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दर्द ऐ किसान गेहूं की फसल खराब होने के बाद भाई के गले लगकर रोने लगी बहन,हे प्रकृति तेरा यूँ बेरहम होना हमे रास नही आया
24/03/2023

दर्द ऐ किसान गेहूं की फसल खराब होने के बाद भाई के गले लगकर रोने लगी बहन,

हे प्रकृति तेरा यूँ बेरहम होना हमे रास नही आया

मखाना को मिला जीआई टैग!बिहार वासियों को बधाई विशेषकर मिथिला वालों को !बिहार के मिथिला में एक कहावत  है- पग-पग पोखरि, माछ...
25/08/2022

मखाना को मिला जीआई टैग!
बिहार वासियों को बधाई विशेषकर मिथिला वालों को !

बिहार के मिथिला में एक कहावत है- पग-पग पोखरि, माछ-मखान। केंद्र सरकार ने भी मिथिला के इस विशिष्टता पर मोहर लगा दिया हैं।कल मखाना को जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग दे दिया है, और अब मखाना मिथिला मखाना के रूप में जाना जाएगा।
इससे मखाना उत्पादकों को अब उनके उत्पाद का और भी बेहतर दाम मिल पाएगा। मिथिला के मखाने अपने स्वाद, पोषक तत्व और प्राकृतिक रूप से उगाए जाने के लिए प्रख्यात है। भारत के 90% मखानों का उत्पादन यहीं से होता है। इससे पहले बिहार की मधुबनी पेंटिंग, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव का खाजा, मुजफ्फरपुर की शाही लीची और भागलपुर के जरदालू आम को जीआई टैग दिया जा चुका है।
मखाना के सेहतमंद गुण और और इसकी अच्छी कीमत तो जगजाहिर है। किसान भाइयों के लिए सबसे अच्छी बात तो यह है कि इसकी खेती बंजर हो चुकी जमीन या फिर बरसात के समय पानी से भरी हुई भूमि जो हमारे किसी काम की नहीं रहती उसमें भी मखाने की खेती आसानी से की जा सकती हैं।

मखाना उत्पादन में बिहार पूरी दुनिया को रास्ता दिखा रहा है। ग्लोबल प्रोडक्शन का 80 से 90 प्रतिशत मखाना का उत्पादन यही होता है।

बिहार में मखाना की खेती ने न सिर्फ मिथिला के किसानों की तकदीर बदल दी है बल्कि हजारों हेक्टेयर की जलजमाव वाली जमीन को भी उपजाऊ बना दिया है. अब तो निचले स्तर की भूमि मखाना के रूप में सोना उगल रही है. विगत डेढ़ दशक में पूर्णिया, कटिहार और अररिया जिले में मखाना की खेती शुरू की गयी है. किसानों के लिए इसकी खेती वरदान साबित हुई है. मखाना की खेती का स्वरूप और इसके खेती शुरू होने से तैयार होने तक की प्रक्रिया भी अनोखी है. जमीन में पानी रहने के बाद मखाना का बीज बोया जाता है.

मखाना का पौधा पानी के स्तर के साथ ही बढ़ता है. इसके पत्ते पानी के ऊपर फैले रहते हैं और पानी के घटने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी से लबालब भरे खेत की जमीन पर पसर जाते हैं. इसके बाद कुशल और प्रशिक्षित मजदूर द्वारा विशेष प्रक्रिया अपना कर फसल को एकत्रित करके पानी से बाहर निकाला जाता है. इस प्रक्रिया में पानी के नीचे ही बुहारन का इस्तेमाल किया जाता है.

मखाना की खेती की शुरुआत बिहार के दरभंगा जिला से हुई. अब इसका विस्तार क्षेत्र सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज होते हुए पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के हरिश्रंद्रपुर तक फैल गया है. पिछले एक दशक से पूर्णिया जिले में मखाना की खेती व्यापक रूप से हो रही है. साल भर जलजमाव वाली जमीन मखाना की खेती के लिए उपयुक्त साबित हो रही है. बड़ी जोत वाले किसान अपनी जमीन को मखाना की खेती के लिए लीज पर दे रहे हैं. इसकी खेती से बेकार पड़ी जमीन से अच्छी वार्षिक आय हो रही है.

