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दुनिया में कोई भी काम कठिन या सरल नहीं होता आपकी योग्यता और सोच पर निर्भर करता है
15/04/2026

दुनिया में कोई भी काम कठिन या सरल नहीं होता आपकी योग्यता और सोच पर निर्भर करता है

15/04/2026

महत्वपूर्ण बातें :-धूप छांव, सुख दुख, हंसना रोना, ये प्रकृति का स्वभाव है इन सब बातों को लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं ...
09/04/2026

महत्वपूर्ण बातें :-
धूप छांव, सुख दुख, हंसना रोना, ये प्रकृति का स्वभाव है इन सब बातों को लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है

पूर्व मध्यकाल का इतिहास :-पूर्व मध्यकाल (लगभग 600-1200 ईस्वी) भारतीय इतिहास में गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद का एक संक्...
04/04/2026

पूर्व मध्यकाल का इतिहास :-
पूर्व मध्यकाल (लगभग 600-1200 ईस्वी) भारतीय इतिहास में गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद का एक संक्रमणकालीन दौर था, जिसे सामंतवाद, क्षेत्रीय राज्यों के उदय (राजपूत) और राजनीतिक विकेंद्रीकरण के लिए जाना जाता है। इस दौर में उत्तर में गुर्जर-प्रतिहार, पाल, और दक्षिण में चोल (चोल साम्राज्य के विवरण पर जानकारी) प्रमुख थे, जो लगातार क्षेत्रीय वर्चस्व के लिए लड़ रहे थे।

पूर्व मध्यकाल की प्रमुख विशेषताएं:
राजनीतिक विकेंद्रीकरण (सामंतवाद): राजाओं की शक्ति कमजोर हुई और छोटे-छोटे सामंत (भूमि के मालिक) ताकतवर हो गए। यह काल सामंतवाद के चरमोत्कर्ष का समय था।
क्षेत्रीय राज्यों का उदय: उत्तर भारत में राजपूतों (जैसे- परमार, चंदेल, चौहान) का उदय हुआ। बंगाल में पाल, दक्षिण में चोल और राष्ट्रकूट प्रमुख वंश थे।
सांस्कृतिक विकास: कला, साहित्य और मंदिर वास्तुकला (जैसे- खजुराहो के मंदिर, तंजौर का बृहदेश्वर मंदिर) में चोल और चंदेल शासकों ने महान योगदान दिया।
आर्थिक स्थिति: व्यापारिक मार्गों में कमी के कारण स्थानीय अर्थव्यवस्था का विकास हुआ, लेकिन मुद्रा का प्रचलन कम हो गया।
महत्वपूर्ण राजवंश (750-1100 ईस्वी):
गुर्जर-प्रतिहार: उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत में।
पाल वंश: बंगाल और बिहार क्षेत्र में।
राष्ट्रकूट/चोल: दक्षिण भारत में, चोलों ने अपनी नौसैनिक शक्ति के लिए ख्याति प्राप्त की।

यह युग एक तरह से प्राचीन भारत से मध्यकालीन भारत की ओर संक्रमण का समय था, जो विदेशी आक्रमणों (मोहम्मद गौरी आदि) के साथ समाप्त हुआ।

हिंदी साहित्य आदिकाल (10वीं से 14वीं शताब्दी) हिंदी साहित्य का प्रारंभिक काल है, जो अपनी युद्ध-वर्णन, वीरगाथात्मकता, और ...
01/04/2026

