना कष्ट मिटायेगी। मंगलवार के दिन सूर्योदय से पूर्व नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत हनुमान जी के श्रीचरणों में ऊँ अग्निगर्भाय नम: मंत्र का जाप करते हुए 108 चुटकी सिंदूर अर्पित करें। अवश्य लाभ मिलेगा। ऐसा नियमित 40 दिन करें।
मंगलवार के दिन कन्याओं को श्रद्घानुसार चावल देना भी शुभ रहेगा।

7.दांपत्य सुख हेतु-
वैवाहिक रिश्तों में बिना मतलब कड़वाहट रहती हो, बात-बात पर पति-पत्नी में झगड़ा हो जाता हो, और किसी ने आपसे कहा है कि आप दोनों की जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की यह पूजा आपको अवश्य लाभ देगी। हर मंगलवार के दिन श्रद्घापूर्वक पंचोपचार पूजन करने के उपरांत मिट्टी के पात्र में शहद भरकर हनुमान जी के मंदिर में अर्पित करें। वहीं बैठकर शुद्घ लाल आसन पर ऊँ श्री हनुमते नम: मंत्र का 108 बार जाप करें। ऐसा 21 मंगलवार करें। अवश्य लाभ मिलेगा।

8. दुर्घटना निवारण हेतु-
यदि आपके साथ में बिना कारण ही दुर्घटना घट जाती है, बार-बार आपकी गाड़ी का एक्सीडेंट होता हो, अनावश्यक भय बना रहता हो, और किसी ने आपसे कहा है कि आपकी जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की यह प्रयोग आपको अवश्य लाभ देगा। मंगलवार के दिन यह पूजा प्रारंभ करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत हनुमान जी का ध्यान करते हुए अपने पूजा स्थान में चमेली के तेल का दीपक जलाएं। श्रद्घापूर्वक ऊँ हं हनमते रुद्रआत्मकाय हुं फट्। मंत्र का जाप करें। ततपश्चात 108 चमेली के पुष्प हनुमान जी के श्रीचरणों में अर्पित करें। ऐसा 11 मंगलवार करें।

9. शत्रु कष्ट निवारण हेतु-
बिना वजह दुश्मनों का डर सताता हो, हमेशा मन भयभीत रहता हो, और लोगों ने आपको भयभीत किया हो कि कि आपकी जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की यह पूजा करने से दुश्मन आपका बुरा नहीं कर पाएगा। किसी भी मंगलवार के दिन यह पूजा प्रारंभ करें। प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत माता-पिता के चरण स्पर्श करें। पारद हनुमत प्रतिमा के सामने लाल हकीक की माला पर हर रोज ऊँ नमो हनुमते रुदावताराय सर्व शत्रु संहाराणाय सर्व रोग हराय, सर्व वशीकरणाय राम दूताय स्वाहा मंत्र का जाप करने से अवश्य लाभ मिलेगा।

10. कार्य बाधा निवारण हेतु-
चलते काम में अचानक बाधा आती हो, चलता-चलता काम अचानक रुक जाता हो, व्यवसाय में बिना वजह परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हो और लोगों ने आपसे कहा है कि आपकी जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की इस पूजा से संपूर्ण कष्टों का निवारण होता है। मंगलवार के दिन पूजा प्रारंभ करें। लगातार 40 दिन करें। हर रोज नित्यक्रम से निवृत्त हो स्नानोपरांत दक्षिणावर्ती हनुमान जी की मूर्ति के सामने तेल का दीपक जलाएं। ततपश्चात गुड़ के चूरमे का भोग लगाएं। ऊँ नम: हरीमरकटमरकटाय स्वाहा इस मंत्र का 3 माला जाप करें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

11. कर्जें से मुक्ति हेतु-
लाख प्रयासों के बावजूद भी कर्जें से मुक्ति नहीं मिल पा रही हो और किसी ने आपसे कहा है कि आपकी जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल नहीं है, शनिदेव की वजह से कष्ट आ रहे हैं तो हनुमान जी की इस पूजा का करने से संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा। किसी भी मंगलवार के दिन लाल चंदन की हनुमान जी की प्रतिमा बनाकर, गंगाजल से पवित्र कर श्रद्घापूर्वक अपने पूजा स्थान में लाल वस्त्र पर स्थापित करें। हर रोज देसी घी का दीपक जलाकर 21 दिन तक 11 माला ऊँ नमो हनुमते आवेशाय आवेशाय स्वाहा। मंत्र का जाप करें। जाप के उपरांत 9 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं को लाल वस्त्र का दान दें। संपूर्ण कष्टों से छुटकारा मिलेगा।

12. कारोबार में लाभ हेतु-
संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी कारोबार में लाभ नहीं मिल रहा हो, सारे प्रयास विफल हो रहे हो तो मंगलवार के दिन हनुमान जी की यह आराधना प्रारंभ करें। और लगातार 40 दिन करें। हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत सूर्योदय से पूर्व हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करें। ततपश्चात शुद्घ चंदन का धूप जलाकर, घी का दीपक प्रज्जवलित कर एक पाठ सुंदरकांड का करें। पूजा के उपरांत मीठा भोजन गरीब व जरूरतमंद कन्याओं को कराएं।

13. रोग मुक्ति हेतु-
यदि प्रयासों के बावजूद भी रोगों से पीछा नहीं छुट रहा हो, डॉक्टर को बीमारी समझ में नहीं आ रही हो, द वा काम नहीं कर रही हो और किसी ने आपसे कहा है कि आपकी जन्मकुंडली में निजकृत कर्मों की वजह से शनि अुनकूल फल प्रदान नहीं कर रहा है तो हनुमान जी की यह पूजा आपको अवश्य लाभ देगी। हर रोज नित्यकर्म से निवृत्त हो स्नानोपरांत मंगलवार के दिन हनुमान जी का ध्यान करते हुए पंचोपचार का पूजन करें। लाल कपड़े 700 ग्राम रेवडिय़ां बांधकर पोटली बनाकर अपने पूजा स्थान में रख दें। घी का दीपक जलाकर संकटमोचन हनुमानष्टक के 11 पाठ करें। ततपश्चात यह पोटली अपने ऊपर से 7 बार उसार करके बहते पानी या सरोवर में प्रवाहित कर दें। पूजा के उपरांत गरीब बच्चों को मीठे परांठे खिलाना भी लाभयदायक रहेगा।

22/05/2019

Guru Slokas (गुरु श्लोक)
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

भावार्थ :

गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु हि शंकर है; गुरु हि साक्षात् परब्रह्म है; उन सद्गुरु को प्रणाम ।

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धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः । तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते ॥

भावार्थ :

धर्म को जाननेवाले, धर्म मुताबिक आचरण करनेवाले, धर्मपरायण, और सब शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करनेवाले गुरु कहे जाते हैं ।

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निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते । गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते ॥

भावार्थ :