दरभंगा से पहुंचते हैं मजदूर
मखाना की खेती से तैयार कच्चे माल को स्थानीय भाषा में गोरिया कहा जाता है. इस गोरिया से लावा निकालने के लिए बिहार के दरभंगा जिला से प्रशिक्षित मजदूरों को बुलाया जाता है. गोरिया कच्चा माल निकालने के लिए जुलाई में दरभंगा जिला के बेनीपुर, रूपौल, बिरैली प्रखंड से हजारों की संख्या में प्रशिक्षित मजदूर आते हैं. उन मजदूरों में महिला व बच्चे भी शामिल रहते हैं. ये लोग पूरे परिवार के साथ यहां आकर मखाना तैयार करते हैं. उन लोगों के रहने के लिए छोटे-छोटे बांस की टाटी से घर तैयार किया जाता है. जुलाई से लावा निकलना शुरू हो जाता है और यह काम दिसंबर तक चलता है. फिर वे मजदूर वापस दरभंगा चले जाते हैं. प्रशिक्षित मजदूरों के साथ व्यापारियों का समूह भी पहुंता है और गोरिया तैयार माल लावा खरीद कर ले जाते हैं. तीन किलो कच्चा गोरिया में एक किलो मखाना होता है. गोरिया का भाव प्रति क्विंटल लगभग 3500 से 6500 के बीच रहता है.

मखाना की खेती का उत्पादन
मखाना की खेती का उत्पादन प्रति एकड़ 10 से 12 क्विंटल होता है. इसमें प्रति एकड़ 20 से 25 हजार रुपये की लागत आती है जबकि 60 से 80 हजार रुपये की आय होती है. इसकी खेती के लिए कम-से-कम चार फीट पानी की जरूरत होती है. इसमें प्रति एकड़ खाद की खपत 15 से 40 किलोग्राम होती है. मार्च से अगस्त तक का समय मखाना की खेती के लिए उपयुक्त होता है. पूर्णिया जिले के मुख्यत: जानकीनगर, सरसी, श्रीनगर,बैलौरी,लालबालू,कसबा,जलालगढ़ सिटी आदि क्षेत्रों में इसकी खेती की जाती है. इतना ही नहीं मखाना तैयार होने के बाद उसे 200, 500 ग्राम और आठ से दस किलो के पैकेट में पैकिंग कर दूसरे शहरों व महानगरों में भेजा जाता है. मखाने की खेती की विशेषता यह है कि इसकी लागत बहुत कम है. इसकी खेती के लिए तालाब होना चाहिए जिसमें 2 से ढाई फीट तक पानी रहे. पहले सालभर में एक बार ही इसकी खेती होती थी लेकिन अब कुछ नई तकनीकों और नए बीजों के आने से मधुबनी-दरभंगा में कुछ लोग साल में दो बार भी इसकी उपज ले रहे हैं. मखाने की खेती दिसम्बर से जुलाई तक ही होती है. बता दें कि विश्व का 80 से 90 प्रतिशत मखाने का उत्पादन अकेले बिहार में होता है. विदेशी मुद्रा कमाने वाला यह एक अच्छा उत्पाद है. इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि छह साल पहले जहाँ लगभग 1, 000 किसान मखाने की खेती में लगे थे, वहीं आज यह संख्या साढे आठ हजार से ऊपर हो गई है. इससे मखाने का उत्पादन भी बढा है. पहले जहां सिर्फ 5-6 हजार टन मखाने का उत्पादन होता था वहीं आज बिहार में 30 हजार टन से अधिक मखाने का उत्पादन होने लगा है. यहाँ कुछ वर्षों में केवल उत्पादन ही नहीं बढा है बल्कि उत्पादकता भी 250 किलोग्राम प्रति एकड़ की जगह अब 400 किलोग्राम प्रति एकड़ हो गई है.

कई शहरों से भी व्यापारी, तैयार मखाना के लिए आते हैं. पूर्णिया जिले से मखाना कानपुर, दिल्ली, आगरा,ग्वालियर, मुंबई के मंडियों में भेजा जाता है. यहां का मखाना अमृतसर से पाकिस्तान भी भेजा जाता है. मखाना की खपत प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है. मखाना में प्रोटीन, मिनरल और कार्बेाहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है.

