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 #सर्पसूक्त पाठ ।।    अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प योग है, उसने उसके निवारण के लिए अनेक उपाय भी कर लिए उसके बा...
28/07/2025

#सर्पसूक्त पाठ ।।
अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प योग है, उसने उसके निवारण के लिए अनेक उपाय भी कर लिए उसके बाद भी कालसर्प दोष से होने वाली परेशानियों से छूटकारा नहीं मिल पा रहा है तो, ऐसे व्यक्ति घबराएं नहीं बल्की सावन माह में पड़ने वाले नागपंचमी पर्व के दिन नाग देवता की इस वंदना को नियमित रूप से करने से शीघ्र लाभ होने लगता हैं । इसके आलावा भी जीवन में अन्य कोई और भी समस्या हो तो उन्में भी सर्प सूक्त का पाठ करने से राहत मिलती हैं ।

ॐ सर्पेभ्यो नमः।
ॐ शं शं शं शेषनाग देवताये नमः।
ॐ ह्रीं क्लीं वासुक्ये नमः।
ॐ सहस्त्रफणाय च विदमहे वासुकीराजाय धीमहि तन्नो नाग: प्रचोदयात्।
ॐ भुजंगेशाय विद्महे, सर्पराजाय धीमहि, तन्नो नाग: प्रचोदयात्।।
ॐ नवकुलाय विद्महे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्प प्रचोदयात।
ॐ अनन्तेशाय विद्महे महाभुजांगाय धीमहि तन्नो नाथः प्रचोदयात।

1- ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा शेषनाग परोगमा: ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासु‍कि प्रमुखाद्य: ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा

2- कद्रवेयश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखाद्य ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।

3- सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखाद्य ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।

4- पृथिव्यां चैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।

5- ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पप्रचरन्ति ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
समुद्रतीरे ये सर्पाये सर्पा जंलवासिन: ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।

6- रसातलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला: ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।

* ।।इति श्री सर्पसूक्त पाठ समाप्त।।*
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 #शालीग्राम~~~~~~~शालीग्राम एक प्रकार का जीवाश्म पत्थर है, जिसका प्रयोग परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में भगवान विष्णु जी...
27/07/2025

#शालीग्राम
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शालीग्राम एक प्रकार का जीवाश्म पत्थर है, जिसका प्रयोग परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में भगवान विष्णु जी का आह्वान करने के लिए किया जाता है। शालीग्राम आमतौर पर पवित्र नदी की तली या किनारों से एकत्र किया जाता है। शिव भक्त पूजा करने के लिए शिव लिंग के रूप में लगभग गोल या अंडाकार शालिग्राम का उपयोग करते हैं।

वैष्णव (हिन्दू) पवित्र नदी गंडकी में पाया जाने वाला एक गोलाकार, आमतौर पर काले रंग के एमोनोइड जीवाश्म को भगवान विष्णु के प्रतिनिधि के रूप में उपयोग करते हैं। शालीग्राम को प्रायः 'शिला' कहा जाता है। शिला शालिग्राम का छोटा नाम है जिसका अर्थ "पत्थर" होता है। शालीग्राम भगवान विष्णु का ही एक प्रसिद्ध नाम है। इस नाम की उत्पत्ति के सबूत नेपाल के एक दूरदराज़ के गाँव से मिलते है जहां विष्णु को शालीग्रामम् के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में शालीग्राम को सालग्राम के रूप में जाना जाता है। शालीग्राम का सम्बन्ध सालग्राम नामक गाँव से भी है जो गंडक नामक नदी के किनारे पर स्थित है तथा यहां से ये पवित्र पत्थर भी मिलता है।

पद्मपुराण के अनुसार
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गण्डकी अर्थात नारायणी नदी के एक प्रदेश में शालिग्राम स्थल नाम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है; वहाँ से निकलनेवाले पत्थर को शालिग्राम कहते हैं। शालिग्राम शिला के स्पर्शमात्र से करोड़ों जन्मों के पाप का नाश हो जाता है। फिर यदि उसका पूजन किया जाय, तब तो उसके फल के विषय में कहना ही क्या है; वह भगवान के समीप पहुँचाने वाला है।

बहुत जन्मों के पुण्य से यदि कभी गोष्पद के चिह्न से युक्त श्रीकृष्ण शिला प्राप्त हो जाय तो उसी के पूजन से मनुष्य के पुनर्जन्म की समाप्ति हो जाती है।

पहले शालिग्राम-शिला की परीक्षा करनी चाहिये; यदि वह काली और चिकनी हो तो उत्तम है। यदि उसकी कालिमा कुछ कम हो तो वह मध्यम श्रेणी की मानी गयी है। और यदि उसमें दूसरे किसी रंग का सम्मिश्रण हो तो वह मिश्रित फल प्रदान करने वाली होती है। जैसे सदा काठ के भीतर छिपी हुई आग मन्थन करने से प्रकट होती है, उसी प्रकार भगवान विष्णु सर्वत्र व्याप्त होने पर भी शालिग्राम शिला में विशेष रूप से अभिव्यक्त होते हैं।

जो प्रतिदिन द्वारका की शिला-गोमती चक्र से युक्त बारह शालिग्राम मूर्तियों का पूजन करता है, वह वैकुण्ठ लोक में प्रतिष्ठित होता है।

जो मनुष्य शालिग्राम-शिला के भीतर गुफ़ा का दर्शन करता है, उसके पितर तृप्त होकर कल्प के अन्ततक स्वर्ग में निवास करते हैं।

जहाँ द्वारकापुरी की शिला- अर्थात गोमती चक्र रहता है, वह स्थान वैकुण्ठ लोक माना जाता है; वहाँ मृत्यु को प्राप्त हुआ मनुष्य विष्णुधाम में जाता है।

