31/01/2013
मंगल चिह्न स्वास्तिक
स्वस्तिक मंत्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। मंत्रोच्चार करते हुए दर्भ से जल के छींटे डाले जाते थे तथा यह माना जाता था कि यह जल पारस्परिक क्रोध और वैमनस्य को शांत कर रहा है। गृहनिर्माण के समय स्वस्तिक मंत्र बोला जाता है। मकान की नींव में घी और दुग्ध छिड़का जाता था। ऐसा विश्वास है कि इससे गृहस्वामी को दुधारु गाएँ प्राप्त हेती हैं एवं गृहपत्नी वीर पुत्र उत्पन्न करती है। खेत में बीज डालते समय मंत्र बोला जाता था कि विद्युत् इस अन्न को क्षति न पहुँचाए, अन्न की विपुल उन्नति हो और फसल को कोई कीड़ा न लगे। पशुओं की समृद्धि के लिए भी स्वस्तिक मंत्र का प्रयोग होता था जिससे उनमें कोई रोग नहीं फैलता था। गायों को खूब संतानें होती थीं।
यात्रा के आरंभ में स्वस्तिक मंत्र बोला जाता था। इससे यात्रा सफल और सुरक्षित होती थी। मार्ग में हिंसक पशु या चोर और डाकू नहीं मिलते थे। व्यापार में लाभ होता था, अच्छे मौसम के लिए भी यह मंत्र जपा जाता था जिससे दिन और रात्रि सुखद हों, स्वास्थ्य लाभ हो तथा खेती को कोई हानि न हो। पुत्रजन्म पर स्वस्तिक मंत्र बहुत आवश्यक माने जाते थे। इससे बच्चा स्वस्थ रहता था, उसकी आयु बढ़ती थी और उसमें शुभ गुणों का समावेश होता था। इसके अलावा भूत, पिशाच तथा रोग उसके पास नहीं आ सकते थे। षोडश संस्कारों में भी मंत्र का अंश कम नहीं है और यह सब स्वस्तिक मंत्र हैं जो शरीररक्षा के लिए तथा सुखप्राप्ति एवं आयुवृद्धि के लिए प्रयुक्त होते हैं। भारतीय संस्कृति और धर्म में स्वास्तिकको शुभ माना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि न केवल हिंदू धर्म, बल्कि कुछ दूसरे धर्मावलंबी भी बडी श्रद्धा और भक्ति भाव से इसे अपने भवनों, दुकानों और प्रतिष्ठानों में लगाते हैं। यहां तक कि विदेश में भी विभिन्न जाति और धर्म को मानने वाले लोग उत्सव के अवसर पर इसे मंगल चिह्न के रूप में बनाते हैं।
महिलाएं अपने आभूषणों मसलन हार, कंगन और कुंडलों आदि में इसका प्रयोग करती हैं। पुराण में कहा गया है जो स्त्रियां इस मंगल चिह्न वाले गहने को मंगलवार के दिन धारण करती हैं, उनकी कामनाएं श्री ब्रह्मा जी अवश्य पूरी करते हैं। बाणभट्टके एक ग्रंथ कादंबरी में भी गोबर से स्वास्तिकबनाने का उल्लेख है। इसके अलावा, हडप्पा व मोहनजोदडो की खुदाई से निकले सिक्कों पर भी स्वास्तिक के मंगल चिह्न बने हुए हैं। चारो पुरुषार्थो को दर्शाता है स्वास्तिकका चिह्न दो तरह से बनाया जाता है। एक सीधा और दूसरा उल्टा। ऐसी मान्यता है कि इसकी चार भुजाएं चार पुरुषार्थो को दर्शाती हैं। ऊपर बाईभुजा धर्म की प्रतीक है और दाहिनी ओर अर्थ, यानी संपत्ति की है। नीचे बाई ओर काम, संपत्ति तथा दाहिनी ओर की भुजा मोक्ष दर्शाती है। यह इस बात को दर्शाता है कि धर्म की प्रतिष्ठा से ही अर्थ, काम, और मोक्ष की भी प्रतिष्ठा होती है। कहने का मतलब है कि हमारे जीवन में मंगल तभी आ सकता है, जब हम धर्म का पालन करेंगे। सच तो यह है कि संपूर्ण विश्व का कल्याण धर्म की स्थापना से ही हो सकता है।