अनुपयुक्त जमीन पर मखाना उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने की योजना है, जिससे उनकी समस्या का समाधान संभव होगा और वे आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे. मखाना उत्पादन के साथ ही इस प्रस्तावित जगह में मछली उत्पादन भी किया जा सकता है. मखाना उत्पादन से जल कृषक को प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 55 हजार रु पए की लागत आती है. इसे बेचने से 45 से 50 हजार रु पए का मुनाफा होता हैं. इसके अलावा लावा बेचने पर 95 हजार से एक लाख रु पएा प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ होता है. मखाना की खेती में एक महत्व पूर्ण बात यह है कि एक बार उत्पादन के बाद वहां दोबारा बीज डालने की जरूरत नही होतीं हे

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27/07/2022

जमीन के नीचे है पेड़ों को जोड़ने वाला जादुई नेटवर्क

हमारे पैरों के नीचे सूक्ष्म कवकों का एक विशाल नेटवर्क मौजूद है जिसे वूड वाइड वेब भी कहा जाता है. इसकी मदद से पेड़ अपने पोषक तत्वों और सूचनाओं को दूसरे पेड़ पौधों से बांटते हैं.

जमीन के नीचे अगर फफूंद का विशाल नेटवर्क काम ना करे तो पेड़ों के लिए जिंदा रहना संभव नहीं होगा. ये अतिसूक्ष्म फफूंद या कवक हमारी नजरों के सामने नहीं आते लेकिन इनके तंतु पूरी मिट्टी में किसी इंटरनेट के जाल की तरह फैले होते हैं और यह पेड़ पौधों को एक दूसरे से जोड़ने का काम करते हैं ठीक वैसे ही जैसे इंटरनेट हमारे कंप्यूटरों को जोड़ता है.

वूड वाइड वेब
पेड़ पौधे इस तंत्र का इस्तेमाल पानी, नाइट्रोजन, कार्बन और दूसरे पोषक तत्वों के लेन देन में करते हैं, इसके साथ ही वो इसके जरिए किसी संभावित खतरे की चेतावनी पहले हासिल कर लेते हैं. वैज्ञानिक इस तंत्र को "वूड वाइड वेब" भी कहते हैं.
सूक्ष्म कवकों का नेटवर्क इन पेड़ों के आसपास करीब 40 करोड़ सालों से हैं. इकोलॉजिस्ट थॉमस क्राउथर के मुताबिक ये एक तरह से "जंगल के दिमाग" की तरह काम करते हैं जो पूरे इकोसिस्टम को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी उठाता है. क्राउथर का कहना है, "माइकोरिजाल कवक दुनिया के 90 फीसदी से ज्यादा पेड़ों के काम करते रहने के लिए बेहद जरूरी हैं. एक का काम दूसरे के बगैर नहीं चलेगा." क्राउथर वैज्ञानिकों की उस टीम में शामिल हैं जो वूड वाइड वेब का पहला वैश्विक नक्शा बनाने के काम में जुटा है.

