नक्षत्र लोक ज्योतिष विज्ञान शोध संस्थान

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पृथ्वी लोक पर पितृ प्राण यह कहा जाना उचित नहीं होगा कि 15 दिनों के लिए पितृ गण धरती पर आते हैं व पितृपक्ष के अंतिम दिन अ...
25/09/2022

पृथ्वी लोक पर पितृ प्राण

यह कहा जाना उचित नहीं होगा कि 15 दिनों के लिए पितृ गण धरती पर आते हैं व पितृपक्ष के अंतिम दिन अर्थात अमावस्या को समस्त पितृगण धरती लोग से विदा हो जाते हैं वस्तुतः खगोल में पितृलोक का मुख्य दरवाजा मघा नक्षत्र है जिसके देवता पितृ गण है ,सूर्य जब मघा नक्षत्र पर आते हैं तब पितृ प्राण का पृथ्वी पर आगमन का रुझान प्रारंभ होता है, सूर्य जब उत्तराफाल्गुनी से ज्यूही हस्त नक्षत्र पर संक्रमण करते हैं तब संपूर्ण पितृसत्ता का हरी भरी वसुंधरा पर पदार्पण होता है, जो आश्विन कृष्णा प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अमावस्या, जोकि पितरों का दीवा काल है एवं अमावस्या से आगे आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शरद पूर्णिमा एवं शरद पूर्णिमा से कार्तिक कृष्णा अमावस्या की कालरात्रि तक पितृ प्राण पृथ्वी पर रहता है, दीपावली अमा को सूर्य स्वाति नक्षत्र तक प्राय: रहता है,कई बार विशाखा के प्रथम चरण तक रहता है अर्थात सूर्य हस्त नक्षत्र से विशाखा नक्षत्र के प्रथम चरण तक पितृ प्राण पृथ्वी पर रहकर कार्तिक कृष्णा अमावस्या को वापस अपने लोक को गमन करते हैं, कार्तिक कृष्णा अमावस्या पितृ दीपावली को आमजन दीपक जलाकर सौम्य रात्रि स्वरूप अंधकार को विदा कर देव प्राण के आगमन की स्तुति करते हैं तथा देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा को मनायी जाती है । पितृलोक, पृथ्वी लोक से 45 गुना बड़ा है सूर्य नक्षत्र के एक चरण पर करीब साढे 3 दिन कभी कभी पौने4 दिन चलने से हस्त पर 14 दिन चित्रा पर 14 दिन स्वाति पर 14 दिन विशाखा के एक चरण पर सवा 3 दिन के अनुसार करीब 45 दिन पितृ गण पृथ्वी पर रहते हैं।
दीपावली पर दीपक श्राद्ध के द्वारा पितरों को विदाई दी जाती है।

 #पञ्चबलिकीवैज्ञानिकतापित्र पक्ष में, सनातन धर्म में आस्था रखने वाले आमजन द्वारा अपने पूर्वजों की अक्षय तृप्ति के निमित ...
24/09/2022

#पञ्चबलिकीवैज्ञानिकता

पित्र पक्ष में, सनातन धर्म में आस्था रखने वाले आमजन द्वारा अपने पूर्वजों की अक्षय तृप्ति के निमित वैदिक परम्परानुगत सम्पादित किये जाने वाले श्राद्ध कर्म के अंगभूत रूप में गाय, स्वान, वायस, पिपीलिका एवं देवा जी के निमित दी जाने वाली पंचबलि को विज्ञानं के धरातल पर समझना व परखना आवश्यक है, ऋषियों ने शरीर विज्ञान को दृष्टिगत रखते हुए पंचबली कर्म को किया जाना सुनिश्चित किया है|
श्राद्ध कर्म के क्रियात्मक भाग में, विश्वेदेवा देवताओ सहित सपत्नीक वसुरूप पिता, रुद्ररूप पितामह व आदित्य रूप प्रपितामह को पिंडदान दिए जाने के क्रम में, एकोदिष्ट रूप में मृतक को पित्र परंपरा में सम्मिलित करने के उद्देश्य से उनकी प्रीती व अक्षय तृप्ति के भाव से अपने पाकालय में विशुधता के साथ तैयार किया गया अन्न निर्मित मिष्ठान को नाम गोत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ अर्पित किया जाता है, इसी श्राद्ध कर्म की सम्यक सिद्धि के लिए गायत्राग्नी से तृप्त ब्राहमण की वैस्वानर अग्नि में मिष्ठान की आहुति दिए जाने से पूर्व अन्य वन्य जीव प्राणी गाय, स्वान, वायस, पिपीलिका की वैस्वानर अग्नि में मिष्ठान आहूत किये जाने का शास्त्रीय विधान है| सम्पूर्ण भूत प्राणियों को धारण करने वाली स्वधा नामक अग्नि में नाम, गोत्र, पूर्वक सकल्प के सहित आहूत अन्न नामक सोम, रूपांतरित होता हुआ सीधा उन्ही पित्रगनों के पास पहुंचता है, जिनके नाम से संकल्प किया गया था| इसी श्रंखला में पंचबली के रूप में जीव पशु आदि प्राणियों को दी जाने वाली पंचबली के प्रयोजन का निम्नांकित रूप से विचार करते है :-

