23/10/2025
भवन के पीछे एक छोटा-सा बाड़ा था —
जहाँ एक हाथी बंधा रहता था — गजेंद्र।
कभी वह जंगल का राजा था — बलशाली, विवेकशील और स्वतंत्र।
अब वह एक रस्सी से जकड़ा था।
रस्सी मोटी नहीं थी, पर आदतें उससे कहीं मोटी थीं।
सुबह उसका रखवाला आता, दो बाल्टी पानी, थोड़ा दाना डालता और चला जाता।
गजेंद्र चुपचाप खड़ा रहता।
न शिकायत, न प्रतिरोध।
वह जानता था —
अगर उसने कुछ कहा, तो चाबुक उठेगा,
और भोजन देर से मिलेगा।
धीरे-धीरे उसने मान लिया कि उसका जीवन बस यही है —
रस्सी, चाबुक और दाने का समय।
उसके भीतर जो राजा सोया था,
एक शाम वह हुआ, जो रोज होता था।
गुटखखोर महावत
ने गजेंद्र का फिर अपमान किया।
गजेंद्र को पानी नहीं दिया गया।
धूप कठोर थी, हवा तपी हुई।
गजेंद्र की सूखी जीभ उसके मुँह में चिपक रही थी।
यह वह सालों से सहता आ रहा था पर एक तुच्छ गुटकाबाज महावत से बार बार का अपमान उसे बर्दास्त नहीं हुआ ।
तभी साथ बंधे एक घोड़े ने उसे आवाज़ दी —
“इतना बड़ा होकर भी रस्सी से डरता है?”
गजेंद्र ठिठक गया।
वह आवाज़ कोई बाहरी न थी —
वह उसके भीतर का बच्चा था,
जो बरसों से चुप था।
उसने रस्सी को देखा —
वही रस्सी, जो अब तक उसके भाग्य का प्रतीक थी।
उसने अपनी सूँड़ उठाई —
रस्सी टूट गई, मानो अंधकार फट गया हो।
वह दौड़ा — नहीं, वह लौटा —
अपने अस्तित्व की ओर, अपने जंगल की ओर।
अगले दिन खबर फैली —
“गजेंद्र भाग गया!”
अब भूखा मर जाएगा
लोग हँसे, बोले —
“अब देखें ये क्या करेंगा…”
पर महीनों बाद
“गजेंद्र एक नए विशाल वन में
मस्ताया पाया गया ”।
उसके प्रतीक में एक खुली रस्सी थी —
और नीचे लिखा था —
सह मत तुझमें महान शक्तियों का वास हे
> “जो खुद को बाँध ले, वही दास है।
कहानी का सार:
रस्सी चाहे सूत की हो या सैलरी की —
अगर डर से बंधी है, तो बेड़ी ही है।
जिन्होंने अपने भीतर के ‘गजेंद्र’ को जगा लिया,
उन्हें दुनिया की कोई दीवार रोक नहीं सकती।