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यह लेख बहुत पहले स्व. खुर्शीद अनवर द्वारा लिखा गया था तथा जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था.. मगर यह लेख ताज़ा हालातों में भी अ...
11/01/2015

यह लेख बहुत पहले स्व. खुर्शीद अनवर द्वारा लिखा गया था तथा जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था.. मगर यह लेख ताज़ा हालातों में भी अपनी प्रासंगिकता रखता है..

हालांकि पहले भी आतंकवाद पर कोई बहस या बातचीत आम जन के दिमाग़ को सीधे इस्लाम की तरफ खींच ले जाती थी. लेकिन विश्व व्यापार केन्द्र पर हमले और उसके बाद दो नारों ““आंतकवाद के खिलाफ़ जंग””, और ““दो सभ्यताओं के बीच टकराव”” ऐसी मानसिकता बनायी कि दुनिया भर में आम इंसानों के बीच एक खतरनाक विचार पैठ बनाने लगा कि “सारे मुसलमान आतंकवादी होते हैं”. कुछ “नर्मदिल” रियायत बरतते हुए इसे “हर आतंकवादी मुसलमान होता है” कहने लगे. थे तो यह राजनैतिक षड्यंत्र लेकिन आम लोग हर मुद्दे की तह में जाकर पड़ताल करके समझ बनाएँ यह मुमकिन नहीं. मान्यताएं उनमें ठूंसी जाती हैं. यह जिसे “इस्लामी आतंकवाद” कहा गया, यह दरअसल है क्या? यह आतंकवाद सचमुच इस्लामी है या कुछ और. अगर इस्लाम ही है तो इसकी जड़ें कहाँ हैं? कुरान या हदीस में? परंपरागत इस्लामी मान्यताओं में? इस्लाम की किसी खास धारा में. या यही दरअसल इस्लाम है जिसकी बुनियाद में हिंसा है. इस तथ्य का खुलासा करने के लिए एक शब्द का उल्लेख और उसका आशय समझ कर ही बात आगे की जा सकती है “जिहाद”! आखिर जिहाद है क्या? और इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई? और आशय क्या था?
khurshidanwarar
जिहाद की कुरान में पहली ही व्याख्या “जिहाद अल-नफ़स” यानी खुद की बुराइयों के खिलाफ जंग है.
“रूह और उसे मुकम्मल बनाने वाला (अल्लाह) बताता है कि क्या नेक है और क्या बद है. वही कामयाब है जो इसे पाक बना सके” (सूरह अल-शम्स, कुरान, 91: 7-9)
तुम क़त्ल मत करो क्योंकि अल्लाह ने ज़िंदगी को पवित्र बनाया है “सूरह अल-अनम, कुरान 6:151)
जब ऐसा है तो फिर अचानक वह जिहाद कहाँ से आया जो इंसानों का, यहाँ तक की मासूम बच्चों का खून बहाना इस्लाम का हिस्सा बन गया. दुनिया भर में “इस्लामी” आतंकवाद खतरा बन के मंडराने लगा. यकीनन यह आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए खतरा है पर कहाँ से आया यह खतरा?
इस्लाम जैसे-जैसे परवान चढ़ा, अन्य धर्मों की तरह इसके भी फ़िरक़े बनते गए. कई शाखाओं में बंटा इस्लाम. एक रूप इस्लाम का शुरू से ही रहा और वह था राजनैतिक इस्लाम. ज़ाहिर है कि सत्ता के लिए न जाने कितनी जंग लड़ी गयीं और खुद मोहम्मद ने जंग-ए-बदर लड़ी. आसानी से कहा जा सकता है कि यह जंग भी मज़हब को विस्तार देने के लिए लड़ी गयी. मगर असली उद्देश्य था सत्ता और इस्लामिक सत्ता. जंग-ए-बदर में सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा किसी जंग में होता है पर जिहाद की कुरान में दी गयी परिभाषा फिर भी जस की तस रही. 1299 में राजनैतिक इस्लाम ने पहला बड़ा क़दम उठाया और ऑटोमन साम्राज्य या सल्तनत-ए-उस्मानिया की स्थापना हुई. (1299-1922). आम धारणा कि यह जिहाद के नाम पर हुआ, मात्र मनगढ़ंत है. सत्ता की भूख इसका मुख्य कारण थी.
जिहाद की नयी परिभाषा गढ़ी अठारहवीं शताब्दी में मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब ने. जिसके नाम से इस्लाम ने एक नया मोड़ लिया जिसमें जिहाद अपने विकृत रूप में सामने आया. नज्त में जन्मे इसी मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब (1703–1792) से चलने वाला सिलसिला आज वहाबी इस्लाम कहलाता है जो सारी दुनिया को आग और खून में डुबो देना चाहता है.
मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब के आने से बहुत पहले सूफी सिलसिला मोहब्बत का पैगाम देने और इंसानों को इंसानों से जोड़ने के लिए आ चुका था. इसका प्रसार बहुत तेज़ी से तुर्की, ईरान, अरब, और दक्षिण एशिया में हो चुका था. सूफी सिलसिले से जो कर्मकांड जुड़ गए वह अलग मसला है, मगर हकीक़त है कि सूफी सिलसिले ने इस्लाम को बिल्कुल नया आयाम दे दिया और वह संकीर्णता की जंजीरें तोड़ता हुआ इस्लाम की हदें भी पार कर गया.
सल्तनत-ए-उस्मानिया से लेकर फारस और अरब तक सूफी सिलसिलों ने जो दो बेहद महत्त्वपूर्ण काम अंजाम दिए वह थे गुलाम रखने की परंपरा खत्म करना और महिला मुक्ति का द्वार खोलना.
फारस में मौलाना रूमी के अनुयायियों द्वारा मेवलेविया सिलसिले ने तेरहवीं सदी में औरतों के लिए इस सूफ़ी सिलसिले के दरवाज़े न सिर्फ खोले बल्कि उनको बराबर का दर्जा दिया. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूफियों के संगीतमय वज्दाना नृत्य (सेमा) में पुरुषों और महिलाओं की बराबर की हिस्सेदारी होने लगी. मौलाना रूमी की मुख्य शिष्या फख्रंनिसाँ थी. उनका रुतबा इतना था कि उनके मरने के सात सौ साल बाद मेवलेविया सिलसिले के उस समय के प्रमुख शेख सुलेमान ने अपनी निगरानी में उनका मक़बरा बनवाया.
महान सूफी शेख इब्न-अल-अरबी (1165-1240) खुद सूफी खातून फ़ातिमा बिन्त-ए-इब्न-अल-मुथन्ना के शागिर्द थे. शेख इब्न-अल-अरबी ने खुद अपने हाथों से फ़ातिमा बिन्त-ए-इब्न-अल-मुथन्ना के लिए झोपड़ी तैयार की थी जिसमें उन्होंने ज़िंदगी बसर की और वहीँ दम तोड़ा (इब्न-अल-अरबी- सूफिया-ए-अन्दलूसिया: अनुवाद :आर. ऑस्टिन बेशारा प्रकाशन 1988).
मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब ने एक-एक कर के इस्लाम में विकसित होती खूबसूरत और प्रगतिशील परम्पराओं को ध्वस्त करना शुरू किया और उसे इतना संकीर्ण रूप दे दिया कि उसमें किसी तरह की आज़ादी, खुलेपन, सहिष्णुता, और आपसी मेल-जोल की गुंजाइश ही न रहे. कुरान और हदीस से बाहर जो भी है उसको नीस्त-ओ-नाबूद करने का बीड़ा उसने उठाया. अब तक का इस्लाम कई शाखों में बंट चुका था. अहमदिया समुदाय अब्दल-वहाब के काफी बाद उन्नीसवीं सदी में आया लेकिन शिया, हनफ़ी, मलायिकी, सफ़ई, जाफ़रिया, बाक़रिया, बशरिया, खलफ़िया हंबली, ज़ाहिरी, अशरी, मुन्तजिली, मुर्जिया, मतरुदी, इस्माइली, बोहरा जैसी अनेकों आस्थाओं ने इस्लाम के अंदर रहते हुए अपनी अलग पहचान बना ली थी और उनकी पहचान को इस्लामी दायरे में स्वीकृति बाक़ायदा बनी हुई थी. इनके अलावा सूफ़ी मत तो दुनिया भर में फैल ही चुका था और अधिकतर पहचानें सूफ़ी मत से रिश्ता भी बनाये हुए थीं लेकिन मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब की आमद और प्रभाव ने इन सभी पहचानों पर तलवार उठा ली. “मुख़्तसर सीरत-उल-रसूल” नाम से अपनी किताब में खुद मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब ने लिखा “जो किसी क़ब्र, मज़ार के सामने इबादत करे या अल्लाह के अलावा किसी और से रिश्ता रखे वह मुशरिक (एकेश्वरवाद विरोधी) है और हर मुशरिक का खून बहाना और उसकी संपत्ति हड़पना हलाल और जायज़ है.
यहीं से शुरू हुआ मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब का असली जिहाद. जिसने 600 लोगों की एक सेना तैयार की और हर तरफ घोड़े दौड़ा दिए. तमाम तरह की इस्लामी आस्थाओं के लोगों को उसने मौत के घाट उतारना शुरू किया. सिर्फ और सिर्फ अपनी विचारधारा का प्रचार करता रहा और जिसने उसे मानने से इंकार किया उसे मौत मिली और उसकी संपत्ति लूटी गयी. मशहूर इस्लामी विचारक ज़ैद इब्न अल-खत्ताब के मकबरे पर उसने निजी तौर पर हमला किया और खुद उसे गिराया. मज़ारों और सूफी सिलसिले पर हमले का एक नया अध्याय शुरू हुआ. इसी दौरान उसने मोहम्मद इब्ने साँद के साथ समझौता किया. मोहम्मद इब्ने साँद दिरिया का शासक था और धन और सेना दोनों उसके पास थे. दोनों ने मिलकर तलवारों के साथ-साथ आधुनिक असलहों का भी इस्तेमाल शुरू किया. इन दोनों के समझौते से दूर-दराज के इलाकों में पहुंचकर अपनी विचारधारा को थोपना और खुले आम अन्य आस्थाओं को तबाह करना आसान हो गया. अन्य आस्थाओं से जुड़ी तमाम किताबों को जलाना मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब का शौक सा बन गया. इसके साथ ही उसने एक और घिनौना हुक्म जारी किया और वह ये था कि जितनी सूफी मज़ारें, मकबरे या कब्रें हैं उन्हें तोड़कर वहीँ मूत्रालय बनाये जाएँ.
सउदी अरब जो कि घोषित रूप से वहाबी आस्था पर आधारित राष्ट्र है, उसने मोहम्मद इब्न-अब्दल-वहाब की परंपरा को जारी रखा. बात यहाँ तक पहुँच गयी कि 1952 में बुतपरस्ती का नाम देकर उस पूरी कब्रगाह को समतल बना दिया गया जहाँ मोहम्मद के पूरे खानदान और साथियों को दफन किया गया. ऐसा इसलिए किया गया कि लोग ज़ियारत के लिए इन कब्रगाहों पर जाकर मोहम्मद और उनके परिवार को याद करते थे. अक्टूबर 1996 में काबा के एक हिस्से अल्मुकर्रमा को भी इन्हीं कारणों से गिराया गया. काबा के दरवाज़े से पूर्व स्थित अल-मुल्ताज़म जो कि काबा का यमनी हिस्सा है, उसके खूबसूरत पत्थरों को तोड़कर वहाँ प्लाईवुड लगा दिया गया जिससे कि लोग पत्थरों को चूमें नहीं क्योंकि ऐसा करने पर वहाबी इस्लाम के नज़दीक ये मूर्तिपूजा हो जाती है. अभी हाल में “The Independent” की एक रिपोर्ट के अनुसार मक्का के पीछे के हिस्से में जिन खम्भों पर मोहम्मद की ज़िंदगी के महत्वपूर्ण हिस्सों को पत्थरों पर नक्काशी करके दर्ज किया गया था, उन खम्भों को भी गिरा दिया गया. इन खम्भों पर की गयी नक्काशी में एक जगह अरबी में ये भी दर्ज था कि मोहम्मद किस तरह से मेराज (इस्लामी मान्यता के अनुसार मुहम्मद का खुदा से मिलने जाना) पर गए.

