06/07/2018
मैं अपने आप से ज्यादा किसी को नहीं जानता लेकिन फिर भी अपने आप को लेके सही सही अंदाजा नहीं लगा पाता. कभी सोचता था की कैसे भी बनारस में नौकरी मिल जाये और बनारस चला जाऊँ लेकिन अब बनारस गए हुए कई महीने हो जाते हैं और प्राथमिकता की सूची में बनारस धीरे धीरे कब नीचे चला जा रहा है समझ नहीं आता ..वहां दोस्त भी गिनती के हैं और जो हैं वो भी काम धंधे और परिवार में व्यस्त हैं अगर दो चार दिन के लिए चला भी जाऊँ तो उनका टाइम मिल पाना मुश्किल हो जाता है, फिर भी ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके लिए बनारस जाने का सोचना चाहिए . अकेले किसी और शहर में घूमने से बनारस घूमना ज्यादा अच्छा तो है ही ...वहां के रास्ते भी हमको पहचानते हैं ..वहां के दुकान और उनमे बैठे लोग जिनको देखने की आदत सी हो गयी है वो सब अपना सा लगता है ..किसी और शहर में ये सब अनुभव नहीं कर सकते हैं ..कोई ईमारत जो सालों से आधी टूटी पड़ी है और कोई सिनेमा हॉल जिसको तोड़ के सिनेप्लेक्स बना दिया गया है ये सब हमारे पंद्रह सोलह सालों की यादों की एक रेल है जिसमे बहुत से डिब्बे हैं ..इससे जुडी कहानियां अलग अलग डब्बे हैं इस रेल के जिनमे हमारा बचपन और किशोरावस्था कहीं छुप के बैठे हैं ...जब हम वो सब देखते हैं तो हम अपनी पुरानी जिंदगी को एक बार फिर से जीने लग जाते हैं ..हर जगह के कुंड का पानी कमोबेश एक जैसा ही दीखता होगा लेकिन दुर्गाकुंड के पानी से जुडी महीन यादें हैं जो सावन आने के साथ अपने आप आ जाती हैं ..ये ऐसी यादें हैं जो मेरे साथ साथ आपके साथ भी होता होगा ..ऐसा लगता है जैसे हम सावन के मेले में ऊँचे चरखी में बैठे हैं ..चरखी ऊपर से नीचे आ रही है और मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरा वाला कूपा कट के कुंड में न गिर जाये ..वो एक सिहरन थी जो अब भी दुर्गाकुंड के बारे में सोच के शरीर को रोमांचित कर देती है ..बनारस को लेके मेरा प्यार या हमारा प्यार है जो इससे हमको अलग नहीं होने देगा ...और वैसे भी किसको अलग होना है