#गाय :- इसकी थुम्बी का, सूर्य के गर्भ से आने वाले गो प्राण का सीधा सम्बन्ध है, इसके वैश्वानर अग्नि में दी गई अन्न की आहुति अग्नि के माध्यम से रूपांतरित होती हुई सूर्य को प्राप्त होती है, गो प्राण से इस पशु का इतना गहन सम्बन्ध है की गाय के पिंड से निकलने वाले प्रत्येक विकार, दुग्ध, गोमूत्र, गोबर का सृष्टि सृजन, में महत्वपूर्ण योगदान है, मनुष्य के पिंड में स्थित प्राण संचरण हेतु श्वास नलिका गो प्राण का प्रतीक है| गाय का आदित्य लोक से विशेष सम्बन्ध है|
#श्वान :- पृथ्वी लोक के अधिष्ठात्री देव यमराज है, मृत्यु के द्वारा जीवों का कल्याण करना इनका मुख्य कार्य है, पृथ्वी की तन्मात्रा गंध को ये पशु सर्वाधिक रूप से ग्रहण करते है| श्वन शब्द का प्राण से विशेष सम्बन्ध है, श्वाश प्रश्वाश के माध्यम से प्राण संचरण होता है, विष्णु प्राण प्रदाता व रूद्र प्राण हर्ता है, बचपन से योवनावस्था तक शरीर में विष्णु प्राण की अधिकता एवं प्रौढ़ावस्था के उपरान्त रूद्र प्राणों की तीव्रता रहती है, किसी भी प्राणी की प्रतिष्ठा उसके पुच्छ्भाग अर्थात पूंछ पर होती है, श्वान की पूंछ सर्वदा सीधी न होकर बंधन युक्त होती है, जिससे परिलक्षित होता है की रूद्र श्वान की पूंछ के समान प्राणों को पाश के समान खेंच कर ले जाता है| इस पशु की मृत्यु के देवता यमराज से सन्निकटता के कारण इनको बलि के रूप में पिंड दान किया जाता है, चूँकि यम भी हमारे पित्र है| हमारे शरीर में भोजन के ग्रसन नलिका से श्वान का विशेष सम्बन्ध है|
#वायस : - यह पृथ्वी व स्वर्ग के मध्य अन्तरिक्ष लोक का प्राणी है| इसके गर्दन से नीचे का भाग सर्वदा अप्रकाशित होता है व पूरी गर्दन प्रकाशित होते हुए ऊपर का चोंच सहित मस्तक भाग काले रंग का होता है, अर्थात मध्य भाग इसके आकर्षण का मुख्य केंद्र है| श्राद्ध में रूद्र रूप पितामह का मध्यम पिंड का ग्रास करने से वंश वृद्धि होती है शरीर में भी ह्रदयस्थ व्यानप्राण जो अक्षय उर्जा का केंद्र है, पर प्राण अपान की परस्पर मिलन होता है, पिता प्रपितामह की तुलना में पितामह पोत्र की अधिक इच्छा करता है| मनुष्य शरीर में भोजन नलिका व श्वास नलिका के ठीक उपर एकाक्षी रूप कौवा का प्रतीक कागलिया जो इन दोनों नलिकाओं का नियमन करता हुआ किये हुए भोजन की तृप्ति करवाता है|
*पिपीलिका :- ये सपूर्ण ब्रम्हांड में व्याप्त गतिशीलता की द्योतक है, किसी एक जगह पर स्थित रहना इनके कर्म में नहीं है| ब्रम्हा से कीट तक किसी भी योनी में रह रहे हमारे पितरों को इस रूप में भी बलि दी जाती है, मनुष्य शरीर में स्थित ७२००० नाड़ियो सहित प्रतिदिन बनने वाली कोशिकाओं एवं इनमे व्याप्त रक्त एवं वायु की गतिशीलता को इंगित करती है|
#देवता :- हमारे सम्पूर्ण देवताओं के अधिष्ठात्री देवता ब्रह्मा है, जो सम्पूर्ण भूत प्राणियों की प्रतिष्ठात्मक चेतना है| इसलिए ब्रह्माण्ड में व्याप्त पिंड रूप चेतना को पंचबली के अंतर्गत अंतिम बलि दी जाती है|

पितृगण तर्पण अर्थात जलांजलि से शीघ्र प्रसन्न होते हैं।नियम के अनुसार तर्पण करना चाहिए जिसमें 21 पीढ़ी तक का तर्पण हो करक...
09/09/2022