हिंदी साहित्य
आदिकाल (10वीं से 14वीं शताब्दी) हिंदी साहित्य का प्रारंभिक काल है, जो अपनी युद्ध-वर्णन, वीरगाथात्मकता, और आश्रयदाता कवियों की प्रशंसा के लिए जाना जाता है। इस काल में वीर रस के साथ-साथ श्रृंगार रस का भी सुंदर मिश्रण है, जिसमें युद्ध और प्रेम दोनों प्रमुख विषय रहे।
आदिकाल की मुख्य विशेषताएं:
वीर रस की प्रधानता: रासो काव्यों (जैसे पृथ्वीराज रासो) में वीर रस की प्रमुखता है, जहाँ युद्धों का सजीव वर्णन मिलता है।
आश्रयदाताओं की प्रशंसा: कवि अपने राजाओं के दरबार में रहते थे और उनकी वीरता व यश का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते थे।
ऐतिहासिकता का अभाव: यद्यपि पात्र ऐतिहासिक (जैसे पृथ्वीराज चौहान) थे, लेकिन घटनाओं में कल्पना की अधिकता के कारण ऐतिहासिक तथ्यों का अभाव है।
युद्धों का सजीव चित्रण: युद्ध वर्णन में वीरता के साथ-साथ भयंकर दृश्यों का वर्णन कवियों ने प्रत्यक्षदर्शी की तरह किया है।
श्रृंगार रस का समावेश: युद्धों के मूल में प्रायः सुंदर राजकुमारी होती थी, जिससे वीर रस के साथ श्रृंगार का भी संयोग होता था।
डिंगल-पिंगल भाषा का प्रयोग: इस काल में अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी (डिंगल) और ब्रजभाषा मिश्रित अपभ्रंश (पिंगल) का प्रयोग हुआ है।
विविध साहित्य: युद्ध वर्णन के अलावा, सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य के रूप में धार्मिक और उपदेशात्मक काव्य भी रचे गए।
यह काल 'वीरगाथाकाल' के रूप में भी प्रसिद्ध है, जो अपनी वीरता और युद्ध के सजीव चित्रण के कारण हिंदी साहित्य में विशेष स्थान रखता है।

नवपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं:कृषि की शुरुआत: मानव ने भोजन उत्पादन शुरू किया। मेहरगढ़ (पाकिस्तान) में गेहूं, जौ और कपा...
31/03/2026

नवपाषाण काल की प्रमुख विशेषताएं:
कृषि की शुरुआत: मानव ने भोजन उत्पादन शुरू किया। मेहरगढ़ (पाकिस्तान) में गेहूं, जौ और कपास की खेती के सबसे प्राचीन साक्ष्य मिले हैं, जबकि कोल्डीहवा (यूपी) से चावल की खेती के प्रमाण मिले हैं।
स्थायी जीवन: कृषि के कारण मनुष्य ने एक स्थान पर बसना शुरू किया, जिससे गांवों का विकास हुआ। घर मिट्टी, पत्थर और सरकंडों से बने होते थे।
पॉलिश किए गए पत्थर के उपकरण: इस युग में औजार अधिक उन्नत, धारदार और पॉलिश किए हुए थे। पत्थर की कुल्हाड़ियों का उपयोग मुख्य रूप से जंगल साफ करने और कृषि के लिए किया जाता था।
मृदभांड (मिट्टी के बर्तन): अनाज को रखने (भंडारण) और खाना पकाने के लिए चाक (व्हील) का उपयोग करके मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) बनाए जाने लगे।
पशुपालन: कुत्ता, भेड़, बकरी और मवेशियों को पालतू बनाया गया, जो कृषि और भोजन के स्रोत के रूप में काम आते थे।
पहिये का आविष्कार: पहिये का उपयोग मिट्टी के बर्तन बनाने (चाक) और परिवहन (गाड़ी) के लिए किया जाने लगा।
वस्त्र निर्माण: मानव ने कपास और ऊन से बने वस्त्रों का उपयोग करना सीख लिया था।
प्रमुख स्थल: भारत में मेहरगढ़ (बलूचिस्तान), बुर्जहोम और गुफकराल (कश्मीर), चिरांद (बिहार), और कोल्डीहवा (यूपी) प्रमुख नवपाषाणिक स्थल हैं।
सांस्कृतिक परिवर्तन: इस काल में मृतकों को दफनाने की प्रथा विकसित हुई, और बुरज़ाहोम में पालतू जानवरों को भी मालिकों के साथ दफनाने के साक्ष्य मिले हैं।

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30/03/2026

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