वहाबियत इस्लाम के पूरे इतिहास, मान्यताओं, परस्पर सौहार्द और पहचानों के सह-अस्तित्व के साथ खिलवाड़ करता आया है. एक ही पहचान, एक ही तरह के लोग, एक जैसी किताब और नस्ली शुद्धता का नारा हिटलर ने तो बहुत बाद में दिया इसकी बुनियाद तो वहाबियत ने उन्नीसवीं शताब्दी में ही इस्लाम के अंदर रख दी थी. अरब से लेकर दक्षिण एशिया तक वहाबियत ने अपनी इस शुद्धता का तांडव बहुत पहले से दिखाना शुरू कर दिया था लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसने अपना घिनौना चेहरा और क्रूर रूप और भी साफ कर दिया. जहाँ एक तरफ मेवलेविया सिलसिले ने तेरहवीं सदी में औरतों के लिए सिलसिले के दरवाज़े न सिर्फ खोले बल्कि उनको बराबर का दर्जा दिया था वहीँ दूसरी तरफ वहाबी इस्लाम ने औरतों को ज़िंदा दफन करना शुरू कर दिया. बेपर्दगी के नाम पर औरतों के चेहरों के हिस्से बदनुमा करने और औरतों पर व्यभिचार का इल्ज़ाम लगा कर उन पर संगसारी करके मार देने को इस्लामी रवायत बना दिया. वहाबियत पर विश्वास न रखने वाले मुसलमानों को इस्लाम के दायरे से ख़ारिज करके उन्हें सरेआम क़त्ल करना जायज़ और हलाल बताया जाने लगा. ये मात्र इस्लाम के अनुयायियों के साथ सलूक की बात है, अन्य धर्मों पर कुफ्र का इल्ज़ाम रखकर उन्हें खत्म करना, संपत्ति लूटना उनकी औरतों को ज़बरदस्ती वहाबियत पर धर्मान्तरण करवाना इनके लिए एक आम बात बन चुकी है. वहाबियत या वहाबी इस्लाम लगातार पूरी दुनिया के लिए खतरा बनता जा रहा है. मौत के इन सौदागरों की करतूत को आमतौर पर इस्लामी आतंकवाद का नाम दिया जाता है जिसकी साजिश वाशिंगटन और लन्दन में रची जाती है और कार्यनीति सउदी अरब से लेकर दक्षिण एशिया तक तैयार की जाती है और अंजाम दी जाती है. अल-कायदा, तालिबान, सिपाह-ए-सहबा, जमात-उद-दावा, अल-खिदमत फाउन्डेशन, जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन इस साजिश को अंजाम देकर लगातार खूनी खेल खेल रहे हैं.
दक्षिण एशिया में वहाबी इस्लाम की जड़ों को मजबूत करने का काम मौलाना मौदूदी ने अंजाम दिया. हकूमत-ए-इलाहिया इसी साजिश का हिस्सा है जिसके तहत गैर वहाबी आस्थाओं को, चाहे वह इस्लाम के अंदर की आस्थाएँ हों या गैर इस्लामी, जड़ से उखाड़ फेंकने और उनकी जगह एक ऐसा निजाम खड़ा करने की साजिश है जिसमें हिटलर जैसा वहाबी परचम लहराया जा सके. मौजूदा संदर्भ में बांग्लादेश इसका ताज़ातरीन उदाहरण है. बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी ने उस देश में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बी.एन.पी.) के साथ मिलकर पिछले कुछ महीनों में जो खूनी खेल खेला है उसमें न केवल उपरोक्त संगठनों ने भरपूर सहयोग दिया है बल्कि सउदी अरब से इन संगठनों के ज़रिये बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी को भारी मात्रा में धन भी उपलब्ध कराया गया है. किससे छुपा है कि सउदी अरब का हर कदम अमेरिका की जानकारी में उठता है. क्या अमेरिका को इसका इल्म नहीं कि सउदी अरब अपने देश से लेकर पाकिस्तान और बांग्लादेश तक इन संगठनों की तमाम तरह से मदद कर रहा है और इसकी छाया हिंदुस्तान पर भी मंडरा रही है. 14 नवंबर 2011 के इन्डियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार ऑल इंडिया उलेमा एंड मशायख बोर्ड ने दावा किया कि देवबंद, सहारनपुर स्थित दारुल-उलूम की वहाबी विचारधारा के समर्थक और प्रचारक होने के कारण उसे सउदी अरब से मोटी रकम प्राप्त होती है. दारुल-उलूम के प्रबंधन ने सउदी धन पाने का तो खंडन किया लेकिन इस बात का खंडन नहीं किया कि वह वहाबी विचारधारा का पालन करता है. ज़ाहिर है कि इन तमाम संगठनों को ज़ेहनी खुराक दारुल-उलूम देवबंद से ही पहुँचती है. जिन आतंकवादी संगठनों का ज़िक्र यहाँ किया गया आज तक उनमें से किसी संगठन ने दारुल-उलूम देवबंद पर उंगली नहीं उठाई जबकि दारुल-उलूम से कहीं बड़े समर्थकों वाली बरेलवी सुन्नी इस्लाम की विचारधारा पर और उसमें आस्था रखने वालों पर इन संगठनों ने बार-बार हमले किये हैं. पाकिस्तान में शिया, अहमदिया, हिंदू, सिक्ख, ईसाई के साथ-साथ बरेलवी आस्था के मुसलमान भी इन आतंकी संगठनों का निशाना बनते रहे हैं लेकिन अभी तक के इस खूनी खेल के इतिहास में इन संगठनों ने किसी देवबंदी आस्था के संस्थान या व्यक्ति पर कभी हमला नहीं किया बल्कि उन्हें मदद अवश्य पहुंचाते रहे हैं.
आज की वहाबी आस्था के पास केवल तलवार और राइफलें नहीं हैं बल्कि इनके हाथों बेहद खतरनाक आधुनिकतम हथियार लग चुके हैं. इनकी नज़रें पाकिस्तान में मौजूद न्युकिलर हथियारों पर भी हैं. कितनी ही बार शंका जताई जा चुकी है कि यह कतई असंभव नहीं है अगर इन वहाबी आतंकियों के हाथ अत्यंत विध्वंसकरी न्युकिलर हथियार भी आ जाएँ. आस्था जब पागलपन बन जाये तो वह तमाम हदें पार कर सकती है. वहाबियत पागलपन और हैवानियत के तमाम दायरों को पार कर चुकी है. जो लोग ईद के दिन मस्जिदों में घुसकर लाशों के अम्बार लगा सकते हैं वे मौका मिलने पर क्या कुछ नहीं कर गुज़र सकते. वहाबियत का खतरा इस सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए. इस खतरे की चपेट में हर वह शख्स है जो इस दरिंदगी के खिलाफ खड़ा है.
उसपर से बदकिस्मती ये कि बिना जानकारी या फिर साजिश के तहत वहाबी आतंकवाद के नाम पर इसे इस्लामी आतंकवाद का नाम दे दिया जाता है और वह लोग भी आतंकियों की फेहरिस्त में जोड़ दिए जाते हैं जो खुद इस आतंक का शिकार हैं. “सारे मुसलमान आतंकवादी होते हैं”” या फिर “हर आतंकवादी मुसलमान होता है”” जैसी आम मान्यता इसी नासमझी या साजिश से प्रेरित है. ज़रूरी हो गया है कि आतंकवाद और वहाबियत के रिश्तों की पड़ताल की जाए और इस क्रूर, घिनौनी और खतरनाक विचारधारा के खिलाफ मुहिम चले बजाय इसके कि किसी धर्म विशेष को निशाना बनाकर अनजाने में हम विश्व स्तर पर चल रही साज़िशों का हिस्सा बन जाएँ.


