12/01/2026
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।।
🧡🤍💚भावार्थ-जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ उसके वश में नहीं होती उसकी न तो बुद्धि स्थिर होती है, न मन स्थिर होता है और न ही उसे शान्ति प्राप्त होती है, उस शान्ति-रहित मनुष्य को सुख मिलना किस प्रकार संभव है ?
🟢'नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य'-- जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं है, ऐसे अयुक्त (असंयमी) पुरुष की 'मेरे को केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है ऐसी एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती । कारण कि मन और इन्द्रियाँ संयमित न होनेसे वह उत्पत्ति-विनाशशील सांसारिक भोगों और संग्रहमें ही लगा रहता है। वह कभी मान चाहता है, कभी सुखआराम चाहता है, कभी धन चाहता है, कभी भोग चाहता है--इस प्रकार उसके भीतर अनेक तरह की कामनाएँ होती रहती हैं। इसलिये उसकी बुद्धि एक निश्चयवाली नहीं होती।
🟢 'न चायुक्तस्य भावना'-- जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका नहीं होती, उसकी " मेरे को तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है और फलकी इच्छा, कामना, आसक्ति आदिका त्याग करना है'--ऐसी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होने में कारण है--अपना ध्येय स्थिर न होना।
🟢'न चाभावयतः शान्तिः'-- जो अपने कर्तव्यके परायण नहीं रहता, उसको शान्ति नहीं मिल सकती। जैसे साधु, शिक्षक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि यदि अपने-अपने कर्तव्यमें तत्पर नहीं रहते, तो उनको शान्ति नहीं मिलती। कारण कि अपने कर्तव्यके पालन में दृढ़ता न रहने से ही अशान्ति पैदा होती है।
🟢 'अशान्तस्य कुतः सुखम्'-- जो अशान्त है वह सुखी कैसे हो सकता है? कारण कि उसके हृदयमें हरदम हलचल होती रहती है। बाहर से उसको कितने ही अनुकूल भोग आदि मिल जायँ तो भी उसके हृदय की हलचल नहीं मिट सकती अर्थात् वह सुखी नहीं हो सकता।
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