जो दूसरों को प्रमाद करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते से चलते हैं, हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध करते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं ।

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नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसंनिधौ । गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् ॥

भावार्थ :

गुरु के पास हमेशा उनसे छोटे आसन पे बैठना चाहिए । गुरु आते हुए दिखे, तब अपनी मनमानी से नहीं बैठना चाहिए ।

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किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च । दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम् ॥

भावार्थ :

बहुत कहने से क्या ? करोडों शास्त्रों से भी क्या ? चित्त की परम् शांति, गुरु के बिना मिलना दुर्लभ है ।

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प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा । शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः ॥

भावार्थ :

प्रेरणा देनेवाले, सूचन देनेवाले, (सच) बतानेवाले, (रास्ता) दिखानेवाले, शिक्षा देनेवाले, और बोध करानेवाले – ये सब गुरु समान है ।

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गुकारस्त्वन्धकारस्तु रुकार स्तेज उच्यते । अन्धकार निरोधत्वात् गुरुरित्यभिधीयते ॥

भावार्थ :

'गु'कार याने अंधकार, और 'रु'कार याने तेज; जो अंधकार का (ज्ञान का प्रकाश देकर) निरोध करता है, वही गुरु कहा जाता है ।

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शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च । नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥

भावार्थ :

शरीर, वाणी, बुद्धि, इंद्रिय और मन को संयम में रखकर, हाथ जोडकर गुरु के सन्मुख देखना चाहिए ।

विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम् । शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ॥

भावार्थ :

विद्वत्व, दक्षता, शील, संक्रांति, अनुशीलन, सचेतत्व, और प्रसन्नता – ये सात शिक्षक के गुण हैं ।

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अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

भावार्थ :

जिसने ज्ञानांजनरुप शलाका से, अज्ञानरुप अंधकार से अंध हुए लोगों की आँखें खोली, उन गुरु को नमस्कार ।

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गुरोर्यत्र परीवादो निंदा वापिप्रवर्तते । कर्णौ तत्र विधातव्यो गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ॥

भावार्थ :

जहाँ गुरु की निंदा होती है वहाँ उसका विरोध करना चाहिए । यदि यह शक्य न हो तो कान बंद करके बैठना चाहिए; और (यदि) वह भी शक्य न हो तो वहाँ से उठकर दूसरे स्थान पर चले जाना चाहिए ।

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विनय फलं शुश्रूषा गुरुशुश्रूषाफलं श्रुत ज्ञानम् । ज्ञानस्य फलं विरतिः विरतिफलं चाश्रव निरोधः ॥

भावार्थ :

विनय का फल सेवा है, गुरुसेवा का फल ज्ञान है, ज्ञान का फल विरक्ति है, और विरक्ति का फल आश्रवनिरोध है ।

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यः समः सर्वभूतेषु विरागी गतमत्सरः । जितेन्द्रियः शुचिर्दक्षः सदाचार समन्वितः ॥

भावार्थ :

गुरु सब प्राणियों के प्रति वीतराग और मत्सर से रहित होते हैं । वे जीतेन्द्रिय, पवित्र, दक्ष और सदाचारी होते हैं ।

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एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा ह्यनृणी भवेत् ॥

भावार्थ :

गुरु शिष्य को जो एखाद अक्षर भी कहे, तो उसके बदले में पृथ्वी का ऐसा कोई धन नहीं, जो देकर गुरु के ऋण में से मुक्त हो सकें ।

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बहवो गुरवो लोके शिष्य वित्तपहारकाः । क्वचितु तत्र दृश्यन्ते शिष्यचित्तापहारकाः ॥

भावार्थ :

जगत में अनेक गुरु शिष्य का वित्त हरण करनेवाले होते हैं; परंतु, शिष्य का चित्त हरण करनेवाले गुरु शायद हि दिखाई देते हैं ।

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सर्वाभिलाषिणः सर्वभोजिनः सपरिग्रहाः । अब्रह्मचारिणो मिथ्योपदेशा गुरवो न तु ॥

भावार्थ :

अभिलाषा रखनेवाले, सब भोग करनेवाले, संग्रह करनेवाले, ब्रह्मचर्य का पालन न करनेवाले, और मिथ्या उपदेश करनेवाले, गुरु नहीं है ।

दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् । गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन ॥

भावार्थ :

जैसे दूध बगैर गाय, फूल बगैर लता, शील बगैर भार्या, कमल बगैर जल, शम बगैर विद्या, और लोग बगैर नगर शोभा नहीं देते, वैसे हि गुरु बिना शिष्य शोभा नहीं देता ।

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योगीन्द्रः श्रुतिपारगः समरसाम्भोधौ निमग्नः सदा शान्ति क्षान्ति नितान्त दान्ति निपुणो धर्मैक निष्ठारतः । शिष्याणां शुभचित्त शुद्धिजनकः संसर्ग मात्रेण यः सोऽन्यांस्तारयति स्वयं च तरति स्वार्थं विना सद्गुरुः ॥

भावार्थ :

योगीयों में श्रेष्ठ, श्रुतियों को समजा हुआ, (संसार/सृष्टि) सागर मं समरस हुआ, शांति-क्षमा-दमन ऐसे गुणोंवाला, धर्म में एकनिष्ठ, अपने संसर्ग से शिष्यों के चित्त को शुद्ध करनेवाले, ऐसे सद्गुरु, बिना स्वार्थ अन्य को तारते हैं, और स्वयं भी तर जाते हैं ।

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पूर्णे तटाके तृषितः सदैव भूतेऽपि गेहे क्षुधितः स मूढः । कल्पद्रुमे सत्यपि वै दरिद्रः गुर्वादियोगेऽपि हि यः प्रमादी ॥

भावार्थ :

जो इन्सान गुरु मिलने के बावजुद प्रमादी रहे, वह मूर्ख पानी से भरे हुए सरोवर के पास होते हुए भी प्यासा, घर में अनाज होते हुए भी भूखा, और कल्पवृक्ष के पास रहते हुए भी दरिद्र है ।

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दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवनजठरे सद्गुरोर्ज्ञानदातुः स्पर्शश्चेत्तत्र कलप्यः स नयति यदहो स्वहृतामश्मसारम् । न स्पर्शत्वं तथापि श्रितचरगुणयुगे सद्गुरुः स्वीयशिष्ये स्वीयं साम्यं विधते भवति निरुपमस्तेवालौकिकोऽपि ॥

भावार्थ :

तीनों लोक, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल में ज्ञान देनेवाले गुरु के लिए कोई उपमा नहीं दिखाई देती । गुरु को पारसमणि के जैसा मानते है, तो वह ठीक नहीं है, कारण पारसमणि केवल लोहे को सोना बनाता है, पर स्वयं जैसा नहीं बनाता ! सद्गुरु तो अपने चरणों का आश्रय लेनेवाले शिष्य को अपने जैसा बना देता है; इस लिए गुरुदेव के लिए कोई उपमा नहि है, गुरु तो अलौकिक है ।