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यह लेख बहुत पहले स्व. खुर्शीद अनवर द्वारा लिखा गया था तथा जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था.. मगर यह लेख ताज़ा हालातों में भी अपनी प्रासंगिकता रखता

23/10/2014

by himanshu kumar
भारत में अगर आप किसी जेल में जाएँ तो आपको सबसे ज़्यादा दलित ,आदिवासी और मुसलमान वहाँ मिलेंगे .

अगर आप किसी पागलखाने में जाएँ और वहाँ बंद मरीजों का विश्लेषण करें तो आप पायेंगे कि वहाँ भी सबसे ज़्यादा आदिवासी ,दलित और महिलायें ज़्यादा हैं

अगर आप उच्च शिक्षा में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं की आत्महत्याओं के आंकड़े देखें तो आप पायेंगे कि सबसे ज़्यादा आत्महत्या दलित और आदिवासी विद्यार्थियों को करनी पड़ी है .

भारत में गोडसे के बाद पहली फांसी आंध्र के दो दलित किसानों को दी गयी थी .

और आपको लग रहा था जात पात खतम हो चुकी है ?

इस बीच संभावना संस्थान पालमपुर हिमाचल में चल रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामूहिक चिंतन शिविर में सामाजिक न्याय पर चर्चा जारी है .

साथी अरुण खोटे ने आकर साथियों से इस विषय में चर्चा करी. अम्बेडकर साहब की जीवन पर जब्बार पटेल की बनाई हुई फिल्म भी देखी गयी .

22/10/2014

Sanjay Kumar Amrawat

बहाने नहीं सफलता के रास्ते खोजिए. . . . .

1.मुझे उचित शिक्षा लेने का अवसर नही मिला|
उचित शिक्षा का अवसर फोर्ड मोटर्स के मालिक हेनरी फोर्ड को भी नही मिला।
2.मै अत्यंत गरीब घर से हूँ|
पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी गरीब घर से थे।

