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SAGAN COUNSULTANCY Founded by Mr. Mr.

Ganesh Rastogi, who hailed from an orthodox Hindu Family of holy city and cultural kingdom of the world, Kashi i.e.Varanasi. His Guru ji Late Brambh Gopal Bhaduri have great knowledge of Vedas, Purans & Upnishadas. Rastogi got inspiration from him to establish a unique service to help people live a successful life with help of Astrology. With experience of more than 35 years in the field of astro

logy, Mr. Ganesh Rastogi"s mission is to help others who are searching for the answers to their various problems related to personal life, Business/service, legal issues. marrige problems, career etc His solutions are well known for their accuracy as they are based on sound foundation of astrological science and divine intuitions. He has been awarded with Kashi ratna, Kashi gaurav and Samaj shree and many other awards in the field of Social and Astrological services. A true Devotee of Baba Shree Mahakaal Bhairav Nath who is known as an incarnation of None other than Lord Shiva, who gives power and nourishment to all living beings staying on mother earth (also refereed as Kashi ‘s kotwal), Mr. Rastogi has also written articles in various leading newspapers and journals and is sought after by leading businessmen, corporate, political leaders, administrative officers, film stars etc for consultancy. SAGAN COUNSULTANCY specializes in accurate solution to your problems through:
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- Jadi booti
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31/01/2013
लक्ष्मी नारायण नारायण हरि हरिहरि ॐ नारायण नारायण हरि हरि। भगवन नारायण नारायण हरि हरिशान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं ...
31/01/2013

लक्ष्मी नारायण नारायण हरि हरि
हरि ॐ नारायण नारायण हरि हरि।
भगवन नारायण नारायण हरि हरि
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभांगम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिध्यार्नगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्

मंगल चिह्न स्वास्तिकस्वस्तिक मंत्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते है...
31/01/2013