पितृगण तर्पण अर्थात जलांजलि से शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
नियम के अनुसार तर्पण करना चाहिए जिसमें 21 पीढ़ी तक का तर्पण हो करके गुरु इष्ट मित्र तथा आत्मीय संबंधित जनों का तर्पण भी हो जाता है। ऐसी दिव्यतम व्यवस्था केवल मेरे सनातन धर्म में ही अन्य किसी धर्म में नहीं।
तर्पण में मुख्यतः चांदी के पात्र हो तो बहुत ही अच्छी उत्तम है अभाव में पीतल अथवा ताम्रपत्र भी ले सकते हैं कुशा कच्चा दूध काले तिल सफेद पुष्प पितरों की प्रसन्नता के लिए अनिवार्य है इसके साथ ही उन्हें नैवेद्य में मधु तथा द्राक्षा (दाख) भी प्रिय है।
आज की आपाधापी में नित्य तर्पण कई लोग नहीं कर पाते हैं उनके लिए लघु तर्पण देने का प्रयास कर रहा हूं लेकिन यह केवल मानसिक संतोष ही प्रदान करेगा कि हमने तर्पण कर लिया है हालांकि इसका फल भी मिलता है लेकिन पूर्णरूपेण नहीं।
#तर्पण_में_सभी_का_अधिकार_है।
जिनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ है, वे देव तर्पण में दाहिनी ओर ऋषि तर्पण में कंठी अर्थात माला की तरह और पितृ तर्पण में बांयी ओर जनेऊ करके तर्पण करें।
जिनका जनेऊ नहीं हुआ है वे अंगोछा या गमछे को इसी तरह रख कर के तर्पण करें।
तर्पण से पहले दक्षिण में तिल का आसन देकर तिल के तेल का दीपक पितरों के निमित्त प्रज्वलित करें शालिग्राम को विराजमान करके चन्दन का तिलक करके जौ व तुलसी दल अर्पण करें।

देवता के
तर्पण में पूर्व की ओर मुख करके दोनों हाथों में जल भरकर पात्र में पूर्वाभिमुख होकर " इन मंत्रों से तर्पण करते हुए देवताओं को एक बार जलाअंजलि अर्पित करें"
ू:_देवान_तर्पयामि
ुवः_देवान_तर्पयामि
्व:_देवान_तर्पयामि
ूर्भुवः_स्व:_देवान_तर्पयामि
इन चारों मंत्रों को बोलते हुए एक-एक अंजली जल देवताओं के प्रति सामने की ओर सीधे छोड़ना चाहिए।

#ऋषितर्पण
ऋषि तर्पण उत्तर की ओर मुख करके अंजलि के बीच में से दो दो बार मंत्र बोलते हुए जल अर्पण करें।

ू:_ऋषिन_तर्पयामि
ुवः=ऋषिन_तर्पयामि
्व:=ऋषिन_तर्पयामि
ूर्भुवःस्व:_ऋषिनतर्पयामि
यह मंत्र बोलते हुए ऋषि तर्पण संपूर्ण करें उसके बाद #पितरों के तर्पण के लिए दक्षिण की ओर मुंह करके पितृ तीर्थ अर्थात दाहिने हाथ के अंगूठे से जल की धारा गिराए एक एक मंत्र को तीन बार बोलते हुए तीनों बार जल अर्पित करें।

#ॐ भू: पितृन तर्पयामि
#ॐ भुवः पितृन तर्पयामि
#ॐ स्व: पितृन तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व:पितृन तर्पयामि

#ॐ भू: पितामहेभ्य: तर्पयामि
#ॐ भुवः पितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ स्व: पितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व: पितामहेभ्य तर्पयामि

#ॐ भू: प्रपितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भुवः प्रपितामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ स्व: प्रपितामहेभ्य तर्पयामि

#ॐ भू: मातृभ्यः तर्पयामि
#ॐ भुवः मातृभ्यः तर्पयामि
#ॐ स्व: मातृभ्यः तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व: मातृभ्यः तर्पयामि

#ॐ भू: मातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भुवः मातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ स्व: मातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व: मातामहेभ्य तर्पयामि

#ॐ भू: प्रमातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भुवः प्रमातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ स्व: प्रमातामहेभ्य तर्पयामि
#ॐ भूर्भुवः स्व: प्रमातामहेभ्य तर्पयामि।।

इतना तर्पण करने के बाद गाय स्वान अर्थात कुत्ता चींटी कौवा और अतिथि इनके लिए भोजन निकालें तथा ब्राह्मण भोजन करवाएं।
नियम से तर्पण योग्य ब्राह्मण के सानिध्य में होना चाहिए जलाशय पर होना चाहिए लेकिन महानगरों में तथा सेवारत व्यक्तियों के लिए यह सब संभव नहीं है इसलिए यह लघु प्रयोग दिया गया है लेकिन प्रयास कीजिए कि जहां तक संभव हो सके संपूर्ण तर्पण ही हो।
चित्र -साभार गूगल

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