3.बचपन मे ही मेरे पिता का देहाँत हो गया था|
प्रख्यात संगीतकार ए.आर.रहमान के पिता का भी देहांत बचपन मे हो गया था।
4.मै बचपन से ही अस्वस्थ था|
आँस्कर विजेता अभिनेत्री मरली मेटलिन भी बचपन से बहरी व अस्वस्थ थी।
5.मैने साइकिल पर घूमकर आधी ज़िंदगी गुजारी है|
निरमा के करसन भाई पटेल ने भी साइकिल पर निरमा बेचकर आधी ज़िंदगी गुजारी।
6.एक दुर्घटना मे अपाहिज होने के बाद मेरी हिम्मत चली गयी|
प्रख्यात नृत्यांगना सुधा चन्द्रन के पैर नकली है।
7.मुझे बचपन से मंद बुद्धि कहा जाता है|
थामस अल्वा एडीसन को भी बचपन से मंदबुद्धि कहा जाता था।
8.मै इतनी बार हार चूका,अब हिम्मत नही|
अब्राहम लिंकन 15 बार चुनाव हारने के बाद राष्ट्रपति बने थे।
9.मुझे बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी|
लता मंगेशकर को भी बचपन से परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी थी।
10.मेरी लंबाई बहुत कम है|
सचिन तेंदुलकर की भी लंबाई कम है।
11.मै एक छोटी सी नौकरी करता हूँ,इससे क्या होगा|
धीरु भाई अंबानी भी छोटी नौकरी करते थे।
12.मेरी कम्पनी एक बार दिवालिया हो चुकी है,अब मुझ पर कौन भरोसा करेगा|
दुनिया की सबसे बङी शीतल पेय निर्माता कम्पनी भी दो बार दिवालिया हो चुकी है।
13.मेरा दो बार नर्वस ब्रेकडाउन हो चुका है,अब क्या कर पाउँगा?
डिज्नीलैंड बनाने के पहले वाल्ट डिज्नी का तीन बार नर्वस ब्रेकडाउन हुआ था।
14.मेरी उम्र बहुत ज्यादा है|
विश्व प्रसिद्ध केंटुकी फ्राइड चिकेन के मालिक ने 60 साल की उम्र मे पहला रेस्तरा खोला था।
15.मेरे पास बहुमूल्य आइडिया है पर लोग अस्वीकार कर देते है|
जेराँक्स फोटो कापी मशीन के आईडिया को भी ढेरो कंपनियो ने अस्वीकार किया था पर आज परिणाम सामने है।
16.मेरे पास धन नही है|
इन्फोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायणमूर्ति के पास भी धन नही था|उन्हे अपनी पत्नी के गहने बेचने पड़े थे।
आप कहेगे कि यह जरुरी नही कि जो प्रतिभा इन महानायको मे थी,वह मुझ में भी हो|
मै इस बात से सहमत हूँ|
लेकिन,यह भी जरुरी नही कि जो प्रतिभा आपके अंदर है वह इन महानायको में भी हो!
कोशिश तो कीजिये|हो सकता है की आप उनसे भी आगे निकल जाये|
मतलब यह है कि.....
यदि आप आगे बढ़ना चाहते है तो आपको दो में एक को चुनना होगा…..
बहाना या सफलता का रास्ता!
आप साहसी है|
अपनी मेहनत,हिम्मत और ईमानदारी के दम पर अपनी किस्मत को बदलने का प्रयास कीजिये|सफलता का रास्ता खोजना पड़ता है|वह अपने आप नहीं मिल जाता है|उसे खोजिए और उसपर चलना शुरू कर दीजिये|एक न एक दिन मंजिल जरूर मिलेगी|
खुद भी जगिये और दुसरो को भी जगाइए|लिख डालिये सफलता की एक नई कहानी ताकि दूसरे लोग भी आपसे प्रभावित होकर बहानेबाजी छोड़े और खोज निकालें अपनी सफलता का रास्ता!

19/10/2014

फतवे और मुसलमान ...

आप विज्ञानं और टेक्नोलॉजी को नहीं रोक सकते, ये आपको रौंदती हुई चली जायेंगी, मुसलमान पिछड़े क्यों, आज अमेरिका सुपर पॉवर हैं, हैं तो हैं आपके न मानने से कोई फर्क नहीं पड़ता उससे पहले इंग्लैंड और इंग्लैंड से पहले तुर्की, एक मुस्लिम देश हा वो उस वक़्त सुपर पॉवर था ...जब जर्मनी में छापे की मशीन की इजाद हुई तो तुर्की से शैखुल इस्लाम ने फतवा देकर छापेखाने को हराम करार दिया, 250 सालो तक मुस्लिमो ने छापेखाने नहीं बनाए तब तक पूरा यूरोप इसके जरिये तालीम में तुर्की और मुसलमानों से 250 साल आगे निकल गया, सुपर पॉवर तो दूर की बात मुस्लिम देश तंगहाली के मुकाम पे आ गए, कुछ दशको पहले लाउड स्पीकर को हराम कहा आज लाउड स्पीकर का धडल्ले से इस्तेमाल हो रहा हैं, कुछ सालो पहले तस्वीर, वीडियो, टीवी को हराम कहा आज ये ही दिन रात टीवी पर तकरीरे करते नज़र आते हैं और आज ये इलाज के लिए फूल बॉडी स्कैनर को नाजायज बता रहे हैं,(बकौल हसन निगार ) इनके उल जुलूल फैसलों से ही आज आम मुसलमान इनकी बातो को गंभीरता से नहीं लेता, क्या याद नहीं कैसे मजाक बनाकर रख दिया था इमराना वाले मसले में ...

क्या आज पूरी दुनिया में मुस्लिमो की इस तंगहाली की वजह के जिम्मेदार कुछ इस तरह फैसले नहीं हैं, इस्लाम के नाम पर फैले पाखण्ड और आडम्बर को जड़ से ख़त्म करने की जरूरत हैं ...

'आबिद'

19/10/2014

Zia Imtiyaz

एक भाई ने गिरगिट का फोटो दिखा के मुझसे पूछा है कि इस्लाम का इस बेजुबान जीव ने क्या बिगाड़ा है जो इस्लाम इसकी हत्या करने की शिक्षा मुस्लिमो को देता है ?

पहले तो मैं भाई की ये गलतफहमी दूर करना चाहता हूँ, कि नबी स. ने गिरगिट जो कि अहितकर और विषहीन सरीसर्प ( reptile ) है, को मारने का हुक्म दिया था.... नहीं भाई ऐसा नहीं है, नबी स. ने गिरगिट या छिपकली आदि को मारने का आदेश नहीं दिया ।

बल्कि एक विषैले रेगिस्तानी उभयचर जीव सैलामैन्डर "Salamander" जो कि छिपकली या गिरगिट की तरह दिखता है पर ये सरीसर्प नहीं है, इसे मारने की बात कुछ हदीस मे है

छिपकली आदि को अरबी मे "अल-ज़ब्बा" कहा जाता है जबकि जबकि इस उभयचर सैलामैन्डर को अरबी में "अल-वज़क" कहा जाता है, और यही शब्द हदीस मे है
... इस जीव वज़क की कुछ प्रजातियों की त्वचा पर "टेट्रोडोटॉक्सिन" ( tetrodotoxin ) नाम का तेज जहर पाया जाता है, जो मनुष्यों की जान के लिए खतरनाक है