स्वास्तिकका निर्माण अलग-अलग धातुओं और तत्वों से मिलकर होता है। गोबर और मिट्टी से बना स्वास्तिक मंगल कार्यो में बनाना चाहिए। खासकर विवाह, मुंडन, संतान पैदा होने और गोबर्धनपूजा के दिन।हिंदू धर्म में स्वास्तिककी पूजा की विधि भी बताई गई है। अमूमन मंगल और वृहस्पतिवार को इसकी पूजा करनी चाहिए। सूरज निकलने से पहले नहा धोकर परिवार सहित स्वास्तिककी विधिपूर्वक पूजा करना फलदाई माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि चावल, लाल डोरा, फूल, पान और सुपारी के साथ पूजन करने से न केवल परिवार की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि दुखों से भी मुक्ति मिलती है। शास्त्र के अनुसार अच्छी सेहत, धन और आज्ञाकारी संतान के लिए घर के मुखिया को न केवल स्वास्तिक धारण करना चाहिए, बल्कि उनके मंत्रों का जाप भी करना चाहिए। पूजा के मंत्र वेदों में विश्व कल्याण के लिए हजारों मंत्रों की व्याख्या की गई है। इनमें स्वास्तिक की पूजा करने के लिए भी मंत्र बताए गए हैं। इन मंत्रों का उच्चारण संपूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी माना गया है। इसमें सबसे पहले ज्ञान स्वरूप परमात्मा की स्तुति की गई है। इसमें कहा गया है, हे परमात्मा आप हमारे पिता हैं और मैं आपका पुत्र हूं। जिस तरह से पिता अपने पुत्र की हर समय भलाई के बारे में सोचता रहता है, उसी तरह आप भी हमारी भलाई में लगे रहो।
हर तरह के उत्सवों, यज्ञों आदि के अवसर पर इसके गायन की परंपरा है। प्राचीनकाल से यज्ञ की हवन-वेदी के चारों ओर स्वास्तिक का निर्माण किया जाता रहा है और विधिपूर्वक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। कहते हैं कि इन मंत्रों का उच्चारण करने वाले व्यक्ति में न केवल संकल्प शक्ति दृढ होती है, बल्कि वह साहसी भी होता है। यह प्रतीक और जाप हमें पे्ररणा देते हैं कि हमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सबके कल्याण के लिए सोचना और कार्य करना चाहिए।
स्वास्तिक का भारतीय संस्कृति में बडा महत्व है। विघ्नहर्ता गणेश जी की उपासना धन, वैभव और ऎश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ ही शुभ लाभ, और स्वास्तिक की पूजा का भी विधान है। विभिन्न प्रकार के सुख और समृद्धि का प्रतीक स्वास्तिक घर, द्वार, आंगन आदि में प्रत्येक शुभ एवं मांगलिक कार्य के आरम्भ बनाया जाता है। यह मंगल भावना और सुख-सौभाग्य का द्योतक है। इसे सूर्य और विष्णु का प्रतीक माना जाता है। ऋग्वेद में स्वास्तिक के देवता संतृन्त का उल्लेख है। सविन्तृ सूत्र के अनुसार इस देवता को मनोवांछित फलदाता, सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है। " सिद्धान्तसार " के अनुसार इसे ब्रम्हाण्ड का प्रतीक माना जाता है। इसके मघ्य भाग को विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रम्हाजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित करने की भावना है। देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभामंडल का चिह्न ही स्वास्तिक के आकार का होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ माना जाता है। तर्क से भी इसे सिद्ध किया जा सकता है। श्रुति, अनुभूति तथा युक्ति इन तीनों का यह एक-सा प्रतिपादन प्रयागराज में होने वाले संगम के समान है। दिशाएं मुख्यत: चार हैं, खडी और सीधी रेखा खींचकर, जो धन चिह्न (+) जैसा आकार बनता है। यह आकार चारों दिशाओं का द्योतक है, ऎसी मान्यता सर्वत्र है। स्वस्ति का अर्थ है—क्षेम, मंगल अर्थात् शुभता और क अर्थात कारक या करने वाला। इसलिए देवताओं के तेज के रूप में शुभत्व देने वाला स्वास्तिक है। स्वास्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के कई अन्य देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है।
जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्त्र, ब्रिटेन, अमरीका, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वास्तिक का प्रचलन है। स्वास्तिक की रेखाओं को कुछ विद्वान अग्नि उत्पन्न करने वाली, अश्वत्थ अथवा पीपल की दो लकडियां मानते हैं। प्राचीन मिस्त्र के लोग स्वास्तिक को निर्विवाद रूप में काष्ठ दण्डों का प्रतीक मानते हैं। यज्ञ में अग्नि मंथन के कारण इसे प्रकाश का भी प्रतीक माना जाता है। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि स्वास्तिक सूर्य का प्रतीक है। जैन धर्मावलम्बी अक्षत पूजा के समय स्वास्तिक चिह्न बनाकर तीन बिन्दु बनाते हैं। पारसी इसे चतुर्दिक दिशाओं और चारों समय की प्रार्थना का प्रतीक मानते हैं। व्यापारी वर्ग इसे शुभ-लाभ का प्रतीक मानते हैं। बहीखातों में ऊपर की ओर श्री लिखा जाता है। इसके नीचे स्वास्तिक बनाया जाता है।
ऎतिहासिक साक्ष्यों में स्वास्तिक का महत्व भरा पडा है। मोहनजोदडो, हडप्पा, संस्कृति, अशोक के शिलालेखों, रामायण, हरवंश पुराण, महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है। दूसरे देशों में स्वास्तिक का प्रचार महात्मा बुद्ध की चरण पूजा से बढा है। तिब्बती इसे अपने शरीर पर गुदवाते हैं और चीन में इसे दीर्घायु और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न देशों के रीति-रिवाज के अनुसार पूजा पद्धति में परिवर्तन होता रहता है। सुख, समृद्धि और रक्षित जीवन के लिए ही स्वास्तिक पूजा का विधान है। यह प्रथा हजारों वर्षो पूर्व से चली आ रही है।
स्वास्तिक दरअसल समृद्धि का सूचक है। संस्कृत में इस शब्द का अर्थ ही होता है समृद्धि या अक्षय जीवन ऊर्जा। स्वास्तिक हज़ारों साल से हिन्दू और बौद्ध परम्परा में इसी प्रतीक के रूप में चला आ रहा है। जर्मनी में नाज़ियों ने स्वास्तिक को पहले अपने पार्टी-चिन्ह के रूप में अपनाया था और बाद में उसे जर्मनी का राजकीय-चिन्ह बना दिया था। तीन सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व की हडप्पा-सभ्यता के स्मारकों की खुदाई में भी बर्तनों और दीवारों पर स्वास्तिक बना हुआ मिला था। इसलिए दुनिया में कोई भी इसे मानवविरोधी या संस्कृतिविरोधी प्रतीक नहीं मानता है। समृद्धि के प्रतीक के रूप में दुनिया के बहुत से देशों की जातियाँ स्वास्तिक का उपयोग करती रही हैं। ख़ुद अमरीका के बहुत से मूल निवासी भी इसे अपना धार्मिक प्रतीक मानते हैं। यही नहीं बीसवीं शताब्दी के शुरू में, जब यह बात सामने आई थी कि इंडोयूरोपियन जातियाँ एक-दूसरे की सहोदर जातियाँ हैं और आर्य ही उनके पूर्वज थे तो पश्चिमी देशों में स्वास्तिक बहुत लोकप्रिय हो गया था। यह अलग बात है कि जर्मन नाज़ियों ने सबसे पहले उसका व्यापक तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया। कनाडा में तो स्वास्तिक नाम का एक शहर भी है।नाज़ी सैनिकों की वर्दियों पर स्वास्तिक का चिन्ह बने होने के साथ-साथ यह भी लिखा रहता था- ‘Gott mit uns’ यानी ख़ुदा हमारे साथ है।