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06/03/2019

" जन्म कुंडली और रोग "
कई बार कुंडली में कुछ बुरे योग बन जाते हैं या दो शत्रु ग्रह इकट्ठे बैठ जाए तो व्यक्ति को कोई न कोई रोग दे ही देते हैं हालाकिं यह सूची तो बड़ी लम्बी है
इनमें से कुच्छ योग नीचे दे रहा हूँ
गुरु-राहु की युति हो तो दमा, तपेदिक या श्वास रोग हो सकता है
चन्द्र-राहु की युति हो तो पागलपन या निमोनिया रोग का रोग हो सकता है
मंगल-शनि की युति हो तो रक्त विकार, कोढ़ या ऑपरेशन ,आदि से कष्ट होगा अथवा दुर्घटना से चोट-चपेट लगने के कारण भी कष्ट होता है।
शुक्र-राहु की युति हो तो जातक अपने जीवन साथी को संतुष्ट नही कर पाता जिसे हम नामर्दी या नपुंसकता कहते हैं
शुक्र-केतु की युति हो तो जातक को पेशाब सम्बन्धी रोग होते हैं,जैसे कि स्वप्न दोष,धांत गिरना आदि
गुरु-मंगल या चन्द्र-मंगल की युति हो तो पीलिया रोग से कष्ट हो सकता है
मंगल राहू की युति भी खून से सम्बन्धित रोग देती है व्यक्ति को शरीर में कैंसर अथवा बवासीर का रोग हो सकता है
गुरु शुक्र की युति या आपसी दृष्टि सम्बन्ध मधुमेह अर्थात शूगर का रोग कर सकता है
चन्द्र राहू की युति हो तो ऐसा व्यक्ति मानसिक तौर पर असंतुष्ट होता है है
मंगल शुक्र की युति व्यक्ति को अत्यदिक कामी बनाती है
यह रोग अक्सर इन ग्रहों की महादाषा अथवा अंतर दशा में या गोचर में भी इनकी चाल के कारण हो सकते हैं