परंतु कोई भी निर्णय लेने से पूर्व हमें मां आयशा रज़ि. से सम्बन्धित हदीसो का भी अध्ययन करना चाहिए जिनमें आप रज़ि. फरमाती हैं कि नबी स. ने सैलामैन्डर जीव का जिक्र मेरे सामने करते हुए बताया कि वो एक बुरा जीव है, जो गलत काम करता है, पर मैने नबी स. को इसे मारने का हुक्म देते नहीं सुना
( सहीह बुखारी, किताब-29, नम्बर-57 , और किताब-54, नम्बर-525 )

सिद्ध होता है कि सैलामैन्डर को मारने की शिक्षा न तो धार्मिक थी न ही अनिवार्य या पुण्यकारी... क्योंकि यदि सैलामैन्डर को मारना एक अनिवार्य धार्मिक कार्य होता तो सदा नबी स. के साथ रहने वाली, और धार्मिक ज्ञान लेने मे बढ़ चढ़ के रुचि लेने वाली अपनी प्रिय पत्नी, हजरत आएशा सिद्दीका रज़ि. को नबी स. इस धार्मिक ज्ञान से कतई वंचित न रखते.... पर सैलामैन्डर को मारने की बात मां आएशा रज़ि. को न मालूम होने से ये स्पष्ट होता है कि सैलामैन्डर को मारना अनिवार्य नहीं .....

हां यदि ये जहरीला जीव आक्रामक दिखे , या घर मे ऐसी जगहों पर चलता फिरता दिखे जहाँ किसी परिवार के सदस्य को इसके द्वारा काटे जाने कि भय हो, तो इस जीव को मार देना ही ठीक है !!

