15/10/2023
#नवरात्र शक्ति साधना का महापर्व
१). प्रथम - #शैलपुत्री को प्रणाम, उनके स्वरूप का ध्यान और प्रणाम
प्रथम - नवरात्रि #शैलपुत्री
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।
२). शक्ति उपासना के इस महापर्व में विनम्रता कि आह्वान
विनम्रता - विनय पूर्ण स्वभाव
नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः।
शुष्कवृक्षाश्च मूर्खाश्च, न नमन्ति कदाचन।।
अर्थ : जिस तरह जो वृक्ष फलों से लदे होते हैं, वह सदैव झुके रहते हैं। उसी तरह जो मनुष्य गुणों से युक्त होते हैं, वह सदैव विनम्र एवं झुके रहते हैं। जो वृक्ष सूखे होते हैं, वह हमेशा तन कर खड़े रहते हैं, उसी प्रकार जो लोग मूर्ख लोग होते हैं वह हमेशा अकड़ में रहते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि जिनमें गुण हैं, वह विनम्र है। वह विनम्रता से झुक कर बात करते हैं। जिनमें गुण नहीं है, अवगुण हैं, वे हमेशा अकड़ में रहते हैं और एक दिन टूट कर बह जाते है।
३) शक्ति उपासना में सभ्य भाषा और व्यवहार का आह्वान उसका स्वाभिमान और प्रभाव
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।
अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।
४) साधना का मार्ग समर्पण से पुष्ट होता है, अभिमान से नहीं। माँ गायत्री को साधने वाले गुरू विश्वामित्र अपने साधना के बल पर जीवित ही त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने कि सामर्थ्य रखते हैं पर ब्रह्मार्षि बनने की बाधा उनका दंभ और अहंकार ही बना रहा, जिस क्षण अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष के स्थान को समर्पण ने लिया। तो ब्रह्मार्षि कहलाये और वह भी गुरू वशिष्ठ को श्रीमुख से... शक्ति साधना के इस नवरात्रि रूपेण मार्ग पर अपने समर्पण को विकसित करें।