मंगल चिह्न स्वास्तिक
स्वस्तिक मंत्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। मंत्रोच्चार करते हुए दर्भ से जल के छींटे डाले जाते थे तथा यह माना जाता था कि यह जल पारस्परिक क्रोध और वैमनस्य को शांत कर रहा है। गृहनिर्माण के समय स्वस्तिक मंत्र बोला जाता है। मकान की नींव में घी और दुग्ध छिड़का जाता था। ऐसा विश्वास है कि इससे गृहस्वामी को दुधारु गाएँ प्राप्त हेती हैं एवं गृहपत्नी वीर पुत्र उत्पन्न करती है। खेत में बीज डालते समय मंत्र बोला जाता था कि विद्युत् इस अन्न को क्षति न पहुँचाए, अन्न की विपुल उन्नति हो और फसल को कोई कीड़ा न लगे। पशुओं की समृद्धि के लिए भी स्वस्तिक मंत्र का प्रयोग होता था जिससे उनमें कोई रोग नहीं फैलता था। गायों को खूब संतानें होती थीं।
यात्रा के आरंभ में स्वस्तिक मंत्र बोला जाता था। इससे यात्रा सफल और सुरक्षित होती थी। मार्ग में हिंसक पशु या चोर और डाकू नहीं मिलते थे। व्यापार में लाभ होता था, अच्छे मौसम के लिए भी यह मंत्र जपा जाता था जिससे दिन और रात्रि सुखद हों, स्वास्थ्य लाभ हो तथा खेती को कोई हानि न हो। पुत्रजन्म पर स्वस्तिक मंत्र बहुत आवश्यक माने जाते थे। इससे बच्चा स्वस्थ रहता था, उसकी आयु बढ़ती थी और उसमें शुभ गुणों का समावेश होता था। इसके अलावा भूत, पिशाच तथा रोग उसके पास नहीं आ सकते थे। षोडश संस्कारों में भी मंत्र का अंश कम नहीं है और यह सब स्वस्तिक मंत्र हैं जो शरीररक्षा के लिए तथा सुखप्राप्ति एवं आयुवृद्धि के लिए प्रयुक्त होते हैं। भारतीय संस्कृति और धर्म में स्वास्तिकको शुभ माना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि न केवल हिंदू धर्म, बल्कि कुछ दूसरे धर्मावलंबी भी बडी श्रद्धा और भक्ति भाव से इसे अपने भवनों, दुकानों और प्रतिष्ठानों में लगाते हैं। यहां तक कि विदेश में भी विभिन्न जाति और धर्म को मानने वाले लोग उत्सव के अवसर पर इसे मंगल चिह्न के रूप में बनाते हैं।
महिलाएं अपने आभूषणों मसलन हार, कंगन और कुंडलों आदि में इसका प्रयोग करती हैं। पुराण में कहा गया है जो स्त्रियां इस मंगल चिह्न वाले गहने को मंगलवार के दिन धारण करती हैं, उनकी कामनाएं श्री ब्रह्मा जी अवश्य पूरी करते हैं। बाणभट्टके एक ग्रंथ कादंबरी में भी गोबर से स्वास्तिकबनाने का उल्लेख है। इसके अलावा, हडप्पा व मोहनजोदडो की खुदाई से निकले सिक्कों पर भी स्वास्तिक के मंगल चिह्न बने हुए हैं। चारो पुरुषार्थो को दर्शाता है स्वास्तिकका चिह्न दो तरह से बनाया जाता है। एक सीधा और दूसरा उल्टा। ऐसी मान्यता है कि इसकी चार भुजाएं चार पुरुषार्थो को दर्शाती हैं। ऊपर बाईभुजा धर्म की प्रतीक है और दाहिनी ओर अर्थ, यानी संपत्ति की है। नीचे बाई ओर काम, संपत्ति तथा दाहिनी ओर की भुजा मोक्ष दर्शाती है। यह इस बात को दर्शाता है कि धर्म की प्रतिष्ठा से ही अर्थ, काम, और मोक्ष की भी प्रतिष्ठा होती है। कहने का मतलब है कि हमारे जीवन में मंगल तभी आ सकता है, जब हम धर्म का पालन करेंगे। सच तो यह है कि संपूर्ण विश्व का कल्याण धर्म की स्थापना से ही हो सकता है।
स्वास्तिकका निर्माण अलग-अलग धातुओं और तत्वों से मिलकर होता है। गोबर और मिट्टी से बना स्वास्तिक मंगल कार्यो में बनाना चाहिए। खासकर विवाह, मुंडन, संतान पैदा होने और गोबर्धनपूजा के दिन।हिंदू धर्म में स्वास्तिककी पूजा की विधि भी बताई गई है। अमूमन मंगल और वृहस्पतिवार को इसकी पूजा करनी चाहिए। सूरज निकलने से पहले नहा धोकर परिवार सहित स्वास्तिककी विधिपूर्वक पूजा करना फलदाई माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि चावल, लाल डोरा, फूल, पान और सुपारी के साथ पूजन करने से न केवल परिवार की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि दुखों से भी मुक्ति मिलती है। शास्त्र के अनुसार अच्छी सेहत, धन और आज्ञाकारी संतान के लिए घर के मुखिया को न केवल स्वास्तिक धारण करना चाहिए, बल्कि उनके मंत्रों का जाप भी करना चाहिए। पूजा के मंत्र वेदों में विश्व कल्याण के लिए हजारों मंत्रों की व्याख्या की गई है। इनमें स्वास्तिक की पूजा करने के लिए भी मंत्र बताए गए हैं। इन मंत्रों का उच्चारण संपूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी माना गया है। इसमें सबसे पहले ज्ञान स्वरूप परमात्मा की स्तुति की गई है। इसमें कहा गया है, हे परमात्मा आप हमारे पिता हैं और मैं आपका पुत्र हूं। जिस तरह से पिता अपने पुत्र की हर समय भलाई के बारे में सोचता रहता है, उसी तरह आप भी हमारी भलाई में लगे रहो।
हर तरह के उत्सवों, यज्ञों आदि के अवसर पर इसके गायन की परंपरा है। प्राचीनकाल से यज्ञ की हवन-वेदी के चारों ओर स्वास्तिक का निर्माण किया जाता रहा है और विधिपूर्वक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। कहते हैं कि इन मंत्रों का उच्चारण करने वाले व्यक्ति में न केवल संकल्प शक्ति दृढ होती है, बल्कि वह साहसी भी होता है। यह प्रतीक और जाप हमें पे्ररणा देते हैं कि हमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सबके कल्याण के लिए सोचना और कार्य करना चाहिए।