19/10/2014

डॉ विवेक आर्य
धर्म और उसकी आवश्यकता
२७ मई,२०१३ को टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार दिल्ली संस्करण में एक समाचार छपा हैं की "Latest Global Index of Religiosity and Atheism" अर्थात विश्व में धर्म और नास्तिकता को मानने वालों के आंकड़ें के अनुसार विश्व में सन २००५ में ८१% लोग धर्म और ईश्वर को मानते थे वही २०१३ में धर्म और ईश्वर को मानने वालो की संख्या ७% घटकर ७४% रह गई हैं। अपने आपको आधुनिक, प्रगतिशील और सभ्य कहने वाला समाज न धर्म की परिभाषा को जानता हैं और न ही जानना चाहता हैं। अपितु भोगवाद को जीवन का उद्देश्य समझकर उसमें लिप्त होकर एक से बढ़कर एक पाप कर्म में लीन हो रहा हैं। सम्पूर्ण दोष उनका भी नहीं हैं । आज जो धर्म का स्वरुप उनके समक्ष दिखाया जा रहा हैं, उसका स्वरुप या तो मत-मतान्तर का वैर विरोध हैं या सांप्रदायिक द्वेष हैं या उपद्रव का मूल हैं। उनके अनुसार धर्म के कारण मानव जाति में बड़े पैमाने पर रक्त-पात हुआ हैं। उनके अनुसार धर्म राष्ट्रीय एकता का न केवल घोर शत्रु हैं अपितु देश की उन्नति के लिए अनावश्यक ही नहीं अपितु बाधक भी हैं। इसलिए संसार को उसकी कोई भी आवश्यकता नहीं हैं इसलिए धर्म को धरती से जितनी भी जल्दी हो सके मिटा देना चाहिए।
धर्म सम्बन्धी इस प्रकार की धारणा, घृणा और विरोध का कारण वास्तव में धर्म के वास्तविक रूप से अनभिज्ञता हैं जिसका मुख्य कारण भोगवाद की लहर से उपजी उनकी सीमित सोच हैं।
धर्म का परिभाषा क्या हैं?
१. धर्म संस्कृत भाषा का शब्द हैं जोकि धारण करने वाली धृ धातु से बना हैं। "धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म हैं। अथवा लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म हैं। दूसरे शब्दों में यहभी कह सकते हैं की मनुष्य जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली ज्ञानानुकुल जो शुद्ध सार्वजानिक मर्यादा पद्यति हैं वह धर्म हैं।
२. जैमिनी मुनि के मीमांसा दर्शन के दूसरे सूत्र में धर्म का लक्षण हैं लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु गुणों और कर्मों में प्रवृति की प्रेरणा धर्म का लक्षण कहलाता हैं।
३. वैदिक साहित्य में धर्म वस्तु के स्वाभाविक गुण तथा कर्तव्यों के अर्थों में भी आया हैं। जैसे जलाना और प्रकाश करना अग्नि का धर्म हैं और प्रजा का पालन और रक्षण राजा का धर्म हैं।
४. मनु स्मृति में धर्म की परिभाषा
धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९
अर्थात धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण हैं।
दूसरे स्थान पर कहा हैं आचार:परमो धर्म १/१०८
अर्थात सदाचार परम धर्म हैं
५. महाभारत में भी लिखा हैं
धारणाद धर्ममित्याहु:,धर्मो धार्यते प्रजा:
अर्थात जो धारण किया जाये और जिससे प्रजाएँ धारण की हुई हैं वह धर्म हैं।
६. वैशेषिक दर्शन के कर्ता महा मुनि कणाद ने धर्म का लक्षण यह किया हैं
यतोअभयुद्य निश्रेयस सिद्धि: स धर्म:
अर्थात जिससे अभ्युदय(लोकोन्नति) और निश्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती हैं, वह धर्म हैं।
७. स्वामी दयानंद के अनुसार धर्म की परिभाषा
जो पक्ष पात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार हैं उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म हैं।-सत्यार्थ प्रकाश ३ सम्मुलास
पक्षपात रहित न्याय आचरण सत्य भाषण आदि युक्त जो ईश्वर आज्ञा वेदों से अविरुद्ध हैं, उसको धर्म मानता हूँ - सत्यार्थ प्रकाश मंतव्य
इस काम में चाहे कितना भी दारुण दुःख प्राप्त हो , चाहे प्राण भी चले ही जावें, परन्तु इस मनुष्य धर्म से पृथक कभी भी न होवें।- सत्यार्थ प्रकाश
धर्म मनुष्य की उन्नति के लिए आवश्यक हैं अथवा बाधक हैं इसको जानने के लिए हमें सबसे पहले धर्म और मजहब में अंतर को समझना पड़ेगा। कार्ल मार्क्स ने जिसे धर्म के नाम पर अफीम कहकर निष्कासित कर दिया था वह धर्म नहीं अपितु मज़हब था। कार्ल मार्क्स ने धर्म ने नाम पर किये जाने वाले रक्तपात, अन्धविश्वास, बुद्धि के विपरीत किये जाने वाले पाखंडों आदि को धर्म की संज्ञा दी थी। जबकि यह धर्म नहीं अपितु मज़हब का स्वरुप था।
धर्म और मजहब में अंतर क्या हैं?
प्राय:अपने आपको प्रगतिशील कहने वाले लोग धर्म और मज़हब को एक ही समझते हैं।
मज़हब अथवा मत-मतान्तर अथवा पंथ के अनेक अर्थ हैं जैसे वह रास्ता जी स्वर्ग और ईश्वर प्राप्ति का हैं और जोकि मज़हब के प्रवर्तक ने बताया हैं। अनेक जगहों पर ईमान अर्थात विश्वास के अर्थों में भी आता हैं।
१. धर्म और मज़हब समान अर्थ नहीं हैं और न ही धर्म ईमान या विश्वास का प्राय: हैं।
२. धर्म क्रियात्मक वस्तु हैं मज़हब विश्वासात्मक वस्तु हैं।
३. धर्म मनुष्य के स्वाभाव के अनुकूल अथवा मानवी प्रकृति का होने के कारण स्वाभाविक हैं और उसका आधार ईश्वरीय अथवा सृष्टि नियम हैं। परन्तु मज़हब मनुष्य कृत होने से अप्राकृतिक अथवा अस्वाभाविक हैं। मज़हबों का अनेक व भिन्न भिन्न होना तथा परस्पर विरोधी होना उनके मनुष्य कृत अथवा बनावती होने का प्रमाण हैं।