जो शालग्राम-शिला की क़ीमत लगाता है, जो बेचता है, जो विक्रय का अनुमोदन करता है तथा जो उसकी परीक्षा करके मूल्य का समर्थन करता है, वे सब नरक में पड़ते हैं। इसलिये शालिग्राम शिला और गोमती चक्र की ख़रीद-बिक्री छोड़ देनी चाहिये।

शालिग्राम-स्थल से प्रकट हुए भगवान शालिग्राम और द्वारका से प्रकट हुए गोमती चक्र- इन दोनों देवताओं का जहाँ समागम होता है, वहाँ मोक्ष मिलने में तनिक भी सन्देह नहीं है।

द्वारका से प्रकट हुए गोमती चक्र से युक्त, अनेकों चक्रों से चिह्नित तथा चक्रासन-शिला के समान आकार वाले भगवान शालिग्राम साक्षात चित्स्वरूप निरंजन परमात्मा ही हैं। ओंकार रूप तथा नित्यानन्द स्वरूप शालिग्राम को नमस्कार है।

शालिग्राम स्वरूप
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जिस शालिग्राम-शिला में द्वार-स्थान पर परस्पर सटे हुए दो चक्र हों, जो शुक्ल वर्ण की रेखा से अंकित और शोभा सम्पन्न दिखायी देती हों, उसे भगवान श्री गदाधर का स्वरूप समझना चाहिये।

संकर्षण मूर्ति में दो सटे हुए चक्र होते हैं, लाल रेखा होती है और उसका पूर्वभाग कुछ मोटा होता है।

प्रद्युम्न के स्वरूप में कुछ-कुछ पीलापन होता है और उसमें चक्र का चिह्न सूक्ष्म रहता है।

अनिरुद्ध की मूर्ति गोल होती है और उसके भीतरी भाग में गहरा एवं चौड़ा छेद होता है; इसके सिवा, वह द्वार भाग में नील वर्ण और तीन रेखाओं से युक्त भी होती है।

भगवान नारायण श्याम वर्ण के होते हैं, उनके मध्य भाग में गदा के आकार की रेखा होती है और उनका नाभि-कमल बहुत ऊँचा होता है।

भगवान नृसिंह की मूर्ति में चक्र का स्थूल चिह्न रहता है, उनका वर्ण कपिल होता है तथा वे तीन या पाँच बिन्दुओं से युक्त होते हैं। ब्रह्मचारी के लिये उन्हीं का पूजन विहित है। वे भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं।

जिस शालिग्राम-शिला में दो चक्र के चिह्न विषम भाव से स्थित हों, तीन लिंग हों तथा तीन रेखाएँ दिखायी देती हों; वह वाराह भगवान का स्वरूप है, उसका वर्ण नील तथा आकार स्थूल होता है। भगवान वाराह भी सबकी रक्षा करने वाले हैं।

कच्छप की मूर्ति श्याम वर्ण की होती है। उसका आकार पानी की भँवर के समान गोल होता है। उसमें यत्र-तत्र बिन्दुओं के चिह्न देखे जाते हैं तथा उसका पृष्ठ-भाग श्वेत रंग का होता है।

श्रीधर की मूर्ति में पाँच रेखाएँ होती हैं, वनमाली के स्वरूप में गदा का चिह्न होता है।

गोल आकृति, मध्यभाग में चक्र का चिह्न तथा नीलवर्ण, यह वामन मूर्ति की पहचान है।

जिसमें नाना प्रकार की अनेकों मूर्तियों तथा सर्प-शरीर के चिह्न होते हैं, वह भगवान अनन्त की प्रतिमा है।

दामोदर की मूर्ति स्थूलकाय एवं नीलवर्ण की होती है। उसके मध्य भाग में चक्र का चिह्न होता है। भगवान दामोदर नील चिह्न से युक्त होकर संकर्षण के द्वारा जगत की रक्षा करते हैं।

जिसका वर्ण लाल है, तथा जो लम्बी-लम्बी रेखा, छिद्र, एक चक्र और कमल आदि से युक्त एवं स्थूल है, उस शालिग्राम को ब्रह्मा की मूर्ति समझनी चाहिये।

जिसमें बृहत छिद्र, स्थूल चक्र का चिह्न और कृष्ण वर्ण हो, वह श्रीकृष्ण का स्वरूप है। वह बिन्दुयुक्त और बिन्दुशून्य दोनों ही प्रकार का देखा जाता है।

हयग्रीव मूर्ति अंकुश के समान आकार वाली और पाँच रेखाओं से युक्त होती है।

भगवान वैकुण्ठ कौस्तुभ मणि धारण किये रहते हैं। उनकी मूर्ति बड़ी निर्मल दिखायी देती है। वह एक चक्र से चिह्नित और श्याम वर्ण की होती है।

मत्स्य भगवान की मूर्ति बृहत कमल के आकार की होती है। उसका रंग श्वेत होता है तथा उसमें हार की रेखा देखी जाती है।

जिस शालिग्राम का वर्ण श्याम हो, जिसके दक्षिण भाग में एक रेखा दिखायी देती हो तथा जो तीन चक्रों के चिह्न से युक्त हो, वह भगवान श्री रामचन्द्रजी का स्वरूप है, वे भगवान सबकी रक्षा करनेवाले हैं।

द्वारकापुरी में स्थित शालिग्राम स्वरूप भगवान गदाधर। भगवान गदाधर एक चक्र से चिह्नित देखे जाते हैं।

लक्ष्मीनारायण दो चक्रों से, त्रिविक्रम तीन से, चतुर्व्यूह चार से, वासुदेव पाँच से, प्रद्युम्न छ: से, संकर्षण सात से, पुरुषोत्तम आठ से, नवव्यूह नव से, दशावतार दस से, अनिरुद्ध ग्यारह से और द्वादशात्मा बारह चक्रों से युक्त होकर जगत की रक्षा करते हैं। इससे अधिक चक्र चिह्न धारण करने वाले भगवान का नाम अनन्त है।

शिवपुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने खुद ही गंडकी नदी में अपना वास बताया था और कहा था कि गंडकी नदी के तट पर मेरा (भगवान विष्णु का) वास होगा। नदी में रहने वाले करोड़ों कीड़े अपने तीखे दांतों से काट-काटकर उस पाषाण में मेरे चक्र का चिह्न बनाएंगे और इसी कारण इस पत्थर को मेरा रूप मान कर उसकी पूजा की जाएगी।

पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार शालिग्राम शिला में विष्‍णु का निवास होता है। इस संबंध में अनेक पौराणिक कथाएं आज भी प्रचलित हैं। इन्‍हीं कथाओं में से एक के अनुसार जब भगवान शिव जालंधर नामक असुर से युद्ध नहीं जीत पा रहे थे तो भगवान विष्‍णु ने उनकी मदद की थी। कथाओं में कहा गया है कि जब तक असुर जालंधर की पत्‍नी वृंदा 'तुलसी' अपने सतीत्‍व को बचाए रखती तब तक जालंधर को कोई पराजीत नहीं कर सकता था। ऐसे में भगवान विष्‍णु ने जालंधर का रूप धारण करके वृंदा के सतीत्‍व को नष्‍ट करने में सफल हो गए। जब वृंदा को इस बात का अहसास हुआ तबतक काफी देर हो चुकी थी। इससे दुखी वृंदा ने भगवान विष्‍णु को कीड़े-मकोड़े बनकर जीवन व्‍यतीत करने का शाप दे डाला। फलस्‍वरूप कालांतर में शालिग्राम पत्‍थर का निर्माण हुआ, जो हिंदू धर्म में आराध्‍य हैं। पुरानी दंतकथाओं के अनुसार मुक्तिक्षेत्र वह स्‍थान है जहां पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहीं पर भगवान विष्‍णु शालिग्राम पत्‍थर में निवास करते हैं।

अन्य कथाओं में वृंदा, शंखचूड़ राक्षस की पत्नी थी लेकिन भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए उपासना तन मन से किया करती थी। भगवान विष्णु उसके मन की बात जानते थे, इसलिये छल से उसके पति शंखचूड़ रुप में बनने का अभिनय किया तो वृन्दा रुष्ट हो गई और उन्होंने विष्णु को शाप दिया कि वे पत्थर बन जाएं क्योंकि आपने छल से मेरे पति का रूप धरा है। भगवान विष्णु ने तुलसी का श्राप स्वीकार कर लिया और कहा कि तुम धरती पर गंडकी नदी तथा तुलसी के पौधे के रूप में रहोगी। तदनोपरांत वृंदा उस शरीर को त्याग स्वयं गंडकी नदी में बदल गई तथा पत्थर बने भगवान विष्णु को अपने हृदय में धारण कर लिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक समय पर तुलसी ने भगवान विष्णों को अपने पति के रूप में पाने के लिए कई सालों तक तपस्या की थीं, जिसके फलस्वरूप भगवान ने उसे विवाह का वरदान दिया था। जिसे देवप्रबोधिनी एकादशी पर पूरा किया जाता है। देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन शालिग्राम शिला तथा तुलसी के पौधा का विवाह करवाने की परंपरा है।

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श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में 9 जून 2024 को सांय 7:26पर शपथ लेकर  देश के प्रध...
10/06/2024

श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में 9 जून 2024 को सांय 7:26पर शपथ लेकर देश के प्रधान पद को ग्रहण किया। इस काल समय पर पूर्व क्षितिज पर मंगल ग्रह की राशि वृश्चिक राशि का उदय हो रहा था जो कि स्थिर राशि है। चंद्रमा अपनी स्व राशि कर्क में वर्गोत्तम नवांश में स्थित है। चतुर्थी तिथि, पुनर्वसु नक्षत्र रविवार को सर्वार्थ सिद्धि योग का सृजन हो रहा है। ऐसे में एनडीए ने देश का नेतृत्व करने का उत्तरदायित्व ग्रहण किया। शपथ ग्रहण का मुहूर्त लग्न सूर्य, मंगल, गुरु तथा चतुर्थ भाव में स्थित शनि की पूर्ण दृष्टि से बली हो रहा है। ज्योतिष की दृष्टि से यह सरकार अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करेगी क्योंकि यह मुहूर्त पूर्ण आयु योग से सृजित है। मुहूर्त लग्नेश मंगल का छठे भाव में स्वग्रही होकर स्थित होना दर्शाता है कि एनडीए सरकार का यह कार्यकाल देश के आंतरिक और बाहरी शत्रुओं के लिए काल के रूप में रहेगा। सरकार का पूर्ण प्रयास रहेगा कि देश को सभी शत्रुओं से मुक्त करे।
कोर्ट के फैसले भी सरकार के हित में ही आएंगे। राहु के पाप कर्तरि योग में फंस जाने के कारण UCC जैसे मुद्दों पर सरकार की सहमति बन जाएगी और इसे लागू कर दिया जाएगा। षड्यंत्रकारी तत्व मुंह की खाएंगे। मुहूर्त लग्न तथा लग्नेश का शत्रु हंता योग बनाना प्रतिपक्ष, सत्ता विरोधी दलों के लिए चिंता का विषय है। उनके अपने दल में फूट पड़ने की संभावनाएं बनी रहेगी। शुक्र एवं बुध का अस्त होना तथा चंद्रमा के केमद्रुम योग में पड़ने से वित्तीय स्थिति के बारे में कुछ चिंतित करता है । जनकल्याण, समर्थन मूल्य जैसी योजनाओं से वित्त व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। हालांकि ऊर्जा, रक्षा, निर्माण, रोड, रेल, तरल पदार्थों पर सरकार अधिक व्यय करेगी। सरकार की आय के साधन बढ़ेंगे। विश्व में गिरती हुई आर्थिक व्यवस्था में भारत की आर्थिक स्थिति नई ऊंचाइयों पर अपना परचम लहराएगी। सेंसेक्स आने वाले वर्षों में 75000 से ₹100000 तक पहुंचेगा। ऐसे योग हैं। मुहूर्त लग्न में आयेश बुध और धनेश गुरु के योग से विदेश से धन का निवेश दुगना हो जाएगा।
सही मुहूर्त चुनकर हम सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारी सफलता भी सुनिश्चित हो। पद ग्रहण में शुभ मुहूर्त का चुनाव करके इस सरकार ने कुछ ऐसे ही किया है।
यतो धर्म: ततो जय:
भारत के उज्जवल भविष्य की शुभकामनाओं सहित
सतीश शर्मा

