12/08/2020
महाभारत के युद्ध मे जब अर्जुन को लगता है कि युद्ध मे सामने तो सारे मेरे अपने खड़े है, इनको मारकर प्राप्त होने वाला राज्य मुझे नही चाहिए ।तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया उसे ही गीता के नाम से जाना जाता है । आज उसका सार यहाँ दिया जा रहा है जो विश्व के समस्त युवाओँ के लिए समझना जरूरी है।।
श्रीकृष्ण ने कहा:-
हे अर्जुन >इस धर्म और अधर्म के बीच मे होने वाले युद्ध के मध्य में खड़े होकर अगर तुम ये कहोगे की इनको मारकर मुझे क्या प्राप्त होगा तो ये तुमारे वश में नही है क्योंकि तुम्हारे वश में सिर्फ तुम्हारा कर्म है उस से प्राप्त होने वाला फल नही। तुम सिर्फ अपना कर्म करो फल की चिंता मत करो क्योंकि फल देना मेरे हाथ मे है।
और अगर तुम ये सोचते हो कि इस युद्ध को छोड़कर तुम तटस्थ होकर अलग बैठ सकते हो तो वो भी तुम्हारे लिए असम्भव है, क्योकि इस संसार मे पैदा हुए प्रत्येक मनुष्य का एक क्षण मात्र भी ऐसा नही होता कि जब वो कर्म नही कर रहा होता है । प्रत्येक घड़ी मनुष्य कोई न कोई कर्म कर रहा होता है इसलिए तुम वो कर्म करो जो तुम्हारे क्षत्रिय धर्म के अनुकूल है।। तुम क्रम का त्याग नही कर सकते तुम्हें तो सिर्फ उस कर्म से प्राप्त होने वाले फल का त्याग करना है।।
और हमे कर्म कोन से करने चाहिए ये तय करते है हमारे तीन गुण सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। हमारे शरीर की 5 इंद्रिया हमारे 5 भाव है और ये पाँचो मन से संचालित होती है । और मन बड़ा चंचल है वो ये तय नही कर सकता कि कोन से कर्म करने योग्य है और कौन सा नही। ये हमारी बुद्धि को तय करना होता है ।
सतोगुण:-अगर कोई भी कर्म में किसी का भला छुपा हुआ है और उस कार्य को करने में तुम्हे आंनद प्राप्त होता है और तुम्हारी अन्तरात्मा उस कार्य को करने के ये तुम्हे प्रेरित करती है तो वो कार्य तुम् उस समय सतोगुण से युक्त होकर कार्य कर रहे हो।।
रजोगुण:-अगर किसी कार्य करने में तुम्हारी बुद्धि निर्णय नहीं ले पा रही और सोच रही है कि करू या ना करू अथवा जो कार्य तुम अपने सांसारिक जीवन को चलाने हेतु कर रहे हो वो कार्य रजोगुण से प्रेरित है।
तमोगुण:-अगर कोई ऐसा कार्य है जो ना करने योग्य है तुम्हारी आत्मा भी जिसको करने से मना कर रही है और फिर भी तुम वो कार्य करते हो तो वो कार्य तमोगुण से प्रेरित है।।
इसलिए कोई भी कार्य से पहले अच्छी तरह सोच विचार करो क्योकि मन से बड़ी बुद्धि और बुद्धि से बड़ी आत्मा है। इसके बाद तुम कुछ भी कर्म करते हो तो वो मुझे अर्पण करदो क्योंकि मेरी प्रेरणा के बिना तो कोई कर्म होता ही नहीं है । और तुमने जैसा कर्म किया वैसा फल तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा ।।
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संजय अग्रवाल
सूरत