४. धर्म के जो लक्षण मनु महाराज ने बतलाये हैं वह सभी मानव जाति के लिए एक समान है और कोई भी सभ्य मनुष्य उसका विरोधी नहीं हो सकता। मज़हब अनेक हैं और केवल उसी मज़हब को मानने वालों द्वारा ही स्वीकार होते हैं। इसलिए वह सार्वजानिक और सार्वभौमिक नहीं हैं। कुछ बातें सभी मजहबों में धर्म के अंश के रूप में हैं इसलिए उन मजहबों का कुछ मान बना हुआ हैं।
५. धर्म सदाचार रूप हैं अत: धर्मात्मा होने के लिये सदाचारी होना अनिवार्य हैं। परन्तु मज़हबी अथवा पंथी होने के लिए सदाचारी होना अनिवार्य नहीं हैं। अर्थात जिस तरह तरह धर्म के साथ सदाचार का नित्य सम्बन्ध हैं उस तरह मजहब के साथ सदाचार का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। क्यूंकि किसी भी मज़हब का अनुनायी न होने पर भी कोई भी व्यक्ति धर्मात्मा (सदाचारी) बन सकता हैं।
परन्तु आचार सम्पन्न होने पर भी कोई भी मनुष्य उस वक्त तक मज़हबी अथवा पन्थाई नहीं बन सकता जब तक उस मज़हब के मंतव्यों पर ईमान अथवा विश्वास नहीं लाता। जैसे की कोई कितना ही सच्चा ईश्वर उपासक और उच्च कोटि का सदाचारी क्यूँ न हो वह जब तक हज़रात ईसा और बाइबिल अथवा हजरत मोहम्मद और कुरान शरीफ पर ईमान नहीं लाता तब तक ईसाई अथवा मुस्लमान नहीं बन सकता।
६. धर्म ही मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं अथवा धर्म अर्थात धार्मिक गुणों और कर्मों के धारण करने से ही मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त करके मनुष्य कहलाने का अधिकारी बनता हैं। दूसरे शब्दों में धर्म और मनुष्यत्व पर्याय हैं। क्यूंकि धर्म को धारण करना ही मनुष्यत्व हैं। कहा भी गया हैं-
खाना,पीना,सोना,संतान उत्पन्न करना जैसे कर्म मनुष्यों और पशुयों के एक समान हैं। केवल धर्म ही मनुष्यों में विशेष हैं जोकि मनुष्य को मनुष्य बनाता हैं। धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान हैं। परन्तु मज़हब मनुष्य को केवल पन्थाई या मज़हबी और अन्धविश्वासी बनाता हैं। दूसरे शब्दों में मज़हब अथवा पंथ पर ईमान लेन से मनुष्य उस मज़हब का अनुनायी अथवा ईसाई अथवा मुस्लमान बनता हैं नाकि सदाचारी या धर्मात्मा बनता हैं।
७. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़ता हैं और मोक्ष प्राप्ति निमित धर्मात्मा अथवा सदाचारी बनना अनिवार्य बतलाता हैं परन्तु मज़हब मुक्ति के लिए व्यक्ति को पन्थाई अथवा मज़हबी बनना अनिवार्य बतलाता हैं। और मुक्ति के लिए सदाचार से ज्यादा आवश्यक उस मज़हब की मान्यताओं का पालन बतलाता हैं।
जैसे अल्लाह और मुहम्मद साहिब को उनके अंतिम पैगम्बर मानने वाले जन्नत जायेगे चाहे वे कितने भी व्यभिचारी अथवा पापी हो जबकि गैर मुसलमान चाहे कितना भी धर्मात्मा अथवा सदाचारी क्यूँ न हो वह दोज़ख अर्थात नर्क की आग में अवश्य जलेगा क्यूंकि वह कुरान के ईश्वर अल्लाह और रसूल पर अपना विश्वासनहीं लाया हैं।
८. धर्म में बाहर के चिन्हों का कोई स्थान नहीं हैं क्यूंकि धर्म लिंगात्मक नहीं हैं -न लिंगम धर्मकारणं
अर्थात लिंग (बाहरी चिन्ह) धर्म का कारण नहीं हैं।
परन्तु मज़हब के लिए बाहरी चिन्हों का रखना अनिवार्य हैं जैसे एक मुस्लमान के लिए जालीदार टोपी और दाड़ी रखना अनिवार्य हैं।
९. धर्म मनुष्य को पुरुषार्थी बनाता हैं क्यूंकि वह ज्ञानपूर्वक सत्य आचरण से ही अभ्युदय और मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देता हैं परन्तु मज़हब मनुष्य को आलस्य का पाठ सिखाता हैं क्यूंकि मज़हब के मंतव्यों मात्र को मानने भर से ही मुक्ति का होना उसमें सिखाया जाता हैं।
१०. धर्म मनुष्य को ईश्वर से सीधा सम्बन्ध जोड़कर मनुष्य को स्वतंत्र और आत्म स्वालंबी बनाता हैं क्यूंकि वह ईश्वर और मनुष्य के बीच में किसी भी मध्यस्थ या एजेंट की आवश्यकता नहीं बताता। परन्तु मज़हब मनुष्य को परतंत्र और दूसरों पर आश्रित बनाता हैं क्यूंकि वह मज़हब के प्रवर्तक की सिफारिश के बिना मुक्ति का मिलना नहीं मानता।
११. धर्म दूसरों के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति तक देना सिखाता हैं जबकि मज़हब अपने हित के लिए अन्य मनुष्यों और पशुयों की प्राण हरने के लिए हिंसा रुपी क़ुरबानी का सन्देश देता हैं।
१२. धर्म मनुष्य को सभी प्राणी मात्र से प्रेम करना सिखाता हैं जबकि मज़हब मनुष्य को प्राणियों का माँसाहार और दूसरे मज़हब वालों से द्वेष सिखाता हैं।
१३. धर्म मनुष्य जाति को मनुष्यत्व के नाते से एक प्रकार के सार्वजानिक आचारों और विचारों द्वारा एक केंद्र पर केन्द्रित करके भेदभाव और विरोध को मिटाता हैं तथा एकता का पाठ पढ़ाता हैं। परन्तु मज़हब अपने भिन्न भिन्न मंतव्यों और कर्तव्यों के कारण अपने पृथक पृथक जत्थे बनाकर भेदभाव और विरोध को बढ़ाते और एकता को मिटाते हैं।
१४. धर्म एक मात्र ईश्वर की पूजा बतलाता हैं जबकि मज़हब ईश्वर से भिन्न मत प्रवर्तक/गुरु/मनुष्य आदि की पूजा बतलाकर अन्धविश्वास फैलाते हैं।
धर्म और मज़हब के अंतर को ठीक प्रकार से समझ लेने पर मनुष्य अपने चिंतन मनन से आसानी से यह स्वीकार करके के श्रेष्ठ कल्याणकारी कार्यों को करने में पुरुषार्थ करना धर्म कहलाता हैं इसलिए उसके पालन में सभी का कल्याण हैं।