22/02/2019

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आओ समझें ज्योतिष और तंत्र का रहस्य.......
*(मनचाही संतान प्राप्ती के रहस्य और ज्योतिषीय तंत्र।)*
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*स्त्रियों में ऋतुस्राव और संतान प्राप्ति से सम्बन्धित बाधाऐं..... ज्योतिषीय दर्पण में।*
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*किसी भी स्त्री पुरुस के जीवन के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जीवन के चार प्रमुख पुर्सार्थ हैं, जिस प्रकार जीवन यापन के लिए धन, ईश्वर प्राप्ति अर्थात् मोक्ष आत्म शुद्धि धर्म का प्रमुख लक्ष्य है, ठीक उसी प्रकार सृष्टि विकास के लिए काम (समभोग) भी जीव मात्र की भ्रूण भूत अभिवृति है। प्राणियों केलिए काम (समभोग) के दो मुख्य उद्देश्य हैं प्रथम विषयानंद तथा इूसरा वंश वृद्धि। संतति अर्थात् वंश वृद्धि काम का मुलभूत आवस्यक आधार है। जिसे ज्योतिष शास्त्र जन्म कुंंडली के... मूलतः सप्तम भाव, सप्तमेश एवं शुक्र के माध्यम से अभिव्यक्त करता है।*
संतान का कारक कुंडली का पंचम भाव, पंचमेश तथा चंद्र, शुक्र, सूर्य, गुरु एवं मंगल है। चंद्र और मंगल स्त्री के मासिक धर्म और अंड निर्माण के कारण बनते हैं तथा गुरु और चंद्रमा पुरूष के वीर्य और शुक्राणुओं के कारक है। स्त्री के अंड एवं पुरुष के शुक्राणु के सहयोग से गर्भ धारण होता है। अतः इनका बलवान एवं ऊर्जावान होना परम आवश्यक है।
भारतीय ज्योतिष में ग्रह और राशियों को भी स्‍त्री-पुरुष वर्गों में बांटा गया है। मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ को पुरुष राशि और वृष, कर्क, कन्‍या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों को स्‍त्री राशि कहा गया है। इसी प्रकार चंद्रमा और शुक्र जहां स्‍त्री स्‍वभाव ग्रह है वहीं सूर्य, मंगल और गुरु पुरुष ग्रह हैं तथा शनी, राहु, बुध व केतु नपुंसक ग्रह माने जाते हैं। स्‍त्री जातकों में स्‍त्री राशि और स्‍त्री ग्रहों का प्रभाव अधिक होने पर स्‍त्रैण गुण अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होंगे। ऐसा देखा गया कि जिन मामलों में पुरुष जातकों की तुलना में स्‍त्री जातकों का विश्‍लेषण किया जाता है, उनमें स्‍त्री जातकों के लिए अलग नियम दिए गए हैं। शेष योगों के मामले में स्‍त्री और पुरुष जातकों को कमोवेेश एक ही प्रकार से फलित किए जाते हैं।
ज्योतिष के अनुसार सभी ग्रह शरीर के किसी न किसी अंग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हीं ग्रहों के प्रभाव स्वरुप हमें फल प्राप्त होते हैं और स्वास्थ्य का हाल जाना जा सकता है। जब कोई भी ग्रह पीड़ित होकर लग्न, लग्नेश, षष्ठम भाव अथवा अष्टम भाव से सम्बन्ध बनाता है। तो ग्रह से संबंधित अंग रोग प्रभावित हो सकता है। प्रत्येक ग्रह शरीर के किसी न किसी अंग को प्रभावित अवश्य करता है या उससे संबंधित बिमारी को दर्शाता है। जैसे कि :- सूर्य हृदय, पेट, पित्त , दायीं आंख, घाव, जलने का घाव, गिरना, रक्त प्रवाह में बाधा आदि को दिखाता है। उपरोक्त ग्रहों में जो ग्रह छठे भाव का स्वामी हो या छठे भाव के स्वामी से युति सम्बन्ध बनाए उस ग्रह की दशा में रोग होने के योग बनते हैं। छठे भाव के स्वामी का सम्बन्ध लग्न भाव लग्नेश या अष्टमेश से होना स्वास्थ्य के पक्ष से शुभ नहीं माना जाता है। जब छठे भाव का स्वामी एकादश भाव में हो तो रोग अधिक होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इसी प्रकार छठे भाव का स्वामी अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को लंबी अवधि के रोग होने की अधिक संभावनाएं रहती हैं।
सामान्यतया महिलाओं की दो-तीन समस्‍याएं ऐसी हैं जो आम है। पहली खून की कमी , दूसरी प्रदर(लीकोरिया) व कमर दर्द और तीसरी है आत्यधिक चिंताग्रस्त रहना । ये समस्‍याऐं मूलतः मासिकधर्म ही से जुड़ी हुई होती हैं। बहुत सी माता-बहनें इन समस्‍याओं को सामान्य मानकर नजरअंदाज करती रहती है जिससे आगे चलकर उनकी खुद की जिन्‍दगी और परिवार भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
माहवारी चक्र महीने में एक बार होता है, सामान्यतः 28 से 32 दिनों में एक बार। हालांकि अधिकतर मासिक धर्म का समय तीन से पांच दिन रहता है परन्तु दो से सात दिन तक की अवधि को सामान्य माना जाता है। अधिकांश 10 से 15 साल की आयु की लड़की के अंडाशय हर महीने एक विकसित डिम्ब (अण्डा) उत्पन्न करना शुरू कर देते हैं। वह अण्डा अण्डवाहिका नली (फैलोपियन ट्यूव) के द्वारा नीचे जाता है जो कि अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है, उसका स्तर रक्त और तरल पदार्थ से गाढ़ा हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि यदि अण्डा उर्वरित हो जाए, तो वह बढ़ सके और शिशु के जन्म के लिए उसके स्तर में विकसित हो सके। यदि उस डिम्ब का पुरूष के शुक्राणु से सम्मिलन न हो तो वह स्राव बन जाता है जो कि योनिमार्ग से निष्कासित हो जाता है। इसी स्राव को मासिक धर्म, रजोधर्म या माहवारी कहते हैं।
ज्‍योतिष गुरुओं ने मासिक धर्म की समस्‍याओं का समाधान सिंदूर में बताया है। केवल सिंदूर ही नहीं लाल चूडियां, लाल साड़ी, लाल अंत:वस्‍त्र, लाल बिंदिया और लाल लिपिस्टिक समस्‍या का समाधान कर सकते हैं। ज्‍योतिषी दृष्टिकोण से इसका कारण यह माना जाता है कि मासिक धर्म के दौरान मंगल का ह्रास होता है। इस मंगल की पूर्ति करने के लिए महिलाओं को लाल रंग का अधिक से अधिक इस्‍तेमाल उन्‍हें पुन: शक्ति प्राप्‍त करा सकता है। इसके अलावा स्‍त्री-पुरुष संबंधों को संतोषप्रद बनाने में भी मदद करता है। मांगलिक स्त्रियों या ऐसी स्त्रियों जिनकी शादी मांगलिक पुरुष से हुई है, यह उपचार करें तो बेहतर है।
इस समस्त प्रक्रिया का उद्देश्य संतान प्राप्ती से जुडा है... जो सभी की प्राकर्तिक जिम्मेदारी भी होती है व जीवन का उद्देश्य भी......
जन्मकालीन चंद्रमा से जब गोचर का चंद्रमा 3,6,10 एवं 11वें भाव को छोड़कर अर्थात लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, नवम एवं बारहवें भाव से गोचर करता है तथा उसे मंगल देखता है तथा पुरुष की जन्म कुंडली में जन्मकालीन चंद्रमा से गोचर का चंद्रमा 3,6,10,11 में से किसी एक भाव में हो तथा गुरु से चंद्रमा दृष्ट हो तब स्त्री पुरूष के संयोग से गर्भ धारण होता है। यदि पंचम भाव को सूर्य मंगल एवं गुरु देखे तथा पंचम पर किसी ग्रह का दुष्ट प्रभाव न हो तो पुत्रोत्पति होता है। यदि पंचमेश पुरुष ग्रह होकर पाप दृष्ट या युत न हो और जब चंद्र या शुक्र पचम या पंचमेश को देखे तथा पाप प्रभाव में पंचम या पंचमेश न हो तो ऐसी अवस्था में अधिकतर कन्या संतति उत्पन्न होती है।
जो दम्पति मेडिकल जांच में ठीक है किंतु संतान उत्पति में असफल है ऐसे समय का उपयोग कर संतानोत्पति कर सकते हैं। किंतु जो दम्पति मेडिकल जांच में ठीक नहीं किंतु उनकी कुंडलियों में संतान योग के कारण दिखाई दे ऐसे दम्पतियों को उचित चिकित्सा करवाना ही श्रेष्ठ है। यदि लग्नेश, लग्न, द्वितीय या तृतीय भावस्थ हो तो प्रथम संतान पंत्र और लग्नेश चतुर्थ भाव में हो तो द्वितीय संतान पुत्र होती है। यदि पंचमेश एवं पंचम भाव पर गुरु की दृष्टि तथा पंचम एवं पंचमेश पापत्व प्रभाव से रहित हो तो ऐसी स्थिति में अधिकांशतः पुत्रोत्पति होती हैं पंचम भाव शुभ प्रभाव में हो तो संतान योग होता है किंतु शुभ ग्रह का पंचमेश से दृष्ट न होने पर संतान की अभाव रहता है। सप्तम में शुक्र दशम में चंद्रमा तथा चतुर्थ में पापग्रह होने से संतानहीन योग बनता है। पंचमेश जिस भाव में स्थित है वहीं से 5,6,12वें भाव में दुष्ट ग्रह होने पर संतान अभाव रहता है। यदि संतान हो भी जाये तो उसके जीवित रहने में संदेह है। किसी जातक के जन्मांग में पंचम भाव पर पापी ग्रह शनि, राहु, केतु अथवा नीच ग्रह की दृष्टि या युति, पंचम भाव में पंचमेश नीचस्थ हो, द्वादशेष, अष्टमेश, षष्ठेश से दृष्ट या युत होने पर संतानोत्पति में बाधक है क्योंकि दुष्ट ग्रह के प्रभाव से अंडे के विकास में बाधा आती है तथा प्रोजस्टीरोन हारमोन की कमी हो जाती है। गर्भाशय की मांसपेशियां कमजोर होती है। मंगल की दृष्टि आदर्शन का कारण बनती है। पंचम भाव के उपाधिपति के नक्षत्र के उपनक्षत्र में स्थित ग्रह की दशा, अंतरदशा और प्रत्यंतर में संतान उत्पति होती है।
दूसरी समस्‍या है छोटी चिंताओं की पहले मैं इसे गंभीरता से नहीं लेता था। क्‍योंकि मुझे यह स्‍त्री विशेष या कह दें पर्सनेलिटी विशेष की समस्‍या लगती थी। जो केवल स्‍त्री ही नहीं किसी इंडी‍जुअल पुरुष में भी हो सकती थी। ज्‍योतिष अध्‍ययन के अनुसार चिंता करने की समस्‍या के कारण स्त्रियों और पुरुषों में एक जैसे होते हैं। यानि इसमें फर्क नहीं किया गया है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पूर्व में जातक हमेशा पुरुष ही रहे होंगे। ज्‍योतिष की पुस्‍तकें पढ़ने के दौरान ही एक पुस्‍तक हाथ लगी। इसमें स्त्रियों और पुरुषों के सोचने के तरीके के बारे में विस्‍तार से बताया गया था। तो मेरा भी ध्‍यान इस ओर गया।
अब सवाल यह है कि छोटी चिंताओं का स्‍वरूप क्‍या है और इसका एक साथ समाधान कैसे किया जा सकता है? ज्‍योतिष की ही पुस्‍तकों में इसका सपाट और सटीक उपाय बताया गया है। जिस तरह एक आदमी को सुखमय वैवाहिक और संबंध की दृष्टि से संतुष्टिदायक जिंदगी के लिए शुक्र की आवश्यकता होती है वैसे ही स्त्रियों के लिए इसे गुरु के रूप में देखा गया है। गुरु का नाम गुरु है तो ऐसा लगता है जैसे स्त्रियों को ज्ञान देने वाले की जरूरत है लेकिन वास्‍तव में गुरु नहीं बल्कि सांसारिकता ज्ञान और सांसारिकता का लाभ देती है। गुरु इसी सांसारिकता को रिप्रजेंट करता है। अब चूंकि गुरु किसी भी स्थिति में नुकसान नहीं करता। हां फल कम या अधिक दे सकता है। ऐसे में अधिकांश स्त्रियों को आँख मूंदकर पुखराज पहनने की सलाह दे दी जाती है। इससे उनके सोचने का नजरिया वृहद् हो जाता है। इसी के साथ मोती पहनने की सलाह भी दी जाती है। चंद्रमा का उपचार विचार शृंखला को थामे रखता है। गुरु और चंद्रमा का कांबिनेशन प्राथमिक स्‍तर पर ही अधिकांश समस्‍याओं का समाधान कर देता है। उन विचारों और कारणों को बढ़ने ही नहीं देता जो चिंताओं को हवा दे। इस तरह महिलाओं को फैशन में ही सही पुखराज और मोती पहन लेने चाहिए। भले ही वे ज्‍योतिष से संबंधित स्‍टोन हैं, लेकिन खूबसूरत होने के कारण ग्राह्य भी हैं।
बुध का प्रभाव- पुरुष कुण्‍डली में जहां शनि पीड़ादायी ग्रह है वहीं स्‍त्री जातक के लिए बुध पीड़ादायी ग्रह सिद्ध होता है। बुध के प्रभाव में एक ही रूटीन में लंबे समय तक बने रहना और एक जैसी क्रियाओं को लगातार दोहराते रहना पुरुष के लिए आसान है, पर स्‍त्री जातकों के लिए यह पीड़ादायी सिद्ध होता है। ऐसे में महिलाओं को अपनी दिनचर्या, कपड़े, रहने का तौर तरीका लगातार बदलते रहने की सलाह दी जाती है। इससे उनकी जिंदगी में दुख और तकलीफ का असर कम होता है।
