24/09/2022
#पञ्चबलिकीवैज्ञानिकता
पित्र पक्ष में, सनातन धर्म में आस्था रखने वाले आमजन द्वारा अपने पूर्वजों की अक्षय तृप्ति के निमित वैदिक परम्परानुगत सम्पादित किये जाने वाले श्राद्ध कर्म के अंगभूत रूप में गाय, स्वान, वायस, पिपीलिका एवं देवा जी के निमित दी जाने वाली पंचबलि को विज्ञानं के धरातल पर समझना व परखना आवश्यक है, ऋषियों ने शरीर विज्ञान को दृष्टिगत रखते हुए पंचबली कर्म को किया जाना सुनिश्चित किया है|
श्राद्ध कर्म के क्रियात्मक भाग में, विश्वेदेवा देवताओ सहित सपत्नीक वसुरूप पिता, रुद्ररूप पितामह व आदित्य रूप प्रपितामह को पिंडदान दिए जाने के क्रम में, एकोदिष्ट रूप में मृतक को पित्र परंपरा में सम्मिलित करने के उद्देश्य से उनकी प्रीती व अक्षय तृप्ति के भाव से अपने पाकालय में विशुधता के साथ तैयार किया गया अन्न निर्मित मिष्ठान को नाम गोत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ अर्पित किया जाता है, इसी श्राद्ध कर्म की सम्यक सिद्धि के लिए गायत्राग्नी से तृप्त ब्राहमण की वैस्वानर अग्नि में मिष्ठान की आहुति दिए जाने से पूर्व अन्य वन्य जीव प्राणी गाय, स्वान, वायस, पिपीलिका की वैस्वानर अग्नि में मिष्ठान आहूत किये जाने का शास्त्रीय विधान है| सम्पूर्ण भूत प्राणियों को धारण करने वाली स्वधा नामक अग्नि में नाम, गोत्र, पूर्वक सकल्प के सहित आहूत अन्न नामक सोम, रूपांतरित होता हुआ सीधा उन्ही पित्रगनों के पास पहुंचता है, जिनके नाम से संकल्प किया गया था| इसी श्रंखला में पंचबली के रूप में जीव पशु आदि प्राणियों को दी जाने वाली पंचबली के प्रयोजन का निम्नांकित रूप से विचार करते है :-
#गाय :- इसकी थुम्बी का, सूर्य के गर्भ से आने वाले गो प्राण का सीधा सम्बन्ध है, इसके वैश्वानर अग्नि में दी गई अन्न की आहुति अग्नि के माध्यम से रूपांतरित होती हुई सूर्य को प्राप्त होती है, गो प्राण से इस पशु का इतना गहन सम्बन्ध है की गाय के पिंड से निकलने वाले प्रत्येक विकार, दुग्ध, गोमूत्र, गोबर का सृष्टि सृजन, में महत्वपूर्ण योगदान है, मनुष्य के पिंड में स्थित प्राण संचरण हेतु श्वास नलिका गो प्राण का प्रतीक है| गाय का आदित्य लोक से विशेष सम्बन्ध है|
#श्वान :- पृथ्वी लोक के अधिष्ठात्री देव यमराज है, मृत्यु के द्वारा जीवों का कल्याण करना इनका मुख्य कार्य है, पृथ्वी की तन्मात्रा गंध को ये पशु सर्वाधिक रूप से ग्रहण करते है| श्वन शब्द का प्राण से विशेष सम्बन्ध है, श्वाश प्रश्वाश के माध्यम से प्राण संचरण होता है, विष्णु प्राण प्रदाता व रूद्र प्राण हर्ता है, बचपन से योवनावस्था तक शरीर में विष्णु प्राण की अधिकता एवं प्रौढ़ावस्था के उपरान्त रूद्र प्राणों की तीव्रता रहती है, किसी भी प्राणी की प्रतिष्ठा उसके पुच्छ्भाग अर्थात पूंछ पर होती है, श्वान की पूंछ सर्वदा सीधी न होकर बंधन युक्त होती है, जिससे परिलक्षित होता है की रूद्र श्वान की पूंछ के समान प्राणों को पाश के समान खेंच कर ले जाता है| इस पशु की मृत्यु के देवता यमराज से सन्निकटता के कारण इनको बलि के रूप में पिंड दान किया जाता है, चूँकि यम भी हमारे पित्र है| हमारे शरीर में भोजन के ग्रसन नलिका से श्वान का विशेष सम्बन्ध है|
#वायस : - यह पृथ्वी व स्वर्ग के मध्य अन्तरिक्ष लोक का प्राणी है| इसके गर्दन से नीचे का भाग सर्वदा अप्रकाशित होता है व पूरी गर्दन प्रकाशित होते हुए ऊपर का चोंच सहित मस्तक भाग काले रंग का होता है, अर्थात मध्य भाग इसके आकर्षण का मुख्य केंद्र है| श्राद्ध में रूद्र रूप पितामह का मध्यम पिंड का ग्रास करने से वंश वृद्धि होती है शरीर में भी ह्रदयस्थ व्यानप्राण जो अक्षय उर्जा का केंद्र है, पर प्राण अपान की परस्पर मिलन होता है, पिता प्रपितामह की तुलना में पितामह पोत्र की अधिक इच्छा करता है| मनुष्य शरीर में भोजन नलिका व श्वास नलिका के ठीक उपर एकाक्षी रूप कौवा का प्रतीक कागलिया जो इन दोनों नलिकाओं का नियमन करता हुआ किये हुए भोजन की तृप्ति करवाता है|
*पिपीलिका :- ये सपूर्ण ब्रम्हांड में व्याप्त गतिशीलता की द्योतक है, किसी एक जगह पर स्थित रहना इनके कर्म में नहीं है| ब्रम्हा से कीट तक किसी भी योनी में रह रहे हमारे पितरों को इस रूप में भी बलि दी जाती है, मनुष्य शरीर में स्थित ७२००० नाड़ियो सहित प्रतिदिन बनने वाली कोशिकाओं एवं इनमे व्याप्त रक्त एवं वायु की गतिशीलता को इंगित करती है|
#देवता :- हमारे सम्पूर्ण देवताओं के अधिष्ठात्री देवता ब्रह्मा है, जो सम्पूर्ण भूत प्राणियों की प्रतिष्ठात्मक चेतना है| इसलिए ब्रह्माण्ड में व्याप्त पिंड रूप चेतना को पंचबली के अंतर्गत अंतिम बलि दी जाती है|