17/11/2023

गीता के उपदेश से करोडो लोगो को राह दिखाई, उनसे बढ़ कर “गुरु” और कौन हो सकता है..?

रक्षा के लिए समुंद्र के बीच में नगरी बसई उनसे बड़ा "वास्तुकार" कौन हो सकता है ..?

आँखों से मन की बात समझने वाला
उनसे बड़ा "मनोवैज्ञानिक" कौन हो सकता है..?

बांसुरी बजा के गाय और गोपियों को बंधने वाला उनसे बड़ा "संगीतकार" कौन हो सकता है..?

अच्छी सेहत का संदेश देने वाला उनसे बड़ा “डॉक्टर” कौन हो सकता है..?

धर्म के लिए युद्ध करो, ये कहने वाला
उनसे बड़ा “वीर” कौन हो सकता है..?

कमी या कष्ट ना हो, ऐसा महसूस करने वाला उनसे बड़ा “राजा” कौन हो सकता है..?

हवन यज्ञ से बरिश बरसाई, उनसे बढ़कर प्रकृति को समझने वाला "जलवायु विज्ञानी" कौन..?

घूमते सुदर्शन चक्र को नियंत्रण करने वाला
उनसे बड़ा "काइनेटिक इंजीनियर" कौन है...?

उन्होन जो धर्म बताया
वो धर्म नहीं, हमारा जीवन है।

जब तक उसके पास ना आए वो समस्या है... एक बार उस तक पहुंच गई तो वो समाधान है...

वह सब है फाइटर, सिंगर, टीचर, वॉरियर
और क्या नहीं... वह सब कुछ है।

उनकी आभा शाश्वत है
वह मेरे लिए भगवान से बढ़कर हैं, मैं उनकी उत्कृष्टता की पूजा करता हूं।

जय श्री कृष्ण 🙏

श्रीमहालक्ष्मी_अक्षरमालिकानामावली!!               ॥ॐ श्रीं श्रियै नमः॥अशेषजगदीशित्रि अकिञ्चन मनोहरे ।अकारादिक्षकारान्त न...
08/10/2023

श्रीमहालक्ष्मी_अक्षरमालिकानामावली!!
॥ॐ श्रीं श्रियै नमः॥
अशेषजगदीशित्रि अकिञ्चन मनोहरे ।अकारादिक्षकारान्त नामभिः पूजयाम्यहम्॥

सर्व मङ्गल माङ्गल्ये सर्वाभीष्टफलप्रदे ।
त्वयैवप्रेरितो देवि अर्चनां करवाण्यहम्॥

सर्व मङ्गलसंस्कारसम्भृतां परमां शुभाम्।
हरिद्राचूर्ण सम्पन्नां अर्चनां स्वीकुरु स्वयम्॥

