02/08/2026
#मदकू द्वीप की विशेषताएँ और लोकश्रुति
(भाग – आठ)
#श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू के इतिहास के विलुप्त अध्याय
श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू आज छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक एवं धार्मिक धरोहरों में अपना विशिष्ट स्थान बना चुका है, किन्तु लगभग ढाई दशक पूर्व इसकी पहचान केवल शिवनाथ नदी के मध्य स्थित एक प्राकृतिक द्वीप तथा यहाँ आयोजित होने वाले मेलों तक ही सीमित थी। उस समय जब भी मदकू द्वीप का नाम लिया जाता था, लोगों की स्मृति में सर्वप्रथम यहाँ लगने वाले मेलों का ही उल्लेख आता था। बहुत कम लोग यह जानते थे कि यह द्वीप अपने भीतर हजारों वर्षों के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के अमूल्य साक्ष्य संजोए हुए है।
यद्यपि भगवान धूमनाथ की प्राचीन प्रतिमा, अष्टभुजी श्रीगणेश की दुर्लभ मूर्ति तथा राधाकृष्ण एवं हनुमान मंदिरों की दीवारों में प्रयुक्त प्राचीन मंदिरों के शिलाखंड इस तथ्य की ओर संकेत करते थे कि यह स्थान किसी समय अत्यंत समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा, तथापि पर्याप्त पुरातात्त्विक प्रमाणों के अभाव में इस तथ्य को प्रमाणिक रूप से स्थापित नहीं किया जा सका था।
इसी समय समाजसेवी एवं मदकू द्वीप के संरक्षण के लिए समर्पित श्रद्धेय शांताराम जी ने इस स्थान के वास्तविक इतिहास को सामने लाने का संकल्प लिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि मदकू द्वीप प्राचीन हरिहर क्षेत्र रहा है तथा इसका इतिहास अत्यंत गौरवशाली है। उन्होंने पुरातत्वविदों और संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के अधिकारियों से निरंतर संपर्क कर मदकू द्वीप में वैज्ञानिक पुरातात्त्विक सर्वेक्षण कराने का आग्रह किया। वस्तुतः मदकू के पुरातन वैभव को पुनः प्रतिष्ठित करना उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य बन गया था।
उनके सतत प्रयासों के फलस्वरूप संस्कृति विभाग द्वारा "मदकू महात्म्य" नामक एक पुस्तिका प्रकाशित की गई, जिसके साथ एक वृत्तचित्र (सीडी) भी संलग्न था। इस वृत्तचित्र में पुराविद् श्री राहुल सिंह ने मदकू द्वीप के ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि इंडियन एपिग्राफी प्रतिवेदन (1959–60) में मदकू घाट (द्वीप) से प्राप्त दो प्राचीन शिलालेखों का उल्लेख मिलता है।
इनमें पहला शिलालेख ब्राह्मी लिपि में अंकित है, जिसका काल लगभग तृतीय शताब्दी ईस्वी माना गया है। इसमें किसी "अक्षयनिधि" का उल्लेख होने का संकेत मिलता है, किन्तु शिलालेख अत्यधिक घिस जाने के कारण उसका संपूर्ण पाठ पढ़ा नहीं जा सका। दूसरा शिलालेख शंखलिपि में उत्कीर्ण है। शंखलिपि भारतीय उपमहाद्वीप की अत्यंत रहस्यमयी एवं अब तक पूर्णतः अपठित लिपियों में गिनी जाती है। विद्वानों के अनुसार इसका प्रचलन मुख्यतः चौथी से आठवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य रहा, यद्यपि कुछ विद्वान इसका प्रारंभ तृतीय शताब्दी ईस्वी से भी मानते हैं। इस कारण यह शिलालेख भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हो सकता है।
बताया जाता है कि ये दोनों शिलालेख तत्कालीन दक्षिण-पूर्वी पुरातात्त्विक मंडल, विशाखापट्टनम के कार्यालय में सुरक्षित रखे गए थे। इस जानकारी के उपरांत शांताराम जी ने इन शिलालेखों का पता लगाकर उन्हें पुनः छत्तीसगढ़ लाने का भरसक प्रयास किया, किन्तु उन्हें अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। आज भी यह स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है कि वे दोनों शिलालेख वर्तमान में कहाँ सुरक्षित हैं तथा उनमें अंकित अभिलेखों का वास्तविक आशय क्या है। यदि इनका वैज्ञानिक अध्ययन एवं सफल पाठ हो सके, तो मदकू द्वीप के प्रारंभिक इतिहास के अनेक अज्ञात तथ्य प्रकाश में आ सकते हैं।
मदकू द्वीप का इतिहास केवल ऐतिहासिक काल तक सीमित नहीं है। यहाँ से प्रागैतिहासिक काल के अनेक लघु पाषाण उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। ये उपकरण इस तथ्य के सशक्त प्रमाण हैं कि इस क्षेत्र में अत्यंत प्राचीन काल से मानव का निवास अथवा सतत आवागमन रहा है। इस प्रकार मदकू द्वीप का मानव इतिहास हजारों वर्ष पूर्व तक पहुँचता है।
इसके पश्चात् वर्ष 2011 में पुरातत्त्व विभाग द्वारा किए गए वैज्ञानिक उत्खनन ने मदकू द्वीप की ऐतिहासिक महत्ता को नई पहचान प्रदान की। उत्खनन में दसवीं, ग्यारहवीं एवं बारहवीं शताब्दी ईस्वी के एक ही विशाल पीठ पर निर्मित अठारह मंदिरों का समूह प्राप्त हुआ। इन मंदिरों से भगवान लक्ष्मीनारायण, उमा-महेश्वर, अनेक शिवलिंग तथा द्वादश स्मार्त लिंग प्राप्त हुए। यह खोज इस तथ्य का सशक्त प्रमाण है कि उस काल में मदकू द्वीप केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वैष्णव, शैव तथा स्मार्त परम्पराओं के समन्वित उपासना-केंद्र के रूप में विकसित था।
यदि मदकू द्वीप से प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्यों को कालक्रम में देखा जाए, तो यहाँ से प्रागैतिहासिक लघु पाषाण उपकरण, तृतीय शताब्दी ईस्वी का ब्राह्मी शिलालेख, शंखलिपि का शिलालेख तथा उसके बाद सीधे दसवीं से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के भव्य मंदिरों के अवशेष प्राप्त होते हैं। इस क्रम में चौथी से नौवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य का लगभग छह शताब्दियों का इतिहास अभी भी रहस्य के आवरण में है। इस अवधि में मदकू द्वीप का राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्वरूप क्या था, यहाँ किस राजवंश का प्रभाव था तथा यह क्षेत्र किन ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी बना—ये सभी प्रश्न अभी भी गहन अनुसंधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
निस्संदेह यह कालखंड केवल मदकू द्वीप ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हो सकता है। यदि पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग इस विषय पर व्यवस्थित उत्खनन, अभिलेखीय अध्ययन, शिलालेखों की पुनः खोज तथा वैज्ञानिक अनुसंधान कराए, तो श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप मदकू का वास्तविक और गौरवशाली इतिहास विश्व के समक्ष प्रतिष्ठित हो सकेगा। यह केवल एक पुरास्थल का इतिहास नहीं होगा, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सनातन परम्परा के विकास की एक अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर का पुनः उद्घाटन होगा।
#मदकूद्वीपकीविशेषताएंऔरलोकश्रृति