23/04/2024
वो मेरी चाहत, ना जाने क्यूं बिखरने को है,
शायद रंग कोई नया उसपे चढ़ने को है,
बहुत हो गया शायद, मेरी खुशबू अब नहीं भाती उसे,
वो लेकर एक नई खुशबू, फिर से निखरने को है।
रंग मेरी मुहब्बत का फीका था,
मैंने तो प्यार करना उसी से सीखा था,
वो बेताब थी जाने को, ख्वाबों की पनाहों में,
मुझे तो हकीकत के साथ जीना था,
उसमे फिर से नई लहर सिहरने को है,
वो मेरी चाहत
फिरा ली नजरें मेरी जरा सी आंख लगी,
कि थी पतझड़ और सूखे पत्तों में आग लगी,
हवा भी बदली, और बदल गई दिशाएं भी,
धूल जमती ही गई, और ना आगे बात बढ़ी,
नया एक गीत बजा, उसके कदम थिरकने को हैं
वो मेरी चाहत