ॐ अकारलक्ष्म्यै नमः। ॐ अच्युतलक्ष्म्यै नमः।
ॐ अन्नलक्ष्म्यै नमः। ॐ अनन्तलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ अनुग्रहलक्ष्म्यै नमः। ॐ अमरलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ अमृतलक्ष्म्यै नमः । ॐ अमोघलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ अष्टलक्ष्म्यै नमः । ॐ अक्षरलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ आत्मलक्ष्म्यै नमः । ॐ आदिलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ आनन्दलक्ष्म्यै नमः । ॐ आर्द्रलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ आरोग्यलक्ष्म्यै नमः ।ॐ इच्छालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ इभलक्ष्म्यै नमः। ॐ इन्दुलक्ष्म्यै नमः।
ॐ इष्टलक्ष्म्यै नमः । ॐ ईडितलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ उकारलक्ष्म्यै नमः । ॐ उत्तमलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ उद्यानलक्ष्म्यै नमः । ॐ उद्योगलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ उमालक्ष्म्यै नमः । ॐ ऊर्जालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ ऋद्धिलक्ष्म्यै नमः । ॐ एकान्तलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ ऐश्वर्यलक्ष्म्यै नमः।ॐ ओङ्कारलक्ष्म्यै नमः।
ॐ औदार्यलक्ष्म्यै नमः । ॐ औषधिलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ कनकलक्ष्म्यै नमः । ॐ कलालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ कान्तालक्ष्म्यै नमः । ॐ कान्तिलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ कीर्तिलक्ष्म्यै नमः । ॐ कुटुम्बलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ कोशलक्ष्म्यै नमः। ॐ कौतुकलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ ख्यातिलक्ष्म्यै नमः । ॐ गजलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ गानलक्ष्म्यै नमः । ॐ गुणलक्ष्म्यै नमः।
ॐ गृहलक्ष्म्यै नमः । ॐ गोलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ गोत्रलक्ष्म्यै नमः । ॐ गोदालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ गोपलक्ष्म्यै नमः । ॐ गोविन्दलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ चम्पकलक्ष्म्यै नमः ।ॐ छन्दोलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ जनकलक्ष्म्यै नमः । ॐ जयलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ जीवलक्ष्म्यै नमः । ॐ तारकलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ तीर्थलक्ष्म्यै नमः । ॐ तेजोलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ दयालक्ष्म्यै नमः । ॐ दिव्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ दीपलक्ष्म्यै नमः । ॐ दुर्गालक्ष्म्यै नमः ।
ॐ द्वारलक्ष्म्यै नमः । ॐ धनलक्ष्म्यै नमः।
ॐ धर्मलक्ष्म्यै नमः । ॐ धान्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ धीरलक्ष्म्यै नमः । ॐ धृतिलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ धैर्यलक्ष्म्यै नमः । ॐ ध्वजलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ नागलक्ष्म्यै नमः । ॐ नादलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ नाट्यलक्ष्म्यै नमः । ॐ नित्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ पद्मलक्ष्म्यै नमः । ॐ पूर्णलक्ष्म्यै नमः।
ॐ प्रजालक्ष्म्यै नमः । ॐ प्रणवलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ प्रसन्नलक्ष्म्यै नमः । ॐ प्रसादलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ प्रीतिलक्ष्म्यै नमः । ॐ भद्रलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ भवनलक्ष्म्यै नमः । ॐ भव्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ भाग्यलक्ष्म्यै नमः । ॐ भुवनलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ भूतिलक्ष्म्यै नमः । ॐ भूरिलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ भूषणलक्ष्म्यै नमः । ॐ भोग्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ मकारलक्ष्म्यै नमः । ॐ मन्त्रलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ महालक्ष्म्यै नमः । ॐ मान्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ मेधालक्ष्म्यै नमः । ॐ मोहनलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ मोक्षलक्ष्म्यै नमः । ॐ यन्त्रलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ यज्ञलक्ष्म्यै नमः । ॐ यागलक्ष्म्यै नमः।
ॐ योगलक्ष्म्यै नमः । ॐ योगक्षेमलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ रङ्गलक्ष्म्यै नमः । ॐ रक्षालक्ष्म्यै नमः।
ॐ राजलक्ष्म्यै नमः । ॐ लावण्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ लीलालक्ष्म्यै नमः । ॐ वरलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ वरदलक्ष्म्यै नमः । ॐ वराहलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ वसन्तलक्ष्म्यै नमः । ॐ वसुलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ वारलक्ष्म्यै नमः । ॐ वाहनलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ वित्तलक्ष्म्यै नमः । ॐ विजयलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ वीरलक्ष्म्यै नमः । ॐ वेदलक्ष्म्यै नमः।
ॐ वेत्रलक्ष्म्यै नमः । ॐ व्योमलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ शान्तलक्ष्म्यै नमः । ॐ शुभलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ शुभ्रलक्ष्म्यै नमः । ॐ सत्यलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ सन्तानलक्ष्म्यै नमः । ॐ सिद्धलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ सिद्धिलक्ष्म्यै नमः । ॐ सूत्रलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ सौम्यलक्ष्म्यै नमः ।ॐ हेमाब्जलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ हृदयलक्ष्म्यै नमः । ॐ क्षेत्रलक्ष्म्यै नमः ।
ॐ ज्ञानलक्ष्म्यै नमः । ॐअकिञ्चिनाश्रयायै नमः ।
ॐ दृष्टादृष्टफलप्रदायै नमः । ॐ सर्वाभीष्टफलप्रदायै नमः ।

॥ इति श्रीमहालक्ष्मी अक्षरमालिका नामावलिः सम्पूर्णा ॥
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श्री कल्कि भगवान :----------------------------------------------कल्कि विष्णु का भविष्य में आने वाला अवतार माना जाता है। ...
04/10/2023