18/10/2014

by mo usman
मु•नगर-शामली, मोहब्बत नगर जैसे उपनाम और गुड गन्ने की मिठास के लिए प्रसिद्ध इलाका जहाँ मैं पैदा हुआ पला बढ़ा।पिछले दिनों तक जब कोई मुझसे मेरे इलाके की खासियत के बारे में पूछता था तो मैं तने हुए सीने के साथ बडे गर्व से जवाब देता था. ....मेरे जिले में साहब आप किसी भी गांव के किसी भी घर के सामने यूहीं खडे होकर देखिए कभी, जैसे ही आप पर किसी की नजर पडेगी तो वो आपका नाम पूछे बगैर आपको घर के अंदर ले जाकर सबसे पहले आपसे खाना पानी पूछेगा खिलाएगा और फिर कहेगा आपको किसके यहां जाना है? कोई परेशानी तो नहीं है?
लेकिन अब कुछ सत्ता के लोभी वहशी दरिंदों ने मुझे बार बार गर्वित करते रहने वाली मेरी 1947 से भी पूरानी विरासत को एक ही झटके में छीन लिया है।
अब ऐसे ही सवाल पर मेरा शरीर सिकुड़ सा जाता है, नजरे किसी अनजाने अपराध बोध से झुक जाती है और लरजती जबान से निकलता है. ............"आपने खबरों में तो देखा ही होगा वहीं मु•नगर शामली जहां पिछले दिनो साम्प्रदायिक दंगे हुए थे"

18/10/2014

By Refik chuhan
इस्लाम उस जीवन प्रणाली का नाम है जो स्वभाव से ही मनुष्य को अपेक्षइत है। रसूलों और नबियों को भेज कर अल्लाह ने मनुष्य को जिन चीजों को याद कराया है। वे उनकी प्रकरति और स्वभाव ही की मांग है।
इस्लाम विचार एवं व्यवहार का विधान है, जो बुद्धि विवेक और हमारी प्रकर्ति के सर्वथा अनुकूल है।इसी कारण कुरान ने इस्लाम को सरल मार्ग की उपमा दी है।
इसलिए इस्लामी आदेशों का उल्लंधन वास्तव में अपनी प्रक्रति और स्वभाव का विरोध और अल्लाह की रचना को विकरत करना है। इस्लाम ने जिन चीजों का आदेश दिया है,स्वभावत उन्हीं के द्वारा व्यक्ति को पूर्णता मिलती है और उन्हीं से मनुष्य का व्यक्तित्व निखरता और विकसित होता है।

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