मंगल का प्रभाव- सामान्‍य तौर पर ऋतुस्राव के दौरान स्त्रियों के रक्‍त की हानि होती है। ज्‍योतिष में इसे मंगल के ह्रास के रूप में देखा जाता है। मंगल के इस नुकसान की भरपाई के लिए सुहागिनों को लाल बिंदी लगाने, लाल चूडि़यां पहनने, लाल साड़ी एवं लाल रंग का सिंदूर लगाने की सलाह दी जाती है। मंगल की भूमिका अधिकार एवं तेज क रूप में होती है। लाल रंग को धारण करने से मंगल का तेज महिलाओं को फिर से प्राप्‍त हो सकता है।
चन्द्रमा का प्रभाव- चंद्रमा पीडि़त होने पर शरीर में खनिज तत्‍वों और कैल्शियम की कमी हो जाती है। राहू, केतू, बुध और शनि के कारण चंद्रमा पीड़ित हो तो स्‍त्री कर्कशा, रुदन करने वाली या कलहप्रिय होती है। ऐसी स्त्रियों को रोजाना सुबह खाली पेट मिश्री के साथ मक्‍खन खाने की सलाह दी जाती है। मक्‍खन में उपलब्‍ध खनिज तत्‍व एवं कैल्शियम जातक के केन्‍द्रीय तंत्रिका तंत्र को फिर से दुरुस्‍त करता है और जातक हंसने खिलखिलाने लगता है।
किसी भी रोगी जातक की कुंडली का विश्लेषण करते समय सबसे पहले 3, 6, 8 भावों के ग्रहों की शक्ति का आंकलन करना चाहिए। जन्मकुंडली के अनुसार शरीर का विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाव और उनसे मुक्ति प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ कुण्डली में रोगों का अध्ययन करते समय इन तथ्यों का अध्ययन करते हुए ग्रहों की युति, प्रकृति, दृष्टि, उनका परमोच्चा या परम नीच की स्थिति का भी अध्ययन आवश्यक है तभी हम किसी निर्णय पर पहुंच सकते हैं।
आदि काल से ऋषियों ने पहले ही संतान प्राप्ति के नियम और संयम आदि निर्धारित किये थे जिस प्रकार पृथ्वी पर उत्पत्ति और विनाश का क्रम हमेशा से चलता रहा है और ये आगे भी ये नियमित रहेगा उसी प्रकार इस क्रम में जड़-चेतन का जन्म होता है फिर उसका पालन होता है इसके पश्चात विनाश होता है। मनचाही सन्तान लड़का या लड़की उत्पन्न करना हमारे वश की बात है, बशर्ते हमें इस विषय पर पर्याप्त और ठीकठाक जानकारी हो। शास्त्र सम्मत विधी विधान के अनुसार मन पसन्द सन्तान की उत्पत्ती कैसे हो इस पर चर्चा हम यहां करेंगे।
गर्भाधान के समय केंद्र एवम त्रिकोण में शुभ ग्रह हों, तीसरे छठे ग्यारहवें घरों में पाप ग्रह हों, लग्न पर मंगल गुरू इत्यादि शुभ कारक ग्रहों की दॄष्टि हो, विषम चंद्रमा नवमांश कुंडली में हो और मासिक धर्म से सम रात्रि हो, उस समय सात्विक विचार पूर्वक योग्य पुत्र की कामना से यदि रति की जाये तो निश्चित ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है। इस समय में पुरूष का दायां एवम स्त्री का बांया स्वर ही चलना चाहिये, यह अत्यंत अनुभूत और अचूक उपाय है जो खाली नही जाता। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि पुरुष का जब दाहिना स्वर चलता है तब उसका दाहिना अंडकोशः अधिक मात्रा में शुक्राणुओं का विसर्जन करता है जिससे कि अधिक मात्रा में पुल्लिंग शुक्राणु निकलते हैं। अत: पुत्र उत्पन्न होता है।
योग्य पुत्र प्राप्त करने के इच्छुक दंपति अगर निम्न नियमों का पालन करें तो अवश्य ही उत्तम पुत्र प्राप्त होगा। स्त्री को हमेशा पुरूष के बायें तरफ़ सोना चाहिये। कुछ देर बांयी करवट लेटने से दायां स्वर और दाहिनी करवट लेटने से बांया स्वर चालू हो जाता है। इस स्थिति में जब पुरूष का दांया स्वर चलने लगे और स्त्री का बांया स्वर चलने लगे तब संभोग करना चाहिये। इस स्थिति में अगर गर्भादान हो गया तो अवश्य ही पुत्र उत्पन्न होगा। स्वर की जांच के लिये नथुनों पर अंगुली रखकर ज्ञात किया जा सकता है।
योग्य कन्या संतान की प्राप्ति के लिये स्त्री को हमेशा पुरूष के दाहिनी और सोना चाहिये। इस स्थिति में स्त्री का दाहिना स्वर चलने लगेगा और स्त्री के बायीं तरफ़ लेटे पुरूष का बांया स्वर चलने लगेगा। इस स्थिति में अगर गर्भादान होता है तो निश्चित ही सुयोग्य और गुणवती कन्या संतान प्राप्त होगी।
विवाहोपरांत सभी दम्पति की अभिलाषा होती है कि उसकी कम से कम एक संतान अवश्य हो -जिस प्रकार धरती पर समय पर बीज का रोपड किया जाता है तो बीज की उत्पत्ति और उगने वाले पेड़ का विकास सुचारु रूप से होता रहता है और समय आने पर उच्चतम फ़लों की प्राप्ति होती है अगर वर्षा ऋतु वाले बीज को ग्रीष्म ऋतु में रोपड कर दिया जावे तो वह अपनी प्रकृति के अनुसार उसी प्रकार के मौसम और रख रखाव की आवश्यकता को चाहेगा और नहीं मिल पाया तो वह सूख कर खत्म हो जायेगा।
इसी प्रकार से प्रकृति के अनुसार पुरुष और स्त्री को गर्भाधान का कारण समझ लेना चाहिये जिनका पालन करने से आप तो संतानवान होंगे ही आप की संतान भी आगे कभी दुखों का सामना नहीं करेगा।
इनमे से अधिकांश औषधियों का चयन प्राचीन ग्रंथों से किया गया हैं और वैद्यों एवं प्रयोगकर्ता इन्हें पूर्ण सफल और अनुभव सिद्ध भी मानते हैं और कुछ मंत्रों के विधान से भी और निष्ठापूर्वक किया गया ब्रत भी फलदायी होता है।
कुछ रातें ऐसी भी हैं जिसमे हमें सम्भोग से बचना चाहिए-जैसे अष्टमी, एकादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और आमवस्या -चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा- यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहां माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं-मासिक धर्म शुरू होने के प्रथम चार दिवसों में संभोग से पुरूष रुग्णता को प्राप्त होता है तथा पांचवी रात्रि से संतान उत्पन्न करने की विधि करनी चाहिए।
यदि पति-पत्नी संतान प्राप्ति के इच्छुक ना हों और सहवास करना ही चाहें तो मासिक धर्म के अठारहवें दिन से पुन: मासिक धर्म आने तक के समय में सहवास कर सकते हैं इस काल में गर्भाधान की संभावना नहीं के बराबर होती है।
चार मास का गर्भ हो जाने के पश्चात दंपति को सहवास नहीं करना चाहिये अगर इसके बाद भी संभोग रत होते हैं तो भावी संतान अपंग और रोगी पैदा होने का खतरा बना रहता है- इस काल के बाद माता को पवित्र और सुख शांति के साथ देव आराधना और वीरोचित साहित्य के पठन पाठन में मन लगाना चाहिये इसका गर्भस्थ शिशु पर अत्यंत प्रभावकारी असर पड़ता है।
अगर दंपति की जन्मकुंडली के दोषों से संतान प्राप्त होने में दिक्कत आ रही हो तो बाधा दूर करने के लिये संतान गोपाल के सवा लाख जप करने चाहिये- यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण का श्रवण करें- राहु बाधक हो तो कन्यादान से- केतु बाधक हो तो गोदान से- शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं।
मासिक स्राव रुकने से अंतिम दिन (ऋतुकाल) के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है|
चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।
पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।
छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।
सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।
आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।
नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।
दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।
ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।
तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।
चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।
पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।
सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।
विवाहोपरांत सभी दम्पति यह चाहते हैं की उनकी सन्तान स्वस्थ, सुन्दर और बुद्धिमान हो, साथ ही साथ दम्पति खुद निर्णय करें की उन्हें पुत्र चाहिए या पुत्री, लेकिन यह वहुत कम दंपत्ति जानते हैं की ऐसा कैसे हो सकता है। यह जो विधी हम बताने जा रहे है यह 100 प्रतिशत सफल सिद्ध हुयी है एक दम्पति ने इस विधी का पालन किया फलस्वरूप ( पांच पुत्रियों के बाद) पुत्र उत्पन्न करने में सफलता पाई।
पुरातन काल के लोग उपरोक्त नियम-संयम से संतान-उत्त्पति किया करते थे। सहवास से निवृत्त होते ही पत्नी को दाहिनी करवट से 10-15 मिनट लेटे रहना चाहिए एकदम से नहीं उठना चाहिए तथा वास्तु शास्त्र में कुछ ऐसे प्रमुख दोष बताये गए है जिनके कारण संतान की प्राप्ति नहीं होती या वंश वृद्धि रुक जाती है इस समस्या के पीछे की वास्तविकता-क्या है इसका शास्त्रीय और ज्योतिषीय आधार क्या है ये आप अपनी जन्म कुंडली के द्वारा जानकारी प्राप्त कर सकते है-इसके लिए आप हरिवंश पुराण का पाठ या संतान गोपाल मंत्र का जाप करें
पति-पत्नी दोनों सुबह स्नान कर पूरी पवित्रता के साथ इस मंत्र का जप तुलसी की माला से करें- संतान प्राप्ति गोपाल मन्त्र
इस मंत्र का बार रोज 108 जाप करें और मंत्र जप के बाद भगवान से समर्पित भाव से निरोग, दीर्घजीवी, अच्छे चरित्रवाला, सेहतमंद पुत्र की कामना करें।
अपने कमरे में श्री कृष्ण भगवान की बाल रूप की फोटो लगाये या लड्डू गोपाल को रोज माखन मिसरी की भोग अर्पण करें।
कई बार प्रायः देखने में आया है की विवाह के वर्षों बाद भी गर्भ धारण नहीं हो पाता या बार-बार गर्भपात हो जाता है, ज्योतिष में इस समस्या या दोष का एक प्रमुख कारण पति या पत्नी की कुंडली में संतान दोष अथवा पितृ दोष हो सकता है या घर का वास्तुदोष भी होता है, जिसके कारण गर्भ धारण नहीं हो पाता या बार-बार गर्भपात हो जाता है।
श्री गणपति की मूर्ति पर संतान प्राप्ति की इच्छुक महिला प्रतिदिन स्नानादि से निवृत होकर एक माह तक बिल्ब फल चढ़ाकर इस मंत्र की 11 माला प्रतिदिन जपने से संतान प्राप्ति होती है।
'ॐ पार्वतीप्रियनंदनाय नम:'
माघ शुक्ल षष्ठी को संतानप्राप्ति की कामना से शीतला षष्ठी का व्रत रखा जाता है कहीं-कहीं इसे 'बासियौरा' नाम से भी जाना जाता हैं इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर मां शीतला देवी का षोडशोपचार-पूर्वक पूजन करना चाहिये- इस दिन बासी भोजन का भोग लगाकर बासी भोजन ग्रहण किया जाता है।
अगर दंपति की जन्मकुंडली के दोषों से संतान प्राप्त होने में दिक्कत आ रही हो तो बाधा दूर करने के लिये संतान गोपाल के सवा लाख जप करने चाहिये। यदि संतान मे सूर्य बाधा कारक बन रहा हो तो हरिवंश पुराण क श्रवण करें, राहु बाधक हो तो क्न्यादान से, केतु बाधक हो तो गोदान से, शनि या अमंगल बाधक बन रहे हों तो रूद्राभिषेक से संतान प्राप्ति में आने वाली बाधायें दूर की जा सकती हैं।
*यदि विभिन्न उपाय और चिकित्सा करने पर भी संतानोत्पत्ति या मासिकधर्म की समस्या ना जा रही हो तो .... किसी अच्छे ज्योतिष विद्वान से परामर्श अवस्य लेना चाहिए क्योंकि ज्योतिष और वैदिक तंत्र में इन समस्याओं के बहुत से सटीक समाधान मिलते हैं ।।* पं.कृपाराम उपाध्याय