श्री कल्कि भगवान :
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कल्कि विष्णु का भविष्य में आने वाला अवतार माना जाता है। पुराणकथाओं के अनुसार कलियुग में पाप की सीमा पार होने पर विश्व में दुष्टों के संहार के लिये कल्कि अवतार प्रकट होगा। कल्कि अवतार कलियुग के अन्त के लिये होगा। ये विष्णु जी के आवतारो मै से एक है। जब कलियुग मै लोग धर्म का अनुसरण करना बन्द कर देगे तब ये आवतार होगा।
कल्कि की कथा कल्कि पुराण में आती है। अव्तार तो हो च्हुका ह सद्गुरु को पह्च्हानओ जो उस भग्वान तक पहुच्हा सके॥। कलियुग के अन्त में इक्कीसवीं बार विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर भगवान का कल्कि अवतार होगा|
आज वर्तमान समय में सम्पूर्ण धार्मिक जगत श्री कल्कि भगवान के बारे में जानने को उत्सुक है। आज विश्व में मानवता त्राहि - त्राहि कर रही है और जो पापाचार बढ़ रहे हैं उनको देखकर बहुत कष्ट होता है। इस स्थिति में सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान के अवतार की ओर ध्यान जाता है। जैसे कि भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं -‘‘ यदा यदा हिधर्मस्य ग्लार्निभवति भारतः अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम, परित्राणय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।’’
अर्थात् जब - जब धर्म की हानि होती है, भूमि पर भार बढ़ता है तब-तब धर्म की संस्थापना के लिए, साधुजनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।
भगवान सूर्य के प्रकाश की पहली किरण जब भारत की पवित्र भूमि को छूती थी तो सारा वातावरण पूजा की घंटियों और शंखनाद से गूंज उठता था। मंदिरों के पट खुल जाते थे और भगवान का अभिषेक सारे भारत में एक साथ आरम्भ हो जाता था। भारत भूमि ऋषिओं और देवताओं की भूमि है, इसके कण - कण में आध्यात्मिक चेतना है, जो भगवान का नाम लेकर जागती थी और भगवान का कीर्तन करते हुए सोती थी। महर्षि वेद-व्यास जी ने श्रीमद् भागवत् के 12 स्कन्ध के दूसरे अध्याय में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि श्री कृष्ण जब अपनी लीला संवरण करके परम धाम को पधार गये उसी समय से कलियुग ने संसार में प्रवेश किया। उसी के कारण मनुष्यों की मति - गति पाप की ओर ढुलक गयी। धर्म कष्ट से प्राप्त होता है और अधः पतन सुखों से, इसलिए भोली भाली जनता को गिरने में देर नहीं लगी।
सत्य सनातन धर्म शाश्वत धर्म है। भगवान का मानवता के उत्थान, दुष्टों के संहार, धर्म की संस्थापना और भक्तों की रक्षा के लिए पंच भौतिक संसार में साक्षात् होना ही अवतार कहलाता है। केवल भगवत् अवतार से ही धर्म की पूर्ण संस्थापना हो सकती है। महात्माओं के आने से केवल आंशिक रूप से ही सत्य की स्थापना हो पाती है।
युग परिवर्तनकारी भगवान श्री कल्कि के अवतार का प्रायोजन विश्व कल्याण है। भगवान का यह अवतार ‘‘निष्कलंक भगवान’’ के नाम से भी जाना जायेगा। श्रीमद् भागवत महापुराण में विष्णु के अवतारों की कथाएं विस्तार से वर्णित हैं। इसके बारहवें स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में भगवान के कल्कि अवतार की कथा कुछ विस्तार से दी गई, कहा गया है कि सम्भल ग्राम में विष्णुयश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के पुत्र के रूप में भगवान कल्कि का जन्म होगा। वे देवदत्त नाम के घोड़े पर आरूढ़ होकर अपनी कराल करवाल (तलवार) से दुष्टों का संहार करेंगे तभी सतयुग का प्रारम्भ होगा।
‘‘ सम्भल ग्राम, मुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः
भवने विष्णुयशसः कल्कि प्रादुर्भाविष्यति।।
भगवान श्री कल्कि सत्य सनातन धर्म में प्राण पुरूष की भाँति स्थान रखते हैं। कलियुग में सतयुग की ओर युग की धारा को मोड़ने की सामथ्र्य भगवान के ऐसे ही तेजस्वी रूप में संभव है। आज मनुष्य हौर उसके द्वारा बुना हुआ सामाजिक ताना बाना इन सभी बुराईयों से ग्रसित हो गये हैं। जहाँ धर्म, सत्य, न्याय, कर्तव्य, मातृ-पितृ भक्ति, गौसेवा, ज्ञान, सुसंस्कार, वैदिक गरिमा, सच्चे ब्रह्मानुरागी और संतोषी ब्राह्मण और उनका सम्मान करने वाले वीर और आन वाले क्षत्रिय और समाज के हितैषी, दानी और उदार वैश्य, कर्तव्य पथ पर चलने वाले शूद्र और देवी शक्ति की प्रतीक नारि शुचिता पर टिकना बहुत कठिन हो गया है। आज धर्म के नाम पर तथाकथित धर्मगुरू अपने शिष्यों और भक्तों को ईश्वर के वास्तविक रूप का ज्ञान कराने की बजाए स्वय ईश्वर बन बैठे हैं। जब गुरू ही ईश्वर हो जाए, तब कैसे और कौन करायेगा हमें ईश्वर की पहचान ? अधर्म और गुरूडम को, असत्य और अन्याय को और अविश्वास और अश्रद्धा को समाप्त करने भगवान श्री विष्णु का अन्तिम अवतार सम्भल में होगा। समस्त विश्व का कल्याण इस अवतार का प्रायोजन है।
भगवान श्री कल्कि निष्कलंक अवतार हैं। उनके पिता का नाम विष्णुयश और माता का नाम सुमति होगा। उनके भाई जो उनसे बड़े होंगे क्रमशः सुमन्त, प्राज्ञ और कवि नाम के नाम के होंगे। याज्ञवलक्य जी पुरोहित और भगवान परशुराम उनक गुरू होंगे। भगवान श्री कल्कि की दो पत्नियाँ होंगी - लक्ष्मी रूपी पद्मा और वैष्णवी शक्ति रूपी रमा। उनके पुत्र होंगे - जय, विजय, मेघमाल तथा बलाहक।
भगवान का स्वरूप (सगुण रूप) परम दिव्य एवम् ज्योतिमय होता है। उनके स्परूप की कल्पना उनके परम अनुग्रह से ही की जा सकती है। भगवान श्री कल्कि अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक हैं। शक्ति पुरूषोत्तम भगवान श्री कल्कि अद्वितीय हैं। भगवान श्री कल्कि दुग्ध वर्ण अर्थात् श्वेत अश्व पर सवार हैं। अश्व का नाम देवदत्त है। भगवान का रंग गोरा है, परन्तु क्रोध में काला भी हो जाता है। भगवान पीले वस्त्र धारण किये हैं। प्रभु के हृदय पर श्रीवत्स का चिह्न अंकित है। गले में कौस्तुभ मणि सुशोभित है। भगवान पूर्वाभिमुख व अश्व दक्षिणामुख है। भगवान श्री कल्कि के वामांग में लक्ष्मी (पद्मा) और दाएं भाग में वैष्णवी (रमा) विराजमान हैं। पद्मा भगवान की स्वरूपा शक्ति और रमा भगवान की संहारिणी शक्ति हैं। भगवान के हाथों में प्रमुख रूप से नन्दक व रत्नत्सरू नामक खड्ग (तलवार) है। शाऽं्ग नामक धनुष और कुमौदिकी नामक गदा है। भगवान कल्कि के हाथ में पांचजन्य नाम का शंख है। भगवान के रथ अत्यन्त सुन्दर व विशाल हैं। रथ का नाम जयत्र व गारूड़ी है। सारथी का नाम दारूक है। भगवान सर्वदेवमय व सर्ववेदमय हैं। सब उनकी विराट स्वरूप की परिधि में हैं। भगवान के शरीर से परम दिव्य गंध उत्पन्न होती है जिसके प्रभाव से संसार का वातावरण पावन हो जाता है।

भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार अथवा संचालक माना जाता है। यह बात तो हम सभी जानते हैं कि भगवान विष्णु के 10 अवतारों में...
04/10/2023

भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार अथवा संचालक माना जाता है। यह बात तो हम सभी जानते हैं कि भगवान विष्णु के 10 अवतारों में से एक मत्स्य अवतार हैं। उन्होंने यह स्वरूप सृष्टि के अंत में लिया था। बता दें कि जब प्रलय आने में कुछ ही समय बचा हुआ था, तब उन्होंने सृष्टि के उद्धार के लिए यह रूप धारण किया था। शास्त्रों में वर्णित भगवान विष्णु के सभी अवतारों के पीछे कुछ ना कुछ उद्देश्य अवश्य छिपा हुआ है और उनसे जुड़ी अद्भुत कथाएं भी ऋषि एवं मुनियों द्वारा वेद-ग्रंथों में वर्णन कई वर्षों पहले किया गया था, जिसका श्रवण और पाठन आज भी किया जाता है। आज हम भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार के विषय में जानेंगे कि कैसे उनके द्वारा संसार का उत्थान हुआ था?

क्यों धारण किया था भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप?
किंवदंतियों के अनुसार, एक बार एक प्रतापी राजा जिसका नाम सत्यव्रत था, कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। स्नान के पश्चात जब सूर्य देव को तर्पण के लिए अपने हाथ उठाया तो उसकी अंजलि में एक छोटी सी मछली की आ गई। राजा सत्यव्रत ने मछली को पुनः नदी में छोड़ दिया। लेकिन तभी मछली बोली कि 'राजन में इस जल में बड़े-बड़े जीव रहते हैं जो छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। कृपया मेरे प्राणों की रक्षा करें।' तब सत्यव्रत के हृदय में उस मछली के लिए दया उत्पन्न हुई और वह उस मछली को अपने कमंडल में रखकर अपने घर ले आया।
अगली सुबह जब सत्यव्रत नींद से उठा, तब मछली का शरीर इतना बड़ा हो चुका था कि कमंडल भी छोटा पड़ने लगा था। तब मछली बोली कि 'राजा मेरे रहने के लिए कोई और स्थान हो तो कृपया ढूंढिए। मैं इसमें नहीं रह पा रही हूं।' तब सत्यव्रत ने मछली को कमंडल से निकालकर पानी के बड़े मटके में रख दिया। रात भर बाद मटका भी मछली के लिए छोटा पड़ने लगा। ऐसा करते-करते मछली का आकार इतना बड़ा हो गया कि उसे सरोवर में डालना पड़ा। कुछ समय बाद वह इतनी बड़ी हो गई कि सरोवर भी उसके लिए छोटा पड़ गया और उसके बाद उसे समुद्र में डाल दिया गया।
आश्चर्य की बात यह थी कि विशालकाय समुद्र की मछली के लिए छोटा पड़ गया। तब सत्यव्रत ने बड़े ही विनम्र स्वर में पूछा कि 'आप कौन हैं, जिन्होंने सागर को भी डुबो दिया है?' तब भगवान विष्णु ने उत्तर दिया कि 'मैं हयग्रीव नामक दैत्य के वध के लिए आया हूं। जिसने छल वेदों को चुरा लिया है और उसके कारण जगत में चारों ओर अज्ञानता और अधर्म फैल गया है।' भगवान विष्णु आगे कहा कि 'आज से 7 दिन के बाद पृथ्वी पर प्रलय आएगी और वह समय बहुत ही भयानक होगा। संपूर्ण पृथ्वी जल मग्न हो जाएगी। जल के अतिरिक्त यहां कुछ भी नहीं बचेगा। तब आपके पास एक नाव पहुंचेगी और उस समय आप सभी प्रकार के जरूरी अनाज, औषधि, बीज एवं सप्त ऋषियों को साथ लेकर उस नाव पर सवार हो जाएं। मैं उसी समय आपसे फिर मिलुंगा।'
सत्यव्रत ने यह भगवान का आदेश मानकर स्वीकार किया और सातवें दिन जब पृथ्वी पर प्रलय चक्र ने अपना आकार बढ़ाना शुरू किया और समुद्र सीमाओं को लांघ कर सब कुछ जल मग्न करने लगी, तब उसी समय सत्यव्रत को एक नाव दिखा। आदेशानुसार सत्यव्रत ने नाव में सप्त ऋषियों को नाव में सम्मानपूर्वक चढ़ाया, साथ महत्वपूर्ण अनाज, औषधि को भरकर सत्यव्रत भी उसी नाव पर सवार हो गया। सागर के वेग के कारण नाव अपने आप चलने लगी। चारों ओर पानी के अलावा और कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। इसी बीच सत्यव्रत को मत्स्य रूप में भगवान दिखे और श्रीहरि से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत और सप्तऋषि धन्य हो धन्य हो गए। जब प्रकोप शांत हुआ, तब भगवान ने हयग्रीव का वध कर सभी वेद वापस छीन लिए और ब्रह्मा जी को वापस सौंप दिए। इस प्रकार भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण कर वेदों का उद्धार किया तथा प्राणियों का कल्याण किया।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा। अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥(श्रीमद्भगवद्गीता 11/13)दृष्टि की सीमा, बुद्...
19/09/2023

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥(श्रीमद्भगवद्गीता 11/13)

दृष्टि की सीमा, बुद्धि की सीमा, ज्ञान की और बलवान की सीमा।
आदि न अंत अनादि प्रभू जिनकी नहिं कृपा प्रवाह की सीमा।।
जग में जल में थल में नभ में हरि की दश दिसि विस्तार नि:सीमा।
आद्यान्त निलय तुम ही हो प्रभु इस दास के सोच विचार की सीमा।।
भृकुटि विलास से सृष्टि रच्यौ ब्रह्माण्ड वसै भगवान तुम्हीं में।
चर अरु अचर निवास करें प्रभु मायावश जग सब तुम ही में।।
दैव अदैव सदैव रहैं तुम्हरे पदरज अनुरज कण ही में।
भानु विधु: ग्रह सातहुं तल रचि राखि पुनः लय होत तुम्हीं में।।
ध्यान बिना, गुरु ज्ञान बिना प्रभु नामहि केवल आवत जी में ‌।
दासानुदास शरीर तजै तब जीव मिलै पद रज तुम ही में।।