स्वास्तिक का भारतीय संस्कृति में बडा महत्व है। विघ्नहर्ता गणेश जी की उपासना धन, वैभव और ऎश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ ही शुभ लाभ, और स्वास्तिक की पूजा का भी विधान है। विभिन्न प्रकार के सुख और समृद्धि का प्रतीक स्वास्तिक घर, द्वार, आंगन आदि में प्रत्येक शुभ एवं मांगलिक कार्य के आरम्भ बनाया जाता है। यह मंगल भावना और सुख-सौभाग्य का द्योतक है। इसे सूर्य और विष्णु का प्रतीक माना जाता है। ऋग्वेद में स्वास्तिक के देवता संतृन्त का उल्लेख है। सविन्तृ सूत्र के अनुसार इस देवता को मनोवांछित फलदाता, सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है। " सिद्धान्तसार " के अनुसार इसे ब्रम्हाण्ड का प्रतीक माना जाता है। इसके मघ्य भाग को विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रम्हाजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित करने की भावना है। देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभामंडल का चिह्न ही स्वास्तिक के आकार का होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ माना जाता है। तर्क से भी इसे सिद्ध किया जा सकता है। श्रुति, अनुभूति तथा युक्ति इन तीनों का यह एक-सा प्रतिपादन प्रयागराज में होने वाले संगम के समान है। दिशाएं मुख्यत: चार हैं, खडी और सीधी रेखा खींचकर, जो धन चिह्न (+) जैसा आकार बनता है। यह आकार चारों दिशाओं का द्योतक है, ऎसी मान्यता सर्वत्र है। स्वस्ति का अर्थ है—क्षेम, मंगल अर्थात् शुभता और क अर्थात कारक या करने वाला। इसलिए देवताओं के तेज के रूप में शुभत्व देने वाला स्वास्तिक है। स्वास्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के कई अन्य देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है।
जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्त्र, ब्रिटेन, अमरीका, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वास्तिक का प्रचलन है। स्वास्तिक की रेखाओं को कुछ विद्वान अग्नि उत्पन्न करने वाली, अश्वत्थ अथवा पीपल की दो लकडियां मानते हैं। प्राचीन मिस्त्र के लोग स्वास्तिक को निर्विवाद रूप में काष्ठ दण्डों का प्रतीक मानते हैं। यज्ञ में अग्नि मंथन के कारण इसे प्रकाश का भी प्रतीक माना जाता है। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि स्वास्तिक सूर्य का प्रतीक है। जैन धर्मावलम्बी अक्षत पूजा के समय स्वास्तिक चिह्न बनाकर तीन बिन्दु बनाते हैं। पारसी इसे चतुर्दिक दिशाओं और चारों समय की प्रार्थना का प्रतीक मानते हैं। व्यापारी वर्ग इसे शुभ-लाभ का प्रतीक मानते हैं। बहीखातों में ऊपर की ओर श्री लिखा जाता है। इसके नीचे स्वास्तिक बनाया जाता है।
ऎतिहासिक साक्ष्यों में स्वास्तिक का महत्व भरा पडा है। मोहनजोदडो, हडप्पा, संस्कृति, अशोक के शिलालेखों, रामायण, हरवंश पुराण, महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है। दूसरे देशों में स्वास्तिक का प्रचार महात्मा बुद्ध की चरण पूजा से बढा है। तिब्बती इसे अपने शरीर पर गुदवाते हैं और चीन में इसे दीर्घायु और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न देशों के रीति-रिवाज के अनुसार पूजा पद्धति में परिवर्तन होता रहता है। सुख, समृद्धि और रक्षित जीवन के लिए ही स्वास्तिक पूजा का विधान है। यह प्रथा हजारों वर्षो पूर्व से चली आ रही है।
स्वास्तिक दरअसल समृद्धि का सूचक है। संस्कृत में इस शब्द का अर्थ ही होता है समृद्धि या अक्षय जीवन ऊर्जा। स्वास्तिक हज़ारों साल से हिन्दू और बौद्ध परम्परा में इसी प्रतीक के रूप में चला आ रहा है। जर्मनी में नाज़ियों ने स्वास्तिक को पहले अपने पार्टी-चिन्ह के रूप में अपनाया था और बाद में उसे जर्मनी का राजकीय-चिन्ह बना दिया था। तीन सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व की हडप्पा-सभ्यता के स्मारकों की खुदाई में भी बर्तनों और दीवारों पर स्वास्तिक बना हुआ मिला था। इसलिए दुनिया में कोई भी इसे मानवविरोधी या संस्कृतिविरोधी प्रतीक नहीं मानता है। समृद्धि के प्रतीक के रूप में दुनिया के बहुत से देशों की जातियाँ स्वास्तिक का उपयोग करती रही हैं। ख़ुद अमरीका के बहुत से मूल निवासी भी इसे अपना धार्मिक प्रतीक मानते हैं। यही नहीं बीसवीं शताब्दी के शुरू में, जब यह बात सामने आई थी कि इंडोयूरोपियन जातियाँ एक-दूसरे की सहोदर जातियाँ हैं और आर्य ही उनके पूर्वज थे तो पश्चिमी देशों में स्वास्तिक बहुत लोकप्रिय हो गया था। यह अलग बात है कि जर्मन नाज़ियों ने सबसे पहले उसका व्यापक तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया। कनाडा में तो स्वास्तिक नाम का एक शहर भी है।नाज़ी सैनिकों की वर्दियों पर स्वास्तिक का चिन्ह बने होने के साथ-साथ यह भी लिखा रहता था- ‘Gott mit uns’ यानी ख़ुदा हमारे साथ है।

