21/10/2020
संपूर्ण ब्रह्मांड मे सभी ग्रह, नक्षत्र , तारे व आकाशीय पिंड अपने परिपथ पर अपनी अपनी कक्षा मे परम तत्त्व के आकर्षण एवं विकर्षण के नैसर्गिक सिद्धांत से बिना किसी संघर्ष के चल रहे हैं. हमारा यह स्थूल,कारण व सूक्ष्म शरीर भी इस ब्रह्मांड का एक पारूमाणविक अंश रूपी पिंड है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के अन्य पिंडों के साथ क्रिया प्रतिक्रिया करता रहता है. फलस्वरूप हमारे मन मे निरंतर नवीन संकल्प उत्पन्न होते हैं और हमारा शरीर सदा इस शाश्वत संचालित प्रक्रिया के कारण स्वाभाविक रूप से नूतन कार्मिक प्रकल्प संपादित करता रहता है. इस शाश्वत प्रक्रिया से मनुष्य के भविष्य का निर्माण होता है जिसे हम साधारण भाषा मे कर्म और कर्मफल कहते हैं. निखिल ब्रह्मांड मे आकाशीय पिंडो से अदृश्य रश्मियों का विसरण होता रहता है. सभी पिंडों के साथ मानवीय पिंड के पारस्परिक प्रतिक्रिया के कारण ही हर मानव का विकास अलग अलग होता है. प्रत्यक्ष रूप से साक्षात सूर्य के कारण फसलें पकती हैं और चंद्रमा के कारण ही जड़ी बूटियां रसासिक्त होती हैं. ऐसा ही प्रभाव ग्रह नक्षत्र अपनी रश्मियों के द्वारा मानव के मनो मस्तिष्क पर डालते हैं. यह प्रभाव ही ज्योतिष के वैज्ञानिक अस्तित्व को प्रमाणित करता है. जैसे पुष्ट बीज से ही उसके पुष्ट वृक्ष होने की भविष्य वाणी नहीं की जा सकती है उसे पुष्ट करने हेतु अच्छी भूमि,प्रकाश,वायु,जल, खाद और विशेष देखभाल की जरूरत होती है. इसी तरह मानव के जीवन मे सभी पिंडों ,ग्रहों, नक्षत्रों ,क्षिति जल पावक गगन व समीर के पारस्परिक प्रतिक्रिया के अनुकूलन के लिये कुछ निश्चित क्रियाओं की आवश्यकता होती है. ज्योतिष मे इसे यंत्र,मंत्र और तंत्र के द्वारा संपादित किया जाता है.