08/07/2023
08/07/2023

श्रीहनुमान चालीसाकी रचना

(श्रीविश्वशान्ति टेकड़ीवाल परिवारकी प्रस्तुति)

श्रीहनुमान-चालीसाको रचनाका कारण एक अति चमत्कारिक ऐतिहासिक प्रसंगसे जुड़ा हुआ है। एक ब्राह्मणकी अन्तिम यात्राकी तैयारियाँ हो रही थीं। गोस्वामी तुलसीदासजी वहाँसे जा रहे थे। किसी स्त्रीने आकर तुलसीदासजीका चरणस्पर्श किया। सहज ही, उन्होंने आशीर्वाद दिया, 'अखण्ड सौभाग्यवती भव।'व्यर्थ हैं। मेरे पतिका अभी-अभी निधन हुआ है।' तुलसीदासजीने कहा—'मेरे मुखसे निकले हुए शब्द कदापि अन्यथा नहीं होंगे। प्रभु तेरे पतिको जीवित करेंगे।'उन्होंने वहाँ उपस्थित सभीको आँखें बन्द करके श्रीरामनामका जप करनेके लिये कहा। कुछ ही क्षणोंमें मृत ब्राह्मण पुनर्जीवित हुआ। इस घटनाके साक्षी सभी उपस्थित लोग आश्चर्य से चकित रह गये।

शहंशाह अकबरके वित्तमंत्री टोडरमल और भक्तकवि रहीमने गोस्वामी तुलसीदासजीके इस चमत्कारके समाचार बादशाहतक पहुँचाये। अकबरने तुलसीदासजीको दरबारमें उपस्थित होनेका हुक्म किया। साहित्यरचनामें अति व्यस्त होनेके कारण गोस्वामी तुलसीदासजीने आमंत्रणको अस्वीकार किया। बादशाहके अहंकारपर चोट लगी और उसने सैनिकोंको भेजकर तुलसीदासजीको बलपूर्वक दरबारमें बुलाया और कोई चमत्कार दिखानेका आदेश किया।

तुलसीदासजीने नम्रतासे कहा-'मैं कोई चमत्कार नहीं करता, मैं केवल श्रीरामजीका भक्त हूँ। यह सम्पूर्ण लीला एवं कृपा मेरे इष्टदेव श्रीरामकी ही है।'अच्छा, चलो देखते हैं, श्रीराम तुम्हारे लिये क्या कर्ताओंने करते हैं ?' कहकर बादशाहने तुलसीदासजीको फतेहपुर हनुमान- सीकरीकी जेलमें बन्द कर दिया।

स्वाभिमानी तुलसीदासजीने बादशाहकी बर्बरताके सामने झुकनेसे इनकार किया और हनुमान चालीसाकी रचना करके उसका चालीस दिनोंतक अनुष्ठान किया। अनुष्ठान सम्पन्न होते ही फतेहपुर सीकरीमें वानरोंका विशाल समूह उतर पड़ा और पूरे नगरमें तबाही मचा दी। शहरके रक्षक और मुगल सैनिक वानरसेनाके पराक्रमको असहाय बनकर देखते रहे। किसी वृद्ध हाफिजने अकबरको चेतावनी दी कि किसी पवित्र सन्तको बन्दी बनानेका यह परिणाम है।बादशाहको अपनी भूलका एहसास हुआ। उसने तुलसीदासजीके चरण छूकर उनसे माफी माँगी और उन्हें सम्मानके साथ मुक्त किया। गोस्वामीजीके बाहर आते ही वानरोंका उपद्रव शान्त हुआ। तुलसीदासजीने अकबरको हमेशा के लिये फतेहपुर सीकरी छोड़ देनेकी सलाह दी। उनकी आज्ञाको शिरोधार्यकर अकबरने पुनः दिल्लीको राजधानी बनाया। इस घटनाके बाद अकबर जीवनभर गोस्वामी तुलसीदासजीके निजी स्वजनके रूपमें रहा और उसने शाही फरमान जारी किया कि श्रीराम और श्रीहनुमान्जीके भक्त हिन्दुओंसे कोई ऐसा दुर्व्यवहार न किया जाय, जिससे उन्हें परेशानी हो ।

उपर्युक्त प्रसंग केवल कही-सुनी बात नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक तथ्य है। इसको समीक्षा अनेक भारतीय विद्वान् और इतिहासकारोंके उपरान्त केम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेसद्वारा प्रकाशित, ‘Warrior ascetics and Indian empires ग्रन्थमें विलियम पिन्च तथा ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेसद्वारा प्रकाशित ‘Hanuman's Tale: The massage of a Divine Monkey' ग्रन्थमें फिलीप लुट्गेन्डोर्फ-जैसे पाश्चात्य अनुसन्धान-कर्ताओंने भी की है। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि हनुमान चालीसा का पाठ एवं अनुष्ठान करनेवाले भक्त की रक्षा श्रीहनुमानजी अवश्य करते हैं।

['ज्ञानगुणसागर-हनुमान' से साभार ]

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास...
08/07/2023

श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं..

इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।
जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-
नारद- बालक तुम कौन हो ?
बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।
नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?
बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।

तब नारद ने ध्यान धर देखा। नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।
बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?
नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।
बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?
नारद- शनिदेव की महादशा।

इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।
नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।
ब्रह्मा जी से वरदान मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।
शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।
अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वरदान मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-

1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।

2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।

सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है.....

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