यह नेटवर्क काम कैसे करता है?
पेड़ और पौधों के बीच एक सहजीवी रिश्ता होता है. इसमें माइकोरिजाल कवक उनके आसपास और जड़ों के अंदर शामिल होते हैं. पौधे अपने इन कवक सहजीवियों को कार्बन देते हैं और उसके बदले में उनसे फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्व लेते हैं. कवकों को यह पोषक तत्व धरती से हासिल होता है.
सिर्फ इतना ही नहीं पेड़ पौधे जमीन के भीतर के इस विशाल नेटवर्क का इस्तेमाल कर एक दूसरे से संपर्क करते हैं. इनकी मदद से वो सूचनाओं, पोषक तत्वों, मिठास और पानी नेटवर्क में शामिल उन पौधों तक पहुंचाते हैं जिन्हें इसकी ज्यादा जरूरत होती है.
क्राउथर का कहना है, "जो पेड़ पोषक तत्वों के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं उन्हें अकसर इस नेटवर्क का फायदा मिलता है क्योंकि कवक पोषक तत्वों को इन संघर्षरत पेड़ों में बांट देते हैं या फिर उन पेड़ों को जिन्हें कीड़ों ने भारी नुकसान पहुंचाया हो. यही संपर्क पूरे सिस्टम को चलाता है."
जब कोई अंकुर इस नेटवर्क में शामिल होता है तो उन्हें भी वयस्क पेड़ों से पोषक तत्वों और पानी की खुराक मिल सकती है. इससे उन्हें विकसित होने में और तनाव की स्थिति में खुद को सहनशील बनाने में मदद मिलती है. जिन पेड़ों की जीवनलीला खत्म हो रही होती है वो भी इस नेटवर्क का इस्तेमाल कर अपने पोषक तत्वों को पड़ोसी पेड़ों तक या पौधों तक पहुंचा देते हैं.
पेड़ का कोई पड़ोसी अगर हमले का शिकार होता है तो इसी नेटवर्क की मदद से उन्हें इस खतरे की चेतावनी मिल जाती है. कैटरपिलर या फिर इसी तरह के दूसरे कीड़ों के हमले की स्थिति में पेड़ अपनी सुरक्षा के लिए रक्षात्मक रसायन भी पहले से ही तैयार करने में जुट जाते हैं.

पेड़ की मौत के साथ कवक भी मर जाते हैं
माइकोरिजाल कवकों का नेटवर्क इकोसिस्टम की मदद करता है और जंगलों को ज्यादा लचीला बनाता है. ये बड़ी मात्रा में कार्बन को सोखते हैं. ये गर्मी को रोक कर रखने वाले कार्बन डाइ ऑक्साइड को जमीन के भीतर ही दबाये रखते हैं. हालांकि खेती के विस्तार, रासायनिक उर्वरकों के प्रदूषण और जंगलों की कटाई ने इन सूक्ष्मजीवों के नेटवर्क को खतरे में डाल दिया है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक करीब 17.8 करोड़ हेक्टेयर जंगल पिछले तीन दशकों में खत्म हो चुका है. इतनी जमीन पर फ्रांस जैसे तीन देश बस जाएंगे. जब पेड़ों को काटा जाता है तो जमीन के भीतर कवक भी खत्म हो जाते हैं. रिसर्चरों ने देखा है कि पेड़ों की कटाई से जमीन में मौजूद कवकों का 95 फीसदी तक हिस्सा खत्म हो जाता है.
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान की वजह से भी लंबे समय तक कार्बन को बाध कर रखने वाले कवकों की जगह ऐसे कवक की किस्म आ रही है जो वातावरण में कार्बन छोड़ते हैं.
धरती पर जीवन को बनाये रखने में ये कवक करोड़ों सालों से मदद कर रहे हैं. हमारे पैरों के नीचे जो इनका विशाल नेटवर्क है उसे खत्म करने का मतलब उन जीवों को खतरे में डालना है जिनपर हमारा अस्तित्व निर्भर है.

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Millets Culinary Festival organised by IHM Pusa, ICAR-IIMR, IFCA and Sponsored by Ministry of Agriculture and Farmers Welfare going to held at Delhi Haat, INA Market, Delhi during 29-31 July 2022.


ICAR - Indian Institute of Millets Research, Hyderabad Indian Council of Agricultural Research IFCA - Indian Federation of Culinary Associations Ministry of Agriculture & Farmer’s Welfare, Government of India INA Ihm Pusa Delhi



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भारत सरकार ने 1 जुलाई यानी आज से सिंगल यूज या एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया है। पॉलीस्टायरीन और विस्तारित पॉलिस्ट्रीन सहित एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक का निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध संबंधी यह आदेश 1 जुलाई 2022 से प्रभावी होगा। यह जानकारी केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से दी गई है।

The government has issued a list of single-use plastic items that are banned include polystyrene (thermocol) for decorat...
01/07/2022

The government has issued a list of single-use plastic items that are banned include polystyrene (thermocol) for decoration, candy sticks, plastic flags, earbuds with plastic sticks, plastic straws, spoons, trays, packaging films around sweet boxes, invitation cards, plastic or PVC banners which are less than 100 micron, stirrers, etc. Not only use and sales, but also their production, import, possession and distribution will be banned from July 1.



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