02/06/2026
समाज में कुछ विद्वान ऐसे भी हैं , जो हर सामाजिक विचार , हर सकारात्मक पहल और किसी के भी चिंतनपरक विचारपूर्ण लेख के नीचे अपने “विशेष ज्ञान” की टिप्पणी करना अपना नैतिक दायित्व समझते हैं। विशेष आश्चर्य तब होता है जब अत्यंत शिक्षित एवं प्रतिष्ठित पेशे से जुड़े लोग भी संवाद की गरिमा बढ़ाने के बजाय हर विषय में व्यंग्य , उपहास और अनावश्यक बौद्धिक श्रेष्ठता प्रदर्शित करने लगते हैं।
ज्ञात होगा कि हाल ही में एक महोदय ने सामाजिक ग्रुपों (सोशल मीडिया) पर लिखा था -“सोशल मीडिया विश्वसनीय स्रोत नहीं, यह केवल प्रचार और प्रभाव डालने का माध्यम है।”
विडंबना देखिए कि यही गूढ़ ज्ञान उन्होंने स्वयं सोशल मीडिया पर ही पोस्ट किया। अर्थात् मंच अविश्वसनीय है , लेकिन उस मंच पर लिखे उनके विचार पूर्णतः प्रमाणिक और अंतिम सत्य हैं!यह वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर मरीजों से कहे कि “दवा पर भरोसा मत करो”… और फिर वही दवा अपनी दुकान से बेचने लगे।
कभी कहते हैं — “खोखले शब्दों से समाज नहीं बदलता”, लेकिन वही लोग प्रतिदिन सोशल मीडिया पर लंबी-लंबी टिप्पणियों के माध्यम से ऐसा बौद्धिक धुआँ छोड़ते रहते हैं कि वास्तविक विषय कहीं पीछे छूट जाता है और मूल विषय को छोड़ वह अपना एक नया आईडिया समाज को परोस विषयांतरित कर देते हैं।किसी के भी विचार लेख में कमी निकालना , हर विचार पर कटाक्ष करना और हर चर्चा में स्वयं को अंतिम ज्ञानी सिद्ध करना शायद अब कुछ लोगों की आदत बन चुकी है।
सवाल ये हैं कि धरातल पर अपने समाजजनों की भलाई के खुद ने क्या किया ? पहले जो आईडिया समाज को परोसा , क्या उसे खुद पहल कर फलीभूत किया ? कौन समाज को जोड़ने का प्रयास कर रहा है और कौन हर सकारात्मक संवाद को उपहास में बदलने में लगा है ?ज्ञान तब सार्थक होता है जब वह मार्गदर्शन दे , पहल करे , प्रेरणा दे और समाधान प्रस्तुत करे , न कि केवल दूसरों को नीचा दिखाने का माध्यम बने।
समाज यह भी देख रहा है कि जो लोग “जमीनी कार्य” का सबसे अधिक शोर मचाते हैं , वे अक्सर संवाद के स्तर को सबसे अधिक गिराते हैं। हर समय उपदेश देना , दूसरों की नीयत पर प्रश्न उठाना और स्वयं को ही जागरूकता का केंद्र मान लेना , यह विद्वता नहीं, बल्कि बौद्धिक अहंकार का लक्षण है।
एक चिकित्सक का दायित्व केवल शरीर का उपचार करना नहीं होता, बल्कि समाज में संतुलन , संवेदना और सकारात्मकता का संदेश देना भी होता है। यदि शिक्षित वर्ग ही हर सार्थक चर्चा को व्यंग्य और उपहास में बदलने लगे, तो समाज में संवाद नहीं , केवल कटुता बढ़ेगी।
अतः बेहतर होगा कि कुछ स्वघोषित बुद्धिजीवी पहले अपने स्वयं के सुझावों और विचारों के विरोधाभास को समझें , फिर समाज को ज्ञान देने निकलें। क्योंकि किसी के भी सार्थक विचार पर अनावश्यक नकारात्मक टिप्पणी करना ही सामाजिक चेतना नहीं कहलाता। कभी-कभी मौन , विनम्रता और सकारात्मक सहयोग भी सबसे बड़ा ज्ञान होता है।