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*वैदिक तंत्र-ज्योतिष में गर्भाधान काल व नवमास चिकित्सा का महत्व:-*
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*यदि दंपती शारीरिक क्षमतावान होकर भी निसंतान है अथवा ऐच्छिक रूप, गुण, शक्ती संपन्न संतान प्राप्ती की अभिलाषा रखते हैं.... तो ये आलेख ... ऐसे दंपतियों के लिऐ वैदिक-तंत्र विज्ञान का वरदान है इस लेख के मार्गदर्शन अनुसार आचरण करने वालों को मनोवांछित शक्तीवान संतान-रत्न की प्राप्ती अवस्स होगी... जय भैरवी।।*
क्या है गर्भाधान:-
पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज से मन सहित जीव का संयोग जिस समय होता है उसे गर्भाधान काल कहते हैं। गर्भाधान का संयोग (काल) कब आता है ? इसे ज्योतिष शास्त्र बखूबी बता रहा है। चरक संहिता के अनुसार – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इन पंच महाभूतों और इनके गुणों से युक्त हुआ आत्मा गर्भ का रुप ग्रहण करके पहले महीने में अस्पष्ट शरीर वाला होता है। सुश्रुत ने इस अवस्था को ‘कलल’ कहा है। ‘कलल’ भौतिक रूप से रज, वीर्य व अण्डे का संयोग है।