Siddha yellow KaudiKaudi's charged by Lakshmi Mantra. Kauri (small) is considered holy by the Hindus and it is accepted ...
31/01/2013

Siddha yellow Kaudi
Kaudi's charged by Lakshmi Mantra. Kauri (small) is considered holy by the Hindus and it is accepted as an auspicious object since Vedic times. The possession of Kauri is considered good for wealth and love. In Hindu families it a part of marriage attire. It brings financial prosperity. It is kept in cash box and in cupboard, where jewels, financial papers or jewelery is kept. Keep this Siddha Kaudi in pocket Yellow Koudi is the favorable objects to Maa Mahalakshmi and Lord Vishnu. And also used to worship Goddess Baglamukhi Maa.
They are believed to be hundreds of years old. It is said that the shell selects its owner and will never stay with an unlucky person. Many spiritual and tantrik pooja processes are completed successfully with the aid of Yellow Koudi. In Astrology, Yellow Koudi is used to balance the planetary effect of Jupiter and the malefic effects of Ketu and Rahu. Keeping 11 Yellow Koudi peeli Koudi in one's place of wealth bestows the blessings of Lord Kuber and goddess Lakshmi. On the auspicious occassion of Dhanteras and Akshay Triteeya, Yellow Koudi must be kept at pooja place after wrapping in yellow cloth. This ensures a smooth flow of money in the family. People suffering from minimal savings despite good earnings must keep 21 pieces of Yellow Koudi in the north-west part of their room. Yellow Cowrie or Peeli Kauwdi or Yellow Kawdi must always be used in odd numbers i.e. 1,3,5,7,9 or 11 and so on.Yellow Kaudi must be wrapped in a yellow cloth to get the fullest benefits.Ensure that the yellow kaudi has smooth edges and is not broken on the sides. Yellow kowdi with a ridge like structure on the smooth side are considered more auspicious than those kaudi which are smooth.

Kaali KowdiBlack Kaudi or Kaalili Kowdi or Black Cowrie shell is of great significance in the worship of Goddess Maha Ka...
31/01/2013

Kaali Kowdi
Black Kaudi or Kaalili Kowdi or Black Cowrie shell is of great significance in the worship of Goddess Maha Kaali ji and Lord Bhairav ji. Black Kaudi helps protect from negative energies of black magic and relieves the native from the clutches of ta**ra. Black Kaudi is also used during the pooja of the Das-Mahavidyaa Ten Supreme forms of the mother Goddess. Many spiritual and tantrik pooja processes are completed successfully with the aid of Black Cowrie. In Astrology, Black Kaudi is used to balance the planetary effect of Saturn and the malefic effects of Ketu and Rahu. Keeping 11 Black Kaudi peeli kawdi in one's pooja place or altar bestows the blessings of Goddess Maha Kaali. On the auspicious occassion of Diwali night and every Amawasya, Black Kaudi must be kept at pooja place after wrapping in black cloth. This ensures protection from spirits and blck magic. People suffering from chronic diseases and the problem of mental depression get a significant relief when Black Kaudi is kept in the South West of their room.
Black Cowrie or Kaali Kauwdi or Black Kawdi may be used in multiples of 8 i.e. 8, 16, 24, 32 and so on.Black Kaudi must be wrapped in a black cloth to get the fullest benefits.Ensure that the black kaudi has smooth edges and is not broken on the sides. Black kowdi with a ridge like structure on the smooth side are considered more auspicious than those kaudi which are smooth

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