शुक्ल पक्ष की दशमी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चंद्रमा को शास्त्रकारों ने पूर्णबली माना है। शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की कलाऐं जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे स्त्री-पुरुषों के मन में प्रसन्नता और काम-वासना बढ़ती है। जब गोचरीय चंद्रमा का शुक्र अथवा गुरु से दृष्टि या युति संबंध होता है, तब इस फल की वृद्धि होती है।
सफल मिलन का समय जिस समय आपकी राशि से गोचर का चंद्रमा चैथा, आठवां बारहवां न हो। रश्मियुक्त हो। शुक्र अथवा गुरु से दृष्ट या युत हो। उस समय प्रेमी या प्रेमिका से आपकी मुलाकात सफल होती है और आपकी मनोकामना पूर्ण होती है। इस मुहूर्त में आपकी पत्नी भी सहवास के लिए सहर्ष तैयार हो जाती है यह अनुभव सिद्ध है।


*गर्भाधान की क्रिया का वैज्ञानिक आधार :-*
यह सभी जानते हैं कि गर्भाधान करने के लिए यौन संपर्क स्थापित करना पड़ता है, किंतु पति-पत्नी के प्रत्येक यौन संपर्क के दौरान गर्भाधान संभव नहीं होता है। यौन संपर्क तो बहुत बार होता है, परंतु गर्भाधान कभी-कभी संभव हो पाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार पुरुष के वीर्य में स्थित शुक्राणु जब स्त्री के रज में स्थित अण्डाणु में प्रवेश कर जाते हैं, तो गर्भ स्थापन्न हो जाता है। निषेचन की इस जैविक प्रक्रिया को गर्भाधान कहते हैं। यह प्रक्रिया स्त्री के गर्भाशय में होती है। निःसंतान दंपत्तियों (बांझ स्त्री/नपुंसक पुरुष) के लिए निषेचन की यह क्रिया परखनली में कराई जाती है। इससे उत्पन्न भ्रूण को ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ कहते हैं। इसके विकास के लिए बेबी भ्रूण को किसी अन्य स्त्री के गर्भाशय में रख दिया जाता है। जिसे सेरोगेट्स या किराये की कोख कहते हैं ये एक आधुनिक विधि है।।
*आयुर्वेद की दृष्टि से गर्भोत्पत्ति का कारण चरक संहिता के अनुसार–* जब स्त्री पुराने रज के निकल जाने के बाद नया रज स्थित होने पर शुद्ध होकर स्नान कर लेती है और उसकी योनि, रज तथा गर्भाशय में कोई दोष नहीं रहता, तब उसे ऋतुमती कहते हैं। ऐसी स्त्री से जब दोष रहित बीज (सुक्र) वाला पुरुष यौन क्रिया करता है, तब वीर्य, रज तथा जीव – इन तीनों का संयोग होने पर गर्भ उत्पन्न होता है। यह जीव (जीवात्मा) गर्भाशय में प्रवेश करके वीर्य तथा रज के संयोग से स्वयं को गर्भ के रूप में उत्पन्न करता है। ज्योतिष में जीव (गुरु) को गर्भोत्पत्ति का प्रमुख कारक माना है।
वीर्य, रज, जीव और मन का संयोग ही गर्भ है:-
महर्षि आत्रेय मुनि ने कहा है- पुनर्जन्म लेने की इच्छा से जीवात्मा मन के सहित पुरुष के वीर्य में प्रवेश कर जाता है तथा क्रिया काल में वीर्य के साथ स्त्री के रज में प्रवेश कर जाता है। स्त्री के गर्भाशय में वीर्य, रज, जीव और मन के संयोग से ‘गर्भ’ की उत्पत्ति होती है।
पुरुष के वीर्य और स्त्री के रज, मन और जीव का संयोग जिस समय होता है उसे गर्भाधान काल कहते हैं। गर्भाधान का संयोग कब आता है ? इसे ज्योतिष शास्त्र बखूबी बता रहा है।
गर्भ उत्पत्ति की संभावना का योग जब स्त्री की जन्म राशि से अनुपचय (1, 2, 4, 5, 7, 8, 9, 12) स्थान में गोचरीय चंद्रमा मंगल द्वारा दृष्ट हो, उस समय स्त्री की रज प्रवृत्ति हो तो ऐसा रजो दर्शन गर्भाधान का कारण बन सकता है अर्थात गर्भाधान संभव होता है। क्योंकि यह ‘ओब्यूटरी एम.सी.’ होती है। इस प्रकार के मासिक चक्र में स्त्री के अण्डाशय में अण्डा बनता है तथा 12वें से 16वें दिन के बीच स्त्री के गर्भाशय में आ जाता है। यह वैज्ञानिकों की मान्यता है।
हमारी मान्यता के अनुसार माहवारी शुरु होने के 6वें दिन से लेकर 16वें दिन तक कभी भी अण्डोत्सर्ग हो सकता है। यदि छठवें दिन गर्भाधान हो जाता है तो वह श्रेष्ठ कहलाता है। यह ब्रह्माजी का कथन है।
मासिक धर्म प्रारंभ होने से 16 दिनों तक स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल होता है। जिनमें प्रारंभ के 4 दिन निषिद्ध (वर्जित) हैं। इसके पश्चात शेष रात्रियों में गर्भाधान (निषेक) करना चाहिए।
पुरुष की राशि से गर्भाधान के योग
गर्भ धारण की इच्छुक स्त्री की योग्यता और उसके अनुकूल समय से काम नहीं बनता है। गर्भाधान हेतु पुरुष की योग्यता व उसके अनुकूल समय का होना भी आवश्यक है।

*शीतज्योतिषि योषितोऽनुपचयस्थाने कुजेनेक्षिते,*
*जातं गर्भफलप्रदं खलु रजः स्यादन्यथा निष्फलम्।*
*दृष्टेऽस्मिन् गुरुणा निजोपचयगे कुर्यान्निषेक पुमान,*
*अत्याज्ये च समूलभे शुभगुणे पर्वादिकालोज्झिते।।*
जातक पारिजात में आचार्य वैद्यनाथ ने लिखा है :–
स्त्री की जन्मराशि से अनुपचय स्थानों में चंद्रमा हो तथा मंगल से दृष्ट या संबद्ध हो तब गर्भाधान संभव है, अन्यथा निष्फल होता है। पुरुष की जन्म राशि से उपचय (3, 6,10,11) स्थानों में चंद्र गोचर हो और उसे संतान कारक गुरु देखे तो पुरुष को गर्भाधान में प्रवृत्त होना चाहिए।
पुरुष की जन्म राशि से 2, 5, 9वें स्थान में जब गुरु गोचर करता है तब वह गर्भाधान करने में सफल होता है। क्योंकि 2रे स्थान का गुरु 6 और 10वें चंद्रमा को तथा 5वें स्थान से 11वें चंद्रमा को और 9वां गुरु 3रे चंद्रमा को देखेगा। द्वि, पंच, नवम गुरु से गर्भाधान की संभावना का स्थूल आकलन किया जाता है। पुरुष की जन्म राशि से 3, 6, 10, 11वें स्थान में सूर्य का गोचर हो तो गर्भाधान की संभावना रहती है।
गर्भाधान का शुभ मुहूर्त एवं लग्न शुद्धि
वैद्यनाथ द्वारा कथित उपरोक्त योग गर्भ उत्पत्ति की संभावना के योग हैं। गर्भाधान संस्कार हेतु शुभ या अशुभ मुहूर्त से इसका कोई संबंध नहीं है। गर्भ उत्पत्ति संभावित होने पर ही किसी अच्छे ज्योतिषी से गर्भाधान का मुहूर्त निकलवाना चाहिए। यही हमारी संस्कृति का प्राचीन नियम है।
शुभ मुहूर्त में गर्भाधान संस्कार करने से सुंदर, स्वस्थ, तेजस्वी, गुणवान, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और दीर्घायु संतान का जन्म होता है। इसलिए इस प्रथम संस्कार का महत्व सर्वाधिक है।
गर्भाधान संस्कार हेतु स्त्री (पत्नी) की जन्म राशि से चंद्र बल शुद्धि आवश्यक है। जन्म राशि से 4, 8, 12 वां गोचरीय चंद्रमा त्याज्य है। आधान लग्न में भी 4, 8, 12वें चंद्रमा को ग्रहण नहीं करना चाहिए। आधात लग्न में या आधान काल में नीच या शत्रु राशि का चंद्रमा भी त्याज्य है। जन्म लग्न से अष्टम राशि का लग्न त्याज्य है।
आघात लग्न का सप्तम स्थान शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होना चाहिए। ऐसा होने से कामसूत्र में वात्स्यायन द्वारा बताये गये सुंदर आसनों का प्रयोग करते हुए प्रेमपूर्वक यौन संपर्क होता है और गर्भाधान सफल होता है।
आघात लग्न में गुरु, शुक्र, सूर्य, बुध में से कोई शुभ ग्रह स्थित हो अथवा इनकी लग्न पर दृष्टि हो तो गर्भाधान सफल होता है एवं गर्भ समुचित वृद्धि को प्राप्त होता है तथा होने वाली संतान गुणवान, बुद्धिमान, विद्यावान, भाग्यवान और दीर्घायु होती है। यदि उक्त ग्रह बलवान हो तो उपरोक्त फल पूर्ण रूप से मिलते हैं। गर्भाधान में सूर्य को शुभ ग्रह माना गया है और विषम राशि व विषम नवांश के बुध को ग्रहण नहीं करना चाहिए।
आघात लग्न के 3, 5, 9 भाव में यदि सूर्य हो तो गर्भ पुत्र के रूप में विकसित होता है।
गर्भाधान के समय लग्न, सूर्य, चंद्र व गुरु बलवान होकर विषम राशि व विषम नवांश में हो तो पुत्र जन्म होता है। यदि ये सब या इनमें से अधिकांश ग्रह सम राशि व सम नवांश में हो तो पुत्री का जन्म होता है।
आधान काल में यदि लग्न व चंद्रमा दोनों शुभ युक्त हों या लग्न व चंद्र से 2, 4, 5, 7, 9, 10 में शुभ ग्रह हों, तथा पाप ग्रह 3, 6, 11 में हो और लग्न या चंद्रमा सूर्य से दृष्ट हो तो गर्भ सकुशल रहता है।
गर्भाधान संस्कार हेतु अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाती, अनुराधा, तीन उत्तरा, धनिष्ठा, रेवती नक्षत्र प्रशस्त है।
पुरुष का जन्म नक्षत्र, निधन तारा (जन्म नक्षत्र से 7, 16, 25वां नक्षत्र) वैधृति, व्यतिपात, मृत्यु योग, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा व सूर्य संक्रांति काल गर्भाधान हेतु वर्जित है। स्त्री के रजोदर्शन से ग्यारहवीं व तेरहवीं रात्रि में भी गर्भाधान का निषेध है। शेष छठवीं रात्रि से 16वीं रात्रि तक

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